अप्रेंटिस कानून के तहत मज़दूरों की हालत

केंद्र सरकार ने श्रम कानून संबंधी एक नया मसौदा तैयार किया है जिसे औद्योगिक संबंध संहिता कहा जा रहा है। यह संहिता कई मौजूदा कानूनों की जगह लेगी, जैसे - औद्योगिक विवाद अधिनियम, ट्रेड यूनियन अधिनियम और औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम। मज़दूर वर्ग पर हमले और तेज़ करने के मकसद से सरकार ने नवंबर 2014 में अप्रेंटिस कानून में संशोधन करते हुए, नौजवान मज़दूरों को नियमित नौकरी दिये बगैर उनका अत्यधिक शोषण करने की प्रथा को कानूनी रूप दिया। इस कानून के तहत नौजवान मज़दूरों को बरसों तक न्यूनतम वेतन दिए बगैर ही काम पर रखा जा सकता है और अवकाश व अन्य तमाम सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है। इसके अलावा पूंजीपतियों द्वारा स्थायी मज़दूरों की जगह पर प्रशिक्षु और अप्रेंटिस मज़दूरों से काम कराने को आसान बनाने के लिए राष्ट्रीय रोज़गार क्षमता वृद्धि मिशन (नीम) की शुरुआत की गई है। इस मिशन के तहत पूंजीपति नौजवान मज़दूरों को तीन साल की “ट्रेनिंग” के नाम पर बेहद कम वेतन पर रख सकते हैं और उनको तमाम कानूनी सुविधाओं से वंचित कर सकते हैं। मज़दूर और उनकी यूनियनें पूंजीपतियों द्वारा मज़दूर वर्ग पर इस हमले के खि़लाफ़, अपने अधिकारों के लिए अलग-अलग तरीकों से लड़ रही हैं।

पिछले कुछ दशकों से अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में अधिकतर मज़दूरों को “गैर-स्थायी” मज़दूरों के रूप में ही काम पर रखा जा रहा है। तमिलनाडु में ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स और विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों में नौजवान महिला और पुरुष मज़दूरों को बेहद कम वेतन पर प्रशिक्षु या अप्रेंटिस के रूप में काम पर लिया जा रहा है। इन प्रशिक्षु या अप्रेंटिस मज़दूरों को ट्रेनिंग देने की आड़ में उनको उत्पादन लाइनों में लगाया जा रहा है और उनसे वही काम कराये जा रहे हैं जो कि एक स्थायी मज़दूर से कराये जाते हैं, लेकिन उन्हें वेतन का अंशमात्र हिस्सा ‘स्टाईपेंड’ के रूप में दिया जाता है। आउटसोर्सिंग और कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरी जैसे श्रम कानूनों में बदलाव केवल इस मकसद से किये जा रहे हैं कि पूंजीपति मालिकों का मज़दूरी पर खर्चा कम हो और उनके मुनाफ़े खूब बढ़ें। क्योंकि प्रशिक्षु या अप्रेंटिस मज़दूरों को पूरा वेतन देने के बजाय केवल स्टाईपेंड देना होता है और इसके अलावा कंपनी पर सामाजिक सुरक्षा पर खर्चे का बोझ भी कम हो जाता है।

औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम और अप्रेंटिस कानून के तहत प्रशिक्षु या अप्रेंटिस मज़दूरों को निर्धारित समय के लिए काम पर रखे जाने का प्रावधान है। इन मज़दूरों को स्थायी करना या फिर उनको नौकरी से निकाल देना, यह पूरी तरह से पूंजीपति मालिकों की मनमर्जी पर छोड़ दिया गया है। प्रशिक्षु या अप्रेंटिस मज़दूरों को 4 से 7 वर्ष तक इसी स्थिति में रखा जाता है और उनके स्थायी और नियमित रोज़गार पाने की बहुत कम उम्मीद होती है। ऐसे ही कुछ मज़दूरों ने नौकरी से बर्खास्त किये जाने पर कानून का सहारा लिया है और उन्हें अस्थायी तौर पर कुछ जीत भी हासिल हुई है। तमिलनाडु के श्री पेरूम्बुदुर में हिंदुजा फाउंड्रीज में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां अदालत ने बर्खास्त मज़दूरों की पुनः बहाली के आदेश दिए हैं।

ख़बरों के अनुसार, एक मज़दूर जिसने अदालत में मामला दर्ज किया है, उसने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में आई.टी.आई. से डिप्लोमा हासिल करने के बाद हिंदुजा फाउंड्रीज में काम करना शुरू किया। उसके साथ कई और प्रशिक्षु मज़दूर भी थे और उनमें से कुछ मज़दूरों को पिछले वर्ष नियमित किया गया था। लेकिन जब स्थायी मज़दूरों ने अपनी यूनियन बनाने की कोशिश की तब मैनेजमेंट ने जल्द नियमित होने वाले प्रशिक्षु मज़दूरों को बर्खास्त करना शुरू कर दिया। मैनेजमेंट ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि यदि ये मज़दूर भी स्थायी हो जाते तो यूनियन की ताक़त बढ़ जाती। तीन प्रशिक्षु मज़दूर जिन्होंने अदालत में मामला दर्ज़ किया है उनमें से दो ऑपरेटर का काम करते थे, जबकि एक क्वालिटी कंट्रोल में था। इन तीनों मज़दूरों की एक वर्ष की प्रशिक्षण अवधि के बाद, उस अवधि को और एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया था। इन मज़दूरों को पहले दिन से ही उत्पादन लाईन में काम करने पर लगाया गया था, लेकिन उनको “प्रशिक्षु” ही कहा जाता था। वैसे तो अदालत ने इन मज़दूरों की पुनः बहाली के आदेश दिए हैं और जबसे उनकी प्रशिक्षण की अवधि समाप्त हुई है उस समय से नियमित मज़दूरों जैसे वेतन देने के निर्देश दिये हैं, लेकिन हिंदुजा फाउंड्रीज ने इस बात पर अमल नहीं किया है। अब मज़दूरों ने मैनेजमेंट के खि़लाफ़ कोर्ट की अवमानना का मामला दर्ज़ किया है, जिसकी सुनवाई कांचीपुरम कोर्ट में की जाएगी।

वाब्को कंपनी के एक मज़दूर के साथ ऐसा ही हुआ है। उसकी प्रशिक्षण अवधि को तीन बार बढ़ाया गया और उसके बाद उसे एक वर्ष के प्रोबेशन पर रखा गया था। प्रोबेशन अवधि का अंत होने पर उस मज़दूर को जबरदस्ती बर्खास्त कर दिया गया। अपने फैसले को सही साबित करने के लिए मैनेजमेंट ने मज़दूर के खि़लाफ़ झूठे आरोप लगाये जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिए।

एशियन पेंट्स के एक मज़दूर के साथ भी ऐसा ही हुआ, जब उसे प्रशिक्षण के बाद एक वर्ष के लिए प्रोबेशन पर रखा गया और उसके बाद उसे भी बर्खास्त कर दिया गया। इस मामले में भी कोर्ट ने पूरे बकाया वेतन के साथ उसकी पुनः बहाली के आदेश दिए हैं।

नियमित और स्थायी मज़दूरों की जगह पर प्रशिक्षु और अप्रेंटिस मज़दूरों को काम पर रखने की प्रथा काफी जोर पकड़ रही है। मज़दूरों को लम्बे मुकदमे के बाद जो कुछ जीत हासिल होती है वह भी बड़ी ही अस्थायी होती है, क्योंकि पूंजीपति मालिक और मैनेजमेंट के पास अपार संसाधन होते हैं, जिनका इस्तेमाल करके वे मामले को टालते हैं।

ऐसे प्रशिक्षु मज़दूरों को कम वेतन देकर उनसे काम कराने के अलावा, पूंजीपति मालिक स्थायी मज़दूरों की हड़ताल को ताड़ने के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं। जब स्थायी मज़दूर हड़ताल पर जाते हैं तो मैनेजमेंट इन प्रशिक्षु मज़दूरों से वही काम कराते हैं जो स्थायी मज़दूर करते हैं। इससे साफ दिखता है कि भले ही ऐसे मज़दूरों को प्रशिक्षु या अप्रेंटिस कहा जाता है, लेकिन ये मज़दूर नियमित उत्पादन की प्रक्रिया चलाने के लिए पूरी तरह से काबिल होते हैं।

मज़दूरों की इस जीत से अन्य क्षेत्रों के मज़दूरों को भी पूंजीपतियों द्वारा चलाये जा रहे इन नाजायज़ हमलों का प्रतिरोध करने की प्रेरणा और उत्साह मिलता है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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