हरियाणा के बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी हड़ताल पर

हरियाणा के बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी (एम.पी.एच.डब्ल्यू.) जो कि पूरे समुदाय तक निवारक और प्रचारक स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं पहुंचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं, उन्होंने 27 अगस्त से हरियाणा के सभी जिलों में हड़ताल कर दी है। बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी सामुदायिक स्वास्थ्य के कई महत्वपूर्ण पहलुओं के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, जैसे घर-घर जाकर बीमार लोगों की पहचान करना, स्वास्थ्य योजनाओं में लोगों की भागीदारी को बढ़ाना, महामारी के बारे में जानकारी देना और उसपर नियंत्रण करना, बीमार लोगों को रेफेरल के लिए भेजना, रिकॉर्ड रखना, टीकाकरण के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करना, माता और बालक के लिए स्वास्थ्य और पोषण (एम.सी.एच.एन.) सेवाएं प्रदान करना, मलेरिया, टी.बी. जैसी बीमारियों के लिए प्राथमिक जांच करना, संक्रामक रोगों से ग्रसित लोगों के उपचार का फॉलोअप करना, गणना करना, स्वास्थ्य अभियान आयोजित करना, इत्यादि।

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हड़ताल पर बैठे बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों पर बहुत दबाव डाला गया कि वे हड़ताल पर न जायें, लेकिन वे उस दबाव के सामने नहीं झुके। 29 अगस्त को राज्य सरकार ने उनके खि़लाफ़ छः महीने के लिए आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम 1974 (एस्मा) लागू किया। इसके तुरंत बाद 6 सितंबर को हिसार जिला न्यायाधीश ने बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों की यूनियन के 11 नेताओं और एक ए.एन.एम. के नेता को इस कानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया। कुछ जिलों में हड़ताल कर रहे कर्मचारियों को अधिकारियों की तरफ से नोटिस जारी किये गए और उनसे काम पर न आने के कारण बताने को कहा गया।

लेकिन, इन तमाम दबावों और धमकियों के बावजूद बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपनी हड़ताल जारी रखी। उनका जवाब था - “हम एस्मा जैसे काले कानूनों से घबराते नहीं हैं। हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे और अपनी मांगें हासिल करके रहेंगे”। हड़ताल के 10वें दिन कुछ कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों के समर्थन में अपना सिर मुंडवा लिया और हड़ताल जारी रखी।  

बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों की मांगें इस प्रकार हैं :

  • कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों को नियमित करना और आउटसोर्सिंग की नीति का अंत करना
  • तक कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों को नियमित नहीं किया जाता है तब तक उनको समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित करना
  • -उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों को तकनीकी कर्मचारी का दर्ज़ा देना
  • रुपये का ग्रेड-वेतन लागू करना
  • रुपये का निर्धारित यातायात भत्ता देना
  • और बाल स्वास्थ्य (आर.सी.एच.) से जुड़े सभी कर्मचारियों के लिए समान भत्ता लागू करना
  • आयोग की सिफारिशों की तुलना में विसंगतियों को दूर करना और सभी के लिए कैश-लेस सुविधा देना

बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी 2010 से अपनी मांगों को लगातार उठाते आये हैं। उनकी इन मांगों का राज्य सरकार ने जब कोई जवाब नहीं दिया तब कर्मचारियों ने ‘बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी एसोसिएशन’ की अगुवाई में 19 से 23 नवम्बर के बीच चार दिन के लिए झज्जर जिले में हरियाणा के शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री के घर के सामने धरना आयोजित किया।

एसोसिएशन के राज्य अध्यक्ष और सचिव ने बताया कि वे कई बार अधिकारियों से मिले और उनसे अपनी मांगें पूरी करने की अपील की, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। 

“स्वास्थ्य कर्मचारियों को राज्य सरकार की तरफ से खोखले आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। हमारा एसोसिएशन कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मचारियों को नियमित किये जाने और वेतन में विसंगतियां दूर करने की मांग लगातार करता आया है। 2010 से यह सिलसिला चल रहा है।”   

अगस्त 2015 में आयोजित हड़ताल के बाद राज्य सरकार ने बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों की मांगें मान लीं, लेकिन अभी तक उनको लागू नहीं किया। 

फिर दिसम्बर 2017 में राज्य के बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किये। स्वास्थ्य विभाग के उदासीन रवैये की वजह से बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों को सड़क पर उतरना पड़ा। राज्य के अधिकारियों ने एक बार फिर बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों की पहले से स्वीकार की गयी मांगों पर कार्यवाही करने का आश्वासन दिया, लेकिन बात वहीं की वहीं रह गयी।

वे चाहे आशा कार्यकर्ता हो, आंगनवाड़ी कर्मचारी हों, बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारी हों, इन मज़दूरों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य का रवैया बेहद निंदनीय है। सरकार द्वारा घोषित की गई हर एक योजना के साथ-साथ इन मज़दूरों के काम का बोझ बस बढ़ता ही जाता है। उनको नियमित नौकरी नहीं दी जाती है और केवल अस्थायी या कॉन्ट्रैक्ट मज़दूर के तौर पर रखा जाता है, और समान काम के लिए बेहद कम वेतन दिया जाता है। एक अस्थायी कर्मचारी को केवल 4,000-8,000 रुपये प्रतिमाह मिलता है।

हरियाणा के बहु-उद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों का संघर्ष पूरी तरह से जायज़ है। उनके खि़लाफ़ एस्मा कानून लगाये जाने की घोर निंदा की जानी चाहिए। हरियाणा सरकार का दावा है कि उनपर एस्मा कानून इसलिए लगाया गया क्योंकि हड़ताल की वजह से आम लोगों को तकलीफ़ होगी। यदि सरकार यह मानती है कि लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा देना बेहद महत्वपूर्ण है तो, जो कर्मचारी इन सेवाओं को लोगों तक पहुंचा रहे हैं उनके साथ नियुक्ति, वेतन, पद और तमाम मामलों में सही बर्ताव किया जाना चाहिए।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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