प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान योजना : किसानों को धोखा देने और पूंजीपति व्यापारियों की तिजोरियां भरने के मकसद से बनाई गयी योजना

पिछले कुछ वर्षों में देशभर के किसान अपने लिए आजीविका की सुरक्षा की मांग को लेकर बार-बार सड़कों पर उतरते आ रहे हैं। एक मांग यह है कि सरकार उनकी फसलों के लिए लागत की क़ीमत के 1.5 गुना दाम की गारंटी दे और इसे सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी तंत्र स्थापित करे।

किसानों की इस मांग को पूरा करने की बजाय सरकार ऐसी योजनाओं की घोषणा कर रही है जो कृषि व्यापार पर नियंत्रण करने वाले पूंजीपतियों के हित में हैं और किसानों के ख़िलाफ़ हैं। 12 सितम्बर, 2018 को सरकार ने एक नयी योजना प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पी.एम.-आशा) की घोषणा की। सरकार का दावा है कि इस योजना के तहत किसानों के लिए फसलों को लाभकारी क़ीमत पर ख़रीदे जाने की गारंटी होगी। 

Kisan sansad  

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इस “अम्ब्रेला योजना” के तीन हिस्से हैं :

पहला हिस्सा है मूल्य समर्थन योजना (पी.एस.एस.), जिसके तहत केंद्र सरकार और राज्य सरकार किसानों से दालें, तिलहन और सूखे नारियल की फसलों की खरीदी करेगी।

इससे पहले, अपनी फसलों के लिए उत्पादन मूल्य का 1.5 गुना क़ीमत की किसानों की मांग के संदर्भ में, 4 जुलाई को केंद्र सरकार ने ऐलान किया था कि उसने 14 ख़रीफ़ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) में बढ़ोतरी की है। इन फसलों के लिए सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है वह उत्पादन मूल्य के 1.5 गुना क़ीमत से बहुत कम है। यहां तक कि यह क़ीमत राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित किये गये न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम है।

खेती के हर मौसम में सरकार एक या दूसरी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। लेकिन गेहंू और धान को छोड़कर किसी भी अन्य फसल को खरीदने की ज़िम्मेदारी सरकार नहीं उठाती, और यहां तक कि गेहूं और धान के मामले में भी केवल 4 राज्यों में 20 प्रतिशत से भी कम अनाज की खरीदी सरकार द्वारा की जाती है। अधिकतर मामलों में किसान अपनी फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य से बहुत कम दाम पर खुली मंडियों में बेचने के लिए मजबूर होते हैं। फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर न ख़रीदा जाये, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई भी तंत्र मौजूद नहीं है। फसलों की खरीदी की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी गयी है और हर एक राज्य में खरीद के तंत्र अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों में तो कोई भी ख़रीदी नहीं की जाती है। इस वजह से किसान बड़े व्यापारियों के रहमों-करम पर रह जाते हैं।

किसानों को इस धोखे में नहीं रहना चाहिए कि सरकार उनकी दालों, तिलहन और सूखे नारियल की फसल को लाभकारी दाम पर या सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। ऐसा करने के लिए सरकार के पास कोई भी तंत्र मौजूद नहीं है और दरअसल इनकी खरीदी मंडियों में आयोजित की जाती है। सरकार के इस ऐलान का मकसद है हमारे लड़ाकू किसानों के बीच फूट पैदा करना और उनको सांझे संघर्ष से भटकाना। किसानों का यह सांझा संघर्ष इस मांग को लेकर है कि सरकार सभी फसलों को उत्पादन मूल्य से 1.5 गुना दाम पर खरीदने की ज़िम्मेदारी उठाये।

12 सितंबर, 2018 को सरकार ने जिस दूसरी योजना का ऐलान किया है उसे मूल्य कमी भुगतान योजना (प्राइस डेफिशियेंसी पेमेंट स्कीम - पी.डी.पी.एस.) कहा गया है। इस योजना के तहत किसानों को मंडियों में मिलने वाली क़ीमत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच जो भी कमी होगी, सरकार उस रकम को किसानों के बैंक खाते में जमा करेगी।

यह योजना मध्य प्रदेश सरकार की भावांतर भुगतान योजना (बी.बी.वाई.) से बिल्कुल भी अलग नहीं है और यह योजना मध्य प्रदेश के किसानों के लिए पूरी तरह से नाकाम रही है। इस बुरी तरह से नाकाम “भावांतर” योजना को अब नयी योजना के रूप में पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जा रही है। मध्य प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना को अगस्त 2017 में शुरू किया गया था और इस योजना के तहत राज्य की 257 मंडियों में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर बेची गयी फसल से होने वाले नुकसान की भरपाई करने का दावा किया गया था। यह योजना उड़द दाल, मूंगफली और सोयाबीन समेत 7 फसलों पर लागू होनी थी। अक्तूबर से दिसम्बर 2017 के बीच की अवधि में की जाने वाली पहली बिक्री के लिए 21 लाख किसानों ने इस योजना के तहत अपना नाम दर्ज़ कराया।

लेकिन जब किसान अपनी फसल को लेकर मंडी पहुंचे तो उनको पता चला कि सरकार उनके नुकसान की भरपाई बिक्री की असली क़ीमत के आधार पर नहीं बल्कि पूरे राज्य में बिक्री क़ीमत के औसतन मूल्य के आधार पर कर रही है। यह पूरे राज्य के लिये निर्धारित एक औसतन मूल्य है, जिसे मोडल क़ीमत कहा जाता है। यह मोडल क़ीमत किसी फसल के लिए देशभर में उस फसल के प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौजूदा क़ीमत के आधार पर तय किया जाता है। यदि कोई किसान अपनी फसल को मोडल क़ीमत से अधिक दाम पर बेचता है तो सरकार उसे असली बिक्री क़ीमत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान करती है। लेकिन यदि कोई किसान अपनी फसल को मोडल क़ीमत से कम दाम पर बेचता है तो सरकार उसे केवल मोडल क़ीमत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच के अंतर का ही भुगतान करती है। ऐसी हालत में मोडल क़ीमत और असली क़ीमत के बीच के अंतर से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए कोई भी प्रावधान नहीं है। कई इलाकों में यह अंतर काफी ज्यादा था।

कई ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें उड़द दाल, सोयाबीन और मूंगफली पैदा करने वाले किसानों को अपनी फसल मोडल क़ीमत से 1000 रुपये प्रति टन से भी कम दाम पर बेचनी पड़ी। फसल ख़रीदी के एक लाख ऐसे मामले हैं जिनमें 470 व्यापारियों ने किसानों से फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य के 60 प्रतिशत से भी कम दाम पर खरीदी थी। 29,000 ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें फसल की क़ीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य के 30 प्रतिशत से भी कम थी। कुछ मंडियों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें कुछ व्यापारियों ने कुछ किसानों से, फसल को कई हिस्सों में बांटकर, हर हिस्से की अलग-अलग ख़रीदारी की है। हर ख़रीदारी में किसान को दी गई क़ीमत मंडी में तत्कालीन मूल्य से कम थी और न्यूनतम समर्थन मूल्य से बहुत ही कम थी।

इसके अलावा, कई जगहों पर किसानों को मजबूरी में अपनी फसल बहुत कम दाम पर बेचनी पड़ी। यदि सोयाबीन उगाने वाले किसी किसान ने इस योजना के तहत अपना नाम दर्ज़ कराया था तो उसे अपनी फसल 16 अक्तूबर से 31 दिसम्बर के बीच में ही बेचनी थी। इस तरह की समय की मियाद सभी ख़रीफ़ फसलों के लिए तय की गयी थी। इस वजह से सभी किसानों को एक ही समय पर अपनी फसल मंडी में लाने को मजबूर होना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि मंडी में उत्पादों की मांग की तुलना में आपूर्ति बहुत अधिक बढ़ गई और इससे फसल के दाम एकदम से नीचे गिर गए। स्थिति और गंभीर बन गई जब सरकार ने बी.बी.वाई. के तहत भरपाई की जाने वाली फसल की मात्रा को ही सीमित कर दिया।  

जबकि 11 सितम्बर से 25 नवम्बर 2017 के बीच मध्यप्रदेश के 98 लाख किसानों में से 20 लाख किसानों ने बी.बी.वाई. योजना के तहत खुद को पंजीकृत किया, लेकिन अपने कड़वे अनुभव के आधार पर इनमें से अधिकतर किसान रबी के मौसम में इस योजना से दूर ही रहे। अब सरकार ऐसी किसान-विरोधी और व्यापारी-परस्त योजना को पूरे देश में लागू करने की कोशिश कर रही है।

इस योजना का तीसरा हिस्सा है निजी खरीद और जमाखोर योजना का पायलट (पायलट ऑफ़ प्राइवेट प्रोक्योरमेंट स्टॉकिस्ट स्कीम - पी.पी.एस.एस.)। इस योजना के तहत तिलहन की खरीदी को निजी क्षेत्र के व्यापारियों के हाथों में देने का प्रस्ताव किया जा रहा है। हर एक राज्य सरकार को अपने-अपने राज्य के चुनिंदा जिलों या कृषि उत्पाद मार्केटिंग केंद्रों (ए.पी.एम.सी.) में इस योजना को निजी जमाखोरों के ज़रिये लागू करने के लिए खुली छूट दी जा रही है। इस योजना के तहत जब मंडियों में फसल की क़ीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होती है, या जब राज्य सरकार या केन्द्र शासित प्रदेषों में केन्द्र सरकार आदेश देती है, तो कुछ चुनिंदा निजी व्यापारी निर्धारित अवधि के दौरान, पी.पी.एस.एस. दिशा-निर्देशों के अनुसार, फसल को मंडियों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेंगे।

निजी खरीद और जमाखोर योजना के ज़रिये सरकार एक बार फिर कृषि उत्पादों के बाज़ार में निजी कंपनियों को प्रवेश करने की इजाज़त देने की कोशिश कर रही है। जबकि कृषि उत्पादों को सही दाम पर खरीदना सरकार की ज़िम्मेदारी है, तो सरकार इस ज़िम्मेदारी से पीछे हट रही है और इसे जायज़ ठहराने के लिये उपरोक्त योजना को पेश कर रही है।

पी.डी.पी.एस. और निजी खरीद और जमाखोर योजना का पायलट पी.पी.एस.एस., ये दोनों योजनायें कृषि व्यापार में बड़े निजी पूंजीवादी व्यापारियों के प्रवेश के लिए रास्ते खोल रही हैं जिससे ये निजी पूंजीवादी व्यापारी फसल की क़ीमतों से खिलवाड़ करते हुए अधिकतम मुनाफ़े बना सकें।

देशभर में किसान और उनके संगठन, सरकार द्वारा उनके साथ किये जा रहे इस घोटाले और धोखे को ठुकरा रहे हैं। एक तरफ सरकार किसानों के लिए बेहतर सौदे देने के नाम पर एक के बाद एक योजना का ऐलान कर रही है और दूसरी तरफ कृषि उत्पादों के बाज़ारों को कृषि व्यापार पर हावी पूंजीवादी इजारेदार कंपनियों के प्रवेश के लिए खोल रही है। किसानों को कृषि व्यापार पर हावी और कृषि लागत व कृषि उत्पादों की क़ीमतों के साथ खिलवाड़ करने वाली पूंजीवादी इजारेदार कंपनियों के रहमो-करम के भरोसे छोड़ दिया जा रहा है। देशभर में लाखों-करोड़ों किसानों की आजीविका के साधनों के छीने जाने के पीछे यही कारण है। न्यूनतम समर्थन मूल्य हो, भावांतर योजना हो, या प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना हो या फिर ये सारी नयी योजनाएं हों, ये सभी किसानों को धोखा देने के मकसद से बनायी जा रही हैं। जब सरकार यह दावा करती है कि वह किसानों के लिए आजीविका सुनिश्चित करने के बारे में चिंतित है तब वह सबसे बड़ा झूठ बोल रही है।

किसानों के लिए आजीविका की सुरक्षा तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब राज्य कृषि उत्पादों के थोक व्यापार को पूरी तरह से अपने हाथों में लेता है और उसे सामाजिक नियंत्रण में लाता है। सभी फसलों की लाभकारी मूल्य पर खरीदी सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी राज्य को लेनी होगी। किसानों की यह मांग है और वे अपने जायज़ अधिकारों की लड़ाई के लिए संघर्ष के मैदान में डटे हुए हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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