बेगुनाह मज़दूर झूठे आरोपों में गिरफ़्तार

12 जनवरी, 2018 को ठाणे में महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते (ए.टी.एस.) ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चार मज़दूरों, एक कांट्रेक्टर और एक अस्थायी मज़दूर को गिरफ़्तार किया था। इससे एक दिन पहले मज़दूर यूनियन के एक कार्यकर्ता को गिरफ़्तार किया गया था। इन सभी के ख़िलाफ़, गिरफ़्तारी से दो सप्ताह पहले हुई, भीमा-कोरेगांव की घटना के संदर्भ में यू.ए.पी.ए. के तहत आरोप लगाये गए हैं।

लेकिन जैसे-जैसे इस मामले में खुलासा होता गया, यह बात सामने आने लगी कि उनकी गिरफ़्तारी का भीमा-कोरेगांव की घटना से कोई संबंध नहीं है। 25 जनवरी को ए.टी.एस. ने रिलायंस के एक और मज़दूर को गिरफ़्तार किया। इन सभी मज़दूरों को यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ़्तार किया गया है न कि मकोका के तहत, जबकि इस केस को मकोका केस बतौर दर्ज़ किया गया है।UAPA

गिरफ़्तारी के नौ महीने बाद भी ये मज़दूर मुंबई की जेलों में बंद हैं। गिरफ़्तारी के बाद 15 जनवरी को मुंबई इलेक्ट्रिक एम्प्लाइज़ यूनियन के नेता महाराष्ट्र गृह विभाग के सचिव से मिले और ए.टी.एस. द्वारा की गयी कार्यवाही पर विरोध जताया। 17 जनवरी को वे ए.टी.एस. के अधिकारियों से भी मिले। इसके बाद 30 जनवरी को उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को पत्र भेजा। लेकिन इन सभी प्रयासों का कोई असर नहीं हुआ।

पुलिस ने दावा किया है कि ये सभी मज़दूर माओवादी हैं और फ़र्ज़ी पहचान से यहां रहते हैं। इन सभी दावों को झुठलाते हुए तमाम सबूत पेश किये गए जो यह दिखाते हैं कि ये मज़दूर रिलायंस एनर्जी के कर्मचारी हैं, पंजीकृत मज़दूर यूनियन के सदस्य हैं और 5-15 वर्ष से काम कर रहे हैं और उनका पता भी स्थायी है। लेकिन इन सभी सबूतों के बावजूद उनपर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए। पुलिस ने दावा किया कि इन सभी मज़दूरों के घर से माओवादी साहित्य बरामद किया गया है, जैसे कि केवल माओवादी साहित्य रखना किसी को आतंकवादी साबित करता है।

ये मज़दूर यूनियन के संघर्षों में सक्रियता से हिस्सा लेने वाले मज़दूर हैं। रिलायंस एनर्जी/इन्फ्रास्ट्रक्चर के पांच मज़दूर मुंबई इलेक्ट्रिक एम्प्लाइज़ यूनियन के संस्थापक सदस्य हैं और उसकी समिति के सदस्य हैं। कई वर्षों से यह यूनियन मज़दूरों के लिए बेहतर वेतन और काम के लिए बेहतर वातावरण की मांग को लेकर संघर्ष चलाती आई है। यह बात बिलकुल साफ़ है कि महाराष्ट्र सरकार इन मज़दूरों पर बेबुनियादी और झूठे आरोप लगाने तथा उन्हें आतंकित करने के लिए, भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के कांड का बहाना बना रही है।

जो आठ मज़दूर गिरफ़्तार किये गए हैं वे सभी आंध्र प्रदेश/तेलंगाना से आये हुए प्रवासी मज़दूर हैं। गिरफ़्तार करते समय उनको कोई भी अग्रिम नोटिस या गिरफ़्तारी का वारंट नहीं दिया गया था। उनके पूरे घर को उथल-पुथल कर दिया गया और उनकी व्यक्तिगत चीजों को बर्बाद कर दिया गया। इन मज़दूरों ने अपने वकील और परिजनों को बताया है कि हिरासत के दौरान पुलिस ने उनको बुरी तरह से मारा है।

उनका परिवार बेहद ग़रीबी में जैसे-तैसे कुछ मदद से गुज़ारा कर रहा है। इनमें से एक मज़दूर की मां को उसकी गिरफ़्तारी से गहरा सदमा पहुंचा और इसके दो दिन बाद ही उनका देहांत हो गया। गिरफ़्तार किये गए मज़दूरों के बच्चों को स्कूल छोड़ने पर मज़बूर होना पड़ा क्योंकि उनके पास स्कूल की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं।

मज़दूर एकता लहर मज़दूरों के साथ हुई इस नाइंसाफी और उनपर किये जा रहे इन हमलों की कड़ी निंदा करती है और अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में संगठित हो रहे लोगों को आतंकित करने के लिए यू.ए.पी.ए. जैसे कानूनों का इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा करती है।

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बेगुनाह मज़दूर    झूठे आरोपों    Oct 16-31 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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