आयात शुल्क के ज़रिये अमरीका का व्यापार युद्ध

सितम्बर 2018 में अमरीकी सरकार ने अपने देश में आयात की जाने वाली कई वस्तुओं पर लगने वाले आयात शुल्क में भारी बढ़ोतरी का ऐलान किया। जिसका निशाना ख़ास तौर पर चीन से 200 अरब अमरीकी डॉलर के मूल्य की आयात की जाने वाली वस्तुओं को बनाया जा रहा है, जिनमें बड़े पैमाने पर उपभोग की वस्तुएं शामिल हैं। अमरीका की ओर से यह सबसे नया और सबसे बड़ा ऐसा क़दम है जो कि भू-राजनीतिक जंग में उठाया जा रहा है और व्यापार नीति का इस्तेमाल एक और हथियार बतौर किया जा रहा है। अमरीका द्वारा शुल्कों को बढ़ाने के पलटवार में चीन ने अपने देश में बिकने वाली 60 अरब अमरीकी डॉलर की अमरीकी वस्तुओं और सेवाओं पर 24 सितम्बर, 2018 से नये शुल्कों की घोषणा की है।

इस सिलसिले में पहला क़दम इस वर्ष मार्च में उठाया गया था जब अमरीकी सरकार ने यूरोपीय संघ, चीन, हिन्दोस्तान व अन्य देशों से आयातित इस्पात पर 25 प्रतिशत और एल्युमीनियम पर 10 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाया था। कनाडा और मैक्सिको से होने वाले आयात को इससे छूट दी गयी थी। इन दोनों पड़ोसी देशों से आयातित इस्पात और एल्युमीनियम मुख्य तौर पर अमरीकी कंपनियों द्वारा ही उन देशों में बनाया जाता है।

इस्पात और एल्युमीनियम पर आयात शुल्क लगाये जाने से इसका सबसे बड़ा फायदा अमरीक की उन विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिलता है जो इस क्षेत्र में काम करती हैं और जो अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बहुत अधिक की़मतों पर बेचती हैं। जबकि कई अन्य अमरीकी कंपनियां जो अन्य देशों से कच्चा माल और अन्य सामग्रियों का आयात करती हैं, उनके लिए इस क़दम का मतलब है, बढ़ता खर्चा और घटता मुनाफ़ा। इनमें से कई कंपनियों ने मार्च 2018 में लगाए गए आयात शुल्क पर अपनी असहमति जताई है।

जून 2018 में अमरीकी सरकार ने आयात शुल्क लगाने का दूसरा दौर चलाया। जिसमें कई वस्तुओं और सामग्रियों को शामिल किया गया। इसका असर चीन से निर्यात की जाने वाली 50 अरब अमरीकी डॉलर (3500 करोड़ रुपये) के मूल्य की औद्योगिक सामग्रियों और उच्च-तकनीकी वस्तुओं पर हुआ। चीन में अमरीकी निर्यात जिसका मूल्य 50 अरब डाॅलर है उस पर चीन की सरकार ने आयात शुल्क लगाकर अमरीका पर पलटकर वार किया है।

सितम्बर में अमरीका ने घोषणा की कि वह मैक्सिको और कनाडा के साथ चल रहे नाफ्टा समझौते को बदल देगा। इसके पहले जुलाई में, यूरोपीय मोटर गाड़ियों पर अमरीका द्वारा शुल्क लगाने के ख़तरे का सामना करने के लिये, अमरीका व यूरोप ने, व्यापार की नयी शर्तों पर समझौता करना स्वीकार किया। यूरोप ने अमरीकी कृषि उत्पादों, कच्चे तेल व गैस का आयात करना स्वीकार किया।

मार्च में लगाये गए आयात शुल्क को जायज़़ बताने के लिए अमरीकी सरकार ने आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क का सहारा लिया। जून आते-आते अमरीका ने चीन द्वारा तथाकथित रूप से टेक्नोलॉजी की चोरी और अनुचित व्यापार प्रथाओं के ख़िलाफ़ आक्रामक हमला शुरू कर दिया। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐलान किया कि विष्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) चीन द्वारा अपनाई जा रही अनुचित व्यापार प्रथाओं को रोकने में नाकामयाब है और इसलिए अमरीकी सरकार द्वारा आयात शुल्क थोपे जाने जैसी एकतरफा कार्यवाही करना पूरी तरह से जायज़ है।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि उनके इन क़दमों से अमरीकी व्यापार में हो रहे नुकसान को कम किया जा सकेगा और अमरीकी मज़दूरों के लिए नौकरियां वापस लाई जा सकेंगी। लेकिन ये सारे दावे झूठे हैं, जिनका मकसद अमरीकी मज़दूर वर्ग और लोगों को धोखा देना है। चीन के खि़लाफ़ व्यापार युद्ध का असली मकसद चीन को तकनीकी प्रधानता हासिल करने से रोकना है, जिसकी वजह से चीन वैष्विक मामलों में अमरीका के प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है।

चीन के हुक्मरानों ने ऐलान किया है कि वे स्टील, प्लास्टिक, खिलौने और अन्य उपभोग की चीजों व इलेक्ट्रिक उपकरणों के उत्पादन में दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश से आगे बढ़कर अब ऐसी वस्तुओं और उपकरणों के उत्पादन में प्रवेश करना चाहते हैं जिसमें सबसे ऊंची टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है। जून में अमरीका द्वारा लगाए गए आयात शुल्क में ऐसी ही उच्च टेक्नोलॉजी की वस्तुओं को शामिल किया गया है जैसे - एयरोस्पेस (हवाई-अंतरिक्ष) उपकरण, मरीन (समुद्री) उपकरण, टेलिकॉम, रोबोटिक्स, चिकित्सा उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहन, इत्यादि। इसके साथ-साथ अमरीकी राज द्वारा यह प्रचार चलाया गया कि चीन अमरीकी टेक्नोलॉजी और अमरीकी नौकरियों की चोरी कर रहा है।

चीन द्वारा टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वर्चस्व हासिल करने की, चीनी राज्य द्वारा प्रायोजित योजना का अमरीकी साम्राज्यवाद विनाश करना चाहता है। यह योजना “मेड इन चाइना 2025” के नाम से चलायी जा रही है।

अमरीकी साम्राज्यवाद अमरीका के बढ़ते व्यापार घाटे के लिए चीन पर आरोप लगा रहा है। लेकिन असलियत में अमरीकी राज्य का विशालकाय व्यापार घाटा, व्यापार में उदारीकरण का ही नतीजा है, जिसका अमरीकी राज्य पिछले 25 वर्षों से दुनिया भर में खुद ढिंढोरा पीटता आया है।

1990 के दशक के मध्य से अमरीका की अगुवाई में दुनियाभर के सबसे बड़े साम्राज्यवादी, डब्ल्यू.टी.ओ. के सभी सदस्य देशों पर आयात शुल्क को कम करने के लिए दबाव डालते आये हैं। वस्तुओं और पूंजी के बिना रोक-टोक प्रवाह के लिए राष्ट्रीय आयात शुल्क को कम करना “मुक्त व्यापार” के लिए ज़रूरी शर्त के रूप में पेश किया गया और दावा किया गया कि ऐसा करना सभी के हित में होगा।

जहां तक दुनिया के अधिकांश लोगों का सवाल है, डब्ल्यू.टी.ओ. द्वारा बनाये गए तथा सभी सदस्य देशों पर थोपे गए कानून न तो मुक्त थे और न ही न्यायपूर्ण। डब्ल्यू.टी.ओ. द्वारा थोपे गए कानूनों से दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी कंपनियों को फायदा हुआ, इसके द्वारा वे दुनिया के तमाम देशों में और बाज़ारों में बे-रोक-टोक घुस गए और उन्होंने बाज़ारों में अपने हिस्सों का विस्तार किया। इन कानूनों के चलते ग़रीब और कमज़ोर देशों के अपने बाज़ारों की रक्षा करने के अधिकार बेहद सीमित हो गए। इसके ठीक विपरीत उत्तरी अमरीका सहित जापान और यूरोप के ताक़तवर साम्राज्यवादी देशों ने न केवल डब्ल्यू.टी.ओ. पर अपना वर्चस्व जमाया बल्कि तमाम तरह के बहु-राष्ट्रीय समझौतों के द्वारा क्षेत्रीय व्यापार गुट बनाये।

पिछले दो दशकों में दुनियाभर के व्यापार में हुई बढ़ोतरी का फ़ायदा सभी को नहीं मिला है। दुनिया के सभी देशों में मज़दूर वर्ग का शोषण और अधिक बढ़ा है। दुनिया के अधिकांश देशों में बड़े पैमाने पर रोज़गार और नौकरियों का विनाश हुआ है। देश के भीतर और अलग-अलग देशों के बीच आर्थिक विषमता और गैर-बराबरी बढ़ी है। विष्व अर्थव्यवस्था बार-बार एक संकट से दूसरे संकट की ओर घसीटी जा रही है।

पिछले दो दशकों से अधिक समय से पूंजी और उत्पादन ऐसे देशों और क्षेत्रों की और खींचते जा रहे हैं जहां श्रम और कच्चा माल सबसे सस्ते हैं या पर्यावरण संबंधी कानून आसानी से तोड़े जा सकते हैं। इस तरह पूंजी के पलायन की वजह से अमरीका और कई अन्य विकसित पूंजीवादी देशों में विनिर्माण से संबंधित नौकरियां बेहद कम हो गयी हैं। इसका एक और नतीजा हुआ है, चीन का एक वैश्विक ताक़त के रूप में उभरना और हिन्दोस्तान में पूंजीवाद का तेज़ी से विकास होना। इसका एक और नतीजा है कि अमरीका के व्यापार घाटे में तेज़ी से बढ़ोतरी, जिसके आयात की मात्रा निर्यात की तुलना में लगातार बढ़ती जा रही है और साल दर साल व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है।

तेज़ी से बढ़ते व्यापार घाटे की समस्या को हल करने के नाम पर अमरीकी साम्राज्यवादी अपने व्यापार में प्रमुख भागीदार देशों पर अपना दबदबा बढ़ाने के लिए आयात शुल्क का हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस हथियार को खास तौर से चीन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका दुनिया के तमाम मामलों में बढ़ता प्रभाव, अमरीकी वर्चस्व के लिए सबसे बड़े ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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