शेयर बाज़ार में गिरावट

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बी.एस.ई.) का बेंचमार्क सूचकांक, जो सेन्सेक्स के नाम से जाना जाता है और जो फरवरी 2014 में 20,000 से अगस्त 2018 में 39,000 तक चढ़ गया था, वह 21 सितम्बर, 2018 के एक दिन के अंदर लगभग 1,500 प्वाइंट गिर गया। 4 अक्तूबर को उसमें 800 प्वाइंट की और गिरावट हुई। सेन्सेक्स उन सबसे बड़ी 30 पूंजीवादी कंपनियों के स्टाॅक के औसतन दाम का मापदंड है, जिनका बाज़ार में सबसे ज्यादा व्यापार होता है।

Foreign Capital Graf Hindiस्टॉक केवल एक कानूनी दस्तावेज़ है, जो यह प्रमाणित करता है कि किसी कंपनी की  पूंजी में किस निवेशक की कितनी हिस्सेदारी है। स्टॉक कंपनी के संभावित भावी मुनाफ़ों के हिस्से पर शेयर धारक के दावे का दस्तावेज़ है। कंपनी के भावी मुनाफ़ों पर इन दावों को शेयर बाज़ार में ख़रीदा और बेचा जाता है। भविष्य में होने वाले मुनाफ़ों की उम्मीद के आधार पर बाज़ार में शेयरों की क़ीमत में चढाव या उतार होता है। किसी भी वक्त बाज़ार में शेयर की मांग और आपूर्ति के आधार पर भी बाज़ार में शेयर की क़ीमतों में चढ़ाव और उतार आता है। जो बैंक और वित्तीय कंपनियां स्टॉक्स के साथ सट्टाबाज़ारी और जुआखोरी करने में माहिर होती हैं, वे अक्सर मुनाफ़ों की उम्मीद के साथ खिलवाड़ करने में क़ामयाब रहती हैं, जबकि अधिकतम व्यक्तिगत निवेशकों का आम तौर से नुकसान होता है।

सितम्बर के महीने में कई प्रतिकूल आर्थिक गतिविधियों की वजह से स्टॉक की क़ीमतों में गिरावट आई थी। इनमें शामिल है विश्व बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में तेज़ी से बढ़ोतरी, रुपये की क़ीमत में भारी गिरावट और इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंसियल सर्विसेज़ (आई.एल. एंड एफ.एस.) कंपनी द्वारा भारी कर्ज़ा न चुकाना। आई.एल. एंड एफ.एस. कंपनी पर कई वित्तीय संस्थानों की संयुक्त मालिकी है, जिनकी अगुवाई भारतीय जीवन बीमा निगम करती है। इस कंपनी का बैंकों से लिया हुआ 94,000 करोड़ रुपयों का कर्ज़ बकाया है। आई.एल. एंड एफ.एस. कंपनी द्वारा कर्ज़ न चुकाना इस बात का पर्दाफ़ाश करता है कि पूंजीपतियों के बकाया कर्ज़ों की रकम, जो बैंकों के खातों में न चुकाये गये कर्ज़ों के रूप में जाहिर होती है, उसकी मात्रा सरकार द्वारा पहले बताई गयी रकम से बहुत अधिक है।

अक्तूबर के पहले सप्ताह में स्टॉक की क़ीमतों में हालिया गिरावट विदेशी वित्त पूंजी के अचानक बाहर निकल जाने की वजह से हुई थी। (देखिये चार्ट)

विदेशी बैंक और कई वित्तीय संस्थान अपनी पूंजी का एक हिस्सा हिन्दोस्तान के शेयर बाज़ार में लगाते रहे हैं। जब विश्व बाज़ार में तेल की क़ीमतों में तेज़ी से उछाल आया और रुपये की क़ीमत गिरने लगी, उसी समय अमरीका में ब्याज की दरें बढ़ने लगीं। उस समय इन विदेशी निवेशकों ने हिन्दोस्तान के शेयर बाज़ार में लगायी गयी अपनी पूंजी को निकालने और उसे अमरीका में निवेश करने का फैसला किया। इस वजह से बाज़ार में बिक्री के लिए स्टॉक की आपूर्ति बढ़ गयी और उनकी क़ीमत तेज़ी से गिरने लगी।

शेयर बाज़ार पर कार्ल मार्क्स के विचार

(पूंजी, खंड 3, अध्याय 29; बैंक पूंजी के संघटक अंग, पृष्ठ 467-68)

“इन स्वत्वाधिकारों के, केवल सरकारी बांडों के ही नहीं, बल्कि स्टाकों के भी, मूल्य की स्वतंत्र गति इस भ्रान्ति को बल प्रदान करती है कि पूंजी अथवा उस दावे के साथ-साथ, जिसके लिए उनका अधिकार हो सकता है, वे वास्तविक पूंजी का निर्माण करते हैं। कारण कि वे जिसें बन जाते हैं, जिनके दाम की चारित्रिक गतियां होती हैं और अपने ही ढंग से स्थापित होता है...

“जहां तक कि इस पत्र के मूल्य में ह्रास अथवा चढ़ाव जिस वास्तविक पूंजी को वह प्रकट करता है, उसके मूल्य की गति से स्वतंत्र होता है, राष्ट्र की संपदा उसके मूल्य में ह्रास अथवा वृद्धि के बाद भी उतनी ही रहती है, जितनी उसके पहले थी।

“अगर यह ह्रास उत्पादन के और नहरों तथा रेलों पर यातायात के वास्तविक रुकाव को अथवा शुरू किये जा चुके उद्यमों के निलंबन को, या निश्चित रूप में बेकार जोखिमों में पूजी के उड़ाये जाने को ही नहीं प्रतिबिंबित करता है, तो नामिक द्रव्य पूंजी के इस साबुन के बुलबुले के फूटने से राष्ट्र तनिक भी निर्धन नहीं हुआ।

दूसरे शब्दों में स्टॉक बाज़ार कोई नयी संपत्ति तैयार नहीं करता है, और न ही किसी मौजूदा संपत्ति का नाश करता है। वह केवल पहले से बनी बनायी संपत्ति का बंटवारा और पुनः बंटवारा करता है।

ऊपर दिये गए पैराग्राफ का यही अर्थ है कि पूंजीवादी उत्पादन की व्यवस्था के फलस्वरूप उत्पादन की शक्तियों की बर्बादी और उनका विनाश होता है, और स्टॉक बाज़ार की गिरावट के पीछे यही छुपा हुआ कारण है।

जबकि शेयर क़ीमतों की गिरावट में इन तमाम कारकों की भूमिका थी, लेकिन इसके पीछे कुछ और बुनियादी कारण हैं। ये बुनियादी कारण ये हैं कि फरवरी 2014 से अगस्त 2018 के बीच, स्टॉक की क़ीमतों में जो बढ़ोतरी हुई थी, वह उत्पादक पूंजी निवेश की बढ़ोतरी के कारण नहीं हुई। जिस तेज़ी से स्टॉक की क़ीमतों में बढ़ोतरी हुई उसी तेज़ी के साथ उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में पूंजी निवेश नहीं हुआ और न ही मुनाफ़े बनाये गए। इसके विपरीत, स्टॉक की क़ीमतों में बढ़ोतरी, सट्टाबाज़ारी और वित्तीय संस्थानों के दांवपेचों से मुनाफ़े बनाने का नतीजा था। शेयर बाज़ार में एक कृत्रिम गुब्बारा बनाया गया। यह गुब्बारा एक न एक दिन तो फूटने ही वाला था।

पूंजीपतियों द्वारा बकाया कर्ज़ वापस न करने की बढ़ती समस्या इस बात का सबूत है कि उत्पादन के क्षेत्र में बेहद गंभीर समस्या है। जब बड़े पूंजीनिवेश के ज़रिये अपेक्षित दर से मुनाफ़े नहीं बनते हैं तो ज्यादा से ज्यादा कंपनियां बैंक से लिए गये कर्ज़ो को चुकाना बंद कर देती हैं। पिछले 5-6 वर्षों से, जबसे अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादक गतिविधियां और निवेश की गति कम हो गयी है, तब से यह समस्या बद से बदतर होती जा रही है।

कारों और दुपहिया वाहनों के उत्पादन की गति घट गयी है जबकि सूती और सिंथेटिक कपड़े का उत्पादन 2013 से ही लगातार गिरता जा रहा है, क्योंकि अधिकांश लोगों की खरीदने की क्षमता सीमित होती जा रही है। कई घर निर्माण और ढांचागत निर्माण की परियोजनाएं, जो कि पूरी हो चुकी हैं, वे हाल के वर्षों में अपेक्षित दर पर मुनाफे़ नहीं बना पा रही हैं। कई नए घर और हाई राइज़ अपार्टमेंट खाली पड़े हैं, क्योंकि इन्हें ख़रीदने लायक पैसे वाले लोग ही नहीं हैं।

जबकि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में रफ़्तार लगातार कम हो रही थी, तो 2014 से अगस्त 2018 के बीच शेयर बाज़ार की क़ीमतों में लगातार उछाल आ रहा था। यह इजारेदार पूंजीवादी घरानों द्वारा मुनाफ़ों की उम्मीद को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की वजह से हो रहा था और केन्द्र सरकार भी इसमें मदद कर रही थी। सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता और पूंजीवादी घरानों द्वारा नियुक्त अर्थशास्त्री बार-बार यह प्रचार करते रहे  कि हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था दुनिया की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत अच्छी हालत में है। लोगों को धोखा देने और इस संकट-ग्रस्त अर्थव्यवस्था की सच्ची हालत को छुपाने के लिए ये लोग सकल घरेलू उत्पाद और रोज़गार के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे थे।

नवंबर 2016 की नोटबंदी की वजह से सट्टे की पूंजी को रियल एस्टेट से बड़े पैमाने पर निकालकर शेयर बाज़ार में डाला गया, जिससे करीब-करीब सभी कंपनियों के शेयरों की क़ीमतों में आकस्मिक बढ़ोतरी हुई। इसके आलावा, पहली बार मज़दूर वर्ग और मध्यम तबके से लाखों लोगों ने शेयर और बांड बाज़ार में प्रवेश किया। नोटबंदी से लोग अपना पैसा बैंक में जमा करने को मजबूर हो गए थे। परन्तु चूँकि बैंकों के पास नगदी रुपयों की बाढ़ सी आ गयी, इससे बैंक में रखे फिक्स्ड डिपाज़िट की दरें गिरने लगीं। इस हालात का फ़ायदा उठाकर, म्यूच्यूअल फण्ड का खूब प्रचार किया गया और मेहनतकश लोगों को बताया गया कि बचत के धन को जमा करने का यह एक बढ़िया विकल्प है। 

सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (एस.ई.बी.आई.) ने “म्यूच्यूअल फण्ड सही है!” इस प्रचार अभियान को चलाया है। जाना जाता है कि 2017-18 के दौरान म्यूच्यूअल फण्ड में 2.8 लाख करोड़ रुपये जमा किये गए, जो कि पिछले वर्ष से 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

शेयर बाज़ार में गिरावट की वजह से मेहनतकश लोगों द्वारा म्यूच्यूअल फण्ड में जमा किये गए धन के मूल्य में भारी  गिरावट आई है। इस वजह से लाखों मेहनतकश हिन्दोस्तानियों की बचत के धन को अचानक बहुत बड़े नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

शेयर बाज़ार में व्यापार से केवल चंद मुट्ठीभर अति-अमीर शोषकों और सट्टा बाज़ार के खिलाड़ियों को फ़ायदा होता है जो शेयर व्यापार से होने वाले मुनाफ़े का बहुत बड़ा हिस्सा हड़प लेते हंै। शेयर बाज़ार में बनावटी गुब्बारे बनाने से इन्हीं लोगों को फ़ायदा होता है। और जब यह गुब्बारा फूट जाता है तब मेहनतकश परिवारों को इसका सबसे ज्यादा नुकसान भुगतना पड़ता है।

अर्थव्यस्था में होने वाली ये सारी गतिविधियां मौजूदा राजकीय इजारेदार पूंजीवाद की व्यवस्था के अत्यधिक परजीवी चरित्र का पर्दाफाश करती हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें मेहनतकश बहुसंख्यक लोगों की किस्मत मुनाफ़ों के भूखे हिन्दोस्तानी और विदेशी मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपतियों और वित्तीय बाज़ार में सट्टाबाज़ी के खिलाड़ियों के हाथों में है। केंद्रीय राज्य हर समय इन पूंजीवादी कंपनियों के लिए अधिकतम मुनाफ़े की गारंटी देने की दिशा में काम करता है। जब उत्पादक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं या उनका पतन होने लगता है, तब यह राज्य सट्टेबाज़ मुनाफ़ाखोरी को बढ़ावा देने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देता है। इसके लिये राज्य लोगों को सुनियोजित तरीके से धोखा देने और पूंजी के बाज़ार में निवेश करने के लिए उन्हें आकर्षित करने जैसे सारे पैंतरे अपनाता है।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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