महिलाओं पर यौन उत्पीड़न के खि़लाफ़ प्रदर्शन

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विषय को लेकर, 12 अक्तूबर, 2018 को अनेक महिला संगठनों ने नई दिल्ली में संसद पर एक संयुक्त विरोध प्रदर्शन किया। इसमें एडवा, एन.एफ.आई.डब्ल्यू., सोसाइटी फार लेबर एंड डेवेलपमेंट (एस.एल.डी.), स्वास्तिक महिला समिति, पुरोगामी महिला संगठन, जे.डब्ल्यू.पी., आल इंडिया महिला सांस्कृतिक समिति और प्रगतिशील महिला समिति ने भाग लिया।

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प्रदर्शनकारियों ने इस प्रकार के नारे लगाकर अपना गुस्सा जाहिर किया: “एम.जे. अकबर इस्तीफा दो!”, “यौन हिंसा के दोषियों को सज़ा दो!”, “कार्यस्थल को महिलाओं के लिये सुरक्षित बनाओ!”, “कार्यस्थल संस्कृति के नाम पर पितृसत्ता नहीं चलेगा!”, आदि।

सहभागी संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रदर्शन को संबोधित किया।

वक्ताओं ने समझाया कि 10-15 वर्ष पहले हुई, कार्यस्थल पर यौन हिंसा के बारे में आज बहुत सी महिलायें खुलकर अपने विचार प्रकट कर रही हैं। ये पत्रकारिता, मीडिया, फिल्म उद्योग, निजी और सरकारी संस्थानों में काम करने वाली महिलायें हैं। उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ सोशल मीडिया के ज़रिये अनेक ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के दुष्कर्मों का खुलासा किया है, जैसे कि केन्द्र सरकार के मंत्री एम.जे. अकबर, आदि। वक्ताओं ने सांसद उदित राज की टिप्पणी - कि सिर्फ कुछ मध्यवर्गी महिलायें ऐसी बातें फैला रही हैं, इन पर विश्वास नहीं करना चाहिये - की जमकर निन्दा की।

वक्ताओं ने याद दिलाया कि 2013 में संसद में कानून पास किये जाने के बावजूद, आज भी कई संस्थानों में महिलाओं पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को सुनने के लिये कोई कमेटियां नहीं गठित की गईं हैं। जहां ऐसी कमेटियां हैं, वे भी उत्पीड़ित महिलाओं की दशा के प्रति पूरी तरह नदारद रही हैं, बल्कि उच्च पदों पर बैठे गुनहगारों को बचाने में लगी हुई हैं। आज तक किसी भी अपराधी पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई है, न ही किसी को सज़ा दी गई है।

वक्ताओं ने अनेक उदाहरणों के साथ समझाया कि सत्ता में बैठी पार्टियां लोगों को बांटने की राजनीति चलाती हैं और इसमें महिलाओं को सबसे पहले शिकार बनाया जाता है। 1984 के कत्लेआम, 2002 में गुजरात के कत्लेआम और इस प्रकार के तमाम कांडों में सबसे पहले महिलाओं को शिकार बनाया गया था। सरकार कहती है कि महिलाओं की रक्षा के लिये बहुत सारे कानून हैं परन्तु हमारी कानून व्यवस्था महिलाओं को सुरक्षा दिलाने में पूरी तरह नाक़ामयाब साबित हो चुकी है। हमें एकजुट होकर अपने संघर्ष को तेज़ करना होगा, ताकि हम महिलाओं पर हो रहे इन हमलों का मुक़ाबला कर सकें।

प्रदर्शन के बाद सभी सहभागियों ने जंतर-मंतर के गोल-चक्कर पर कुछ समय के लिये यातायात रोक दिया। अंत में संसद मार्ग पर एकत्रित होकर कार्यक्रम की समाप्ति हुई।

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यौन उत्पीड़न    Nov 16-30 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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