नोटबंदी के दो साल बाद : झूठे वादे और असली जन-विरोधी इरादे अब खुलकर सामने

दो साल पहले, 8 नवंबर, 2016 की रात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश को संबोधित करते हुये यह घोषित किया था कि सभी 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट अवैध हो गये हैं। प्रधानमंत्री ने यह चेतावनी दी कि इस क़दम की वजह से लोगों को “थोड़े दिन के लिये” दर्द होगा। परन्तु उन्होंने वादा किया था कि लोगों को आगे, “लंबे समय तक” फ़ायदा होगा।

demonetisationप्रधानमंत्री ने यह दावा किया था कि नोटबंदी की वजह से छुपा हुआ कालाधन बाहर निकल आयेगा, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ख़त्म हो जायेंगे और अमर-ग़रीब के बीच धन की असमानता बहुत कम हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, उनका यह कहना था कि नोटबंदी से जनसमुदाय को बहुत लाभ होने वाला है।

आज यह साबित हो चुका है कि ये सारे दावे झूठे थे।

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 3 लाख से अधिक छोटे और मंझोले औद्योगिक कारोबार बंद हो गये, जिसकी वजह से लगभग 4 लाख लोगों की नौकरियां गईं। अप्रवासी मज़दूर अपने गांव वापस जाने को मजबूर हुये। दो साल बाद, इनमें से कई कंपनियां अभी भी कामकाज शुरू नहीं कर पाई हैं। इसे “थोड़े दिन के लिये” दर्द बताया गया।

प्रचूर फसल के उस वर्ष में किसानों को सरकार द्वारा आयोजित अपनी रोज़ी-रोटी की तबाही का सामना करना पड़ा। मंडियों में कृषि उत्पादों की ख़रीदी और बिक्री, जो नगदी लेन-देन पर निर्भर थी, पूरी तरह तबाह हो गई। किसानों को कौड़ियों के दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ी और आने वाली रबी फसल के लिये उर्वरक, बीज व कीटनाशक खरीदने के लिये उनके पास कोई पैसा नहीं बचा। देश के किसान आज भी इस “थोड़े दिन के लिये” दर्द से कराह रहे हैं।

अर्थव्यवस्था के कई और क्षेत्र जिनमें मुख्यतः नगदी से लेन-देन होती थी, जैसे कि थोक और खुदरा व्यापार, निर्माण, पर्यटन और कुछ अन्य सेवायें बुरी तरह प्रभावित हुईं। जाना जाता है कि कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि आपातकालीन अस्पताल सेवाओं के लिये उनके पास पैसा नहीं था।

नोटबंदी के दो साल बाद यह साफ  है कि जबकि बहुसंख्या के लिये इसका दर्द लंबे समय तक चल रहा है, तो दूसरी ओर, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को इससे फौरी तौर पर तथा लंबे तौर पर बहुत लाभ हुआ है।

नोटबंदी के ज़रिये लंबे समय तक नगदी पैसे की बहुत ज्यादा कमी पैदा की गई थी, ताकि लोग नगदी से हटकर डिजीटल लेन-देन करने को मजबूर हों। लोगों को मजबूर किया गया कि अपनी बचते के सारे धन को बैंकों में जमा कर दें और डिजीटल भुगतान के तरीके अपनाने लगें। यह क़दम इसलिये उठाया गया था ताकि हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपति डिजीटल पेमेंट कंपनियां चलाकर खूब मुनाफ़ा कमा सकें। बीते दो वर्षों में देशभर में डिजीटल पेमेंट कंपनियों और पेमेंट बैंकों का छा जाना इस बात की पुष्टि करता है।

नोटबंदी के वजह से बैंकों में जमा धन खूब बढ़ गया। इसके साथ-साथ, बैंकों से पैसा निकालने पर कड़ी पाबंदियां लगाई गईं। इससे बैंकों द्वारा मुनाफ़ेदार दरों पर कर्ज़ा देने की संभावनायें खूब बढ़ गईं।

नोटबंदी का एक और अहम उद्देश्य था जनता से टैक्स वसूली तथा सेवा शुल्क वसूली के आधार को विस्तृत करना।

भारत सरकार का वह दावा, कि 2016-17 में नोटबंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था में 7 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हुई थी, सरासर झूठ है। सरकार ने सिर्फ बड़ी-बड़ी कंपनियों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वह अनुमान लगाया था और उन गैर-पंजीकृत व छोटे उद्योगों की कोई गणना नहीं की थी, जबकि उन्हें ही नगदी की कमी से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

नोटबंदी के समय सरकार ने यह दावा किया था कि 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक काला धन बाहर निकल आयेगा। 30 अगस्त, 2017 को जारी की गई, भारतीय रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया था कि अवैध घोषित मुद्रा का 98.96 प्रतिशत बैंकों में वापस आ गया है। नगदी के रूप में जो भी “काला धन” था उसे वैध रूप में बदल दिया जा चुका था। सरकार ने आज तक यह साफ-साफ नहीं बताया है कि उसने कितना “काला धन” बाहर निकाला है।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह दावा किया था कि नोटबंदी से वे जाली नोट पकड़े जायेंगे, जिनका इस्तेमाल करके बाहरी ताक़तें हिन्दोस्तान में आतंकवादी गतिविधियों को शय देती हैं। उनका कहना था कि नोटबंदी से आतंकवाद ख़त्म हो जायेगा। सच तो यह है कि विश्व के तौर पर, आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले जाली नोटों पर निर्भर नहीं करते हैं क्योंकि उनके पास धन पहुंचाने के बहुत सारे आधुनिक तौर-तरीके उपलब्ध हैं। आतंकवाद बेरोक जारी है क्योंकि हिन्दोस्तानी शासक वर्ग को आतंकवाद की ज़रूरत है, ताकि जनता के ख़िलाफ़ बढ़चढ़कर राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराया जा सके।

भ्रष्टाचार, ख़ासतौर पर सरकार और राज्य के उच्चतम स्तरों पर होने वाले भ्रष्टाचार, में कोई कमी नहीं आई है। कई बड़े-बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिये गये लाखों-करोड़ों रुपयों के कर्ज़ों को चुकाने से इंकार करना - यह एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार का कांड है जिससे बैंकों व वित्त संस्थानों के प्रधानों और राज्य के उच्चतम अधिकारियों के बीच की सांठ-गांठ खुलकर सामने आ रही है। ढेर सारे और भ्रष्टाचार के कांड, जिनमें हालिया अरबों डालरों का राफेल रक्षा विमान कांड शामिल है, इस बात को दर्शाते हैं कि भ्रष्टाचार दूर करने का सरकार का दावा सरासर झूठ था।

इन सभी बातों से हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी द्वारा जनवरी 2017 में प्रकाशित पुस्तिका “नोटबंदी के असली इरादे और झूठे दावे” में पेश किये गये मूल्यांकन की पुष्टि होती है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि नोटबंदी की वजह से उत्पादक ताक़तों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ तथा करोड़ों मज़दूर, किसान, छोट व्यापारी व दूसरे मेहनतकश लोग बर्बाद हो गये। मुट्ठीभर अति-अमीर व्यक्तियों के हाथों में धन का और ज्यादा संकेंद्रण हुआ है। सभी उपलब्ध आंकड़ों से यही दिखता है कि बीते दो सालों में अमीर पहले से कहीं ज्यादा तेज़ गति से और अमीर होते जा रहे हैं। धन की असमानता को घटाना तो दूर, नोटबंदी से यह असमानता कई गुना बढ़ गई है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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