कश्मीर में बढ़ती हिंसा का चक्र : कश्मीरी लोगों के हिन्दोस्तानी राज्य से अलगावपन को मिटाने के लिए तुरंत क़दम उठाने की ज़रूरत है!

21 अक्तूबर को कश्मीर के कुलगाम में सेना की कार्यवाही में कम से कम 10 लोग मारे गए। इस कार्यवाही में महिलाओं और बच्चों सहित दर्जनों लोग बुरी तरह से घायल हो गये। इस क़त्लेआम के खि़लाफ़ पूरे कश्मीर में लोग सड़कों पर उतर आये हैं।

आखिर कुलगाम में क्या हुआ था? कुलगाम में सेना की एक टुकड़ी तथाकथित आतंकवादियों को मारने के लिए एक रिहायशी इलाके में तलाशी और घेराबंदी की कार्यवाही कर रही थी। उन्होंने एक घर में विस्फोटक लगा दिए, जहां उन्हें शक था कि संदिग्ध नौजवान रह रहे थे। जैसे ही पड़ोसियों को सेना की इस कार्यवाही का पता चला वे अपने नौजवान बच्चों को बचाने के लिए उस घर पर आ गये। उस घर में लगे हुए बम का जब विस्फोट हुआ तो उसमें कई मासूम आदमी, औरत और बच्चे मारे गए व घायल हो गए।

कुलगाम में जो कुछ हुआ यह कोई एकमात्र ऐसी घटना नहीं है। कश्मीर में हर रोज़ सेना किसी न किसी गाँव में इस तरह की कार्यवाही करती रहती है। सेना के इस आदेष कि, ऐसी कार्यवाहियों के दौरान लोग अपने घरों के अंदर ही रहें, इसे मानने से लोग इंकार कर रहे हैं। महिलाएं अपने बच्चों और परिजनों की हिफ़ाज़त के लिये सेना के आदेशों को मानने से इंकार कर रही हैं।

सेना की कार्यवाही में मारे गए नौजवानों की अंतिम यात्राओं में सैकड़ों हजारों की तादाद में लोग शामिल हो रहे हैं। सरकार द्वारा घोषित किये गए कर्फ्यू को तोड़कर लोग ऐसी अंतिम यात्राओं में शामिल हो रहे हैं। इनके दौरान, सुरक्षा बलों और अंतिम यात्राओं में शामिल हो रहे लोगों के बीच टकराव आम बात हो गई है। इसमें और अधिक लोग मारे जाते हैं और घायल हो जाते हैं। इस तरह से हिंसा का यह सिलसिला लगातार चलता रहता है।

चार साल पहले केंद्र सरकार ने “कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए कड़क रवैया” अपनाने का ऐलान किया था। “आतंकवाद को कुचलने” के नाम पर सेना को बिना किसी रोक-टोक के कार्यवाही करने की छूट दी गई थी। हिन्दोस्तान के सेना प्रमुख ने ऐलान किया था कि “जो भी आतंकवादियों के ख़िलाफ़ सेना की कार्यवाही को रोकने की कोशिश” करेगा उसे भी “प्रत्यक्ष आतंकवादी” माना जायेगा और उसके साथ भी दुश्मनों जैसा बर्ताव किया जायेगा। इस रवैये का मकसद अगर तथाकथित आतंकवादियों को अलग करना था, तो फिर यह रवैया पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ है। कुलगाम में हुआ हादसा इस रवैये की पूरी नाकामी का एक और सबूत है।

हिन्दोस्तानी राज्य दमन का विरोध करने वालों को राज्य का दुश्मन करार देता है। सभी कश्मीरियों के साथ “आतंकवादी”, “देशद्रोही” और “पाकिस्तान का जासूस” जैसा बर्ताव किया जाता है। हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा चलाये गए दमन की वजह से बढ़ते पैमाने पर और भी कश्मीरी नौजवान हिन्दोस्तानी राज्य के ख़िलाफ़ हथियार उठाने पर मजबूर हो गए हैं। कई नौजवान जिनको सेना ने अलग-अलग कार्यवाहियों में “आतंकवादी” करार देकर मार दिया है, वे केवल 16 या 17 वर्ष के थे। कश्मीर में हिन्दोस्तानी राज्य की नीतियों के चलते, कश्मीर के लोग हिन्दोस्तानी राज्य से बिल्कुल अलग हो गए हैं। कश्मीर में बढ़ती हुई हिंसा के पीछे भी यही कारण है।

हिन्दोस्तानी राज्य के प्रति कश्मीरी लोगों का अलगावपन इतना गहरा है कि जिन लोगों ने पहले कश्मीर के प्रशासन में अलग-अलग उच्च पदों पर काम किया है, आज वे भी केंद्र सरकार के इस ऐलान के ख़िलाफ़ अपनी असहमति जता रहे हैं। कुलगाम क़त्लेआम के तुरंत बाद ऐसा ही हुआ। ग्रुप ऑफ़ कंसर्नड सिटीज़न (चिंतित नागरिकों का समूह) ने एक बयान जारी किया और इस क़त्लेआम पर अपना रोष प्रकट करते हुए कश्मीर की समस्या का, बातचीत के ज़रिये एक राजनीतिक समाधान निकालने की मांग की। इस बयान पर जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश, जम्मू और कश्मीर राज्य के रिटायर्ड आला अधिकारी, पत्रकार, कश्मीर विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति, राज्य के पूर्व इंस्पेक्टर जनरल, जम्मू और कश्मीर बार एसोसिएशन के वरिष्ठ वकील, ट्रेड यूनियन नेता, किसान नेता और कई अन्य जाने-माने व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किये हैं, जिन्होंने कई वर्षों तक जम्मू-कश्मीर प्रशासन में सेवा की है। इसमें कश्मीर में रहने वाले सभी धर्मों के लोग - हिन्दू, मुस्लिम, सिख शामिल हैं।

29 वर्ष पहले, 1989 में कश्मीर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम लागू किया गया था और “अलगाववाद और आतंकवाद” को कुचलने के लिए वहां सेना को तैनात किया गया था। उन दिनों सरकार का यह प्रचार था कि कश्मीर में मात्र कुछ सैकड़ों पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादी मौजूद हैं जो कश्मीर घाटी में अशांति के लिए ज़िम्मेदार हैं। एक बार इन आतंकवादियों को ख़त्म कर दिया जाये, तो घाटी में फिर से शांति लौट आएगी।

पिछले 29 वर्षों में कश्मीर में दसों-हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं। गृह मंत्रालय की रिकार्डों के अनुसार, 1990 और सितंबर 2017 के बीच में 44801 लोग मारे गये। इनमें 23524 ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकार उग्रवादी बताती है, 14849 नागरिक और 6428 सुरक्षाकर्मी हैं। कश्मीर के मानव अधिकार संगठनों ने कहा है कि मृत नागरिकों के बारे में गृह मंत्रालय के आंकड़े वास्तविकता से बहुत कम हैं। लापता व्यक्तियों के अभिभावकों के संगठन (ऐसोसियेशन ऑफ पेरेंटस ऑफ डिसपियर्ड पर्सन्स) ने बताया है कि 2017 में लगभग 8000 लोग उनके परिजनों द्वारा लापता बताये गये, यानी कि राज्य के सुरक्षाबलों ने उनका अपहरण, उत्पीड़न और क़त्ल कर दिया है। इसके अलावा, 7000 से भी ज्यादा गुमनाम कब्रें मिली हैं।

अब सरकार को यह बात खुलकर स्वीकार करनी पड़ रही है कि उसने जिनको आतंकवादी और उग्रवादी करार दिया है वे कश्मीर के ही नौजवान हैं, पाकिस्तान से आये घुसपैठिये नहीं। ये नौजवान सेना के शासन की छत्रछाया में पैदा हुए और बड़े हुये हैं। उन्होंने कभी सेना के शासन के अलावा, कोई और ज़िंदगी नहीं देखी है। ये नौजवान हिन्दोस्तान की सेना को एक कब्ज़ाकारी शक्ति मानते। कुलगाम जैसी हर नई घटना उनकी इस धारणा को, और ज्यादा मज़बूत करती है।

हिन्दोस्तान के दूसरे हिस्सों से जो लोग कश्मीर जाते हैं, वे वहां के बिगड़े हुए हालातों के बावजूद, हमेशा कश्मीरी लोगों के मिलनसार मिजाज़ को याद करते हैं। इसके साथ ही कश्मीरी लोग इन लोगों से इस बात को बताने से नहीं हिचकते कि वे हिन्दोस्तानी राज्य के दमनकारी शासन का अंत चाहते हैं। वे खुद अपनी ज़मीन का मालिक बनना चाहते हैं और वे हमेशा के लिए सेना के दमनकारी शासन में नहीं जीना चाहते हैं, जो कि एक कब्ज़ाकारी सेना के रूप में पेश आती है।

इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि अक्तूबर 1947 में एक विशेष प्रबंध के अंर्तगत जम्मू-कश्मीर को हिन्दोस्तानी संघ के साथ जोड़ गया था। बीते 71 वर्षों में केन्द्र में जो भी सरकार आई है, उसने उस प्रबंध को हनन किया है। कश्मीरी लोगों के जनवादी अधिकारों का पूरा-पूरा हनन किया गया है। लोगों के अधिकारों के लिये आवाज़ उठाने वालों को जेल में बंद कर दिया गया है, उन्हें  प्रताड़ित किया गया है और मार डाला गया है। चुनावों में खुलेआम धांधली की गई है। इन सब कारणों की वजह से, कश्मीर के लोग हिन्दोस्तानी राज्य से खुद को अलग महसूस करते हैं। मौजूदा हालत के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराने से कुछ भी हासिल नहीं होगा।

तथाकथित “सशस्त्र समाधान” से कश्मीर की समस्या हल नहीं हुई है। इसके ठीक विपरीत, समस्या और भी अधिक पेचीदा हो गयी है। इस वजह से कश्मीर के लोगों का हिन्दोस्तानी राज्य के प्रति पूरी तरह से अलगावपन पैदा हो गया है। इस हालात की वजह से हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच जंग और इस इलाके में अमरीकी सेना की दख़लंदाज़ी का ख़तरा और भी बढ़ गया है।

“कश्मीर समस्या” को हल करने के लिए सबसे पहले, इस बात को स्वीकार करना होगा कि इसका समाधान सेना के द्वारा नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है, जो इस बात को स्वीकार करने पर आधारित हो, कि कश्मीर सबसे पहले कश्मीरी लोगों का है और किसी भी समाधान में उनके सवालों और चिंताओं को ध्यान में रखना ज़रूरी है। कश्मीर में सेना के राज को ख़त्म करना, यह कश्मीर के लोगों के हिन्दोस्तानी राज्य से अलगावपन को ख़त्म करने की दिशा में एक क़दम होगा और इससे राजनीतिक समाधान का रास्ता खुलेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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