भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों को हराना होगा! मज़दूर-किसान संयुक्त मोर्चा ही एकमात्र आगे का रास्ता!

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिज़ोरम, राजस्थान और तेलंगाना की राज्य विधान सभाओं के चुनाव 12 नवम्बर और 7 दिसंबर, 2018 के बीच होने जा रहे हैं।

ये चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं जब सत्ता पर बैठी ताक़तों के बड़े-बड़े वादों और जनसमुदाय के जीवन की असली हालातों के बीच की खाई दिन-ब-दिन और चैड़ी होती जा रही है।

मज़दूर यूनियनों और किसान संगठनों के संयुक्त विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं।

मज़दूर निजीकरण और श्रम कानूनों में पूंजीवाद-परस्त सुधारों का विरोध कर रहे हैं और अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। किसान सिंचाई के अभाव, लागत की बढ़ती महंगाई और उत्पादों को सस्ते-से-सस्ते दाम पर बेचने की मजबूरी तथा इन कारणों से असहनीय कर्ज़ों के बोझ के खि़लाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। आदिवासी-जन बलपूर्वक भूमि अधिग्रहण के खि़लाफ़, बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों द्वारा अपनी प्राकृतिक सम्पदा की लूट तथा निजी मुनाफ़ाखोरों की सांठ-गांठ में सरकारी अफ़सरों द्वारा लूट के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे हैं।

जन संगठन एकजुट होकर राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ उठा रहे हैं। वे धर्म, जाति, इलाका या भाषा के आधार पर लोगों को निशाना बनाकर उन पर राज्य द्वारा आयोजित हमलों का विरोध कर रहे हैं और सभी के अधिकारों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं।

बड़े सरमायदार और इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया इन चुनावों को सबसे पसंद की अपनी दो पार्टियों - कांग्रेस पार्टी और भाजपा - के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। वे इन चुनावों को अगले वर्ष होने वाले संसद के आम चुनावों से पहले “सेमी फाइनल” बतौर बढ़ावा दे रहे हैं।

मई 2014 में जब भाजपा ने केंद्र में अपनी सरकार बनायी थी, तो उसने “सबका विकास” का वादा किया था। उसने अगले पांच वर्षों में 10 करोड़ नयी नौकरियां पैदा करने का वादा किया था। उसने वादा किया था कि किसानों की आमदनी दुगुनी हो जायेगी। उसने एक “नए हिन्दोस्तान” का वादा किया था, जो भ्रष्टाचार, ग़रीबी और उन सारी बीमारियों से मुक्त होगा जिनके लिए वह कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराती है।

पर भाजपा के वादे खोखले निकले। उसकी सरकार ने निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के उसी पुराने कार्यक्रम को भूतपूर्व कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार से कहीं ज्यादा जोश के साथ लागू किया है। मेहनतकश बहुसंख्या की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। “ईज ऑफ डूइंग बिजनस” के नाम पर मज़दूर-विरोधी और पूंजीवाद-परस्त श्रम कानून पास किये गए हैं। बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ रही है और किसान तबाह हो रहे हैं, जबकि टाटा, अम्बानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने बहुत अमीर हो गए हैं। नोटबंदी और जी.एस.टी. की वजह से लाखों-लाखों छोटे कारोबार वाले तबाह हो गए हैं। राफेल विमान सौदे से यह बात साफ हो गयी है कि राज्य के उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार में कोई परिवर्तन नहीं है।

धार्मिक अल्पसंख्यकों पर सांप्रदायिक आतंक और दलितों पर अत्याचार काफी बढ़ गया है। गौरक्षा के नाम पर शारीरिक हमले और हत्याएं आम बात हो गयी हैं। भाजपा लोगों का ध्यान भटकाने के लिए और लोगों को आपस में लड़वाने के लिए, सांप्रदायिक और जातिवादी ध्रुवीकरण का सहारा ले रही है। अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग फिर से उठाई जा रही है। नए-नए मतभेद पैदा किये जा रहे हैं, जैसे कि सबरीमाला का मुद्दा।

जबकि भाजपा खुले रूप से सांप्रदायिक और उग्रराष्ट्रवादी है, तो कांग्रेस पार्टी अपनी बंटवारे की राजनीति को धर्मनिरपेक्षता के परदे के पीछे छुपा देती है। मेहनतकश बहुसंख्या को आतंकित करने, बांटने और अपने असली दुश्मनों से भटकाने के लिए, राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल करने का कांग्रेस पार्टी का सबसे लंबा इतिहास है। वह शासक वर्ग की सबसे पुरानी और सबसे वफादार पार्टी है। उसे बरतानवी उपनिवेशवादी शासन काल से ही, धर्मनिरपेक्षता और “सांप्रदायिक सद्भावना” की कसम खाते हुए, बांटो-और-राज-करो की कार्यनीति को लागू करने का प्रशिक्षण मिला हुआ है।

मेहनतकश जनसमुदाय के लिए कांग्रेस पार्टी भाजपा का विकल्प नहीं है। ये दोनों पार्टियाँ मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी हैं। ये दोनों ही इजारेदार पूंजीपतियों की वफादार पार्टियाँ हैं। इन दोनों पार्टियों को हराना होगा।

राजनीतिक व्यवस्था लोगों को सत्ता से बाहर रखने के लिए बनायी गयी है

इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग लोगों को बुद्धू बनाने के लिए और आपस में भिड़ाने के लिए, चुनावों का इस्तेमाल करता है। वह चुनावों के ज़रिये, अपनी एक वफादार पार्टी की जगह पर दूसरी वफादार पार्टी को बिठा देता है ताकि उसका पहले से चल रहा कार्यक्रम आगे भी चलता रहे पर लोगों में यह भ्रम पैदा किया जा सके कि कोई बेहतर परिवर्तन हुआ है।

जब कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में संप्रग सरकार बदनाम हो गयी थी, तब इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने भाजपा को “स्वच्छ विकल्प” बतौर खूब बढ़ावा दिया था। जैसे-जैसे भाजपा और उसके नेता मोदी बदनाम होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इजारेदार पूंजीवादी घराने कांग्रेस पार्टी को “धर्मनिरपेक्ष विकल्प” बतौर बढ़ावा देने लगे हैं।

संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और इस व्यवस्था में समय-समय पर चुनाव करवाने की प्रक्रिया का मकसद है यह सुनिश्चित करना कि राजनीतिक सत्ता इजारेदार घरानों के वफादार प्रतिनिधियों के हाथों में ही रहे।

हिन्दोस्तान का संविधान जनता को संप्रभुता नहीं दिलाता है। संप्रभुता राष्ट्रपति के हाथ में है, जो प्रधानमंत्री की अगुवाई में मंत्रीमंडल की सलाह का पालने करने को बाध्य है। मुट्ठीभर लोग, बेशुमार धनवान इजारेदार पूंजीपतियों के हित में देश को चलाते हैं।

1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा, जिससे लोगों के मूल अधिकार छीने गये थे, और 2016 में नोटबंदी की घोषणा, जिससे लोगों का नगदी पैसा छीन लिया गया था, ये सिर्फ दो उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि हमारे देश में फैसले लेने का अधिकार मात्र चंद हाथों में संकेंद्रित है। मौजूदा संविधान सबसे ताक़तवर आर्थिक हितों के पक्ष में, कार्यकारिणी की हुक्मशाही की इस हुकूमत को वैधता देता है। बार-बार संस्थागत और प्रक्रियागत क़ायदों को दरकिनार करके, अध्यादेशों का सहारा लिया जाना, यह दर्शाता है कि सर्वोच्च ताक़त बड़े सरमायदारों के हाथों में है।

इजारेदार पूंजीवादी घराने अपनी वफादार पार्टियों के चुनाव अभियानों के लिये धन देते हैं। वे ही प्रमुख टीवी चैनलों के मालिक हैं तथा उनपर नियंत्रण करते हैं। उनके ज़रिये वे अपनी पसंद की पार्टी के पक्ष में प्रचार करते हैं। मज़दूर वर्ग और मध्यम वर्ग के उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में भारी असमानता का सामना करना पड़ता है।

शासक वर्ग चुनाव अभियानों का इस्तेमाल करके लोगों के बीच में बंटवारों को और तीखा करते हैं तथा अपने इरादों को पूरा करने के लिये सबसे बेहतर प्रबंधक दल को चुनते हैं। उसी पार्टी को चुना जाता है जो सबसे अच्छी तरह लोगों को बुद्धू बनाते हुये, वह सब कुछ कर सकती है जो इजारेदार पूंजीपति चाहते हैं।

राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों की भूमिका मतदान के दिन शुरू होती है और मत डालने के साथ-साथ ख़त्म हो जाती है। फैसले लेने में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती। चुने गये प्रतिनिधियों और चुनी गई सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिये लोगों के पास कोई तरीका नहीं है।

आगे का रास्ता

कम्युनिस्टों को लोगों को सच-सच बताना होगा कि वर्तमान पार्टी प्रधान प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की व्यवस्था के ज़रिये जनता का शासन स्थापित करना नामुमकिन है। हमें एक वैकल्पिक व्यवस्था की ज़रूरत का प्रचार करना होगा, जिसमें लोग खुद अपना कार्यक्रम तय करेंगे और खुद अपना शासन करेंगे।

हमारा राजनीतिक मकसद है पूंजीपतियों के शासन की जगह पर मज़दूरों और किसानों का शासन स्थापित करना। ऐसा करके ही लोग अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिला सकेंगे और सबकी खुशहाली सुनिश्चित कर सकेंगे।

मज़दूरों और किसानों के शासन में राजनीतिक सत्ता का पुनर्गठन करना होगा ताकि संप्रभुता जनता के हाथ में हो। लोग चुने गये निकायों को कुछ ताक़त देंगे और बाकी ताक़तें लोगों के हाथ में रहेंगी।

सभी मानवीय, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों की संवैधानिक गारंटी होनी चाहिये तथा उन्हें लागू करने के तंत्र होने चाहियें।

कम्युनिस्टों का तत्कालीन काम है नव-निर्माण के इस कार्यक्रम के इर्द-गिर्द किसानों और सभी शोषित-उत्पीड़ित लोगों को लामबंध करना। कम्युनिस्टों को संसद का गुलाम बनने या व्यक्तिगत आतंकवाद का सहारा लेने के इन दोनों रास्तों को ठुकराना होगा, क्योंकि ये दोनों रास्ते मज़दूरों और किसानों के संयुक्त मोर्चे को बनाने के काम में सबसे ज्यादा बाधा डालते हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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