असम के चाय मज़दूरों ने प्रतिदिन 350 रुपये वेतन की मांग की

हिन्दोस्तान में चाय की कुल पैदावार का आधे से अधिक उत्पादन करने वाले असम के लगभग 800 चाय बाग़ानों में दस लाख से ज्यादा मज़दूर काम करते हैं। इन मज़दूरों का कोई निश्चित न्यूनतम वेतन नहीं है और इनकी रोज़ की मज़दूरी, ट्रेड यूनियनों और उद्योग के बीच समझौतों के माध्यम से तय की जाती है। लेकिन चाय बाग़ान प्रबंधन के प्रतिनिधि ’प्लांटर्स एसोसिएशन’, इस समझौते वाली क़ीमत को मज़दूरों के न्यूनतम वेतन से कई गुना नीचे ले जाते हैं। राज्य सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी के भुगतान को लागू करने के लिए कुछ भी नहीं किया है। असम में 1 जनवरी, 2016 को अधिसूचना जारी की गई थी कि अकुशल, अर्ध-कुशल और कुशल मज़दूरों का न्यूनतम वेतन क्रमशः 250 रुपये, 290 रुपये और 350 रुपये होगा।

जॉइंट एक्शन कमेटी फॉर टी वर्कर्स वेजेस’ (जे.ए.सी.टी.डब्ल्यू.डब्ल्यू.) जो राज्य के आठ संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है, इसने न्यूनतम मज़दूरी की मांग के समर्थन में सभी चाय बाग़ानों के मज़दूरों को विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान दिया है। समिति ने यह मांग रखी है कि इस मुद्दे पर संसद के अगले सत्र, जो कि 11 दिसंबर को शुरू होगा, में चर्चा की जाए।

समिति ने बताया कि 2014 में प्रचार करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने यह वादा किया था कि अगर वे सत्ता में आए तो चाय मज़दूरों के लिए एक समान न्यूनतम मज़दूरी लागू करेंगे। अब भाजपा का शासन केंद्र और राज्य दोनों में है, लेकिन ठीक कांग्रेस पार्टी की तरह ही भाजपा ने भी अपने किये गये वादों और मज़दूरों की मांगों को पूरी तरह नज़र अंदाज़ किया है।

इसके साथ ही, राज्य सरकार ने यह भी घोषणा कर दी है कि मज़दूरों को दिये जाने वाले अनाज पर सब्सिडी नहीं दी जायेगी। न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की बजाय, सरकार ने सभी मालिकों को चाय बाग़ान की भीतरी सड़कों के निर्माण के लिए 1 करोड़ रुपये दिए हैं। यह स्पष्ट रूप से मालिकों के हित में है जबकि मज़दूर अभी भी अपनी सबसे ज़रूरी मांग, न्यूनतम मज़दूरी के भुगतान की पूर्ति के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

असम में चाय उद्योग के लिए न्यूनतम मज़दूरी दर एक बार में 3 साल की अवधि के लिए तय की जाती है। आखिरी मज़दूरी समझौता दिसंबर 2017 में समाप्त हो गया। मज़दूर तब से न्यूनतम वेतन में वृद्धि की मांग कर रहे हैं। 3 जुलाई, 2018 को, राज्य के राज्यपाल ने एक आदेश पारित किया कि राज्य सरकार को मार्च 2018 से प्रति दिन मज़दूरी 30 रुपये की अंतरिम वृद्धि को लागू करना चाहिए। वास्तव में, अप्रैल 2018 से 137 रुपये की दैनिक मज़दूरी के साथ मज़दूरों को 30 रुपये की अंतरिम वृद्धि का भुगतान दिया जा रहा है। यह सभी बाग़ानों में मज़दूरों द्वारा मांगे जाने वाले न्यूनतम वेतन का आधा भी नहीं है। समिति मांग कर रही है कि जब भाजपा  ’एक देश, एक कर’ की बात करती है, तो सभी बागान मज़दूरों के लिए ’एक देश, एक मज़दूरी’ की मांग पूरी क्यों नहीं की जा सकती?

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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