वादा-खि़लाफ़ी पर किसानों का गुस्सा उबला

कर्नाटक से पंजाब तक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में देश के लिये अनाज पैदा करने वाले किसान हुक्मरानों की वादा-खि़लाफ़ी से बहुत गुस्से में हैं। जब भी किसान अपनी फ़सलों के लिए लाभकारी दाम और फ़सल बीमा की मांग को लेकर संघर्ष के मैदान में उतरते हैं, राज्य सरकारें और केंद्र सरकार बड़े-बड़े वादे करती हैं कि किसानों की मांगें पूरी की जाएंगी, लेकिन जब किसान अपना संघर्ष वापस ले लेते हैं और खेतों में लौट जाते हैं, तो सरकारें अपने वादों को भुला देती हैं।

16 नवम्बर को कर्नाटक में बेलगावी के किसान अपनी मांगों को लेकर राज्य की राजधानी में पहुँच गए। वे मांग कर रहे हैं कि चीनी मिलों को बेचे गए गन्ने की बकाया रकम का तुरंत भुगतान किया जाये। जब उनको मुख्यमंत्री से मिलने का आश्वासन दिया गया तो उन्होंने अपनी हड़ताल वापस ले ली। लेकिन सरकार ने इस मीटिंग को भी रद्द करके, इसे आगे की तारीख तक टाल दिया। इससे किसान बहुत आक्रोशित हो गए हैं और उन्होंने विधानसभा पर धावा बोल दिया है। गुरुवार को मुख्यमंत्री ने बेंगलुरू में चीनी मिलों के मालिकों से मुलाकात की, लेकिन बेलगावी और बागलकोट के किसान इस मीटिंग के नतीजे से संतुष्ट नहीं हैं। बेलगावी और बागलकोट के बीच चीनी की 35 मिलें हैं। बेलगावी और बागलकोट के किसानों ने अपना संघर्ष जारी रखा है, क्योंकि इस मीटिंग से कोई भी बात साफ नहीं हुई - चाहे वह उचित और लाभकारी दाम का भुगतान हो या फिर उनका पिछला बकाया, जिसका भुगतान सुनिश्चित करने का क्या तरीका होगा। ऐसा कई बार हुआ है कि किसानों को वादा-खि़लाफ़ी का सामना करना पड़ा है। मिल मालिकों ने सरकार से कई बार किसानों की फ़सल की बकाया रकम का भुगतान करने का वादा किया, लेकिन उन्होंने इस वादे को पूरा नहीं किया। सरकार भी यह सुनिश्चित करने में नाकामयाब रही है कि मिल मालिकों द्वारा किये गए वादे पूरी तरह से लागू हों। 

फ़सल के लिए उचित और लाभकारी दाम (फेयर एंड रेमुंनरेटिव प्राइस - एफ.आर.पी.) वह न्यूनतम दाम है, जिसे सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के अनुसार निर्धारित करती है। राज्य सरकार द्वारा हर एक पेराई के मौसम से पहले स्टेट अडवाईस प्राइस (एस.ए.पी.) की घोषणा की जाती है जो कि (एफ.आर.पी.) से दुगनी होती है। इस वर्ष पूरे देश के किसानों का चीनी मिलों पर एस.ए.पी. के अनुसार कुल बकाया राशि 16,600 करोड़ रुपये है और (एफ.आर.पी) के अनुसार 8,153 करोड़ रुपये है।

राज्य सरकार द्वारा गन्ने की बकाया रकम का भुगतान न किये जाने के खि़लाफ़ पंजाब के किसानों ने 17 नवंबर को दौसा के नजदीक रेल लाइन को बंद कर दिया। 250 प्रदर्शनकारी किसान दौसा और खुदाकुराला रेलवे स्टेशन के बीच ए-82 रेलवे लाइन की क्रासिंग के पास पटरियों पर लेट गए और अपना विरोध जाहिर किया।

किसान इस बात से बहुत नाराज़ हैं कि सरकार उनका आर्थिक और मानसिक रूप से उत्पीड़न कर रही है। उनको अपना खेत-खलिहान छोड़कर प्रदर्शन के लिए जाना पड़ता है, जो कि उनपर अतिरिक्त बोझ है। प्रदर्शन कर रहे इन किसानों में कई छोटे किसान हैं जिनके पास केवल 2 एकड़ ज़मीन है और गन्ने की फ़सल के लिए उन्होंने 20 एकड़ ज़मीन किराये पर ली है। चीनी मिलों के मालिकों के पास एक किसान के 25 लाख रुपये बकाया हैं।

फ़सल की बकाया राशि न मिलने की वजह से किसानों को साहूकारों और बैंकों से कर्ज़ उठाना पड़ता है ताकि उनको दो जून की रोटी मिल सके। किसानों ने लाखों रुपये का कर्ज़ उठाया है और अब वे चीनी मिलों के मालकों से अपनी फ़सल की बकाया राशि के भुगतान का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे अपना कर्ज़ा चुका सकें। इस बकाया राशि का भुगतान मिलने पर ही उनके पूरे परिवार की ज़िन्दगी टिकी हुई है।

मध्य प्रदेश की मंदसौर मंडी के किसान भी सरकार से बहुत नाराज़ हैं। ये किसान सरकार द्वारा दिए जा रहे मुआवजे़, बीमा और कर्ज़ माफ़ी की पेशकश को ठुकरा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि उनकी फ़सल के लिए “सही दाम” दिया जाना चाहिए। 2017 में जब पूरे राज्य में किसान अपनी हालत से तंग आकर सड़कों पर संघर्ष में उतर आये थे, तब सरकार ने किसानों से जो वादे किये थे उनसे गद्दारी कर रही है। किसानों ने “भावंतर” योजना को भी ठुकरा दिया है, जिसे मध्य प्रदेश सरकार किसानों का गुस्सा शांत करने के लिए लायी थी। यह योजना भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह फ़र्ज़ी निकली। पहले किसान अपनी सोयाबीन की फ़सल को 4000-5000 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर बेचा करते थे, लेकिन अब उनको आधे से भी कम क़ीमत मिल रही है। लहसुन पैदा करने वाले किसान अपनी फ़सल 500-1800 रुपये के दाम पर बेचने को मजबूर है, जिसे वे पहले 4000-10,000 रुपये के दाम पर बेचा करते थे।  

इस बीच महाराष्ट्र के हजारों किसान लोक संघर्ष मोर्चा के झंडे तले अपनी मांगों को लेकर मुंबई के आज़ाद मैदान की ओर कुच कर रहे हैं। वे सूखे से हुये नुकसान के लिए मुआवज़ा, बिना शर्त कर्ज़ माफ़ी और जंगल अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों के लिए जंगल पर अधिकार हासिल करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। राज्य सरकार ने जो वादे किये थे उनमें से 2 प्रतिशत भी पूरे नहीं किये हैं। इस बात को लेकर वे सरकार की निंदा कर रहे हैं और इस बार वे मुख्यमंत्री से मिलने और अपना हक़ हासिल करने पर अड़े हुए हैं।

पिछले एक साल में महाराष्ट्र के किसानों का यह तीसरा विशाल मोर्चा है। इसी वर्ष मार्च में 25,000 किसानों ने ऑल इंडिया किसान सभा के झंडे तले विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था और संपूर्ण कर्ज़ माफ़ी की मांग की थी। जुलाई के महीने में दूध का उत्पादन करने वाले किसानों ने प्रदर्शन किया था और दूध के दाम बढ़ाने की मांग की थी।

फ़सल बीमा योजना भी ऐसा एक उदाहरण है जहां घोषित लक्ष्य के ठीक विपरीत नतीजे देखने को मिलते हैं। उपलब्ध आंकड़ों से यह साफ़ नज़र आता है कि इस योजना का असली फ़ायदा तो निजी बीमा कंपनियों को हुआ है जो और अधिक आमीर बन गयी, जबकि बहुत ही कम किसान अपने ‘मुआवज़ों की रकम’ हासिल करने में कामयाब हुए। 2016 से आज तक केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर फसल बीमा योजना के लिए 66,000 करोड़ रुपये की रकम आवंटित की है। किसानों को दिए गए “मुआवज़ों” में यह देख पाना बड़ा मुश्किल है कि इसमें से कितनी रकम बीमा कंपनी की जेब से निकली है। असलियत में करीब-करीब पूरी रकम सरकार की तिजोरी से, यानी लोगों की जेबों से वसूली गयी है।

यह बिलकुल साफ़ नज़र आ रहा है कि आने वाले दिनों में किसान अपना संघर्ष तेज़ करने जा रहे हैं। नवंबर के अंत में देशभर के किसान दिल्ली में संसद पर प्रदर्शन करने की योजना पहले से ही बना चुके हैं, ताकि संसद को किसानों के मसलों पर चर्चा करने और उनका समाधान निकालने के लिए मजबूर कर सकें।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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