महाराष्ट्र के बिजली मज़दूरों का निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष

10 दिसम्बर को ठाणे में स्थित महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनी (एम.एस.ई.डी.सी.एल.) के ऑफिस के सामने गेट मीटिंग में भांडुप ज़ोन बचाव कृति समिति के झंडे तले सौ से ज्यादा मज़दूर इकट्ठे हुए थे। इस कृति समिति में बिजली मज़दूरों की कई यूनियनें शामिल हैं। इस मीटिंग में “मज़दूर एकता ज़िंदाबाद!”, “अधिकारी, अभियंता, कर्मचारी तथा जनता की एकता ज़िंदाबाद!”, “अम्बानी-अदानी सरकार मुर्दाबाद!”, “...हल्ला बोल ...!” जैसे एक के बाद एक दिये गए नारों से आकाश गूंज रहा था और भाग लेने वालों के उत्साह को और बुलंद कर रहा था!

वातावरण तो उर्जित होना ही था, क्योंकि बिजली वितरण में काम करने वाले अभियंता, अफ़सर, लाइंसमेन सहित सब मज़दूरों का प्रतिनिधित्व करने वाले महासंघ ने उसको आयोजित किया था। यूनियन तथा पार्टी सदस्यता के ऊपर उठकर, अलग-अलग श्रेणियों के मज़दूर, इंजिनीयर्स, कर्मचारी आपसी दीवारों को लांघ कर इकट्ठे हुए थे। उनका उद्देश्य था ठाणे महानगर के उपनगर, कलवा तथा मुम्ब्रा में बिजली वितरण को निजी हाथों में देने की योजना का तथा व्यवस्थापन के द्वारा मनमानी से थोपी जाने वाली पुनर्रचना का विरोध करना। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, लोक राज संगठन तथा कामगार एकता कमेटी के जो प्रतिनिधि समर्थन में आये थे, उनका सभी ने स्वागत किया।

महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स फेडरेशन के नेता, का. कृष्णा भोईर तथा का. लीलेश्वर बनसोड, इंटक के श्री जगदाले, वीज कामगार सेना के श्री विनायक जाधव, एस.ई.ए. के श्री देवकाते, वीज कामगार महासंघ के श्री नाईक तथा मागास वर्गीय संगठन के श्री दाभाडे ने अपनी बातें रखीं। एक के बाद एक वक्ताओं ने बताया कि कैसे एम.एस.ई.डी.सी.एल. में मज़दूरों की बहुत कमी है। ग्राहकों की संख्या बढ़ती जाती है, आय भी बढ़ती जाती है। बहुत बड़ी संख्या में और मज़दूरों की ज़रूरत है। इसके बावजूद, पिछले कई सालों से सरकार ने रिक्त पदों को भरना बंद कर दिया है। 97,000 मंजूर पदों में से सिर्फ 67,000 पदों पर मज़दूर काम कर रहे हैं! और अभी, मज़दूरों के प्रतिनिधियों को पूछे बिना प्रबंधन ने पुनर्रचना की एक ऐसी योजना बनायी है, जिससे इंजिनीयर्स तथा अफ़सर सहित सब श्रेणियों की नौकरियां ख़तरे में हैं! कलवा तथा मुम्ब्रा भांडुप ज़ोन में आते हैं। एम.एस.ई.डी.सी.एल. की 25 प्रतिशत आमदनी इन दो इलाकों से आती है। इसीलिए तो वहां निजीकरण का प्रयोग किया जा रहा है। अगर वह सफल हुआ तो महाराष्ट्र के सभी लाभदायक ज़ोनों के निजीकरण के द्वार खुलेंगे। इसलिए वक्ताओं ने ज़ोर दिया कि यह नहीं होने देने की ज़िम्मेदारी हम मज़दूरों की है।

Electricity Workers

काम की परिस्थिति कितनी कठिन है, इस पर कई वक्ताओं ने प्रकाश डाला। एक वक्ता ने बताया कि कैसे राज्य बिजली बोर्ड का जब निगमीकरण किया गया था, उस समय जो आश्वासन दिये गये थे वे सब आश्वासन झूठे साबित हुए हैं। बिजली न तो सस्ती है, न काफी है और न ही सबको उपलब्ध है। कई राज्यों में 30 से 40 प्रतिशत लोगों को बिजली मिलती ही नहीं है! एक अन्य वक्ता ने बताया कि भिवंडी में टॉरेंट कंपनी के हाथों में सरकार ने जब वितरण दिया, तब उसने कंपनी को 650 करोड़ रुपये मदद के नाम पर दिये थे। दोषपूर्ण मीटरों, बहुत बढ़े बिजली बिल, कंपनी अधिकारियों की मनमानी तथा ज़ोर-ज़बरदस्ती, इत्यादि की वजह से ग्राहक पीड़ित हैं। दुनियाभर में इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया गया है लेकिन सरकार ने इसी कंपनी को फिर से वहां का कांट्रेक्ट दिया है!

वक्ताओं ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि जिस कंपनी ने 2005 में मुम्बई में आयी बाढ़ के बाद, 24 घंटों के अंदर बिजली सप्लाई फिर से शुरू करने की ज़िम्मेदारी को निभाया था, अधिकारी उसे ख़त्म करने पर तुले हुए हैं। अमरीका तथा जापान जैसे देशों में जब ब्लैकआउट हुआ, तब सहायता के लिए इस कंपनी के इंजिनीयरों को बुलाया गया था। एक ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया। वहां के 6 महानगरों में बिजली वितरण निजी हाथों में देने की योजना के ख़िलाफ़ चीफ इंजिनीयर से लेकर कांट्रेक्ट कर्मियों तक सब ने हड़ताल की थी। मज़दूरों के संघर्ष की वजह से मुख्यमंत्री यह आश्वासन देने को मजबूर हो गए कि कंपनी का निजीकरण नहीं होने दिया जाएगा।

सब नागरिकों की तरफ़ से अपनी बात रखने के लिए डा. संजीवनी को आमंत्रित किया गया। उन्होंने कहा कि मूलभूत सेवाएं प्रदान करना तो सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है और इसमें मुनाफ़े के बारे में सोचना ही गलत है। तालियों से मज़दूरों ने इस बात को मंजूर किया। उन्होंने कहा कि आम लोगों को यह समझाने की ज़रूरत है कि कैसे निजीकरण से उनका नुकसान होगा तथा मज़दूरों एवं ग्राहकों को निजीकरण के ख़िलाफ़ सांझा संघर्ष करने की ज़रूरत है। जो मौजूद थे, उनके साथ कई अन्य संगठनों ने यह काम हाथों में लिया है। इसके बारे में 2 सभाएं हो चुकी हैं और जनजागृति का काम उत्साह से शुरू भी हो गया है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर बिजली मज़दूर अन्य क्षेत्र के मज़दूरों के साथ तथा आम लोगों के साथ एकता बनाते हैं, तो दुनिया में कोई भी ताक़त उन्हें नहीं रोक सकती।

सभा में निजीकरण के ख़िलाफ़़ संघर्ष को और मजबूत बनाने का निर्णय लिया गया। आने वाले हफ़्ते का प्लान बताया गया तथा सभा संपन्न हुई।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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