“योजनाओं” और वादाख़िलाफ़ी से किसान तंग आ चुके हैं!

किसान कृषि संकट के लिए स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं!

इस साल एक बार फिर देशभर के हजारों किसानों ने 29-30 नवंबर को जुलूस निकाला और संसद पर सभा की। 29 नवम्बर से किसान दिल्ली शहर के रामलीला मैदान में इकट्ठे होने शुरू हो गए। 30 नवंबर को उन्होंने अपनी मांगों को लेकर संसद पर मोर्चा निकाला।

पंजाब, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा से किसानों ने इस मोर्चे में हिस्सा लिया। ये किसान ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी के झंडे तले किसान मुक्ति मार्च के लिए इकट्ठा हुए थे। ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी में देशभर के 200 से अधिक छोटे-बड़े किसान संगठन शामिल हैं।

farmers march

मार्च के दौरान उन्होंने अपनी प्रमुख मांग, फसल के लिए लाभकारी दाम, की मांग को दोहराया। देशभर के किसान कई दशकों से इस मांग के लिए संघर्ष करते आये हैं। इसके अलावा, उन्होंने एक बार के लिये संपूर्ण कर्ज़ माफ़ी की मांग को भी उठाया, जिसके बगैर उनके जैसे सैकड़ों-हजारों किसान और उनके परिवार पूरी तरह से बर्बाद हो जायेंगे।

जिस भी पार्टी की सरकार सत्ता में आई है, वह उनकी इन मांगों को पूरी तरह से नज़रंदाज़ करती आई है या ऐसे वादे करती रही है जिनको उन्हें पूरा करना ही नहीं था। आज हमारे देश के किसान बेहद गुस्से में है और मांग कर रहे हैं कि कृषि संकट के मसले पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाये। संसद में पहले से ही दो विधेयक चर्चा के लिए लंबित हैं - किसानों को कृषि वस्तुओं के लिए सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्यों की गारंटी का अधिकार विधेयक 2018 और कर्जे़ से मुक्ति विधेयक 2018, जिन्हें संसद में पेश किया गया है।

फसलों के लिए लाभकारी दाम की मांग पूरी तरह से जायज़ मांग है। किसान के लिए आय सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है ताकि वह अपनी आजीविका चला सके, परिवार का पेट पाल सके और साथ ही अगले मौसम में फसल की बुआई कर सके। आज हमारे देश के सभी हिस्सों में किसानों को पूरी तरह से व्यापारियों और मंडियों में तेज़ी से चढ़ते-उतरते दाम के रहमों-करम पर निर्भर कर दिया गया है और ये दाम अक्सर फसल उत्पादन के खर्चे से कम होते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती हैं, लेकिन जब फसल मंडी तक पहुंचती है तो उस समय दाम इतने गिर चुके होते हैं कि किसान अपनी फसल को जो भी दाम मिले उस पर बेचने के लिए मजबूर हो जाते हंै, ताकि कुछ तो आमदनी हो। कई राज्य सरकारों और केंद्र सरकार ने तमाम योजनाओं की घोषणा की है, जो यह वादा करती हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य और असली दाम के बीच के अंतर की भरपाई करेगी, लेकिन ऐसी हर एक योजना एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आती है।

देश के किसान अपनी फसल को सूखा, बाढ़ और बे-मौसम बरसात और कीटों की वजह से होने वाले नुकसान से सुरक्षा की मांग उठा रहे हैं। मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाई.) का ऐलान किया और दावा किया कि यह योजना इस समस्या का समाधान करेगी। लेकिन यह योजना भी एक और घोटाले के रूप में सामने आई है।

हमारे देश के किसानों का दशकों का अनुभव और उनकी दयनीय स्थिति यह साफ दिखाती है कि हिन्दोस्तान के कृषि संकट का बुनियादी समाधान करने की ज़रूरत है। कृषि किसी भी समाज का सबसे ज़रूरी आर्थिक कार्य है जिससे समाज से सदस्यों की सबसे बुनियादी ज़रूरत पूरी होती है। देश के लिए अनाज पैदा करने वाले किसानों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सभी मेहनतकश लोगों के लिए वाज़िब दाम पर पर्याप्त मात्रा में अच्छी गुणवत्ता का अनाज और अन्य ज़रूरी वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करना यह राज्य का फर्ज़ है।

इस मक़सद को हासिल करने के लिए राज्य को किसानों से सभी फसलों को लाभकारी दाम पर खरीदने का प्रबंध करना होगा। इसके लिए राज्य को ऐसी मंडियां बनाने में निवेश करना होगा, जहां किसान अपनी फसल, अनाज और सब्जियां लेकर आयें। सार्वजनिक खरीदी के लिए कृषि वस्तुओं की खरीदी और उनके भंडारण के लिए आधुनिक सुविधाओं का निर्माण करने में निवेश करने की ज़रूरत है। साथ ही, इन वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिये, देशभर में थोक और खुदरा वितरण पर निवेश करने की ज़रूरत है।

राज्य को निवेश करने की ज़रूरत है, ताकि कृषि के लिए ज़रूरी अच्छी गुणवत्ता की लागत वस्तुओं को वाज़िब दाम पर किसानों को मुहैया कराया जा सके। इसके अलावा, प्राकृतिक आपदा या किसी अन्य वजह से फसल को होने वाले नुकसान से किसानों को बचाने के लिये बीमा की ज़रूरत है।

ऐसा करने के लिए पूरी अर्थव्यवस्था की दिशा को बुनियादी तौर पर बदलने की ज़रूरत है, ताकि अनाज पैदा करने वालों की रक्षा और खुशहाली सुनिश्चित हो, ताकि देहातों और शहरों के अन्य मेहनतकश लोगों के लिए अच्छी गुणवत्ता के कृषि उत्पाद वाज़िब दाम पर उपलब्ध हों। ऐसी अर्थव्यवस्था को सभी मेहनतकश लोगों के लिए सुख और सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में चलाना होगा।

हिन्दोस्तान की कृषि व्यवस्था को मौजूदा संकट से निकालने के लिए ऐसा करना बेहद ज़रूरी है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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