सज्जन कुमार को सजा : गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिये और इंसाफ के संघर्ष की जीत

17 दिसंबर, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस के भूतपूर्व नेता सज्जन कुमार को 1984 के सिखों के कत्लेआम में प्रमुख आयोजनकर्ता की भूमिका के लिए सज़ा सुनाई। जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सज्जन कुमार को “हत्या के लिए उकसाने, हत्या की आपराधिक साज़िश रचने, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सद्भावना के रखरखाव को नुकसान पहुंचाने के लिये पूर्वाग्रहपूर्ण कार्य करने और गुरुद्वारे को जलाकर अपमानित और नष्ट करने” के अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

31 अक्टूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली, कानपुर और देश के कई अन्य शहरों में राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक जनसंहार में सिख समुदाय के हज़ारों लोगों का कत्लेआम किया गया था। उस जनसंहार को तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस सरकार ने अगुवाई दी थी। सिख पुरुषों और नौजवानों को जलाकर मारने, महिलाओं और लड़कियों का बलात्कार करने, गुरुद्वारों को जलाने और सिख समुदाय के लोगों के घरों और व्यवसायों को लूटने में पुलिस ने कातिलाना गिरोहों का खुलकर साथ दिया था।

सिर्फ पालम इलाके में ही, सज्जन कुमार की अगुवाई में और उनके उकसावे पर भीड़ ने करीब 400 लोगों की हत्या की थी। चश्मदीद गवाहों ने बताया है कि सज्जन कुमार भीड़ को भड़काते हुए कह रहे थे कि “सिख साला एक नहीं बचाना चाहिए। जो हिन्दू भाई उनको शरण देता है, उसका घर भी जला डालो और उनको भी मारो”। इन कातिलाना हमलों को अंजाम देने के लिए भीड़ को वोटर लिस्ट, ज्वलनशील रसायन और रबड़ के टायर उपलब्ध कराये गए। यही तरीका दिल्ली के अन्य कई इलाकों में भी दोहराया गया, जहां कांग्रेस पार्टी के नेताओं की अगुवाई में कातिलाना भीड़ ने उन्हीं नारों के साथ सिख लोगों का कत्लेआम किया था।

34 वर्ष पहले जब यह कत्लेआम किया जा रहा था, तब उस घटना से चिंतित कई नागरिकों ने तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंह राव और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से कत्लेआम को रोकने के लिए कदम उठाने की अपील की थी। दोनों ही ने ऐसा करने में अपनी नाकामयाबी ज़ाहिर की थी। वकील, सेवानिवृत्त जज और राजनीतिक कार्यकर्ताओं समेत कई नागरिक समितियों ने उस जनसंहार की जांच की थी और सभी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि उन दिनों दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में जो कुछ हुआ था वह राज्य द्वारा पूर्व-नियोजित कत्लेआम था।

पिछले 34 वर्षों में हिन्दोस्तानी राज्य ने 1984 में सिखों के कत्लेआम का आयोजन करने वालों और उसे अंजाम देने वालों को बचाने में और उनके गुनाहों पर पर्दा डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, चाहे जिस भी पार्टी की सरकार सत्ता में रही हो। दर्जनों जांच आयोगों, सी.बी.आई और अलग-अलग स्तरों पर न्यायालयों की भी यही भूमिका रही है।

अपना फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायलय के बताया कि “यह एक असाधारण मामला था, जहां” सज्जन कुमार “के खिलाफ़ सामान्य तरीके से मुकदमा चलाना असंभव था, क्योंकि ऐसा मालूम होता था कि उनके खिलाफ़ मामले को दबाने की बड़े पैमाने पर कोशिश की जा रही थी, कि इस मामले को दर्ज करने या पंजीकृत करने के प्रयासों को भी रोका जा रहा था”। 

पिछले 34 वर्षों से लोग लगातार 1984 के जघन्य अपराध के गुनहगारों को सज़ा देने की मांग करते आये हैं, खास तौर से उन लोगों को जो सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बैठे थे और जिन पर इस कत्लेआम में शामिल होने और उसे अगुवाई देने के आरोप थे। जिन लोगों की हत्या की गयी थी, उनके परिजन 1984 के कत्लेआम की जांच करने के लिए बनाये गए तमाम आयोगों के सामने बड़ी बहादुरी के साथ, अपनी बात दोहराते आये हैं। यह संघर्ष अदालतों के साथ-साथ, सड़कों पर भी निरंतर लड़ा जाता रहा है। साल-दर-साल कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, लोक राज संगठन, सिख फोरम और कई अन्य संगठन विरोध प्रदर्शनों, सभाओं और चर्चाओं के ज़रिये, गुनहगारों को सज़ा देने की मांग करते आये हैं और राजकीय आतंकवाद तथा राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा, जिसका भीषण रूप 1984 के कत्लेआम में देखने को मिला था, उसके खिलाफ़ एक सांझा संघर्ष करने का बुलावा देते आये हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सज्जन कुमार को दी गयी सज़ा इस लंबे, दृढ़ और बहादुर सघर्ष का नतीजा है। खास तौर से जगदीश कौर और नीरप्रीत कौर जैसी चश्मदीद गवाहों की बहादुरी को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने इंसाफ के लिए 34 वर्षों से लगातर संघर्ष किया है। जगदीश कौर ने अपने नौजवान पुत्र पर हुए हमले को और उसके जिंदा जलाये जाने को अपनी आँखों से देखा था। नीरप्रीत कौर के पिताजी को उनकी आँखों के सामने घर से बाहर खींचकर निकाला गया और जिंदा जला दिया गया था।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि “नवंबर 1984 के दिनों में हिन्दोस्तान में जो दंगे हुए थे, जिनमें (आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार) केवल दिल्ली में ही 2733 और देश भर में करीब 3350 सिखों की बेरहमी से हत्या की गयी थी, वह इस तरह का पहला कांड नहीं था और दुर्भाग्यवश आखरी भी नहीं। देश के बंटवारे के समय पंजाब, दिल्ली और कई अन्य इलाकों में हुआ जनसंहार हमारी सामूहिक दर्दनाक याद का हिस्सा बना हुआ है, जैसे कि 1984 में सिखों का कत्लेआम भी। इसी तरह के कत्लेआम 1993 में मुंबई में, 2002 में गुजरात में, 2008 में ओडिशा के कंधमाल, और 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफरनगर में तथा कई अन्य जगहों पर आयोजित किये गये हैं। इन सभी जनसंहारों में एक समानता यह है कि इन हमलों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया है और इनको कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिए जिम्मेदार एजेंसियों की सहायता से सबसे बड़े राजनीतिक खिलाड़ियों की अगुवाई में आयोजित किया गया है। इन अपराधों के लिए जिम्मेदार गुनहगारों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और वे अदालत की कार्यवाही व सज़ा से बचते आये हैं।

ऐसे गुनहगारों को सज़ा दिलवाना मौजूदा कानूनी व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। जैसे कि तमाम अपीलों से साफ दिखता है, किसी की भी जवाबदेही साबित करने में दशकों बीत जाते हैं। इसके लिए कानूनी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है। हमारे देश की कानूनी व्यवस्था में न तो ‘मानवता के खिलाफ़ अपराध’ और न ही ‘जनसंहार’ के खिलाफ़ कोई कानून है। कानूनी व्यवस्था में इस कमी को तुरंत पूरा करना बेहद जरूरी है।”

बीते 34 वर्षों से सिखों के जनसंहार के पीड़ितों के परिजन, जो इंसाफ के लिये लगातार संघर्ष करते आये हैं, यह सच्चाई आगे लाने की पूरी कोशिश करते रहे हैं कि नवम्बर 1984 में जो घटना घटी थी वह सुनियोजित जनसंहार ही था। लोगों ने बार-बार यह मांग की है कि कमान की जिस कड़ी के ज़रिये उस जनसंहार को अंजाम दिया गया था, उसे सबके सामने खुल कर रखा जाये और कमान में अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के आधार पर जनसंहार के मुख्य आयोजकों को सज़ा दी जाये। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक कत्लेआम को खत्म करने के लिये कई वकीलों और सेवानिवृत्त जजों ने राज्य द्वारा आयोजित जनसंहार की समस्या पर एक कानून का मसौदा पेश किया है। उस कानून में यह प्रस्तावित किया गया है कि पुलिस अध्यक्ष, प्रशासन के अध्यक्ष, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री भी, यानि आधिकारिक पदों पर बैठे सभी को कमान की जिम्मेदारी के आधार पर जनसंहार के लिये जवाबदेह ठहराना चाहिए।

न तो संप्रग सरकार और न ही वर्तमान राजग सरकार ने कभी भी ऐसा कानून पास करने का विचार किया है।

हमारे देश के हुक्मरान वर्ग की दो प्रमुख पार्टियां, कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित के लिए राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करने के गुनहगार हैं। पिछले 34 वर्षों में राजकीय आतंकवाद और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा फैलाना बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में हमारे देश के हुक्मरान वर्ग का सबसे पसंदीदा तरीका रहा है। लोगों की एकता को चकनाचूर करने और शोषण व दमन के खिलाफ़ अपने अधिकारों के लिए लोगों के सांझा संघर्ष को भटकाने के लिए हमारे हुक्मरान वर्ग राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल करते आये हैं। जो भीषण हादसा 1984 में हुआ था, वही बार-बार देश के अलग-अलग हिस्सों में दोहराया गया है। 1992-93 में बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस के बाद, 2002 में गुजरात में, 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में और कई अन्य जगहों पर ऐसा किया गया है। मानवता के खिलाफ़ इन सभी अपराधों से यही साबित होता है कि हिन्दोस्तानी राज्य सांप्रदायिक है।

सांप्रदायिक हिंसा को ख़त्म करने के लिये संघर्ष करने वाले लोग कभी भी इस सांप्रदायिक राज्य और इसकी तमाम संस्थाओं से समाधान की उम्मीद नहीं कर सकते। हमें इस राज्य का एक नयी बुनियाद पर पुनर्गठन करने के नज़रिये के साथ संगठित होना होगा, जहां धर्म या किसी अन्य आधार पर लोगों को सताया नहीं जायेगा और न ही उनके साथ भेदभाव किया जायेगा। सांप्रदायिक क़त्लेआम से पीड़ित लोगों के लिए इंसाफ और गुनहगारों को सज़ा दिलाने और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद को खत्म करने के हमारे लोगों के सांझे संघर्ष को इसी नज़रिये के साथ आगे बढ़ाना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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