ग़दरियों के रास्ते पर चलने का मतलब है हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए संघर्ष करना!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की 38वीं सालगिरह के अवसर पर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का भाषण

साथियों, हम अपनी पार्टी की 38वीं सालगिरह ऐसे समय पर मना रहे हैं जब सभी देशों के लोग बहुत ही गंभीर स्थिति का सामना कर रहे हैं। रोज़गार की असुरक्षा असहनीय होती जा रही है। सारी दुनिया में अराजकता और हिंसा बढ़ती जा रही है। नस्लवाद, साम्प्रदायिकता, खास जातियों और समुदायों, राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं का दमन - ये सब दिन-ब-दिन, बद से बदतर होते जा रहे हैं।

सभी पूंजीवादी देशों में, और हमारे देश में भी, हुक्मरान तरह-तरह के झूठे प्रचार फैला कर यह छिपाने की कोशिश कर रहे हैं कि लोगों की समस्याओं का उनके पास कोई समाधान नहीं है। वे इस बात पर आपस में कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ रहे हैं कि कौन लोगों को सबसे ज्यादा लूटेगा। अलग-अलग साम्राज्यवादी ताक़तें आपस में स्पर्धा कर रही हैं, एक दूसरे के खि़लाफ़ खुले और गुप्त, आर्थिक और सैनिक जंग लड़ रही हैं।

आज भी हमारे देश में साम्राज्यवादी लूट, पूंजीवादी शोषण, जातिवादी भेदभाव और हर तरह के दमन से मुक्ति के लिए ठीक वही संघर्ष चल रहा है, जिसके बारे में ग़दरियों ने सौ साल पहले बताया था। ग़दरियों ने ऐलान किया था कि हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक हमारे देश के श्रम और संसाधनों का शोषण और लूट होती रहेगी, चाहे लूटने वाले विदेशी पूंजीपति हों या हिन्दोस्तानी या दोनों का गठबंधन। कोई इस बात को इनकार नहीं कर सकता है कि आज भी हमारे श्रम और संसाधनों का शोषण और लूट हो रही है। हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था संकट-ग्रस्त साम्राज्यवादी व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा जुड़ती और फंसती जा रही है।

जो भी सरकार बनती रही है, वह निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को लागू करती रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है टाटा, बिरला, अंबानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों तथा उनके विदेशी सहयोगियों के लिए अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करना। इस कार्यक्रम का मकसद है मज़दूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण करना, किसानों को खूब लूटना, हमारे कुदरती संसाधनों को लूटना और जनता की बचत के धन को लूटना। आज इस समाज-विरोधी कार्यक्रम का लोग बढ़-चढ़कर विरोध कर रहे हैं।

उद्योग और सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में मज़दूरों के विरोध संघर्ष बढ़ रहे हैं। 2018 में हमने देशभर के किसान संगठनों की अप्रत्याशित एकता देखी है, अपने उत्पादों के लिए स्थाई और लाभकारी दामों की मांग को लेकर तथा बीते कर्ज़ों की माफ़ी की मांग को लेकर। महिलायें कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खि़लाफ़ बढ़-चढ़कर संघर्ष कर रही है। करोड़ों नौजवान रोज़गार की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।

2014 में मोदी की अगुवाई में भाजपा की केन्द्र सरकार बनी थी। उसने भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का वादा किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने आमदनियों की असमानताओं को घटाने और सबको विकास व रोज़गार दिलाने का भी वादा किया था। परन्तु ज्यादा से ज्यादा लोग यह समझने लगे हैं कि यह भाजपा सरकार इजारेदार पूंजीवादी घरानों की सेवा में उसी पहले से चल रहे समाज-विरोधी कार्यक्रम को ही लागू कर रही है। सुधार के नाम पर उसने मज़दूरों के अधिकारों को छीनने वाले कानून पास किये हैं। उसने कृषि व्यापार का उदारीकरण करने के कदमों को जारी रखा है, जिसकी वजह से किसान और ज्यादा हद तक कर्ज़ों में डूब रहे हैं तथा उनके रोज़गार की असुरक्षा बढ़ती जा रही है। उसने भारतीय रेल व दूसरी सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण और तेज़ी से आगे बढ़ाने के कदम लिये हैं। उसने विदेशी पूंजीवादी कंपनियों के लिये बहुत सारे नये-नये क्षेत्रों को खोल दिया है जिनमें वे पूंजी निवेश कर सकते हैं और हमारे मज़दूरों के सस्ते श्रम का अतिशोषण कर सकते हैं।

कांग्रेस पार्टी भाजपा पर यह इल्ज़ाम लगाती है कि वह “सूटबूट की सरकार“ चला रही है, यानी टाटा, बिरला, अंबानी और दूसरे धनवान इजारेदार पूंजीवादी घरानों की सेवा में सरकार चला रही है। भाजपा कांग्रेस पर यह इल्जाम लगाती है कि एक भ्रष्ट परिवार उस पार्टी की अगुवाई कर रहा है। सच तो यह है कि ये दोनों पार्टियां इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा लूट की हिफा़ज़त करती हैं तथा इसमें पूरा सहयोग देती हैं और इन्हीं तंग हितों को पूरा करने के लिए धर्म और जाति का इस्तेमाल करके लोगों को आपस में बांटती हैं। पूरी व्यवस्था इसी तरह काम करती है ताकि धनवान अल्पसंख्यक तबका मेहनतकश जनसमुदाय को बांटकर उन पर राज कर सके। ये पार्टियां लालची इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की अलग-अलग प्रबंधक टीम मात्र ही हैं।

न सिर्फ संसद की प्रमुख पार्टियां बल्कि राज्य के सभी अंग, कार्यकारणी, विधायकी और न्यायपालिका, सब ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट हैं। रिश्वत लेना-देना इस राज्यतंत्र के कामकाज का एक निहित हिस्सा है।

शासक वर्ग लोगों की ज्वलंत आर्थिक समस्याओं को हल करने में नाक़ामयाब है। इसलिए वह सांप्रदायिक और नफ़रत-भरी हिंसा, अल्पसंख्यक व दबी-कुचली जातियों के उत्पीड़न, उग्र राष्ट्रवादी प्रचार और पाकिस्तान पर “सरर्जिकल स्ट्राइक” जैसे कदमों का सहारा लेता है।

हर रोज़ देश में कहीं न कहीं किसी बेकसूर इंसान या किन्हीं बेकूसर लोगों पर हमला किया जाता है और उन्हें मार डाला जाता है। कभी यह “गऊ रक्षा“ के नाम पर किया जाता है, तो कभी “इस्लामी आतंकवादियों” या “लव-जिहाद” का मुक़ाबला करने के नाम पर। अपने अधिकारों के लिए, इंसाफ के लिए, शोषण-दमन और भेदभाव से मुक्त हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को “राष्ट्र-विरोधी” और “आतंकवादी” बताया जाता है। उनका कत्ल किया जाता है, उन्हें जेल में बंद करके तड़पाया जाता है।

दिन-ब-दिन यह साफ होता जा रहा है कि यह पूंजीपति वर्ग समाज पर शासन करने के लायक नहीं है। यह वर्ग अपने शासन को बरकरार रखने के लिए लोगों को बांटने और गुमराह करने का रास्ता अपनाता है। इसके लिए वह बीते समय से, उपनिवेशवाद-पूर्व और उपनिवेशवादी काल से, बेहद पिछड़े और वहशी रिवाज़ों का सहारा लेता है।

इससे निकलने का क्या रास्ता है? इस तबाहकारी रास्ते को कैसे रोका जा सकता है? आगे बढ़ने का क्या रास्ता है? आज संघर्ष करने वाले सभी लोगों के मन में यही ज्वलंत सवाल है।

साथियों,

हिन्दोस्तान में बर्तानवियों के खि़लाफ़ उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के सामने दो रास्ते थे - एक क्रांति का रास्ता और दूसरा समझौते का रास्ता। हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी, जो मज़दूरों और किसानों की पार्टी थी, क्रांतिकारी रास्ते की हिमायत कर रही थी। हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी का राजनीतिक लक्ष्य था उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी शासन का तख़्तापलट करके, मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करना। कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा, आर.एस.एस. और पूंजीपतियों व ज़मीनदारों की दूसरी पार्टियों और संगठनों ने उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ समझौता करने के रास्ते की हिमायत की थी। उन्होंने साम्राज्यवादी व्यवस्था से नाता तोड़ने के रास्ते का विरोध किया। उन्होंने उपनिवेशवादियों के शासन की जगह पर हिन्दोस्तानी सरमायदारों की हुकूमत को बिठाने का काम किया। हुक्मरान हिन्दोस्तानी सरमायदारों ने साम्राज्यवादियों तथा देश के अंदर सभी पिछड़ी ताक़तों के साथ गठबंधन बनाया।

आज भी हमारे सामने सिर्फ दो रास्ते हैं। एक है ग़दरियों का रास्ता। इसका मतलब है साम्राज्यवादी व्यवस्था और पूरी उपनिवेशवादी विरासत से पूरी तरह नाता तोड़ देना और हिन्दोस्तानी समाज की नयी नींव डालना। इसका मतलब है सरमायदारों की हुकूमत को ख़त्म करके, उसकी जगह पर मज़दूरों-किसानों की हुकूमत स्थापित करने के राजनीतिक लक्ष्य के इर्द-गिर्द मज़दूर वर्ग और सभी उत्पीड़ित जनसमुदाय को एकजुट करना। दूसरा रास्ता है वर्तमान व्यवस्था के साथ समझौते का रास्ता, यानी इसी व्यवस्था के अंदर किसी तथाकथित धर्म-निरपेक्ष मोर्चे या भ्रष्टाचार-विरोधी मोर्चे के रूप में किसी तथाकथित विकल्प की तलाश करना। दूसरे शब्दों में, इसका मतलब है “संविधान की रक्षा“ के नाम पर सरमायदारों की हुकूमत और उनके राज्य की हिफाज़त करना।

आज हिन्दोस्तानी समाज में जो भी समस्याएं हैं, उनकी जड़ इसी बात में है कि 1947 में जब सत्ता का हस्तांतरण हुआ था, तब उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ नाता नहीं तोड़ा गया था। 1947 में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के साथ समझौते का सौदा किया गया था और उसे सांप्रदायिक आधार पर देश को बांटकर लागू किया गया था। देश के बंटवारे के साथ-साथ 15 लाख से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का जनसंहार किया गया था और एक करोड़ से ज्यादा लोगों का बलपूर्वक विस्थापन व आप्रवासन किया गया था।

1947 में हिन्दोस्तान के सरमायदारों ने साम्राज्यवाद के साथ जो समझौता किया था, उसी की वजह से उपनिवेशवाद के पश्चात के हिन्दोस्तान में वे सारी चीजें निरंतर बरकरार रहीं जो उपनिवेशवादी काल में हुआ करती थीं। अंतर सिर्फ इतना हुआ कि गोरे लोगों की जगह हिन्दोस्तान के कुलीन वर्ग ने ले ली। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की आपसी दुश्मनी को बनाए रखने के लिए ढेर सारे संसाधन खर्च किए जाते हैं। शोषण और लूट की आर्थिक व्यवस्था मेहनतकश जनसमुदाय के जीवन को तबाह करती जा रही है। आज़ाद हिन्दोस्तान में आज भी वही पुरानी राजनीतिक व्यवस्था बरकरार है जो न्यासधारिता, संसद की संप्रभुता, राज्य का सर्वोपरि अधिकार और बर्तानवी साम्राज्यवादी सरमायदारों के दूसरे विचारों पर आधारित है।

1950 के हिन्दोस्तानी संविधान का अधिक हिस्सा बर्तानवी संसद द्वारा पास किए गए 1935 के भारत सरकार अधिनियम की प्रतिलिपि थी। हिन्दोस्तान के गद्दार बड़े सरमायदारों ने यह फैसला किया कि आज़ाद हिन्दोस्तान में वे सत्ता के उपनिवेशवादी संस्थानों को ही बरकरार रखेंगे। इसे उचित ठहराने के लिए उन्होंने, उन्हीं सिद्धांतों का सहारा लिया जिन्हें उपनिवेशवादियों ने अपनी शोषण-लूट की सत्ता को जायज़ ठहराने के लिए प्रस्तुत किया था। इसका परिणाम यह है कि बीते काल की हर पिछड़ी चीज आज भी जारी है और बद से बदतर होती जा रही है। हर चुनाव अभियान में धर्म और जाति की पहचान को आगे रखा जाता है। अब तो इस या उस नेता के गोत्र या हनुमान की जात की भी बात उछाली जा रही है!

कांग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों ही बर्तानवी उपनिवेशवादियों से विरासत में पाए गए इस राज्यतंत्र और शासन के तौर-तरीकों को निरंतर लागू करने पर वचनबद्ध हैं। वे दोनों ही पूंजीवादी व्यवस्था और बढ़ती साम्राज्यवादी लूट की व्यवस्था की हिफ़ाज़त करती हैं। वे दोनों ही ‘बांटों और राज करो’ की उपनिवेशवादी कार्यनीति का इस्तेमाल करती हैं।

भाजपा “हिन्दू अस्मिता” और हिन्दोस्तानी राष्ट्रवाद का नाम लेकर सांप्रदायिक हमले आयोजित करती है और लोगों को बांटने की राजनीति चलाती है। कांग्रेस पार्टी धर्म-निरपेक्षता और हिन्दोस्तानी राष्ट्रवाद के झंडे तले उसी राजनीति को चलाती है। सच यह है कि ये दोनों पार्टियां एक ही वर्ग के हित में काम करती हैं। ये दोनों पार्टियां एक ही राष्ट्र-विरोधी और समाज-विरोधी कार्यक्रम पर वचनबद्ध हैं।

बीते 71 वर्षों से हिन्दोस्तान साम्राज्यवाद के साथ समझौता करने और संकट-ग्रस्त विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के अंदर ज्यादा से ज्यादा जुड़ने के रास्ते पर चलता रहा है। हुक्मरान हिन्दोस्तानी सरमायदार खुद एक साम्राज्यवादी ताक़त बनने के अपने इरादों को पूरा करने के लिए, अमरीका और दूसरी बड़ी ताक़तों के साथ समझौता करते हैं और टकराते भी हैं। मज़दूर वर्ग, किसानों और दूसरे मेहनतकशों को इस रास्ते पर चलकर कोई फायदा नहीं हुआ है। पूंजीवादी हुकूमत को बरकरार रखने से आम जनसमुदाय को कोई फायदा नहीं हुआ है। मौजूदा संविधान जो हमारी जनता का शोषण-दमन करने और देश को लूटने वाली राजनीतिक सत्ता को वैधता देता है, उसकी हिफ़ाज़त करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता है।

हम मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को वर्तमान राज्य और वर्तमान राजनीतिक सत्ता की हिफ़ाज़त करने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि यह सत्ता और यह राज्य हमारे अधिकारों की हिफ़ाज़त नहीं करते हैं। हमारे लिए यही लाभकारी होगा कि हम ग़दरियों के लक्ष्य के लिए संघर्ष करें, यानी उस नए हिन्दोस्तानी समाज, नयी राजनीतिक सत्ता और नए राज्य की नींव डालें जो सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। उस नए राज्य का एक नया संविधान होगा जो मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों तथा हिन्दोस्तानी संघ के सभी घटकों के राष्ट्रीय अधिकारों का आदर करेगा और इन्हें सुनिश्चित करेगा। आज की इस अमानवीय पूंजी केन्द्रित अर्थव्यवस्था की जगह पर हमें एक मानव केन्द्रित अर्थव्यवस्था की ज़रूरत है।

हमें एक ऐसे संविधान के लिए संघर्ष करना होगा, जिसमें अधिकारों की आधुनिक परिभाषा होगी। अधिकार वस्तुगत हैं, किसी की मर्जी के अनुसार नहीं हैं। यह राज्य का फर्ज़ है कि जब भी किसी के अधिकार का हनन होता है तो राज्य उसके अधिकार की रक्षा करे। इंसान होने के नाते हर व्यक्ति के कुछ अधिकार होते हैं। मानव अधिकारों में ज़मीर का अधिकार और सुरक्षित रोज़गार का अधिकार भी शामिल होते हैं। हिन्दोस्तान के हर बालिक नागरिक के बराबर के राजनीतिक अधिकार होने चाहिएं। हरेक राष्ट्र और राष्ट्रीयता के अपने-अपने अधिकार हैं। महिलाओं, वेतनभोगी मज़दूरों, इत्यादि सभी के अपने-अपने अधिकार हैं। सभी अधिकारों को संविधान में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इन अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य को जवाबदेह होना चाहिए।

1857 में हिन्दोस्तान के सभी धर्मों और जातियों के लोगों ने एकजुट होकर ऐलान किया था ‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा!’ 20वीं सदी के प्रारंभ में ग़दरियों और उनके बाद बने संगठनों ने नए हिन्दोस्तान के उसी लक्ष्य को और विकसित किया था, जो 1857 में उभरकर आया था।

बर्तानवी उपनिवेशवादियों ने बीते काल से हर पिछड़े और दमनकारी रिवाज़ का इस्तेमाल करके और ‘बांटो और राज करो’ के जलील तरीकों का इस्तेमाल करके, उस नए हिन्दोस्तान को उभरने से रोका था। उन्होंने सांप्रदायिकता पर आधारित राज्य का निर्माण किया। उन्होंने धर्म-निरपेक्षता का प्रचार किया पर गुप्त रूप से उन सभी धार्मिक उग्रवादियों को प्रश्रय दिया जो हर क्षण सांप्रदायिक जहर उगलते रहते थे। उन्होंने चुनाव की ऐसी प्रक्रिया स्थापित की जिसके ज़रिये जायदाद वाले वर्गों और चुनिंदा जातियों के कुलीन तबकों को सभी प्रांतों के विधायक मंडलों में शामिल किया जा सकता था। उन्होंने जायदाद वाले वर्गों के अलग-अलग तबकों की राजनीतिक पार्टियां बनवायीं, जो चुनावों में भाग लेकर उपनिवेशवादी राज्य का हिस्सा बनेंगी। आज़ाद हिन्दोस्तान में आज भी यही व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया जारी है।

विशेष तबकों को सत्ता में शामिल करने की इस व्यवस्था को न तो कांग्रेस पार्टी बदलना चाहती है और न ही भाजपा, क्योंकि यह इन दोनों के हित में है। सबसे अहम बात यह है कि यह व्यवस्था इन पार्टियों को धन-समर्थन देने वाले इजारेदार पूंजीपतियों के हित में है।

“संविधान बचाओ“ यह नारा पूंजीवादी हुक्मशाही और साम्राज्यवादी लूट के वर्तमान राज्य की हिफ़ाज़त करने का नारा है। क्या मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों को ख़तरा सिर्फ भाजपा से है? नहीं, यह ख़तरा इसलिए है क्योंकि वर्तमान राज्य इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का हथकंडा है। भाजपा इजारेदार पूंजीवादी घरानों की भरोसेमंद पार्टियों में एक है, जबकि कांग्रेस पार्टी दूसरी है।

“संविधान बचाओ” का नारा हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों का नारा है। इसका उद्देश्य है मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को मज़दूरों-किसानों की हुकूमत स्थापित करने के रास्ते से भटकाना। हम कम्युनिस्टों को शासक वर्ग के इस दुष्ट इरादे का पर्दाफ़ाश करना चाहिए। हमें ग़दरियों का रास्ता तथा उसी रास्ते पर चलने वाले हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे संगठनों का रास्ता अपनाना होगा। उन सभी ने उपनिवेशवादियों के संविधान और कानूनों को खुलेआम खारिज़ किया था। हमें सरमायदारों के लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के विकल्प को बहादुरी से आगे रखना होगा। सरमायदारों के लोकतंत्र का विकल्प श्रमजीवी लोकतंत्र है। श्रमजीवी लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित कर सकेगी कि हर मामले में मेहनतकश बहुसंख्या का मत ही हावी होगा। हमें मज़दूर वर्ग और सभी दबे-कुचले लोगों को इस विकल्प के इर्द-गिर्द लामबंध करना होगा, ताकि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि हमारा सामूहिक मत ही अल्पसंख्यक शोषकों पर हावी होगा।

हमें एक ऐसी व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के लिए संघर्ष करना होगा, जिसमें संप्रभुता, यानी फैसले लेने का सर्वोपरि अधिकार जनता के हाथ में हो। कार्यकारिणी को निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह होना होगा और विधायिकी को जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूर वर्ग, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को एकजुट करने का रास्ता ही हमारे उद्धार का रास्ता है।

काम करने के इच्छुक सभी लोगों को रोज़गार दिलाना कोई असंभव लक्ष्य नहीं है। इसे हासिल किया जा सकता है अगर आर्थिक फैसले निजी मुनाफे़ कमाने वाली कंपनियां न करें बल्कि मेहनतकश लोग करें। जब ग़दरियों और उनके रास्ते पर चलने वालों ने रेलवे, इस्पात, बैंकिंग और अर्थव्यवस्था के दूसरे निर्णायक क्षेत्रों के राष्ट्रीयकरण की बात की थी, तो उनका यही मकसद था।

देश के किसानों का संकट पूंजीवादी स्पर्धा और इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के बढ़ते प्रभुत्व के रास्ते पर चलकर हल नहीं होगा। इसे हल करने का एकमात्र रास्ता है कृषि व्यापार पर जनता का नियंत्रण स्थापित करना। सिंचाई, शीत भण्डारण और कृषि की दूसरी जरूरतों पर सामाजिक धन का निवेश करना ज़रूरी है। एक सार्वव्यापक सार्वजनिक खरीदी की व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें सभी कृषि उत्पादों की खरीदी होगी और किसानों को स्थाई व लाभकारी दाम सुनिश्चित किये जायेंगे। किसानों को आपस में स्पर्धा करने के बजाय, सहकारी कृषि के लिये प्रोत्साहित करके, कृषि क्षेत्र को और उत्पादक बनाया जा सकता है। सहकारी कृषि को विकसित करके बड़े-बड़े सामूहिक फार्म स्थापित किये जा सकते हैं, जिनमें समूह के सभी सदस्यों के हित के लिये आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो सकता है।

साथियों,

एक बहुत ही ख़तरनाक झूठ, जो हिन्दोस्तानी लोगों में फैलाया जाता है, वह यह है कि अमरीका हमारा रणनैतिक मित्र है, विश्वसनीय मित्र है, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश हमारे सबसे बुरे दुश्मन हैं।

अगर लोग तीर्थ यात्रा के लिए हिन्दोस्तान से पाकिस्तान जाना चाहते हैं और आसानी से ऐसा कर सकते हैं, तो क्या यह अच्छी बात नहीं है? जब पाकिस्तान की सरकार करतारपुर गलियारे जैसी मित्रतापूर्ण पहल लेती है, तब भी उसकी आलोचना करके, हिन्दोस्तान की सरकार बहुत ही तंग नज़रिया और घमंडी रवैया अपना रही है। वह दक्षिण एशिया के लोगों के हित में और इस इलाके में अमन-शांति के लिए नहीं काम कर रही है।

ऐतिहासिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि अमरीकी साम्राज्यवाद ही दुनिया में आतंकवाद को प्रश्रय देने वाला प्रमुख राज्य है। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को सदा आपस में भिड़ाये रखने के लिए, अमरीका आतंकवाद को एक हथकंडा बतौर इस्तेमाल करता है। जब भी दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से मित्रतापूर्ण और शांतिपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के कोई क़दम लिए जाते हैं, तो अमरीकी सी.आई.ए. पाकिस्तान में बैठे अपने किसी गिरोह के द्वारा हिन्दोस्तान की धरती पर आतंकवादी हमला आयोजित करता है। हिन्दोस्तान के हुक्मरान फौरन पाकिस्तान के खि़लाफ़ चीखने लग जाते हैं और कोई भी वार्ता या मित्रतापूर्ण पहल रुक जाती है।

इस समय अमरीका सोच-समझकर पाकिस्तान में अस्थायी हालतें पैदा कर रहा है। अमरीका चीन-पाक आर्थिक गलियारे को नष्ट करना चाहता है। हिन्दोस्तान के हुक्मरान अमरीका की भू-राजनैतिक कार्यनीति में पूरा सहयोग दे रहे हैं। हमारे हुक्मरान अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के झूठे प्रचार को दोहरा कर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान इस इलाके में आतंकवाद का तथाकथित मुख्य प्रेरक है।

बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवाद हमेशा ही इस उपमहाद्वीप के लोगों का कट्टर दुश्मन रहा है और अब भी है। वह हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों को आपस में बंटे हुए और आपस में लड़वाते हुए रखना चाहता है। हम सबके देशों में अमरीकी साम्राज्यवादी सांप्रदायिक झगड़े भड़का रहे हैं। वे इस इलाके के सभी देशों को अस्थायी बनाने और तबाह करने का काम कर रहे हैं।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफग़ानिस्तान के लोग हमारे ही साथी, हमारे ही भाई-बहन हैं। बरतानवी उपनिवेशवादी गुलामी को ख़त्म करने के संघर्ष में हम सब एक साथ लड़े थे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी के ग़दरियों ने वर्तमान पाकिस्तान में पेशावर और लाहौर से लेकर, वर्तमान बांग्लादेश में चटगाँव और ढाका तक, सैनिकों, किसानों और नौजवानों को लामबंध किया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज़ाद हिन्दोस्तान की प्रथम मुक्त सरकार को हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने अफग़ानिस्तान के काबुल में स्थापित किया था। अफग़ानिस्तान के हुक्मरानों ने बरतानवी उपनिवेशवादी शासन के खिलाफ़ हमारे लोगों के मुक्ति संघर्ष को पूरा समर्थन दिया था।

हिन्द-अमरीका रणनैतिक गठबंधन दक्षिण एशिया के सभी राष्ट्रों और लोगों के लिए एक गंभीर खतरा है। यह पाकिस्तान के साथ तथा इस इलाके के दूसरे देशों व एशिया के अन्य देशों के साथ हमारे देश के शांतिपूर्ण और पारस्परिक लाभ के संबंध बनाने के रास्ते में एक बड़ी रुकावट है।

अमरीकी हुक्मरानों की दोस्ती पर बिलकुल भी विश्वास नहीं किया जा सकता है। अमरीका का भरोसेमंद दोस्त बनने से किसी देश को क्या नुक्सान हो सकता है, उसका पाकिस्तान जीता-जागता उदहारण है।

हमारे देश के हुक्मरान एक बहुत ही हानिकारक विदेश नीति अपना रहे हैं। हानिकारक हिन्द-अमरीका रणनैतिक गठबंधन के खिलाफ़ देश के मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को लामबंध करने में हम कम्युनिस्टों को एकजुट होकर, सक्रिय और अगुवा भूमिका अदा करनी चाहिए।

शांति कायम करने के लिए देश की विदेश नीति को नयी दिशा देनी होगी। हिन्दोस्तान को पाकिस्तान, बांग्लादेश और इस इलाके के सभी देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध और राजनीतिक एकता बनानी चाहिए, ताकि अमरीका या कोई दूसरी विदेशी ताकत दक्षिण एशिया के किसी भी देश की राष्ट्रीय संप्रभुता का हनन न कर सके।

साथियों,

उपनिवेशवादी शासन 71 वर्ष पहले ख़त्म हो गया था परन्तु हमारे समाज की कोई भी समस्या आज तक हल नहीं हुयी है। हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा हमारे लोगों का शोषण और लूट बद से बदतर होती जा रही है। सामंती अवशेषों के तले आज भी हमारी जनता दबी हुयी है। जातिवादी भेदभाव और अत्याचार निरंतर जारी है। महिलाओं पर अत्याचार भी लगातार जारी है। हिन्दोस्तान के तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों को भेदभाव और दमन का सामना करना पड़ता है। पूंजीवादी व्यवस्था और उसकी हिफ़ाज़त करने वाला राज्य इन सारी समस्याओं को बरकरार रखता है। हमारे हुक्मरान सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काते रहते हैं, ताकि लोगों को बांट कर रखा जा सके और उनका राज चलता रहे।

जब तक सरमायदारों का शासन खत्म नहीं किया जायेगा और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित नहीं होगा, तब तक कोई भी समस्या हल नहीं होगी। हिन्दोस्तान को पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था से पूरी तरह नाता तोड़ना होगा। ग़दरियों के क्रांतिकारी निष्कर्षों का आज भी पूरा औचित्य है। उपनिवेशवादी विरासत, वर्तमान राज्य और उसके संस्थानों से पूरी तरह नाता तोड़ना होगा। हिन्दोस्तान की नयी नींव पर नव-निर्माण करना होगा।

ग़दरियों का रास्ता आज सभी कम्युनिस्टों और देशभक्तों का आह्वान कर रहा है।

ग़दरियों ने सभी हिन्दोस्तानियों को धर्म, भाषा, इलाका आदि से ऊपर उठकर एकजुट हो जाने का बुलावा दिया था। उन्होंने उपनिवेशवादी शासन को उखाड़ फेंकने और शोषण-दमन से मुक्त हिन्दोस्तान का निर्माण करने के लक्ष्य के इर्द-गिर्द एकता बनाने का आह्वान किया था। हम कम्युनिस्टों को एकजुट होकर, मज़दूर वर्ग और सभी दबे-कुचले लोगों के संघर्ष को अगुवाई देते हुए, उस नए हिन्दोस्तान की ओर आगे बढ़ना होगा, जिसके लिए ग़दरियों ने संघर्ष किया था और अपनी जानें कुर्बान की थीं।

शोषकों और ज़ालिमों के राज्य के खिलाफ़ ग़दरियों का कट्टर रुख था। उनका राजनीतिक उद्देश्य सभी प्रकार के शोषण-दमन से मुक्त एक नए राज्य और नयी व्यवस्था की स्थापना से कम नहीं था। ग़दरियों के रास्ते पर चलकर, हमें वर्तमान सरमायदारी राज्य और उसके संविधान के बारे में सभी भ्रमों का पर्दाफाश और विरोध करना होगा। हमें मज़दूरों और किसानों के राज्य की स्थापना करने के उद्देश्य के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा।

शोषण और दमन से मुक्त नए हिन्दोस्तान का निर्माण करने में सिर्फ कम्युनिस्ट ही नहीं रुचिकर हैं। बहुत से प्रगतिशील और जनवादी लोग इसी लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोग एक ऐसे नए हिन्दोस्तान के लिए तरस रहे हैं, जिसमें धर्म, जाति, भाषा, लिंग या नस्ल के आधार पर किसी के साथ भेद-भाव नहीं किया जायेगा।  

हमें वर्तमान की पूंजी केन्द्रित अर्थव्यवस्था के विकल्प को वीरता के साथ पेश करना होगा, जैसा कि ग़दरियों ने सौ साल पहले किया था। लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था, जिसमें फैसले लेने की ताकत चंद शोषकों के हाथ में है, उसके क्रांतिकारी विकल्प को हमें पेश करना होगा। सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले नए राज्य और अर्थव्यवस्था के लक्ष्य और कार्यक्रम को हमें पेश करना होगा।

साथियों,

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की 38वीं सालगिरह के अवसर पर, हम फिर से वादा करें कि हिन्दोस्तान में मज़दूरों और किसानों के राज्य की स्थापना करने के लक्ष्य के इर्द-गिर्द कम्युनिस्टों की एकता पुनस्र्थापित करने के लिए संघर्ष करेंगे!

हम फिर से वादा करें कि हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द सभी लोगों की राजनीतिक एकता को बनायेंगे और मजबूत करेंगे!

कम्युनिस्ट एकता के साधन बतौर और मज़दूर वर्ग व सभी दबे-कुचले लोगों को लगातार क्रांतिकारी अगुवाई देने वाले साधन बतौर, अपनी पार्टी को बनाएं और मजबूत करें!

ग़दरियों का रास्ता ही सभी प्रकार के शोषण और दमन से हिन्दोस्तान की मुक्ति का रास्ता है! हम बहादुरी के साथ इसी रास्ते पर आगे बढ़ते जायेंगे!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी जिंदाबाद!

इंक़लाब जिंदाबाद!

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ग़दरियों के रास्ते    नव-निर्माण    Jan 1-15 2019    Voice of the Party    History    Philosophy    Popular Movements     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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