फिलिस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रस्ताव

21 दिसम्बर, 2018 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा ने भारी बहुमत के साथ एक प्रस्ताव पारित किया। यह प्रस्ताव फिलिस्तीनी लोगों के अपने प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभुता के अधिकार की पुष्टि करता है। इस प्रस्ताव पर जब मतदान हुआ तो 159 देशों ने उसके समर्थन में वोट दिया और केवल 7 देशों (कनाडा, इस्राइल, किरीबाती, मार्शल द्वीप, माइक्रोनेशिया, नाउरू और संयुक्त राज्य अमरीका) ने उसके ख़िलाफ़ वोट दिया, जबकि 13 देशों ने अपना वोट नहीं दिया। इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि जिन देशों ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट दिया उन देशों पर अमरीकी साम्राज्यवाद का पूरा दबदबा चलता है।

Protests in Jeruselam
2 दिसम्बर को फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक के नाबुआ शहर में प्रदर्शन
बैनर में लिखा है: फिलिस्तीन की राजधानी यरूशलम है
यरूशलम जंग और शांति की चाभी है

इस प्रस्ताव में पूर्वी यरुशलम सहित इस्राइल द्वारा कब्ज़ा किये गये फिलिस्तीनियों के सारे इलाकों पर फिलिस्तीनी लोगों की और सिरिया में कब्ज़ा किये गये गोलन इलाके पर अरब आबादी की अपने प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी संप्रभुता स्थापित करने की मांग की गई है।

इस प्रस्ताव में आम सभा ने मांग की है कि - इस्राइल “पूर्वी यरुशलम सहित अपने कब्ज़े के फिलिस्तीनी इलाकों और सिरिया में कब्ज़ा किये हुए गोलन के इलाके के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, नुकसान, विनाश और उसे जोखिम पहुंचाने वाली कार्यवाही को तुरंत बंद कर दे”। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने ज़ोर देते हुए कहा कि इस्राइल के कब्ज़े में फिलिस्तीनी ज़मीन पर बनायीं जा रही बस्तियां “अंतर्राष्ट्रीय कानून के ख़िलाफ़ हैं और फिलिस्तीनी लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से वंचित करती हैं।” आम सभा ने उल्लेख किया कि इन बस्तियों को बनाते हुए इस्राइल ने जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से अपने नागरिकों को वहां बसाया है, फिलिस्तीनियों की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, फिलीस्तीनी नागरिकों का जबरन स्थानांतरण किया है, जिसमें बेडुइन परिवार भी शामिल हैं। इस्राइल ने वहां के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है और इलाके का बंटवारा किया है। ये तमाम कार्यवाहियां फिलिस्तीनी नागरिकों और इस्राइल के कब्ज़ें में सिरियाई गोलन के नागरिकों के ख़िलाफ़ की गयी हैं। ये सारी कार्यवाहियां अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं।

इस प्रस्ताव के ठीक पहले, इसी महीने में एक और प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमें “किसी भी इलाके पर जबरदस्ती बल प्रयोग से कब्ज़ा करने को अमान्य” घोषित किया गया था। वह प्रस्ताव पूर्वी यरुशलम सहित इस्राइली कब्ज़े वाले फिलिस्तीनी इलाकों और सिरियाई गोलन में इस्राइल द्वारा बस्तियां बसाने के संदर्भ में पारित किया गया था। संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव में कहा गया था कि ये बस्तियां अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए बसाई गयी हैं।

हक़ीक़त तो यह है कि अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में तमाम साम्राज्यवादी मनमाने ढंग से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं और अपनी सहूलियत के अनुसार अपने दुश्मन को कमजोर करने के लिए उन्हीं अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ पर अमरीकी साम्राज्यवाद का पूरा दबदबा बना हुआ है। फिलिस्तीन का सवाल और उससे जुड़े हुए मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा की सामान्य, विशेष और आपातकालीन बैठकों में कई प्रस्ताव पारित किये जा चुके हैं। लेकिन उन सभी प्रस्तावों का ज़मीनी तौर पर कोई असर नहीं हुआ है, क्योंकि अमरीकी समर्थन के साथ इस्राइली राज्य लगातार फिलिस्तीनी लोगों के मानव अधिकारों का उल्लंघन करता रहता है। इस्राइली राज्य ने उनका प्रस्तावों को मान्यता देने से हमेशा इंकार किया है और उन प्रस्तावों का पालन करने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटता रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस्राइल से तमाम अपीलें की हैं कि कब्जे़ किये हुये इलाकों पर बस्तियां बनाने का काम बंद करे, जो कि 1967 के पूर्व की सीमाओं के आधार पर दो-राष्ट्र के समाधान को बरकरार रखने के लिए निहायत ज़रूरी है। परन्तु इस्राइल ने संयुक्त राष्ट्र संघ की उन तमाम अपीलों को मानने से इंकार किया है ।

लेकिन इस प्रस्ताव का भारी बहुमत के साथ पारित होना यह दिखाता है कि अधिकतम देश इस्राइल द्वारा इंसाफ का खुल्लम-खुल्ला हनन करने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं, हालांकि अमरीका ने ऐसे देशों को आर्थिक सहायता बंद करने की धमकी दी थी। यह फिलिस्तीनी लोगों द्वारा अपनी मातृभूमि पर छीने गये अधिकार को वापस लेने के दशकों से लगातार चलाये जा रहे बहादुर संघर्ष का नतीजा है। फिलिस्तीनियों की हर एक नयी पीढ़ी ने इस्राइल द्वारा उनके साथ की गई इस ऐतिहासिक नाइंसाफी के ख़िलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाया है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस्राइल को इसमें पूरा समर्थन दिया है।

दुनियाभर के लोग साम्राज्यवादी हमलों और जंग के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं और उन देशों और लोगों के अधिकारों की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, जिनकी आज़ादी और संप्रभुता का बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तें उल्लंघन कर रही हैं। लोग मांग कर रहे हैं कि जिस लक्ष्य के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया गया था, उन लक्ष्यों को हासिल किया जाये। लोगों की इस आकांक्षा और आस को पूरा करने के रास्ते में अमरीकी साम्राज्यवाद की अंधाधुंध आक्रमक नीतियां और घमंड सबसे बड़ी चुनौती हैं।

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