राज्यों के चुनावों के परिणाम और आगे का रास्ता

हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने पिछले पांच वर्षों से चली आ रही भाजपा की एक के बाद दूसरी जीत का सिलसिला रोक दिया है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पडा, जहां पर वह पिछले 15 वर्षों से सत्ता में थी। पांच साल बाद उसको राजस्थान में भी हार का सामना करना पड़ा। इन तीनों राज्यों में भाजपा की जगह कांग्रेस पार्टी सत्ता में आ गयी है। मिज़ोरम में कांग्रेस की जगह मिज़ो नेशनल फ्रंट सत्ता में आयी है। केवल तेलंगाना राज्य में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति खुद को सत्ता में बरकरार रख पाई है।

इन चुनावों में पड़े वोटों के रुझानों से यह साफ़ नज़र आ रहा है कि लोग अपनी बदतर होती जा रही हालतों से और “सबका विकास”, “सबको रोज़गार” और “कृषि आमदनी को दोगना करने”, जैसे खोखले सरकारी वादों से बेहद गुस्से में हैं। पांच में से चार राज्यों में सत्ताधारी पार्टी के वोट के हिस्से में आई गिरावट लोगों की मनोदषा की एक झलक देती है। इसके अलावा जिस पैमाने पर लोगों ने “नोटा” (इनमें से कोई भी नहीं) के प्रावधान का उपयोग किया है उससे भी लोगों की मनोदषा का अंदाज़ा मिलता है। 

फ़सल बर्बाद हो या फिर बम्पर फ़सल हो, लाखों किसान ग़रीबी और कर्ज़ की खाई में लगातार गिरते जा रहे हैं। जब वे अधिक उत्पादन करते हैं तब बाज़ार में फ़सल के दाम गिर जाते हैं।

नए मतदाताओं में नौजवानों की संख्या बहुत बड़ी है। रोज़गार की कमी की वजह से इनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियां नौजवानों के गुस्से के साथ खिलवाड़ करते हुए उन्हें जाति के आधार पर लामबंध करके, उन्हें भटकाने की कोशिश कर रही हैं।

पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियों ने मज़दूरों, किसानों और उनके बेटे-बेटियों के अपने वर्ग की हालतों पर आक्रोश को धर्म और जाति के आधार पर बांटने की तमाम कोशिशें कीं। पर इसके बावजूद, इन चुनावों पर उनके आक्रोश का बहुत असर हुआ।

जबकि शोषित वर्गों का गुस्सा वोटों के बंटवारे में कुछ हद तक झलकता है, असलियत में पूंजीपतियों ने चुनाव का इस्तेमाल अपनी पसंद की पार्टी को सत्ता में बिठाने के लिए किया है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लोगों पर अब कांग्रेस पार्टी का शासन चलेगा, जो कि उसी उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। एक बार फिर इस हक़ीक़त का पर्दाफाश हो गया है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में चुनावों के द्वारा कोई भी असली बदलाव संभव नहीं है।

जब कभी लोगों का आक्रोश बढ़ने लगता है तो हुक्मरान पूंजीपति वर्ग अपनी मैनेजमेंट टीम को बदलने का इंतजाम करता है। एक पार्टी की जगह पर दूसरी पार्टी सत्ता में आती है, लेकिन अर्थव्यवस्था की दिशा और सरकार की नीतियां जस की तस बरकरार रहती हैं।

किसानों के गुस्से को ठंडा करने के लिए इन राज्यों में बनी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने किसानों के लिए कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किया है। लेकिन इस तरह की कर्ज़ माफ़ी केवल कुछ किसान परिवारों के लिए सिर्फ कुछ देर के लिये समाधान दे सकती है। ऐसे क़दम किसानों के लिए रोज़ी-रोटी की समस्या को हल नहीं कर सकते हैं।

किसानों की समस्या का या बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी और बेकारी का कोई समाधान न तो भाजपा के पास है और न ही कांग्रेस पार्टी के पास। ये दोनों पार्टियां ही इजारेदार पूंजीपति घरानों के एजेंडे को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि ये घराने मेहनतकश लोगों के शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट करते हुए, तेज़ी से और अधिक अमीर बनते रहें।

हमारे देश में पूंजीपति वर्ग कई तबकों और राजनीतिक पार्टियों में बंटा हुआ है। भाजपा और कांग्रेस पार्टी जो कि इजारेदार पूंजीवादी घरानों द्वारा समर्थित दो प्रमुख पार्टियां हैं, इन दोनों पार्टियों के अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो उन इलाकों के संपत्तिवानों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ऐसी ही एक पार्टी है। हाल ही में हुए चुनाव यह दिखाते हैं कि इस वक्त तेलंगाना के संपत्तिवान इस पार्टी को अपने हितों का रक्षक मानकर, उसके पीछे एकजुट हैं।

विभिन्न राज्यों के संपत्तिवान अपना हित साधने के लिए इजारेदार पूंजीपति घरानों के साथ सौदेबाज़ी करते हैं और साथ ही यह दिखावा करते हैं कि वे अपने-अपने प्रांतों के लोगों के हितों के लिए काम कर रहे हंै। उनके पास अर्थव्यवस्था की कोई वैकल्पिक दिशा नहीं है। वे न तो इजारेदार घरानों के हितों के ख़िलाफ़ जा सकते हैं, न ही कभी जायेंगे।

तो फिर असली विकल्प क्या है? इसका एकमात्र विकल्प है कि मज़दूरों और किसानों की तमाम पार्टियां और संगठन एकजुट हों और अर्थव्यवस्था की दिशा को पूरी तरह से बदलने और सरकार की नीतियों को बदलने के लिए संघर्ष करें, जिससे मुट्ठीभर पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की बजाय सभी इंसानों की ज़रूरतें पूरी की जा सकें।

हाल ही में हुए इन चुनावों में एकजुट कम्युनिस्ट हस्तक्षेप के कुछ सकारात्मक उदाहरण सामने आये हैं। कुछ स्थानों पर अलग-अलग पार्टियों में संगठित कम्युनिस्टों ने एक ऐसे उम्मीदवार का समर्थन किया और उसके साथ सहयोग किया, जिसका लोगों के जन संघर्ष को लगातार अगुवाई देने का इतिहास रहा है। पूंजीपतियों की प्रमुख पार्टियों के गैर बराबर धनबल और मीडिया में प्रचार के बावजूद ऐसे स्थानों पर जीत हासिल करना संभव हुआ है। इस तरह के एकजुट चुनाव अभियानों की वजह से पूंजीवादी हमलों के ख़िलाफ़ लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए रास्ते खुल गए हैं।

इन चुनावों ने यह भी दिखाया है कि जब कभी कांग्रेस पार्टी या क्षेत्रीय संपत्तिवानों के हितों की पार्टियों के साथ कम्युनिस्ट पार्टियां चुनावी गठबंधन बनाती हैं, तो इससे वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाने में कोई लाभ नहीं होता है।

हम कम्युनिस्टों को बहादुरी के साथ निजीकरण और उदारीकरण के ख़िलाफ़ एक वैकल्पिक कार्यक्रम पेश करना होगा, जो अर्थव्यवस्था को मानव-केन्द्रित दिशा में मोड़ने का कार्यक्रम है। मज़दूर यूनियनों और किसानों के संगठनों ने पहले से ही एक सर्वव्यापी सार्वजनिक वितरण प्रणाली और फ़सलों के लिए लाभकारी दाम की मांग को उठाया है। देशभर में आयोजित मज़दूरों और किसानों के आंदोलनों और रैलियों में जिन मांगों को मंच से उठाया गया है, वे अर्थव्यवस्था को मानव-केन्द्रित दिशा की ओर मोड़ने के कार्यक्रम की एक बढ़िया शुरुआत हैं।

चुनावों में हिस्सा लेते समय हम कम्युनिस्टों को मौजूदा चुनावी प्रक्रिया में घुल-मिल नहीं जाना चाहिए। हमें मौजूदा चुनावी प्रक्रिया के बारे में कोई भ्रम नहीं फैलाने चाहिए। हमें इन चुनावों का इस्तेमाल श्रमजीवी जनतंत्र का प्रचार करने के लिए करना चाहिए - एक ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के लिये, जहां बहुसंख्यक मेहनतकश जनसमुदाय के हाथ में सत्ता होगी। 

हमें इस असूल के लिए लड़ना होगा कि कार्यकारिणी, विधायिकी के प्रति जवाबदेह हो और विधायिकी जनता के प्रति जवाबदेह हो। लोगों को केवल वोट देने का ही अधिकार न हो बल्कि चुनावों से पहले अपने उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार भी हो। लोगों को नए कानून का प्रस्ताव करने का और अपने चुने हुए प्रतिनिधि को किसी भी वक़्त वापस बुलाने का अधिकार भी हो। हमें यह मांग उठानी होगी और इस असूल के लिए लड़ना होगा कि पूरी चुनावी प्रक्रिया के लिए राज्य पैसा खर्च करे और किसी भी अन्य तरीके से पैसा लगाने पर पाबंदी लगायी जाये। 

हमारे सामने आगे का रास्ता है - सभी कम्युनिस्टों को एकजुट होकर लोगों के हाथों में सत्ता लाने और पूंजीवादी लालच को पूरा करने के बजाय, मानवीय ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाना। इस कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का एक व्यापक गठबंधन बनाना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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