हिन्दोस्तानी गणराज्य की 69वीं सालगिरह पर : हिन्दोस्तानी गणराज्य का नव-निर्माण वक्त की मांग है

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 10 जनवरी, 2019

इस 26 जनवरी को हिन्दोस्तानी गणराज्य 69 वर्ष का हो जायेगा। आज हम सभी को बड़ी गंभीरता के साथ यह सोचना होगा कि यह गणराज्य जो-जो दावे करता है और वास्तव में जो है, इन दोनों के बीच में इतना ज्यादा अंतर क्यों है। आज हमें यह चर्चा करनी होगी कि इस देश को मालिक बनने की हमारे लोगों की आकांक्षा पूरी करने के लिये क्या करना होगा।

अंग्रेजी भाषा के आक्सफोर्ड शब्दकोश में गणराज्य की यह परिभाषा दी गई है :

“वह राज्य जिसमें सर्वोच्च ताक़त लोगों के हाथ में तथा उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में है और जिसमें राजा नहीं बल्कि निर्वाचित या नामांकित राष्ट्रपति होता है।”

हमारे जीवन का अनुभव यह दिखाता है कि सर्वोच्च ताक़त हिन्दोस्तानी लोगों के हाथ में नहीं है। निर्वाचित प्रतिनिधियों पर लोगों का कोई नियंत्रण नहीं होता है क्योंकि वे प्रतिनिधि अपनी-अपनी पार्टियों के नेताओं के आदेशों का पालन करते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि बहुसंख्यक आबादी, मज़दूरों और किसानों के हितों के लिये काम नहीं करते हैं।

सर्वाेच्च ताक़त पूंजीपति वर्ग के हाथ में है, जिसकी अगुवाई टाटा, अंबानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं। वे अपने बेशुमार धनबल का इस्तेमाल करके चुनावों के परिणामों को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस और भाजपा जैसी अपनी वफ़ादार पार्टियों के सहारे वे हिन्दोस्तानी समाज का कार्यक्रम तय करते हैं।

साल दर साल हमारे मेहनतकश लोग ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन करते हैं परन्तु उनके श्रम का फल मुट्ठीभर दौलतमंद पूंजीपतियों की तिजोरियों में ही जाता है। बडे़ पूंजीपति और अमीर होते रहते हैं जबकि मज़दूर और किसान ग़रीब ही रह जाते हैं और कर्ज़ों में फंसते रहते हैं। जब मज़दूर और किसान अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन पर लाठियां और गोलियां बरसाई जाती हैं।

आज यह स्पष्ट है कि हिन्दोस्तानी गणराज्य 125 करोड़ की जनता पर लगभग 150 इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्मशाही है। सर्वोच्च ताक़त इन मुट्ठीभर शोषकों के हाथ में है।

69 वर्ष पहले जब हिन्दोस्तान को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बतौर घोषित किया गया था, तब हमारी जनता में बड़ी-बड़ी उम्मीदें थी। संप्रभुता को ब्रिटिश राजा के हाथों से हिन्दोस्तान के राष्ट्रपति के हाथों में सौंपा गया। राष्ट्रपति को निर्वाचित प्रतिनिधियों के मंत्रीमंडल की सलाह के अनुसार काम करने को बाध्य किया गया। कई लोगों ने सोचा था कि इससे हमें मुट्ठीभर शोषकों की दमनकारी हुकूमत से मुक्ति मिलेगी। परन्तु आज वे सारी उम्मीदें चूर-चूर हो गई हैं। आज हमारी जनता के सामने बदसूरत और क्रूर हक़ीक़त यही है कि इजारेदार पूंजीपतियों की हुक्मशाही जारी है, ‘बांटो और राज करो’ की नीति बैलट और बुलट के ज़रिये जारी है।

इन हालतों के लिये कौन और क्या ज़िम्मेदार है?

भाजपा दावा करती है कि हिन्दोस्तानी गणराज्य को बिगाड़ने के लिये कांग्रेस पार्टी ज़िम्मेदार है। कांग्रेस पार्टी दावा करती है कि बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और बंटवारे की राजनीति के लिये भाजपा ज़िम्मेदार है।

परन्तु बीते 69 वर्षों का अनुभव यह साफ-साफ दिखाता है कि समस्या सिर्फ एक-दो राजनीतिक पार्टियों की नहीं है। वर्तमान लोकतंत्र की व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया में मौलिक समस्या है। इस व्यास्था को ज़िन्दा रहने के लिये ऐसी ही अपराधी पार्टियों और सांप्रदायिक व बांटने वाली राजनीति की ज़रूरत है।

1950 के संविधान के शब्दों से ऐसा लगता है कि इस गणराज्य में लोग संप्रभु हैं। परन्तु वास्तव में यह संविधान मंत्रीमंडल को पूरी जनता के लिये फैसले करने की ताक़त देता है। मिसाल के तौर पर, जब 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी और लोगों के मौलिक अधिकारों को छीन लिया था, तब उन्हें संसद से सलाह करने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी थी। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2016 में नोटबंदी की घोषणा की और लोगों से लेन-देन के साधन और रोज़ी-रोटी छीन ली, तब उन्हें संसद से सलाह करने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी। इन एक-तरफा क़दमों को सबसे शक्तिशाली आर्थिक ताक़तों का पूरा समर्थन प्राप्त था। इन्हें वर्तमान संविधान के अनुसार पूरी तरह वैध माना जाता है।

प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया, जिसमें अलग-अलग पार्टियां बारी-बारी से कार्यकारिणी को संभालती हैं, यह एक ऐसा तंत्र है जिसके सहारे पूंजीपति वर्ग अपनी सर्वोच्च ताक़त को लागू करता है और पूरे समाज पर अपनी मनमर्जी को थोपता है। इस राजनीतिक प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सिर्फ वही पार्टियां चुनाव जीत सकती हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग का समर्थन हो। इजारेदार पूंजीवादी घराने हजारों-करोड़ों रुपयें खर्च करते हैं, यह सुनिश्चित करने के लिये कि उनकी वफ़ादार पार्टियों में से ही किसी एक को सरकार बनाने का मौका मिलेगा।

हर चुनाव के दौर के बाद जो सरकार बनती है वह ऐलान करती है कि उसे “जनादेश” मिला है। परन्तु सरकार उन्हीं नीतियों को अपनाती है जिनसे हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपति मज़दूरों और किसानों का ज्यादा से ज्यादा शोषण करके, जनता के धन और प्राकृतिक संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा लूटकर अपनी अमीरी बढ़ा सकें। इस गणराज्य में राजनीतिक सत्ता कभी लोगों के हाथ तक नहीं पहुंचती है।

अब लोग समझने लगे हैं कि संविधान के पूर्वकथन में तथा मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों में लिखे गये शब्द कागजों पर लिखे गये कुछ अर्थहीन शब्द मात्र हैं। नीति निदेशक तत्वों को लागू कराने के लिये लोगों के पास कोई तरीका नहीं है। मौलिक अधिकारों के अध्याय में हर कथित अधिकार के बाद उन शर्तों का विवरण है जिनके तहत राज्य उस अधिकार का हनन कर सकता है। बोलने का अधिकार, सभा करने का अधिकार, ट्रेड यूनियन जैसे संगठनों को बनाने का अधिकार और इस प्रकार के कई और अधिकारों का राज्य बार-बार और बड़ी बेरहमी के साथ हनन करता है।

निवारक निरोध की ताक़त को 1950 में संविधान में शामिल किया गया था। बीते 69 वर्षों में ढेर सारे फासीवादी कानून बनाये गये हैं, जिनके ज़रिये लोगों को लंबे समय तक बिना सुनवाई के, जेल में बंद रखा जा सकता है।

हिन्दोस्तान में अनेक राष्ट्र और लोग बसे हुये हैं। हर एक की अपनी भाषा, संस्कृति तथा उपनिवेशवाद के पूर्व का राजनीतिक इतिहास है। यह संविधान इस वास्तविकता को मान्यता नहीं देता है। यह संविधान देश में बसे अलग-अलग राष्ट्रों और लोगों के राष्ट्रीय जजबातों को कुचलने के लिये राज्य के सशस्त्र बल के प्रयोग को जायज़ ठहराता है। कश्मीरी, नगा, मणिपुरी, असमीय और अन्य लोगों के लिये हिन्दोस्तानी गणराज्य एक कारागार है जिसमें उनकी सभी आकांक्षाओं को दबा दिया जाता है। उनके अधिकारों को बलपूर्वक पांव तले रौंद दिया जाता है।

लाखों-लाखों लोग जो इसी देश में जन्मे हैं और कई पीढियों से यहां बसे हुये हैं, उन्हें इस गणराज्य में “अवैध आप्रवासी” घोषित कर दिया जाता है और उनके सभी अधिकारों को छीन लिया जाता है।

ज़ाहिर है कि यह गणराज्य मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों की रक्षा नहीं बल्कि हनन करता है। यह गणराज्य देश की जनता के श्रम और संसाधनों को लूटने के देशी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के “अधिकार” की रक्षा करता है।

आज मेहनतकश और उत्पीड़ित लोग इन हालतों को मानने को तैयार नहीं हैं। लोग यह मांग कर रहे हैं कि राज्य उनके अधिकारों को सुनिश्चित करे। लोग यह मांग कर रहे हैं कि राज्य सभी को खुशहाली और सुरक्षा दे। लोग यह मांग कर रहे हैं कि संप्रभुता जनता के हाथ में हो।

हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी और उसके बाद बने दूसरे क्रांतिकारी संगठनों, हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन और अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी में लामबंध होकर, हमारे क्रांतिकारियों ने उपनिवेशवादी विरासत से नाता तोड़ने के लक्ष्य के लिये संघर्ष किया था। उन्होंने एक ऐसे हिन्दोस्तानी संघ की स्थापना के लक्ष्य के लिये संघर्ष किया था, जिसमें सभी घटक राष्ट्रों और समाज के सभी सदस्यों के अधिकारों को मान्यता और सुरक्षा दी जायेगी। 1947 में उस लक्ष्य के साथ विश्वासघात किया गया था।

1947 में दुनिया में दो प्रकार के गणराज्य मौजूद थे। एक प्रकार के गणराज्य सरमायदारों के गणराज्य थे, जैसे कि फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमरीका, जो मुट्ठीभर शोषकों की हुकूमत के यंत्र थे। दूसरे प्रकार के गणराज्य श्रमजीवी वर्ग के गणराज्य थे, जैसे कि सोवियत संघ, जो मज़दूर वर्ग के साथ मेहनतकश किसानों और सभी दूसरे दबे-कुचले लोगों के गठबंधन की हुकूमत के यंत्र थे।

69 वर्ष पहले जो हिन्दोस्तानी गणराज्य बना था, वह प्रथम प्रकार का गणराज्य था। जो राज्य बर्तानवी इजारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत का यंत्र हुआ करता था, उसे बदलकर हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों, बड़े जमीनदारों और दूसरे परजीवी तत्वों के गठबंधन की हुकूमत का यंत्र बना दिया गया।

1950 में जो संविधान अपनाया गया था, उसमें उपनिवेशवादी पश्चात के साथ नाता नहीं तोड़ा गया था। वह संविधान उसी राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया की निरंतरता और अधिक शुद्धि का कानूनी बयान था, जिसे बर्तानवी उपनिवेशवादियों ने स्थापित किया था और जिसके ज़रिये वे हिन्दोस्तानी लोगों को बांटकर तथा हमारे श्रम और संसाधनों का शोषण और लूट करके हमारे ऊपर राज करते थे।

बीते 69 वर्षों में पूंजी कम से कम हाथों में संकेन्द्रित होती रही है। इसके साथ-साथ, फैसले लेने की ताक़त भी कम से कम हाथों में संकेन्द्रित होती रही है। इसीलिये हिन्दोस्तानी गणराज्य का अमानवीय और जनवाद-विरोधी चरित्र और ज्यादा स्पष्ट रूप से सामने आता रहा है।

अगर हिन्दोस्तानी लोगों को सत्ता में आना है, अगर हमें हर प्रकार के शोषण और दमन से मुक्त होना है, तो हमें उपनिवेशवादी काल से विरासत में पाये गये संस्थानों से पूरी तरह नाता तोड़ना होगा। हमें नई बुनियादों पर हिन्दोस्तानी समाज का निर्माण करने की जुर्रत करनी होगी। हमें उस प्रकार के गणराज्य की स्थापना के लिये संघर्ष करना होगा, जो उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान हमारे क्रांतिकारी पूर्वजों का सपना था।

सर्वोच्च ताक़त उन सबके हाथों में होनी चाहिये जो श्रम करते हैं और देश की दौलत को पैदा करते हैं। ऐसा होने से ही सबकी रोज़ी-रोटी और खुशहाली सुनिश्चित हो सकती है। मेहनतकश बहुसंख्या को फैसले लेने की प्रक्रिया में सक्रियता से भाग लेना होगा। ऐसा करके ही लोग यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि उनके श्रम का फल कुछ मुट्ठीभर शोषकों की जेबों में न जा रहा हो।

श्रमजीवियों को हिन्दोस्तान का हुक्मरान बनाने के लिये एक नये बुनियादी कानून की ज़रूरत है। हमें एक ऐसे संविधान की ज़रूरत है जो लोगों के हाथों में संप्रभुता दिलायेगा। इस संविधान को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्यकारिणी विधयिकी के प्रति जवाबदेह है और विधायिकी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है। सभी बालिग मतदाताओं को चुनाव से पहले, उम्मीदवारों का चयन करने में सक्रिय भूमिका अदा करनी होगी। मतदाताओं को निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने और कानून प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिये। संविधान को फिर से लिखने का अधिकार तथा बाकी सभी अधिकार लोगों के हाथ में होने चाहियें।

संक्षेप में, आज हिन्दोस्तानी गणराज्य के नव-निर्माण की ज़रूरत है। ऐसा करके ही समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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