मज़दूरों के संघर्ष

जूट मज़दूरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा

पश्चिम बंगाल के 2.5 लाख से ज्यादा जूट मिल के मज़दूरों ने 1 मार्च, 2019 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फैसला किया है। ये मज़दूर वेतन संशोधन और जूट उद्योग में न्यूनतम वेतन कानून को लागू करवाने की मांग कर रहे हैं। पूरे राज्य के सभी जूट मिलों में होने वाली इस हड़ताल से 45 लाख जूट उत्पादक प्रभावित हो सकते हैं।

जूट मिल मज़दूरों का प्रतिनिधत्व करने वाली 21 ट्रेड यूनियनों के संयुक्त अधिवेशन में इस फैसले की घोषणा की गयी।

पश्चिम बंगाल के जूट मिल मज़दूरों का बहुत भारी शोषण होता है और उन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। इन मज़दूरों को प्रतिदिन 257 रुपये दिए जाते हैं। उनके काम में बहुत ज्यादा शारीरिक परिश्रम होता है।

Jute workers

यूनियनों का यह कहना है कि मिल मालिकों ने मज़दूरों को मिलने वाले सेवानिवृत्ति और प्रोविडेंट फण्ड के 1050 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया है। कुछ मज़दूरों को सेवानिवृत्ति के 10-15 साल बाद भी यह पैसा नहीं मिला है। कई वृद्ध और बीमार जूट मिल मज़दूर 35-40 सालों तक काम करने के बाद, सवानिवृत्ति और प्रोविडेंट फण्ड के पैसे पाए बिना ही गुजर गए हैं।

मज़दूरों ने पश्चिम बंगाल की सरकार और केंद्र सरकार की निंदा की है, क्योंकि वे मज़दूरों की जायज़ मांगों को नहीं मान रही हैं। मज़दूरों ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की ट्रेड यूनियनों को तोड़ने की कोशिशों का विरोध किया है। 

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के मज़दूर निजीकरण के विरोध में हड़ताल करेंगे

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के लगभग 10,000 मज़दूर 20 फरवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जायेंगे। एयरपोर्ट्स अथॉरिटी एम्प्लोईज़ यूनियन (ए.ए.ई.यू.) के झंडे तले संगठित ये मज़दूर 6 हवाई अड्डों के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं।

नवम्बर 2018 में केंद्र सरकार ने अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, गुवाहाटी, थिरुवनन्थपुरम और मंगलुरु के हवाई अड्डों का निजीकरण करने के फैसले को अनुमति दी थी।

दिसंबर 2018 में ए.ए.ई.यू. ने इस फैसले के खि़लाफ़, देश के कई हवाई अड्डों पर प्रदर्शन किये थे। ए.ए.ई.यू. ने समझाया है कि निजीकरण से मज़दूरों का शोषण बहुत बढ़ जायेगा, क्योंकि कर्मचारियों को सिर्फ ठेके पर ही रखा जायेगा। अब तक जिन-जिन हवाई अड्डों का निजीकरण हो चुका है, उन्हें चलाने वाली दो निजी कंपनियों, जी.वी.के. और जी.एम.आर. का सभी हवाई अड्डों पर इजारेदारी नियंत्रण हो जायेगा।

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हवाई अड्डों का निजीकरण तथाकथित पी.पी.पी. मॉडल के तहत किया जा रहा है। दिल्ली, मुम्बई, बंगलुरु और हैदराबाद के हवाई अड्डों के निजीकरण का अनुभव स्पष्ट दिखाता है कि यह निजी कंपनियों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए जनता के धन को लूटने के सिवाय और कुछ नहीं है। निजीकृत हवाई अड्डों तक पहुंचाने वाले महामार्गों को बनाने के लिए नुकसानजनक पूंजीनिवेश सरकार की ज़िम्मेदारी है, जबकि सांझेदारी का ज्यादा मुनाफ़ेदार भाग, जैसे कि उपभोक्ताओं को दी जाने वाली नाना प्रकार की सेवाओं के किराये, हवाई अड्डों पर लगाई गयी दुकानों के किराये, आदि, निजी कंपनियों को मिलेंगे। निजीकरण की वजह से, सवारियों के उपभोक्ता शुल्कों में भी बहुत बढ़ोतरी हुई है।

ए.ए.ई.यू. ने बताया है कि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने इन 6 हवाई अड्डों के निजीकरण पर बहुत धन खर्च किया है और अब इन्हें निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी कर रहा है। जनता के धन को इन हवाई अड्डों को चलाने वाली निजी कंपनियों की तिजोरियों में डाल दिया जा रहा है।

मध्याह्न भोजन रसोई कर्मचारियों ने बिहार विधानसभा का घेराव किया

लगभग 10,000 मध्याह्न भोजन रसोई कर्मचारियों ने 12 फरवरी, 2019 को बिहार विधानसभा का घेराव किया। यह घेराव उनके 35 दिवसीय विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन का हिस्सा था। मज़दूर न्यूनतम वेतन, श्रम कानूनों के लागू किये जाने और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

MDM workers dharana भारी पुलिस बंदोबस्त के बावजूद, मज़दूरों ने लाल झंडों, बैनर, प्लेकार्ड, आदि लेकर राज्य विधानसभा को घेरा। उनमें अधिकतम महिला मज़दूर थीं। उन्होंने गर्दानीबाग पर एकत्रित होकर, विधानसभा की ओर प्रदर्शन किया।

मध्याह्न भोजन रसोई कर्मचारी अपनी जायज़ मांगों के प्रति सरकार की उदासीनता पर बहुत आक्रोशित हैं। बिहार सरकार ने उनसे बातचीत करने से इनकार कर दिया है। इसके बजाय, सरकार ने उनकी हड़ताल को कुचलने के लिए बलप्रयोग करने की धमकी दी है।

इस हड़ताल की वजह से, बीते एक महीने से 1 करोड़ से ज्यादा बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिल रहा है। बहुत कम बच्चे अब स्कूल जा रहे हैं। परन्तु सरकार अब भी रसोई कर्मचारियों की मांगों को लेकर बातचीत करने से इनकार कर रही है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार को सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की भी कोई परवाह नहीं है।

बिहार सरकार के अधिकारियों ने हड़ताली मध्याह्न भोजन कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की धमकी देते हुए, एक सर्कुलर जारी किया है। परन्तु मज़दूरों ने इन धमकियों की परवाह किये बिना, अपना आन्दोलन जारी रखा है।  

हिमाचल प्रदेश आउटसोर्स मज़दूरों की हड़ताल

हिमाचल प्रदेश के हज़ारों आउटसोर्स किये गए मज़दूरों ने 13 फरवरी, 2019 से शिमला में विधानसभा पर धरना देने की घोषणा की है। वे श्रम कानूनों के हनन और अपने अत्याधिक शोषण का विरोध कर रहे हैं। उनकी यूनियन, हिमाचल प्रदेश आउटसोर्सड वर्कर्स यूनियन (एच.पी.ओ.डब्ल्यू.यू.) के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में लगभग 42,000 आउटसोर्स किये गए मज़दूर हैं।

सरकार ने इन मज़दूरों को नियमित करने से इनकार कर दिया है। आउटसोर्स करने वाली एजेंसियां सभी श्रम कानूनों का खुलेआम हनन करती हैं। आउटसोर्स किये गए मज़दूरों को समान काम के लिए नियमित मज़दूरों से कम वेतन दिए जाते हैं। उन्हें प्रतिदिन 10-12 घंटे काम करने के बाद न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। उन्हें ओवरटाइम, ई.पी.एफ., ई.एस.आई., बोनस, ग्रचुइटी, छुट्टियां, आदि कुछ नहीं मिलतीं।  

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Feb 16-28 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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