गन्ना किसानों का संकट

देश के गन्ना उगाने वाले 5 करोड़ किसान एक बार पुनः घोर संकट का सामना कर रहे हैं। कई महीनों से चीनी मिलों को भेजे गए गन्ने का उन्हें भुगतान नहीं मिला है। इस वर्ष जनवरी के अंत तक चीनी मिलों द्वारा किसानों की बकाया राशि 13,932 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी। इसे चीनी मिलों के पूंजीपति मालिकों के संगठन, इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने स्वयं स्वीकार किया है। चीनी मिलों द्वारा किसानों की बकाया राशि उत्तर प्रदेश में 5,553 करोड़ रुपये, कर्नाटक में 2,714 करोड़ रुपये तथा महाराष्ट्र में 2,636 करोड़ रुपये हैं।

Sugar mill workers Kolhapur चीनी मिलों को किसानों को 14 दिन में गन्ने का भुगतान करना होता है तथा देरी से भुगतान की गयी राशि पर 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होता है। लेकिन महराष्ट्र में 196 सहकारी तथा निजी चीनी मिलों में से 172 मिलों ने अक्तूबर 2018 से सप्लाई किए गए गन्ने का कोई भी भुगतान 9 जनवरी, 2019 तक नहीं किया था। इस कारण उत्तर प्रदेश के 45 लाख तथा महारष्ट्र के 25 लाख किसान संकट का सामना कर रहे हैं।

बीते वर्षों के आंकड़े दिखाते हैं कि कुछ वर्षों में किसानों के कुल भुगतान की आधे से ज्यादा राशि बकाया थी (चित्र क)।

Sugarcane Payments and Arrears
Sugar production

अराजकता पूंजीवादी व्यवस्था का चरित्र है जिसके कारण हमारे देश में चीनी उत्पादन बारी-बारी से अत्यधिक उत्पादन और उत्पादन के घाटे के चक्रों से गुजरता है। (चित्र ख)।

जब अभाव होता है तथा कीमतें ज्यादा होती हैं तो पूंजीपति मिल मालिक चीनी का उत्पादन तथा गन्ने की खरीदी बढ़ा देते हैं। ज़रूरत से ज्यादा उत्पादन होने तक यह क्रम चलता रहता है जिसके कारण न-बिकी चीनी का भंडार बढ़ जाता है और बाज़ार में क़ीमत गिर जाती है। फिर पूंजीपति उत्पादन घटा देते हैं तथा गन्ना किसानों को भुगतान करना बंद कर देते हैं। वे राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार से ब्याज माफ़ी तथा अन्य छूटों के मांग करने लगते हैं। जब तक चीनी की क़ीमत उतनी नहीं बढ़ जाती कि पूंजीपतियों के लिए फिर से उत्पादन बढ़ाना लाभदायक हो जाये, तब तक यह स्थिति जारी रहती है।

इस क्षेत्र की एक विशेषता यह है कि यदि फसल काटने के बाद गन्ने से तुरंत रस नहीं निकाला जाता है तो उसमें चीनी की मात्रा कम हो जाती है। इस कारण गन्ना उत्पादकों को एक नामांकित मिल के साथ जोड़ दिया जाता है जिसको उसे गन्ना देना पड़ता है। यदि चीनी मिल ने बकाया रकम का भुगतान नहीं किया है फिर भी किसानों के पास गन्ना कहीं और बेचने का पर्याय नहीं होता है।

जब चीनी की क़ीमत ज्यादा होती है तो पूंजीपति मिल मालिक बहुत मुनाफ़ा कमाते हैं और जब ज़रूरत से ज्यादा आपूर्ति होती है तो वे नुकसान का बोझ किसानों की पीठ पर लाद देते हैं। दूसरे शब्दों में, पूंजीवादी उत्पादन की अराजकता की क़ीमत गन्ना किसानों को चुकानी पड़ती है।

Sugar mill workers Maharashtra

महाराष्ट्र के एक किसान के शब्दों में, “यदि बरसात न आने से फसल नहीं होती है तो हम भूखे रहते हैं। यदि फसल अच्छी होती है तो मिल कहती है कि बाज़ार में भरमार है। उस हालत में भी हम भूखे रहते हैं। यह कैसा न्याय है?”

इस घटनाचक्र पर काबू पाने के लिए तथा उत्पादन और क़ीमतों में स्थिरता लाने के लिए सबसे सरल उपाय है कि चीनी वितरण में राज्य अपनी भूमिका बढ़ाये। यदि केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें पर्याप्त अतिरिक्त भंडार बना लें तो जब आभाव है तब वे अधिक चीनी बेच सकती हैं और अधिक आपूर्ति के समय में ज्यादा चीनी खरीद सकती हैं। लेकिन, सरकारी नीति इसके विपरीत दिशा में चल रही है। 2013 के पहले चीनी मिलों को उत्पादन का 10 प्रतिशत कम दर पर सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के लिए देना पड़ता था। अब उन्हें पूरा उत्पादन बाज़ार में बेचने की इजाज़त है। चीनी वितरण में राज्य की भूमिका बढ़ाने के बजाय कम कर दी गई है।

दोनों, केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें चीनी मिल मालिकों को बिन-ब्याज कर्जे तथा अन्य प्रकार के अनुदान देते रहते हैं जबकि चीनी क्रमचक्र की लम्बे दौर से चलती हुई समस्या के कारण करोड़ों गन्ना किसानों पर बार-बार होने वाली आपदा के बारे में कुछ भी नहीं करते हैं। किसान पूंजीपति मिल मालिकों की कृपा पर रहते रहे हैं। प्रतिस्पर्धी पार्टियां उनकी इस बेबस हालत का अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। 

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Feb 16-28 2019    Political-Economy    Rights     2019   

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