क्या रक्षा के नाम पर इतना भारी खर्च जायज़ है?

इस वर्ष के रक्षा बजट पर भारत सरकार 3,05,296 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। वित्त मंत्री ने संसद में पेश किये गये अपने अंतरिम बजट में ये आंकड़े पेश किये। यह राशि पूरे सरकारी बजट खर्च की 11 प्रतिशत से अधिक है। सरकार द्वारा खर्च किये जा रहे मदों में, रक्षा पर खर्च सरकारी कर्ज़ों के ब्याज भुगतान के बाद दूसरे नंबर पर है।

सशस्त्र बलों पर कितना खर्च किया जा रहा है इसका सही अनुमान लगाने के लिए ज़रूरी है कि इसमें गृह मंत्रालय पर खर्च की जा रही राशि को भी शामिल किया जाये, जो कि 1,03,927 करोड़ रुपये है, क्योंकि केंद्रीय अर्ध-सैनिक बलों पर खर्च गृह मंत्रालय के बजट के तहत आता है। इन दोनों को मिलाकर सशस्त्र बलों पर खर्च होने वाली राशि कुल बजट का 15 प्रतिशत होती है।

लेकिन संसद में रक्षा बजट पर कभी कोई चर्चा नहीं होती है। सभी पूंजीवादी देशों में रक्षा बजट पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है और हिन्दोस्तान में भी ऐसा ही है। अगर कोई राजनीतिक पार्टी यह सवाल उठाती है कि रक्षा बजट के नाम पर इतना भारी खर्चा क्यों किया जा रहा है, तो उसे देश का दुश्मन करार दिया जाता है।

आइये, अब हम अन्य क्षेत्रों की तुलना में रक्षा पर कितना खर्च किया जा रहा है, इसका जायजा लेते हैं।

बजट के आंकड़ों के अनुसार स्वास्थ्य पर कुल बजट का केवल 2 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है। इसका मतलब है कि स्वास्थ्य की तुलना में रक्षा पर सात गुना राशि निर्धारित की जा रही है। शिक्षा पर बजट की तुलना में रक्षा पर चार गुना राशि निर्धारित की जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों की तरह, इस बार भी सरकार ने “उत्तर पूर्व के विकास” के नाम पर 3,000 करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया है। उत्तर पूर्व में सात राज्य - असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा और मिज़ोरम - शामिल हैं। इन सात राज्यों को दी जा रही राशि की तुलना में रक्षा पर बजट की राशि 136 गुना है। 36 रफाल जेट लड़ाकू विमान खरीदने के लिए सरकार 60,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जो कि उत्तर-पूर्व पर खर्च की जा रही राशि का 20 गुना है!

हिन्दोस्तान की सरकार द्वारा सशस्त्र बलों पर भारी खर्च किये जाने की योजना से दुनियाभर के हथियारों के बाज़ार पर नियंत्रण रखने वाले इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां बेहद खुश हैं। इस वक्त हथियारों पर सबसे अधिक खर्चा करने के मामले में हिन्दोस्तान दुनियाभर में चौथे नंबर पर है। दुनियाभर के हथियारों के उत्पादन पर चंद मुट्ठीभर इजारेदार कंपनियों का बोलबाला है। इन कंपनियों के पास अपने-अपने देशों के हथियार बाज़ार तो उपलब्ध हैं ही; इसके अलावा ये कंपनियां दुनिया के हथियार बाज़ार में अपने-अपने हथियारों को बेचने के लिए जबरदस्त होड़ लगाती हैं। अमरीका, इस्राइल, रूस, ब्रिटेन, इटली, यूरोपीय कंसोर्टियम इत्यादि हिन्दोस्तान के हथियार बाज़ार का सबसे बड़ा हिस्सा हासिल करने के लिए आपस में जबरदस्त होड़ कर रहे हैं। इन इजारेदार कंपनियों के देशों की सरकारें दुनियाभर में इन कंपनियों द्वारा बनाये गए हथियारों की मार्केटिंग करने का काम करती हैं। फ्रांस की हथियार बनाने वाली इजारेदार कंपनी दस्सौल्ट एविएशन द्वारा बनाये गए रफाल लड़ाकू विमान को हिन्दोस्तान को बेचने के लिए फ्रांस की सरकार ने पूरा जोर लगाया।

अन्य पूंजीवादी देशों की सरकारों की तरह ही, हिन्दोस्तान की सरकार भी हथियारों पर भारी खर्च को सही साबित करने के लिए दुश्मन देशों से खतरा होने की बात करती है। लेकिन यदि हम हिन्दोस्तानी राज्य की रणनीति को अच्छी तरह से देखें तो यह समझेंगे कि वह खुद को विदेशी ताक़तों से सुरक्षित करने के लिए नहीं बल्कि अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ाने के लिए हथियारबंद हो रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य की नज़र अफ्रीकी महाद्वीप के पूर्वी तट से अरब की खाड़ी, हिन्द महासागर और मलक्का जलग्रीवा से होते हुए प्रशांत महासागर तक फैले हुए एक विशाल इलाके पर है। हिन्दोस्तानी राज्य इस विशाल इलाके पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये हिन्दोस्तानी राज्य अमरीका की रणनीति के साथ सहयोग करने को तैयार है। इस आक्रमक योजना को किस तरह से “हिन्दोस्तान की रक्षा” की रणनीति माना जा सकता है? यह रणनीति अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर दूसरे देशों पर आक्रमण करने और उन पर कब्ज़ा करने की जंग में हिस्सा लेने के लिए बनायी गयी है। जब अमरीका दुनियाभर के अलग-अलग स्थानों पर अपनी सेना की टुकड़ियों और युद्धपोतों को तैनात करता है तो वह इसी प्रकार की “रक्षा” का बहाना देकर उसे सही ठहराता है।

साम्राज्यवादी राज्य विभिन्न देशों में गृहयुद्ध भड़काने का काम करते रहते हैं। वे पड़ोसी देशों के बीच जंग भड़काने का काम करते रहते हैं। ऐसी जंग के ज़रिये हथियारों के बाज़ार का विस्तार होता है और साथ ही, साम्राज्यवादी देशों के लिए अन्य देशों के बाज़ारों और कच्चे माल के स्रोतों पर कब्ज़ा करने के रास्ते खुल जाते हैं। हमारे इस इलाके में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हमेशा ही हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच टकराव बनाये रखने और जंग भड़काने का काम किया है। अमरीकी साम्राज्यवादी हमारे दोनों देशों को एक दूसरे के खि़लाफ़ भड़काते रहते हैं और दोनों देशों को महंगे आधुनिक हथियार बेचकर मोटे मुनाफे़ बनाते हैं। दोनों ही देश इन महंगे आधुनिक हथियारों को जमा करने और फिर उनका रखरखाव करने में लोगों का बेशकीमती पैसा खर्च करते हैं, बजाय इसके कि इस धन को मज़दूरों और किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने में उत्पादक रूप से खर्च करें। 

आज़ादी के बाद कई दशकों तक हमारे देश में हथियारों का उत्पादन आर्डिनेंस फैक्ट्री और एच.ए.एल., बी.ई.एम.एल. इत्यादि जैसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हुआ करता था। पिछले कुछ वर्षों से हिन्दोस्तान में सैनिकी-औद्योगिक कांप्लेक्स विकसित किया जा रहा है। यह हमारे देश के इजारेदार पूंजीपतियों की तेजी से बढ़ती भूख के साथ तालमेल में किया जा रहा है। ये इजारेदार पूंजीपति अमरीका और अन्य साम्राज्यवादी ताक़तों के बराबर ऊंचे मंचों पर बैठने के मंसूबे से प्रेरित हैं। वे दुनियाभर के बाज़ारों मेें अपना विस्तार करने और कच्चे माल के स्रोतों पर कब्ज़ा करने के लिए सक्रियता से काम कर रहे हैं। अपनी साम्राज्यवादी कार्यवाहियों को अंजाम देने के लिए वे हिन्दोस्तानी राज्य की सैनिकी ताक़त को विकसित करना चाहते हैं। वे हिन्द महासागर के इलाके को “अपने प्रभुत्व का इलाका” मानते हैं। अपने इस मंसूबे को हासिल करने के लिए वे अमरीकी साम्राज्यवादियों की हिन्द-प्रशांत महासागर रणनीति में पूरा-पूरा हिस्सा ले रहे हैं। उनके मंसूबों को हवा देते हुए, अमरीका हिन्दोस्तान को एशिया और अफ्रीका में चीन के साथ टकराने के लिए उकसा रहा है।  

हिन्दोस्तान के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां - टाटा, मुकेश अंबानी समूह, अनिल अंबानी समूह, महिंद्रा, लार्सेन एंड टुब्रो और अन्य कई कंपनियों ने हथियार के उत्पादन के क्षेत्र में आक्रमक रूप से प्रवेश किया है। ये हिन्दोस्तानी कंपनियां तमाम साम्राज्यवादी देशों की विशाल हथियार उत्पादन करने वाली इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के साथ समझौते कर रही हैं। हिन्दोस्तान की सरकार को हथियार बेचकर ये कंपनियां मोटे इजारेदार मुनाफ़े बनाने की योजना बना रही हैं। इन इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए हिन्दोस्तान की सरकार रक्षा उपकरणों की खरीदी की नीति में बदलाव कर रही है और साथ ही, रक्षा उत्पादन के उद्योग के निजीकरण की दिशा में काम कर रही है।

हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपतियों को विदेशी हमलावरों से हिन्दोस्तान की सुरक्षा सुनिश्चित करने की रत्तीभर भी चिंता नहीं है। उनकी बस एक ही चिंता है, कि किस तरह से सरकारी खजाने को लूटकर अधिकतम मुनाफ़े बनाये जायें। हुक्मरान वर्ग की सभी पार्टियां, सत्ता या विपक्ष, इस लूट की हिमायत करती हैं। जो पार्टी सत्ता में होती है उसे इस लूट का कुछ हिस्सा मिलता है। जो विपक्षी पार्टियां सौदे में भ्रष्टाचार का शोर मचाती हैं, वे उस वक्त का इंतजार करती हैं जब वे सत्ता में होंगी और रक्षा सौदे में उन्हें अपना हिस्सा मिलेगा। पूंजीपति और सत्ता में बैठे राजनेता हर संभव तरीके से पैसे बनाते हैं - हथियारों के सौदों से, सैनिकों के लिए खरीदी गयी वर्दी और राशन के सामान से, तोप की खरीदी से (बोफोर्स तोप सौदा), ताबूत खरीदी (जैसे कि कारगिल युद्ध के बाद हुआ), इत्यादि।

हमारे देश की सरकार और विपक्ष, दोनों ही सरहद पर हमारे देश के जवानों की बहादुरी की दुहाई देते रहते हैं। लेकिन जब यही जवान अपनी बदतर हालातों के बारे में, खाने के बारे में शिकायत करते हैं तो यही सरकार और सेना प्रमुख उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्यवाही करते हैं और उनकी आवाज़ को खामोश करने की हर संभव कोशिश करते हैं। सच्चाई तो यह है कि जहां तक इजारेदार पूंजीपति और उनकी सरकार का सवाल है, उनके लिए हमारे देश के सशस्त्र बलों के 12 लाख पुरुष और महिलायें मात्र युद्ध का चारा हैं। वे हमारे सैनिकों के साथ वैसा ही बर्ताव करते हैं जैसा कि वे मज़दूरों के साथ करते हैं - उनका अधिकतम शोषण करना और उसके बाद दूध में से मक्खी की तरह निकल फेंकना।

जब हमारे हुक्मरान यह दवा करते हैं कि अत्याधुनिक हथियार खरीदना और सैनिकीकरण करना राष्ट्र हित में है, तो हमारे देश के मज़दूरों, किसानों और देशभक्त बुद्धिजीवियों को इस प्रचार को ठुकाराना होगा। असलियत तो यह है कि यह सब कुछ दूसरे देशों के खिलाफ हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग के साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ाने और रक्षा उत्पादन क्षेत्र में इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़े बनाने के मकसद के साथ किया जा रहा है।

हमारे देश के सशस्त्र बलों के अधिकांश पुरुष और महिला मज़दूरों, किसानों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के बेटे-बेटियां हैं। वे अपने वतन के लिए अपनी जान तक कुर्बान करने को तैयार हैं। लेकिन आज मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्यसत्ता पर चंद मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीवादी घरानों का नियंत्रण और दबदबा है। इन पूंजीपतियों को देश की सुरक्षा या लोगों की खुशहाली के बारे में कोई भी फिक्र नहीं है। ये पूंजीपति अधिकतम मुनाफ़ों के लिए देश को विदेशी ताक़तों के हाथों बेचने के लिए तैयार हैं। जो भी पार्टी सत्ता में आती है वह केवल इन इजारेदार पूंजीपतियों के अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काम करती है।

दरअसल, हमारे देश का हुक्मरान वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियां ही राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। लोगों की एकता और भाईचारे को भंग करने के लिए वे लोगों के बीच धर्म, भाषा, जाति, इलाका, नस्ल, आदि के आधार पर बंटवारा फैलाने का काम लगातार करती रहती हैं। दुश्मन ताक़तों से देश की रक्षा करना तो दूर, हुक्मरान वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियां अमरीका और अन्य साम्राज्यवादियों के हाथों का खिलौना बनने के रास्ते पर चल रही हैं। ये साम्राज्यवादी ताक़तें हमारे देश को कमजोर और टुकडे़-टुकडे़ करना चाहती हैं। हुक्मरान वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियां अमरीका के साथ सैनिकी रणनैतिक गठबंधन को मजबूत कर रही हैं और एशिया के देशों के बीच आपसी जंग भड़काने की अमरीकी चाल का हिस्सा बन रही हैं। उनके इस रास्ते से हमारे देश की संप्रभुता और इस इलाके में शांति और सुरक्षा को बहुत बड़ा ख़तरा पैदा हो रहा है।

सैनिकी हथियारों और उपकरणों पर खर्च पूरी तरह से अनुत्पादक खर्च है। इससे लोगों की कोई ज़रूरत पूरी नहीं होती और न ही इससे भावी पीढ़ियों के निरंतर विकास में कोई योगदान होता है। सैनिकी उपकरण या तो बेकार पड़े रहते हैं या फिर विनाश के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। दोनों तरीके से वे अनुत्पादक होते हैं।

मज़दूरों, किसानों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा विशाल पैमाने पर किये जा रहे सैनिकी खर्च पर सवाल उठाना होगा और उसका विरोध करना होगा। यह खर्च इजारेदार पूंजीपतियों की बेशुमार मुनाफ़े की लालच को पूरा करने और अन्य देशों पर कब्ज़ाकारी जंग छेड़ने के लिए किया जा रहा है। उनको यह मांग करनी होगी कि सरकार सैनिकी खर्च में कटौती करे और उससे बचने वाले धन को लोगों की खुशहाली के लिए निवेश करे।

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Feb 16-28 2019    Political-Economy    Rights     War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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