नए समाज के संघर्ष में महिलायें सबसे आगे!

दुनियाभर की महिलाएं 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की तैयारी में जुटी हुई हैं। दुनियाभर में महिलायें अपने पर हो रहे दमन और भेदभाव का जमकर विरोध कर रही हैं। महिलाएं मौजूदा अर्थव्यवस्था की अमानवीय और पूंजी-केंद्रित दिशा का, एक आवाज़ में जमकर विरोध कर रही हैं। पहले से कहीं ज्यादा स्पष्टता के साथ वे एक महिला बतौर और एक इंसान बतौर अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में अपनी आवाज़ बुलंद कर रही हैं। जापान से लेकर थाईलैंड, बांग्लादेश, हिन्दोस्तान, अफ्रीका, यूरोप और ब्रिटेन से लेकर उत्तरी अमरीका तक, महिलाएं यह मांग उठा रही हैं कि उनके देशों की अर्थव्यवस्थायें उनकी रोज़गार और सुरक्षा के ज़रूरतों को पूरा करें, जंग को खत्म करें और सैनिकीकरण को रोकें। वे साम्राज्यवादी लुटेरों की सांठगांठ में, अपने हुक्मरानों द्वारा अपने राष्ट्रीय संसाधनों के बेचे जाने का विरोध कर रही हैं।

1908-NY_protests
Women's demonstration for bread and peace

स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और अन्य सामाजिक सेवाओं के बेधड़क निजीकरण के खि़लाफ़ महिलाएं सड़कों पर उतर रही हैं। वे समाज-विरोधी हमलों के खि़लाफ़ डट कर खड़ी हैं। इन समाज-विरोधी हमलों के चलते, लोगों की मेहनत से पैदा की गयी सामाजिक संपत्ति को बर्बाद किया जा रहा है और पूरे के पूरे क्षेत्रों को निजी मुनाफ़े के लिए मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दिया जा रहा है। वे मांग कर रही हैं कि सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता, पेयजल, आवास, परिवहन, शिक्षा और एक मानव जैसे जीवन जीने के लिए ज़रूरी अन्य सुविधाएं मुहैया कराना राज्य की ज़िम्मेदारी है जिससे वह मुंह नहीं मोड़ सकता।

लोगों के हाथों में सत्ता देने के आंदोलन में महिलाएं सबसे आगे रही हैं। पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करते हुए वे मांग कर रही हैं कि समाज की दिशा तय करने में लोगों की अहम भूमिका होनी चाहिए और जनतंत्र का मतलब केवल चुनाव में वोट देना ही नहीं, बल्कि उससे आगे कुछ और भी है।

एक ऐसा समाज जिसमें वे एक इंसान की तरह इज़्ज़त की ज़िन्दगी जी सकें, ऐसे समाज का निर्माण करने के महिलाओं के संघर्ष ने एक संगठित रूप धारण किया जब 1908 में न्यू यॉर्क टेक्सटाइल उद्योग की 15,000 से अधिक महिलाएं मज़दूर वर्ग के 8 घंटे के कार्यदिवस और राजनीतिक अधिकारों की मांग के समर्थन में सड़कों पर उतर आई थीं। न्यू यॉर्क की महिलाओं का यह क़दम मार्च 1857 को उसी दिन पर हुए महिला गारमेंट मज़दूरों के आंदोलन का दोहराव था। अपने उस आंदोलन में महिलाओं ने काम के बेहतर हालात और 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग उठाई थी। अपने इस संघर्ष से महिलाएं पूंजीपति वर्ग से कुछ रियायतें छीनकर हासिल करने में कामयाब हुई थीं। पूरे यूरोप और अमरीका में संगठित महिला आंदोलन की वह शुरुआत थी।

समाजवाद पर आधारित एक नया समाज संभव है, यह बात 1917 की महान अक्तूबर क्रांति ने साबित कर दिया। रूस की महिलाओं ने क्रांतिकारी ज्वार को लोगों के हक़ में बदलने के लिये सक्रियता से अपनी भूमिका निभाई। ज़ार का तख्तापलट करने के बोल्शेविक पार्टी के बुलावे का उन्होंने पूरा समर्थन किया। फरवरी-मार्च 1917 के दौरान महिलायें साम्राज्यवादी जंग के खि़लाफ़ और लोगों के लिए रोटी की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आईं। उन्होंने सैनिकों को अपनी बंदूकें दूसरे देशों के अपने मज़दूर भाइयों पर चलाने के बजाय, ज़ार और उसकी सेना की ओर मोड़ने के लिए लामबंध किया। रूस की महिलाओं ने रूसी समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए संघर्ष किया। रूस में समाजवाद के निर्माण के साथ-साथ बहुसंख्य महिलाओं की विशाल आबादी सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में शामिल हो गयी और पूरी श्रमशक्ति का आधा हिस्सा बन गयी। सोवियत समाज में राजनीतिक जीवन के मामले में मेहनतकश पुरुष के साथ-साथ मेहनतकश महिला की पूरी हिस्सेदारी सुनिश्चित की गयी। रूस में अक्तूबर क्रांति और समाजवाद के निर्माण से दुनियाभर में संघर्ष कर रहे लाखों-करोड़ों मज़दूरों और किसानों को तथा बस्तीवाद-विरोधी संघर्षों को प्रेरणा मिली।

हिन्दोस्तान में महिलाओं ने बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हजारों महिलाओं ने अपने पुरुष भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बस्तीवादी हुकूमत से हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष में हिस्सा लिया और अपनी जान तक कुर्बान कर दी। उन्होंने एक ऐसे हिन्दोस्तान का सपना देखा, जो बर्बर बस्तीवादी गुलामी से आज़ाद होगा। उन्होंने एक ऐसे आधुनिक हिदोस्तान की तमन्ना की थी जहां हर एक महिला और पुरुष इज़्ज़त के साथ काम कर सकेंगे और समाज के भविष्य को बनाने में बराबरी से योगदान दे सकेंगे।

लेकिन बर्तानवी बस्तीवादी हुकूमत से आज़ादी के बाद के दशकों में हिन्दोस्तान के लोगों का यह भ्रम टूटने लगा कि 1947 में हुए सत्ता के हस्तांतरण से उनकी मुक्ति का रास्ता खुल जायेगा। लोगों के साथ हो रही नाइंसाफी और दमन के खि़लाफ़ संघर्ष में हज़ारों महिलाएं सक्रिय हो गयीं। वे इस बात को समझ गयीं कि देश को लोगों के नाम पर चलाया जा रहा है, लेकिन असलियत में मुट्ठीभर शोषकों के हितों की ही सेवा की जा रही है। मां की कोख से लेकर मृत्यु तक, महिलाओं के साथ हर तरह का भेदभाव होता रहा। हर साल प्रसव के दौरान लाखों महिलाओं की मौत होती रही। पितृसत्तात्मक संबंधों के चलते, घर और समाज में महिलाओं को दूसरे दर्ज़े की भूमिका दी जाती रही। हिन्दोस्तान के हुक्मरानों ने हर तरह की सामंतवादी और दकियानूसी ताक़तों के साथ सहयोग किया जो महिलाओं को दबाकर रखना चाहती थीं। महिलाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा से लेकर रोज़गार और व्यवसायिक पेशों में काम करने के अधिकार के लिए लगातार संघर्ष किया।

जब हुक्मरान वर्ग ने उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को अपनाया तब हजारों महिलाओं ने सड़कों पर आकर इसका विरोध किया। हज़ारों लड़ाकू महिलाओं ने इस कार्यक्रम को रोकने की मांग की, जिसे हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के लालची हितों को पूरा करने के लिए चलाया जा रहा था। लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना राज्य का फर्ज़ है, राज्य द्वारा इस असूल से मुंह फेर लेने की महिलाओं ने जमकर निंदा की। उन्होंने मज़दूरों, किसानों और तमाम मेहनतकश लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में अपनी आवाज़ बुलंद की।

राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हमलों और उत्तरपूर्व और कश्मीर में राजकीय आतंकवाद के खिलाफ चल रहे संघर्ष में महिलाएं सबसे आगे रही हैं। मणिपुर में सशस्त्र बलों द्वारा एक महिला का बलात्कार और कत्ल किये जाने के खि़लाफ़ मणिपुर की माताओं ने इम्फाल में सेना के मुख्यालय के सामने खुद को निर्वस्त्र करके अपना विरोध प्रकट किया। धर्म के आधार पर लोगों को निशाना बनाये जाने के खिलाफ महिलाएं विरोध प्रदर्शन में उतर आई हैं। धर्म और जाति से ऊपर उठकर लोगों को संगठित करते हुए, महिलाओं ने लोगों की एकता की हिफ़ाज़त की। सुनियोजित तरीके से चलायी जा रही हिंसा का स्रोत क्या है और किस तरह से उससे टक्कर ली जाये, इस सवाल पर महिलाओं ने गोष्ठियां और चर्चायें आयोजित कीं।

PMS Demo
Anganwadi-workers-demonstration

पिछले दो दशकों से महिलाएं बढ़ते पैमाने पर, एक महिला बतौर, एक मज़दूर बतौर, एक किसान बतौर और एक इंसान बतौर अपनी सुरक्षा के अधिकार और इज़्ज़त से जीने के अधिकारों की हिफ़ाज़त में सड़कों पर उतर आई हैं। अर्थव्यवस्था के हर एक क्षेत्र में महिलायें - फैक्ट्री मज़दूर और घर से काम करने वाले मज़दूर, आईटी मज़दूर, वित्त और बैंक मज़दूर, किसान, शिक्षक, नर्स, आंगनवाडी कार्यकर्ता - रोज़गार की सुरक्षा के लिए, अपने शोषण के खिलाफ, काम के दमनकारी हालातों के खिलाफ, काम की जगह भेदभाव और यौन शोषण के खिलाफ प्रदर्शन में सड़कों पर उतरती आई हैं।

हमारे देश की महिलाओं को, एक महिला बतौर और एक इंसान बतौर, उनके अधिकारों से वंचित किये जाने की वजह यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में चलायी जाती है और हिन्दोस्तानी राज्य इन्हीं इजारेदार पूंजीपतियों का हथकंडा हैं। राज्य के सभी अंग - सरकार, अदालत, कानून लागू करने वाली एजेंसियां - सभी पूंजीपति वर्ग की सेवा में काम करती हैं, जिनकी अगुवाई इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं। यह हुक्मरान इजारेदार पूंजीपति वर्ग अर्थव्यवस्था की दिशा और समाज का एजेंडा तय करता है। सारी राजनीतिक ताक़त एक छोटे से गिरोह, सत्ताधारी पार्टी के केंद्रीय मंत्रिमंडल, के हाथों में केंद्रित होती है। इजारेदार पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को जब कभी जनता के गुस्से से ख़तरा महसूस होता है, तो इसी सत्ता के संकेन्द्रण के चलते तमाम जनतांत्रिक अधिकारों को निलंबित कर दिया जा सकता है।

आज के दिन और युग में किसी भी गणराज्य को आधुनिक तभी माना जा सकता है जब उसमें यह मान्यता दी जाती है कि मानव आधिकार सार्वभौमिक हैं और उनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। ऐसे गणराज्य के बुनियादी कानून में इन अधिकारों को लागू करने के तंत्र मौजूद होने चाहियें। हिन्दोस्तान का मौजूदा संविधान लोगों के बुनियादी अधिकारों को न तो कानूनी तौर पर मान्य ठहराता है और न ही उनको लागू करने की ताक़त देता है। हमें बताया जाता है कि संविधान के नीति-निदेशक तत्व गणराज्य के मार्गदर्शक हैं, लेकिन उनकी मांग को लेकर किसी अदालत में जाने का कोई प्रावधान नहीं है। आज हमारे देश की महिलाओं के सामने यह चुनौती है कि वे एक ऐसे आधुनिक गणराज्य के लिए संघर्ष करें जहां एक सम्मानित और सुरक्षित जीवन जीने के अधिकार की गारंटी होगी। महिलाओं को पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक नए समाज के निर्माण के दृष्टिकोण के साथ संघर्ष करना होगा, एक ऐसा समाज जिसका बुनियादी कानून सभी मेहनतकश लोगों, महिलाओं और सभी इंसानों के अधिकारों की गारंटी देगा।

इसी दृष्टिकोण के साथ हमें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को आयोजित करने की तैयारी करनी होगी। आइये, हम सब मिलकर हमारी असली मुक्ति के इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़ी तादाद में महिलाओं को एकजुट करें। 

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Feb 16-28 2019    Voice of the Party    History    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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