सार्वजनिक कर्ज़ा: जनता को लूटकर निजी संपत्ति एकत्रित करने की प्रक्रिया

हिन्दोस्तानी सरकार की संपूर्ण बकाए की राशि जो “राष्ट्रीय ऋण” या “सार्वजनिक कर्ज़ा” के नाम से जाना जाता है, अब बढ़कर 31 मार्च, 2018 को 73.72 लाख करोड़ हो गई है। पिछले चार सालों में इस राशि में 50 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। औसतन, हिन्दोस्तान के हर महिला, पुरुष और बच्चे के सिर पर 60,000 रुपये का कर्ज़ा है।

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केंद्र सरकार के बजट में हर साल आवर्ती व्यय (रिकरिंग एकपेंडिचर) का सबसे बड़ा हिस्सा इस सार्वजनिक कज़ऱ्े पर लगे ब्याज के भुगतान की राशि होती है।

सोचने की बात है कि हर साल केंद्र सरकार इतनी बड़ी धनराशि का भुगतान किसको करती है? यह पैसा किसकी जेब में जाता है?

2017-18 के आंकड़ों के अनुसार, इस राशि का 80 प्रतिशत हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े-बड़े बैंकों और बीमा कंपनियों की मालिकी में चल रहे पूंजीवादी संस्थानों द्वारा वसूला जाता है।

बाकी 20 प्रतिशत उन लोगों को जाता है जो सरकारी बांड, सरकारी छोटी बचत योजनाओं और भविष्य निधि (पी.एफ.) आदि में अपना पैसा लगाते हैं।

राष्ट्रीय कर्ज़े के ऊपर लगाये गये ब्याज का भुगतान करने का बोझ देश के मेहनतकश लोगों के ऊपर लाद दिया जाता है। जैसे-जैसे सालाना भुगतान की राशि बढ़ती है वैसे-वैसे लोगों के ऊपर लगाए जाने वाले टैक्स भी बढ़ते हैं। अप्रत्यक्ष कर में निरंतर बढ़ोतरी से देश की सभी वस्तुओं और सेवाओं की क़ीमतों में भी वृद्धि होती है। वे महंगी हो जाती हैं।

हक़ीक़त तो यह है कि अगर पूंजीपति किसी उद्योग में अपना धन लगाता है तो उसे जोखिम उठाना पड़ता है। परन्तु सार्वजनिक कज़ऱ्े के द्वारा पूंजीपति अपने धन को बिना कोई जोखिम उठाए ही पूंजी में परिवर्तित करता है और हर साल ब्याज के भुगतान के द्वारा उसकी संपत्ति निरंतर बढ़ती ही जाती है। इसके अतिरिक्त, पूंजीपति वर्ग का पैसा जो सरकारी बांड में लगता है, वह नगदी की तरह होता है क्योंकि उसे कभी भी निकाला जा सकता है। यदि यही पूंजी किसी उद्योग में लगाई जाती तो उसका इस तरह नगदी भुगतान नहीं किया जा सकता।

यह भी गौर करने की बात है कि राष्ट्रीय कज़ऱ्े पर जो ब्याज का भुगतान किया जाता है, उससे कोई नया मूल्य उत्पन्न नहीं होता है। वह सार्वजनिक संसाधनों पर एक बोझ है।

पूंजीवादी व्यवस्था में, जब किसी उद्योग या फैक्ट्री में पूंजी लगाई जाती है तो उत्पादन के दौरान, वेतन भोगी श्रमिकों के शोषण के द्वारा अतिरिक्त मूल्य की उत्पत्ति होती है। इस अतिरिक्त मूल्य का एक हिस्सा उनको जाता है जिन्होंने कर्ज़ा दिया है। परंतु गौर करने की बात यह है कि सार्वजनिक कर्ज़ा उस तरह का कर्ज़ा नहीं है जिससे अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है।

सरकार द्वारा लिए गए कर्ज़े का अधिकांश भाग किसी उत्पादनकारी गतिविधि में नहीं लगाया जाता। उदाहरण के तौर पर, रक्षा और राज्य प्रशासन पर किए गए खर्च से अतिरिक्त मूल्य की उत्पत्ति नहीं होती। इसलिए सरकार द्वारा लिए गए कर्ज़े पर जो ब्याज राशि हर साल बड़े-बड़े बैंकों और बीमा कंपनियों और अन्य वित्त संस्थानों को दी जाती है, वह सरकार द्वारा टैक्स और अन्य प्रकार की वसूली के द्वारा इकट्ठा की गई धनराशि का एक बड़ा हिस्सा होती है। अन्य शब्दों में कहा जाए तो सरकार लोगों से पैसा इकट्ठा करके इन साहूकारों को ब्याज के नाम पर दे देती है।

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद, भारत सरकार ने राज्य की मालिकी में चल रहे वित्त संस्थानों से, बाज़ार से कम ब्याज दर पर कर्ज़ा लेने की प्रणाली शुरू की। आई.एम.एफ. और वल्र्ड बैंक ने इस नीति की कड़ी आलोचना की क्योंकि उनके अनुसार यह नीति “वित्तीय दमन” थी - यह बैंकों और बीमा कंपनियों के मुनाफ़ों पर अंकुश लगाने की नीति थी।

सार्वजनिक ऋण पर कार्ल माक्र्स का बयान

तथाकथित राष्ट्रीय संपत्ति का सिर्फ वह हिस्सा लोगों की सामूहिक सम्पत्ति माना जाता है जो सार्वजनिक कर्ज़ा होता है।

जैसे किसी जादूगर की छड़ी का कमाल हो... उसी तरह यह “सार्वजनिक कर्ज़ा” राज्य द्वारा पूंजीपतियों के लिए एक “पूंजी” का स्रोत बन जाता है। उनको न तो किसी उद्योग में पैसा लगाने की मुसीबतों को झेलना पड़ता है न ही किसी उद्योग के द्वारा उत्पन्न पैसा डुबाने का खतरा। न उन्हें इसकी चिंता होती है कि इस कर्ज़े का ब्याज मिलेगा या नहीं - यह “सार्वजनिक कर्ज़ा” पूंजीपतियों के लिए एक सुनिष्चित आय का माध्यम बन जाता है। (पूंजी, खंड 1, अध्याय 31)

“राज्य को अपने साहूकारों को सालाना ब्याज चुकाना पड़ता है... कहने के लिये तो ब्याज उस पूंजी पर है जो राज्य ने कर्ज़े में ली थी... पर हक़ीक़त में उस पूंजी को तो राज्य ने खर्च लिया है... वह “पूंजी” तो केवल काल्पनिक है। राज्य के साहूकारों के पास सिर्फ राज्य की ओर से एक वचनपत्र रहता है कि राज्य उनको सालाना ब्याज देता रहेगा, उस पूंजी के लिए जो हक़ीक़त में है ही नहीं।

जैसे ही यह “वचन पत्र” बाज़ार में बिकने योग्य नहीं रह जाता है, वैसे ही इस काल्पनिक पूंजी का भ्रम भी ख़त्म हो जाता है। (पूंजी, खंड 3, अध्याय 29)

1990 में निजीकरण और उदारीकरण के दौर में, निजी बैंकों को बढ़ने की खुली छूट दी गई। क्योंकि सरकारी बैंकों को इन निजी बैंकों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी थी, इसलिये सरकार ने बैंकों से बाज़ार की ब्याज दर पर ही कर्ज़ा लेना शुरू किया। इस कारण, सरकार के सालाना ब्याज का बोझ और भी तेज़ी से बढ़ा है।

यदि सरकार अपने खर्चे और आमदनी में सामंजस्य लाए और अपने सालाना बजट के आवर्ती घाटों को ख़त्म करे तो आम लोगों को राहत मिलेगी। लोगों को इस बढ़ते हुए ब्याज के बोझ से छुटकारा मिलेगा।

प्रश्न उठता है कि सरकार ऐसा क्यों नहीं करती?

इसका कारण यह है कि सार्वजनिक ऋण के नाम पर ब्याज के भुगतान के रूप में बड़े पूंजीपतियों - देशी या विदेशी - को जो सुनिश्चित आय अभी मिल रही है, सरकार उसे बंद नहीं करना चाहती। यह पैसा पूंजीपतियों को बिना कुछ किए हुए गारंटी के साथ हर साल मिलता है।

सार्वजनिक ऋण की इस परजीवी प्रणाली को ख़त्म किया जा सकता है। इसके लिए देश की आर्थिक व्यवस्था की दिशा बदलनी होगी।

पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़े की लालसा को पूरा करने की बजाय, सामाजिक उत्पादन और आर्थिक व्यवस्था को लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाना पड़ेगा। तब सभी बैंक और वित्त संस्थान, अधिकतम मुनाफ़ा बनाने की बजाय लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सामाजिक उत्पादन को प्रोत्साहन देंगें।

इस रणनैतिक लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में मज़दूर वर्ग और सभी मेहनतकशों को इन साहूकार वित्त पूंजी के मालिकों और संस्थानों के मनमाने ब्याज के दावों को चुनौती देनी होगी। ये साहूकार ब्याज के नाम पर हर साल राजकोष के सबसे बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लेते हैं। सरकार द्वारा ब्याज के नाम पर जो धनराशि इन साहूकारों को दी जाती है, वह केंद्रीय स्वास्थ्य बजट का 20 गुना और शिक्षा बजट का 17 गुना है।

यदि इन साहूकारों को हर साल दी जाने वाली इस धनराशि के भुगतान को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए तो सरकार के पास 4 लाख करोड़ रुपए की राशि बचेगी, जिसे लोगों की ज़रूरतों, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर सरकार खर्च कर सकेगी।

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Mar 1-15 2019    Political-Economy    Economy     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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