फ़सल बीमा योजना : “किसानों को राहत” देने के नाम पर पूंजीवादी बीमा कंपनियों को मुनाफेदार व्यापार देने की चाल

फरवरी 2016 में मोदी सरकार पुरानी फ़सल बीमा योजना की जगह पर प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना लेकर आई थी और यह दावा किया था कि यह नयी योजना किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए कारगर होगी। आज तीन साल के बाद अब समय आ गया है कि हम इस दावे का आकलन करें कि यह नयी योजना किसानों के हितों की हिफ़ाज़त करने में कितनी कारगर साबित हुई है।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के बारे में किसान क्या सोचते हैं?

जो किसान फ़सल के लिए कर्ज़ उठाते हैं उनको फ़सल बीमा लेने के लिए मजबूर किया जाता है। फ़सल के लिए दिया जाने वाला करीब-करीब सारा कर्ज़ सार्वजनिक क्षेत्र के वित्त संस्थानों और को-आपरेटिव बैंकों के द्वारा दिया जाता है और सरकार के निर्देशों के अनुसार, किसानों को मिलने वाले कर्ज़ की रकम में से बीमा के प्रीमियम की कटौती पहले ही कर ली जाती है।

किसानों को फ़सल बीमा लेने के लिये मजबूर करते हुए, सरकार सबसे पहले बीमा कंपनियों के लिए बीमा लेने वालों की न्यूनतम संख्या सुनिश्चित कर देती है, ताकि इन बीमा कंपनियों के लिए फ़सल बीमा देना एक फायदे का सौदा बन जाये। दूसरी तरफ यह फ़सल बीमा कर्ज़़ देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए किसानों को दिए गए कर्ज़ की एवज में जमानत का काम करता है, क्योंकि फ़सल के बर्बाद हो जाने पर जो कुछ बीमा की रकम अदा करनी होती है वह इन्हीं वित्तीय संस्थानों के माध्यम से अदा की जाती है।

जिन किसानों से फ़सल के लिए उठाये गए कर्ज़ में से जबरदस्ती बीमा के प्रीमियम की कटौती की जाती है उन किसानों को सरकार “कर्ज़दार” करार देती है और अन्य सभी को “गैर-कर्ज़दार” कहा जाता है। फ़सल के लिए कर्ज़ की संख्या में बढ़ोतरी से “कर्ज़दार” किसानों की तादाद बढ़ जाएगी। “गैर-कर्ज़दार” किसानों के बारे में यह मान लिया जाता है कि उन्होंने फ़सल बीमा को अपनी मर्ज़ी से लिया है और उनकी तादाद में बढ़ोतरी को इस तरह से पेश किया जायेगा जैसे कि किसान फ़सल बीमा को अपने लिए फायदेमंद समझते हैं।

फ़सल बीमा के लिए किसानों के नामांकन में भारी गिरावट

Bar graph

नीचे दिए गए चार्ट में पिछले कई वर्षों में खरीफ (मानसून) के मौसम में किसानों की संख्या को दिखाया गया है, जिन्होंने फ़सल बीमा करवाया था। फ़सल बीमा के तहत आने वाले किसानों और फ़सल के क्षेत्रफल का दो तिहाई हिस्सा खरीफ मौसम के तहत आता है। (वर्ष 2016 तक के आंकड़े 2017 में प्रकाशित सी.ए.जी. की रिपोर्ट से लिए गए हैं, और उसके बाद के आंकड़े लोकसभा में और सूचना का अधिकार के तहत दिए गए जवाब से लिए गए हैं)

ऊपर दिए गए चार्ट से नज़र आता है कि फ़सल बीमा के लिए सबसे अधिक नामांकन वर्ष 2016 में हुआ था, जब प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को पहली बार शुरू किया गया था। इनमें से तीन-चैथाई “कर्ज़दार” किसान ऐसे थे जिनसे फ़सल बीमा की प्रीमियम, कर्ज़ की रकम में से जबरदस्ती वसूली गयी थी। इस योजना का “गैर-कर्ज़दार” किसानों के नामांकन में कई असर नहीं हुआ, जो कि 2015 के स्तर पर बना रहा।

इस गिरावट के लिए सरकार का क्या बहाना है?

“कर्ज़दार” किसानों की संख्या में आई गिरावट के लिए सरकार ने कई तर्क पेश किये।

एक तर्क यह है कि जब राज्य सरकारें कर्ज़ माफ़ी का ऐलान करती हैं तो किसान पुराने बकाया कर्ज़ को वापस नहीं करते हैं, जिसके चलते ऐसे किसान नए कर्ज़ के लिए पात्र नहीं रहते हैं। इस वजह से फ़सलों के लिए नए कर्ज़ लेने वाले किसानों की संख्या में कमी हो जाती है। दूसरी वजह है नए कर्ज़ की स्वीकृति के लिए आधार का इस्तेमाल किया जाने लगा, जिससे कोई भी किसान एक ही फ़सल के लिए एक से अधिक कर्ज़ नहीं ले पा रहा है, जैसे कि पहले हुआ करता था।

लेकिन खरीफ फ़सल के आंकड़े यह दिखाते हैं कि न केवल महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में फ़सल बीमा लेने वाले किसानों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जहां इस अवधि में कर्ज़ माफ़ी की घोषणा की गयी है, बल्कि अन्य राज्यों में भी यही हाल है जैसे कि बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। 2016 में खरीफ के मौसम के लिये जिन किसानों ने फ़सल बीमा लिया था, उनमें से 80 प्रतिशत किसान इन्हीं 9 राज्यों में से हैं।

इसके अलावा, इन सभी राज्यों में “गैर-कर्ज़दार” किसानों की संख्या या तो पहले जैसे रही है या फिर उसमें गिरावट आई है। फिर क्या वजह है कि इन राज्यों में जो किसान पहले फ़सल बीमा योजना से नहीं जुड़े थे, उन्होंने खुद अपनी मर्ज़ी से फ़सल बीमा नहीं लिया, जबकि इसके इतने सारे फायदे गिनाये जा रहे हैं।

फ़सल बीमा नहीं लेने की असली वजह क्या है?

यह तो साफ है कि बड़े पैमाने पर किसान नयी फ़सल बीमा योजना के तहत बीमा लेने से बचते रहे, जब तक उनको ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया गया।

फ़सल बीमा को लेकर किसानों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इन समस्याओं में शामिल हैं - कई किसानों को यह जानकारी ही नहीं है कि उनकी फ़सल का बीमा कराया गया है (क्योंकि कर्ज़ की रकम से फ़सल बीमा की प्रीमियम कटौती उनकी जानकारी के बिना की गयी थी); बर्बाद हुई फ़सल का सरकार द्वारा कम करके आकलन कराया जाना; बीमा कंपनियों द्वारा अलग-अलग बहाने देकर बीमा के दावों को ठुकराना; समस्या की शिकायत और निवारण के लिए किसी व्यवस्था का आभाव और बीमा के दावों को पूरा करने में देरी।

किसानों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि फ़सल की बर्बादी के दावों का भुगतान अगली फ़सल के पहले किया जाये, क्योंकि उनको अगली फ़सल की लागत के लिए पैसों की ज़रूरत होती है। लेकिन इसमें बहुत देरी होती है और अक्सर किसानों को 18 महीने तक इंतजार करना पड़ता है। इस हालत में अपना बचाव करने के लिए किसानों को कई सामूहिक फैसले लेने पर मजबूर होना पड़ा है, जिसमें से एक रास्ता है कि फ़सल के लिए उठाये गए कर्ज़ से जबरदस्ती से प्रीमियम की रकम की कटौती का विरोध करना।

फ़सल बीमा योजना पर सरकार द्वारा लोगों का पैसा खर्च करना, इससे सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में क्या खुलासा होता है?

किसी भी अन्य बीमा की तरह, फ़सल बीमा के पीछे भी यही सोच है कि नुकसान के बोझ को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच बांटा जाये। इस मामले में फसल के नुकसान के ख़तरे को ज्यादा से ज्यादा किसानों के बीच बांटना।

बीमा देने वाली कंपनियां यह मानती हैं कि हिन्दोस्तान में फ़सल के बर्बाद होने की संभावना बहुत ज्यादा है और अनुभव व आंकड़े यही दिखाते हैं कि हर तीसरे साल खाद्यान्न उत्पादन में भारी नुकसान होता है। इसलिए पिछले वर्षों के उत्पादन के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर निकाली गयी प्रीमियम की रकम बहुत ज्यादा होती है। फ़सल बीमा के लिए प्रीमियम की इतनी बड़ी रकम छोटे और सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर होती है, जो कि कुल किसान आबादी का 86 प्रतिशत हैं।

फ़सल बीमा के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण मॉडल

हिन्दोस्तान में फ़सल बीमा के लिए दो प्रकार के सार्वजनिक वित्तपोषण के मॉडल चलाने की कोशिश की गयी है। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना की घोषणा से पहले इन दोनों मॉडलों पर आधारित कई बीमा योजनायें काम कर रही थीं।

“ट्रस्ट मॉडल” के तहत किसान प्रीमियम की रकम एक ट्रस्ट में जमा करते हैं, जो इस धन का प्रबंधन करती है और किसानों को बीमा की रकम का बंटवारा करती है। इस मॉडल के तहत प्रीमियम की रकम ऐसे स्तर पर निर्धारित की जाती है जो किसानों के लिए मुनासिब हो। जब बीमा दावे की कुल रकम ट्रस्ट में जमा धन से अधिक होती है तो राज्य इस कमी को पूरा करता है।

राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एन.ए.आई.एस.) इस मॉडल के आधार पर काम करती थी। सरकार प्रीमियम की रकम को निचले स्तर पर निर्धारित करती थी जो कि औसतन तौर पर खरीफ फ़सल के कुल मूल्य के 3.5 प्रतिशत से कम हुआ करती थी। इसके लिए कृषि बीमा कंपनी (ए.आई.सी.) एक ट्रस्ट बतौर काम करती थी, वह प्रीमियम की रकम इकट्ठा करती थी और दावों का निपटारा करती थी। यदि बीमा की कुल रकम ए.आई.सी. के बस के बाहर होती थी तो राज्य और केंद्र सरकार इस कमी को पूरा करने के लिए अपना योगदान देते थे।

“बीमा मॉडल” के तहत एक बीमा कंपनी प्रीमियम इकट्ठा करती है और मुआवज़ों का भुगतान करती है। इस मॉडल के तहत प्रीमियम की रकम को इस तरह से निर्धारित किया जाता है, जिससे बीमा कंपनी को सबसे कम जोखिम हो और वह अपने तमाम खर्चों के बाद मुनाफ़ा बना सके। इसमें प्रीमियम का एक हिस्सा किसान देते हैं और बाकी के हिस्से का भुगतान राज्य करता है। दरअसल इस तरीके से किसान और राज्य दोनों मिलकर अधिकतम जोखिम की ज़िम्मेदारी उठाते हैं।

बीमा मॉडल का दो योजनाओं में इस्तेमाल किया गया - संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एम.एन.ए.आई.एस.) और मौसम आधारित फ़सल बीमा योजना (डब्ल्यू.बी.सी.आई.एस.)। इस मॉडल के तहत प्रीमियम की वसूली करना और दावों का भुगतान करना, इसका प्रबंधन बीमा कंपनियां करती हैं। खरीफ फ़सल के लिए बीमा कंपनियों ने देश के तौर पर औसतन 10-11 प्रतिशत की दर से प्रीमियम लगायी है। इसका एक हिस्सा किसानों से वसूला जाता है और बाकी का हिस्सा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के योगदान से आता है। अपने खर्चों को नियंत्रण में रखने के मक़सद से सरकार ने प्रीमियम सब्सिडी और प्रीमियम की दरों पर उच्चतम सीमा निर्धारित की है।

कांग्रेस पार्टी की संप्रग सरकार ट्रस्ट मॉडल की जगह पर बीमा मॉडल लाना चाहती थी, लेकिन राज्य सरकारों के विरोध के चलते वह इस काम में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाई। 2015-16 में ट्रस्ट मॉडल पर आधारित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एन.ए.आई.एस.) के तहत बीमा लेने वाले 64 प्रतिशत किसान थे और जो कुल सुनिश्चित रकम का 70 प्रतिशत था। बीमा मॉडल पर आधारित योजना का प्रसार न केवल बेहद सीमित था, बल्कि जिन किसानों ने इसके लिए अपना नामांकन किया था उन पर सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों से लिए गए कर्ज़ के साथ बीमा लेने को मजबूर किया गया। संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एम.एन.ए.आई.एस.) के तहत स्वेच्छा से किया गया नामांकन नहीं के बराबर था और मौसम आधारित फ़सल बीमा योजना (डब्ल्यू.बी.सी.आई.एस.) के लिए केवल 3 प्रतिशत किसानों ने नामांकन किया था।

जिस काम को करने में कांग्रेस पार्टी की संप्रग सरकार नाकामयाब रही थी उस काम को मोदी सरकार ने एक ही झटके में कर दिखाया। संप्रग सरकार के जमाने की तीन योजनाओं की जगह पर 2016 में मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना की घोषणा की। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना ने खरीफ फ़सल के लिए पूरे देश में बीमा मॉडल को अपनाया और प्रीमियम के लिए 12-15 प्रतिशत की औसतन दर लागू की। सरकार ने किसानों द्वारा दी जाने वाली प्रीमियम की राशि को एन.ए.आई.एस. के स्तर पर रखा और बाकी की रकम का भुगतान राज्य और केंद्र सरकार के योगदान से किया गया।

यदि बीमा कंपनियों के नज़रिये से देखा जाये तो प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को पहले की योजना की तुलना में और भी अधिक आकर्षक बना दिया गया है। सरकार ने निश्चित तौर पर मिलने वाली राशि और “प्रीमियम सब्सिडी” पर पहले लगाई जा रही सीमा को और भी लचीला कर दिया है। इससे बीमा कंपनियों के लिए निश्चित तौर पर मिलने वाली राशि में और ज्यादा किसानों के नामांकन के रूप में अधिक व्यापार मिलने के रास्ते खुल गए। चूंकि किसानों द्वारा दी जाने वाली राशि को कम स्तर पर रखा गया, इसके चलते बीमा प्रीमियम का अधिकतम बोझ सरकार पर आ गया।

Table

फ़सल बीमा के लिए धन का स्रोत और उसका इस्तेमाल

फ़सल बीमा के लिए निर्धारित धन की मात्रा नाटकीय ढंग से लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसमें सबसे बड़ा योगदान सरकार से आता है जो कि पिछले तीन वर्षों में कुल रकम का 80 प्रतिशत से अधिक रहा है। (ऊपर दिए गए चार्ट में संसद में दिए गए उत्तर से मिले आंकड़े दिखाए गए हैं)।

सरकार द्वारा खर्च की गयी रकम का कितना हिस्सा किसानों को मिलता है?

Chart 2

इस चार्ट में दिखाया गया है कि पिछले कुछ खरीफ मौसमों में सरकार द्वारा खर्च किये गए धन में से कितना हिस्सा बीमा कंपनियों ने अपने लिए बचा लिया है। यह जानकारी सरकार द्वारा प्रकाशित दस्तावेज़ों और संसद में दिए गए जवाबों से संकलित की गयी है। “किसानों को दी गयी रकम” वह रकम है जो प्रीमियम काटने के बाद किसानों के हाथों में आई है।

2016 से पहले बीमा कंपनियां सरकार द्वारा खर्च किये गए धन में से 12 प्रतिशत से कम धनराशि अपने लिए बचा पाती थीं और बाकी की धनराशि किसानों को मिलती थी। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के लागू किये जाने के बाद हालात नाटकीय रूप से बदल गए हैं।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना लागू किये जाने से एक वर्ष पहले, साल 2015 का आकलन काफी कुछ दिखाता है। उस वर्ष सूखा पड़ा था। किसानों को मिलने वाली अधिकतम बीमा राशि एन.आई.ए.एस. के तहत दी गयी थी, जो कि कुल निश्चित राशि का 70 प्रतिशत थी। इसका बड़ा हिस्सा सरकार की तिजोरी से निकाला गया था क्योंकि जितनी रकम के दावे आये थे वे कृषि बीमा कंपनी (ए.आई.सी.) के बस के बाहर थे। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार द्वारा दी गयी करीब-करीब सारी रकम किसानों के खातों में चली गयी।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के आने के बाद प्रीमियम के 80 प्रतिशत हिस्से का भुगतान सरकार द्वारा सीधे बीमा कंपनियों को दिया जाता है। बीमा कंपनियों ने इस रकम में से पिछले दो खरीफ मौसमों में क्रमशः 46 प्रतिशत और 18 प्रतिशत अपने पास रख लिये। 2016 में प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना लागू होने के बाद बीमा कंपनियों के पास रखी हुई रकम में करीब 10 गुना बढ़ोतरी हुई है। 2016 और 2017 के खरीफ मौसम के दौरान बीमा कंपनियों ने 9,300 करोड़ रुपये इकट्ठा किये हैं।

क्या बीमा मॉडल ट्रस्ट मॉडल से बेहतर है?

मोदी सरकार ने बीमा कंपनियों को अप्रत्याशित मुनाफ़े बनाने की छूट दी है इस आलोचना का जवाब देते हुए कृषि सचिव ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना का मॉडल एन.ए.आई.एस. के मॉडल से बेहतर है, क्योंकि अब सरकार पर तमाम दावों का बोझ नहीं है, जो कि पुराने एन.ए.आई.एस. के मॉडल में “असीमित” हुआ करता था और बड़े सूखे की हालत में सरकार को बहुत बड़े पैमाने पर भुगतान करना पड़ता था। (टाइम्स ऑफ इंडिया, 3 दिसम्बर, 2018)

सच्चाई तो यह है कि निजी बीमा कंपनियां अपने ऊपर आने वाले जोखिम को हमेशा कम करने की कोशिश करेंगी। वे हमेशा कोशिश करेंगी कि जोखिम का बोझ बीमा लेने वाले पर पड़े - यानी कि इस मामले में किसान पर पड़े और बाकी सरकार पर पड़े जो प्रीमियम का 80 प्रतिशत हिस्सा देती है। अधिक जोखिम का मतलब है अधिक प्रीमियम।

किसी खास वर्ष में ऐसे भी हो सकता है कि किसान को दी जाने वाली रकम प्रीमियम द्वारा जमा की गयी रकम से अधिक हो। लेकिन यदि इसे कई वर्षों की अवधि में जोड़ा जाये तो प्रीमियम से आने वाली रकम किसानों को मिलने वाली रकम और बीमा कंपनी चलाने के खर्च को मिलाकर उससे अधिक होना चाहिए, ताकि कंपनी मुनाफ़े बना पाए।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना से किसको फायदा है?

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना निजी बीमा कंपनियों को इसका प्रीमियम निर्धारित करने की छूट देते हुए, इसमें हिस्सा लेने की अनुमति देती है। निजी बीमा कंपनियों के पक्ष यह तर्क दिया जाता है कि आपसी होड़ के चलते ये कंपनियां ग्राहकों की ज़रूरतों के प्रति ज्यादा सचेत होती हैं। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के मामले में यह बिलकुल भी लागू नहीं है क्योंकि इस योजना तहत किसी एक इलाके में केवल एक ही बीमा कंपनी काम कर सकती है किसानों के पास कोई और विकल्प नहीं होता है। हालात ऐसे हैं कि समय पर बीमा की रकम का भुगतान कराने के लिए सरकार को अक्सर इन बीमा कंपनियों को धमकाना पड़ता हैं।

देश के ग्रामीण हिस्सों में बीमा सेवा देने के लिए ज़रूरी तंत्र पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में है। बीमा सेवा देने और प्रीमियम की रकम इकट्ठा करने के लिए बैंकों की ग्रामीण शाखाओं से लेकर, फ़सल का उत्पादन और फ़सल को हुए नुकसान को निर्धारित करने के लिए राज्य मशीनरी सब कुछ सार्वजनिक क्षेत्र में है। कई रिपोर्टों से पता चलता है कि इन इलाकों में निजी बीमा कंपनियों की “ज़मीन पर” शायद ही कोई मौजूदगी है जिसके चलते किसानों को अपनी समस्याओं का निवारण करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ये निजी कंपनियां सरकार और किसानों के बीच एक बिचोलिये बतौर कोई भी योगदान नहीं देती है।

इस समय सरकार फ़सल बीमा के लिए प्रीमियम की 80-85 प्रतिशत रकम देती है। फ़सल बीमा के लिए सरकारी तिजोरी से होने वाला खर्च बहुत बड़ा है और मात्र दो वर्षों 2016-17 और 2017-18 के दौरान 40,000 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं।

इन हालातों में क्या इसे जायज़ माना जा सकता है कि सरकार निजी कंपनियों के माध्यम से काम करे और इन कंपनियों के ऊपरी-खर्च और उनके मुनाफ़ों के लिए लोगों का धन खर्च करे? इस सबसे यही नज़र आता है कि जब मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को बनाया था, तब उनका मुख्य सारोकार इन निजी बीमा कंपनियों के लिए मुनाफ़ेदार व्यापार जुटाना था, न कि संकट ग्रस्त किसानों को राहत पहुंचाना।

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Mar 1-15 2019    Political-Economy    Economy     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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