वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प है

शासक वर्ग और उसके द्वारा प्रशिक्षित राजनीतिक विद्वान और नेतागण इस झूठ को हमेशा दोहराते हैं कि वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया और व्यवस्था का कोई विकल्प संभव ही नहीं है। वे अमरीकी और दूसरे साम्राज्यवादी राज्यों के इस मंत्र को हमेशा दोहराते रहते हैं कि बहुदलीय प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र के अलावा इससे बेहतर और कोई राजनीतिक व्यवस्था हो ही नहीं सकती। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि दुनिया के अधिकांश लोग इस व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं।

अपने देश के अधिकांश लोग, एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसका उनकी ज़रूरतों और चिंताओं से कोई संबंध नहीं है से बहुत ही नाराज़ हैं। हमारी लोकसभा में लोगों की आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी जायज़ मांगों को पूरा करने का कोई साधन नहीं है। हर चुनी हुई सरकार केवल गिने-चुने अमीर घरानों की - टाटा, बिरला और अंबानी तथा बड़े-बड़े पूंजीवादी घरानों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ही काम करती है।

करोड़ों मज़दूर और मेहनतकशों को अपने मूलभूत अधिकारों और न्यूनतम वेतन के लिए कितनी बार सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों के लिए मजबूर होना पड़ा है। लाखों किसानों को जो देश के हर कोने से आते हैं, अपनी उत्पादित वस्तुओं के जायज़ दामों की मांगों को लेकर कितने संघर्षपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। देश के आम लोगों की मांग है कि रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सेवाओं के निजीकरण पर तुरंत रोक लगे। हम सबकी इन मांगों को देश की राजनीतिक व्यवस्था और सरकार नकारती रही है।

2019 के लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर हम देख सकते हैं कि किस तरह से बड़े-बड़े पूंजीवादी घराने, देश में वर्तमान राजनीतिक चर्चा के अजेंडे को तय करते हैं। पूंजीपतियों द्वारा चलाए जा रहे बड़े-बड़े मीडिया चैनलों पर, पाकिस्तान से बदला लेने के लिए जंग जैसे विषयों पर चर्चा और प्रचार कर रहे हैं। इस प्रचार का केवल एक ही मक़सद है कि किस तरह से लोगों का ध्यान, उनकी अपनी मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति के लिए चल रहे संघर्ष से हटाया जाए। किस तरह से बढ़ती बेरोज़गारी, शोषण, कृषि क्षेत्र में संकट और किसानों की गिरती आमदनी जैसी समस्याओं का हल ढूंढने की बजाय मज़दूरों, किसानों और अन्य दबे-कुचले लोगों को दिशाभूल किया जाए और उनको पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग के लिए उकसाया जाए। इस प्रचार के द्वारा देश का शासक वर्ग चाहता है कि लोग इस बहस में फंसे रहें कि कांग्रेस पार्टी और भाजपा में से कौन पाकिस्तान को मुंहतोड़ जबाव दे सकते हैं। हम सब जानते हैं कि इस सैन्यीकरण और युद्ध से, दोनों हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को मुनाफ़ा होता है, वे अपनी तिजोरियां भरते हैं। इस साम्राज्यवादी युद्ध से लोगों का नुकसान ही होगा, उनकी हालत बदतर ही होगी।

हिन्दोस्तानी संविधान की प्रस्तावना को पढ़ने से यह भ्रम पैदा होता कि इस राजनीतिक व्यवस्था में देश के आम लोगों के पास सर्वोच्च निर्णय लेने की ताक़त है। हक़ीक़त में देश का संविधान सरकार की कैबिनेट को लोगों के नाम पर सभी निर्णय लेने की ताक़त देता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद की अनुमति के बिना ही नोटबंदी लागू कर दी थी। यह सब जानते हैं कि इस निर्णय के पीछे बड़े-बड़े पूंजीपतियों का हाथ था। मौजूदा संविधान हिन्दोस्तान की सरकार और मंत्रीमंडल को इस तरह के फैसले लेने का अधिकार प्रदान करता है।

हर एक व्यस्क नागरिक को वोट देने के अधिकार का प्रावधान इस संविधान में है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, क़ायदे-कानून और राजनीतिक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि पूंजीपति वर्ग की चुनी हुई पार्टियां ही चुनाव में जीतकर आएं। हजारों-करोड़ों रुपए इसलिए खर्च किए जाते हैं कि बड़े पूंजीवादी घरानों की विश्वासपात्र पार्टियां ही सरकार बना सकें।

पूंजीपति वर्ग बहुत सी राजनीतिक पार्टियों और गुटों में बंटा है। भाजपा और कांग्रेस पार्टी जो पूंजीपतियों की मुख्य पार्टियां हैं, देश में और भी राजनीतिक दल हैं जो देश के विभिन्न इलाकों और क्षेत्रीय पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये सभी पार्टियां चुनावों का इस्तेमाल लोगों का बांटने के लिये करती हैं और उनका ध्यान उनकी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने की अपनी समस्याओं से हटाती हैं। हम सब जानते हैं कि चुनावों में उम्मीदवारों का चयन और चुनावी गठबंधन, धर्म और जाति कि आधार पर किए जाते हैं।

पूंजीपति वर्ग के विभिन्न गुट इस बात की कोशिश करते हैं कि कार्यकारिणी सत्ता पर उनका कब्ज़ा हो। उम्मीदवारों के चयन से लेकर, चुनाव अभियान, चुनावी गठबंधन बनाने, सरकार बनाने और देश के क़ायदे कानूनों और नीतियों को तय करने और लागू करने तक - पूरी राजनीतिक प्रक्रिया पर पूंजीपति वर्ग के विभिन्न गुटों का ही नियंत्रण रहता है। ये राजनीतिक पार्टियां आम लोगों के साथ भिखमंगों की तरह व्यवहार करती हैं - चुनावी प्रत्याशी और पार्टी के नेता अलग-अलग तरह के वादे करते हैं - जो केवल वायदे ही रहते हैं।

मज़दूर, किसान और अन्य मेहनतकश लोग भी बहुत मेहनत और लगन से अपनी पार्टियों और जनसंगठनों के, अपने प्रत्याशी हर चुनाव में खड़े करते हैं। परंतु इन सब प्रत्याशियों को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। यह सबको पता है कि चुनावी प्रक्रिया में पैसों का बोलबाला रहता है। पूरी चुनावी प्रक्रिया बड़ी-बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को, जो पूंजीपति वर्ग का अभिन्न हिस्सा हैं - प्रोत्साहन देती है। पूंजीपतियों द्वारा चलाई जाने वाली पार्टियों को बहुत से विशेषाधिकार मिलते हैं। उनको पार्टी ऑफिस और स्थाई चुनाव चिन्ह मिलते हैं। टी.वी. चैनलों और पूंजीपति वर्ग के प्रचार माध्यमों के द्वारा इन बड़ी-बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को बढ़ावा दिया जाता है। अन्य पार्टियों और आम लोगों के जनवादी संगठनों के उम्मीदवारों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसको उस निर्वाचन क्षेत्र से लोगों का प्रतिनिधिघोषित कर दिया जाता है चाहे उसको उस निर्वाचन क्षेत्र में, जितने मत हैं, उसका एक तिहाई या कुछ प्रतिशत हिस्सा ही मिला हो। अधिकांश लोगों के प्रतिनिधिजो इस चुनावी प्रक्रिया से चुने जाते हैं उनको अपने चुनाव क्षेत्र से मतों का एक न्यूनतम हिस्सा ही हासिल होता है। इस चुनावी प्रक्रिया के द्वारा जब लोगों के प्रतिनिधिको चुन लिया जाता है, फिर इन प्रतिनिधियों का एक हिस्सा सत्तारूढ़दल और दूसरा दल विपक्षकहलाता है। सत्तारूढ़ पक्ष सरकार चलाता है - वह देश की नीतियां तय करता है, कानून का प्रस्ताव लाता है आदि... परंतु यह सब क़ायदे कानून और नीतियां, प्रस्ताव, पूंजीपति वर्ग के हित में होते हैं। चूंकि ये पार्टियां और प्रतिनिधिवास्तव में पूंजीपति वर्ग का ही हिस्सा होते हैं। चुनावों के द्वारा उनको लोगों के प्रतिनिधिबतौर मान्यता मिल जाती है।

हम सब जानते हैं कि जिनको हमारा प्रतिनिधिघोषित किया जाता है, उनपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। संसद में जो बैठते हैं उनकी जबावदेही अपनी पार्टी के हाई कमानके प्रति होती है। क्योंकि उन्हीं की बदौलत वे चुनाव जीतते हैं - वे अपने निर्वाचित क्षेत्र के लोगों के प्रति बिल्कुल भी जबावदेह नहीं होते। लोगों के पास न तो उम्मीदवार के चयन का अधिकार है और न ही जीतकर संसद में गये प्रतिनिधि को वापस बुला सकनेका अधिकार है जो अपने वायदे पूरे नहीं करता। एक बार चुनकर संसद पहुंच गए तो लोगों का प्रतिनिधिलोगों के नाम पर कुछ भी कर सकता है - इस संविधान में लोगों को अपने प्रतिनिधिको वापस बुलाने का अधिकार नहीं है।

हर सत्तारूढ़ सरकार यह बोलती है कि उसको जनादेशमिला है। चुनाव कुछ और मुद्दों पर लड़े और जीते जाते हैं। पर सरकार बनने के बाद, वह पूंजीपति वर्ग का ही एजेंडा लागू करती है। जो भी सरकारें चुनकर आई हैं, उन्होंने लोक-विरोधी निजीकरण, उदारीकरण के द्वारा भूमंडलीकरणका कार्यक्रम ही लागू किया है। सरकार की नीतियों और क़ायदे कानूनों से बड़े पूंजीवादी घराने और भी धनी बनते हैं। देश में पिछले 70 सालों में अमीर पूंजीपति वर्ग की संपत्ति सैकड़ों गुना बढ़ी है और आम मज़दूर, किसान और मेहनतकश लोगों को लाठी, गोली, ग़रीबी और कर्ज़े का सामना करना पड़ता है।

इन सभी तथ्यों और घटनाओं से अपने हाल ही के इतिहास से क्या सीख मिलती है? एक सच्चाई जिसको नकारा नहीं जा सकता- वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग जिसका नेतृत्व टाटा, बिरला और अंबानी जैसे इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं - जिनके पास ही सत्ता है। देश की दिशा यह शासक वर्ग ही तय करता है। यह राज्य तंत्र लोगों को बांटकर राज करनेकी शासन व्यवस्था का एक साधन है।

इस राजनीतिक व्यवस्था में सत्तारूढ़ पार्टी हो या विपक्षी पार्टी”- दोनों ही बड़े-बड़े पूंजीपतियों द्वारा चलाई जाती हैं, उन्हीं के पैसे पर ये बड़ी-बड़ी पार्टियां चलती हैं - और बारी-बारी से सत्ता में आती हैं - परंतु जनादेश मिलने के बाद दोनों का मकसद वही होता है - पूंजीपति वर्ग के अजेंडे को किस तरह से लागू किया जाए। यह राजनीतिक व्यवस्था, यह राजनीतिक प्रक्रिया ही वह साधन है जिसके द्वारा हिन्दोस्तान का शासक पूंजीपति वर्ग अपनी हुक्मशाही समाज पर थोपता है और क़ायम रखता है।

मज़दूर और मेहनतकश लोगों को अपने अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए और अपनी आकांक्षाओं और हितों को साकार करने के लिए, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में, इस घिसी-पिटी, पुरानी और लोक-विरोधी व्यवस्था में, कोई जगह नहीं है। इसका केवल एकमात्र हल है - एक ऐसी व्यवस्था को स्थापित करना, जो हिन्दोस्तानी लोगों की सदियों से चली आ रही मांग को साकार करे - और वह है - “हम हैं इसके मालिक हिन्दोस्तान हमारा। इस वैकल्पिक राज्य व्यवस्था में लोगों को सत्ता चलाने का अधिकार होगा, उनको सत्ता चलाने में एक निर्णायक भूमिका अदा करनी होगी। उनको समाज के हर क्षेत्र में, हर मुद्दे पर फैसले लेने की और समाज के हित में उन फैसलों को लागू करने का अधिकार और क्षमता मिलेगी।

मज़दूर, किसान और देश के मेहनतकश लोग जो देश की संपत्ति पैदा करते हैं, उनके हाथ में सत्ता होनी चाहिए। तभी हम सभी के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएंगे।

देश की सत्ता लोगों के हाथों में आए और रहे, इसके लिए एक ज़रूरी शर्त है कि देश के मेहनतकश लोग एक नए संविधान की रचना करें जिसमें लोगों के हाथ में सर्वोच्च निर्णय लेने की ताक़त हो, न कि किसी राष्ट्रपति, मंत्रीमंडल या संसद में। सत्ता लोगों के हाथ में ही रहनी चाहिए। संप्रभुता लोगों के हाथ में होगी।

इस नई व्यवस्था में, चुने हुए प्रतिनिधियों के दो गुटों में, एक सत्तारूढ़ और दूसरा विपक्ष नहीं बांटा जाएगा। चुने हुए प्रतिनिधि एक सामूहिक संगठन बतौर, लोगों के प्रति जबावदेह होंगे। कार्यकारिणी विधायिकी के प्रति जवाबदेही होगी और विधायिकी लोगों के प्रति जबावदेह होगी।

इस नई राजनीतिक व्यवस्था की विशेषता यह होगी कि मेहनतकश लोगों को सुनियोजित तरीके से समाज के हित में लिए जा रहे हर फैसले की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका अदा करने का प्रावधान होगा। यही एक उपाय है जिससे आम मेहनतकश लोग यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि देश और समाज की अर्थव्यवस्था लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चलाई जाए न कि कुछ मुट्ठीभर शोषकों के द्वारा, लोगों के श्रम के द्वारा उत्पादित किया हुआ अतिरिक्त मूल्य, हड़प कर लिया जाए।

राजनीतिक पार्टी की भूमिका होगी कि वह लोगों को सचेत करे, सक्षम बनाए जिससे कि वे एक संगठित ताक़त बर्तौर समाज की बागडोर अपने हाथों में लें और चलाएं। राजनीतिक व्यवस्था में क़ायदे-कानून इस तरीके के होंगे जिससे ऐसी पार्टियां जो फूट डालती हैं, लोगों को बांटती हैं उनको कोई अधिकार न हो। कोई भी राजनीतिक पार्टी जो सत्ता से लोगों को वंचित करना चाहती है, उनके फैसले लेने के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित नहीं करती है, उस तरह की पार्टियों की, इस नई राज्य व्यवस्था में कोई जगह नहीं होगी।

पूरी चुनावी प्रक्रिया का खर्च राज्य वहन करेगा। इसके अलावा धन के और स्रोतों की राजनीतिक प्रक्रिया में जगह नहीं होगी। अपने निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों के चयन और प्रत्याशियों की सूची को मंजूरी देने का अधिकार और लोगों को ज़िम्मेदारी होगी। लोगों को कानून बनाने की प्रक्रिया में केवल शामिल होने का ही नहीं बल्कि नए कानून प्रस्तावित करने का अधिकार भी होगा। उनको सार्वजनिक जनमत संग्रह द्वारा लिए गए निर्णयों को मंजूरी देने का हक़ होगा। लोगों को यह अधिकार होगा कि वे अपने चुने गए प्रतिनिधि को कभी भी वापस बुला सकें यदि वह उनकी मर्ज़ी और निर्णयों को लागू करने में असमर्थ या अयोग्य है। संविधान को बदलने सहित बची हुई पूरी राजनीतिक ताक़त लोगों के हाथ में रहेगी।

मज़दूर वर्ग को किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों के साथ मिलकर सत्ता चलाने के लिए, इस नई वैकल्पिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था की सख़्त ज़रूरत है। इसके बिना मज़दूर वर्ग सत्ता नहीं चला सकता।

पूंजीपति वर्ग के प्रवक्ता भी शासन और चुनावी प्रक्रिया में सुधारों की बात करते हैं। लेकिन उनके सुधारों का मक़सद है कि किस तरह राजनीतिक सत्ता और फैसले लेने की ताक़त हिन्दोस्तान के सबसे अमीर घरानों में केंद्रित हो। वे चाहते हैं कि पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही और स्थाई हो। उनका मकसद है किस तरह पूंजीपतियों की मान्यता प्राप्तराजनीतिक पार्टियों का प्रभुत्व और बढ़े, व्यवस्था में स्थिरताआए और किस तरह से लोगों के प्रतिनिधियोंकी चुनौती को बेअसर और असंगत करार दिया जाए।

कुछ राजनीतिक पार्टियों ने यह सवाल भी उठाया है कि चुनावों में प्रथम आने वालाकी प्रथा की जगह अनुपातिक प्रतिनिधित्वकी प्रणाली लागू की जाए। इसका मतलब है कि संसद में विभिन्न पार्टियों को उनको कुल मिले वोटों के अनुपात में सीटें मिलेंगी। समझने की बात यह है कि क्या इस सुधार से राजनीतिक सत्ता का वर्ग चरित्र बदल जाएगा। क्या इस सुधार के ज़रिए पूंजीवादी पार्टियों का राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया पर जो दबदबा है, वह ख़त्म हो जाएगा। इस प्रक्रिया के द्वारा क्या आम लोगों के प्रतिनिधि चुनकर संसद में आ सकते हैं? क्या जो लोग अभी हाशिए पर हैं उनको फैसले लेने की ताक़त मिल सकेगी?

सभी कम्युनिस्टों का फ़र्ज़ है कि वे एकजुट होकर एक नई राज्य व्यवस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाएं। एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसमें लोगों के हाथ में संप्रभुता हो। हम सबको मिलकर सभी तथ्यों और तर्कों सहित इस वर्तमान राज्य व्यवस्था का पर्दाफ़ाश करने में कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए। इस सच्चाई को लोगों के सामने लाना होगा कि यह वर्तमान व्यवस्था पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही है। हमें मज़दूरों किसानों की वैकल्पिक व्यवस्था की स्थापना के लिये लोगों के सभी असंतुष्ट तबकों को लामबंध करना होगा।

हमें इन चुनावों में एक विकल्प, एक नई राजनीतिक व्यवस्था और एक नई राजनीतिक प्रक्रिया का अभियान चलाना होगा - एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसमें लोगों के हाथ में सत्ता आए। देश की अर्थव्यवस्था की दिशा पूंजीपतियों के मुनाफ़े बढ़ाने की बजाय लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करे।

हम सबको ऐसे परिवर्तनों, सुधारों के लिए लड़ना पड़ेगा जिससे पूंजीपतियों की पार्टियों का राजनीतिक प्रक्रिया पर दबदबा कमज़ोर हो और लोगों के, मज़दूर-मेहनतकश लोगों के प्रतिनिधियों को अपने विचार और कार्यक्रम लोगों के बीच ले जाने और उन्हें सचेत बनाने के लिए जगह मिले।

हम कम्युनिस्टों को मज़दूर वर्ग और आम लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में एक सचेत भूमिका अदा करने के लिए लामबंध करना होगा। छोटी-छोटी पार्टीवादी लड़ाइयों से ऊपर उठकर हमें लोगों को अपने संघर्षों के दौरान संगठित होने का, अपने निवास स्थानों, अपने काम करने के स्थानों और संघर्षों के बीच राजनीतिक तौर पर सचेत समितियों की स्थापना करने का प्रयास जारी रखना पड़ेगा। लोगों में राजनीतिक चेतना तभी आती है जब वे अपने अधिकारों, अपने सांझे हितों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करते हैं। सामूहिक संघर्षों के द्वारा बनाए गए सचेत संगठनों के बलबूते पर ही हम राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेने के संघर्ष को मजबूत कर सकते हैं। लोगों को सक्षम बना सकते हैं कि वे सत्ता को अपने हाथों में लें और चलाएं।

सभी प्रगतिशील ताक़तों को मिलकर अपनी राजनीतिक एकता को मज़बूत करने की सख़्त ज़रूरत है। वक्त की मांग है कि हम हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए लोगों को लामबंध करें। हम आम मज़दूर-मेहनतकश लोगों को जो आज की व्यवस्था में सत्ता से वंचित हैं, उनको सत्ता पर अपना कब्ज़ा करने का बीड़ा उठाना होगा। हम है इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा” - इस सपने को साकार करने के लिए, हमें एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देना होगा, जिसमें मज़दूर वर्ग के हाथ में सत्ता हो और मज़दूर-किसान और मेहनतकश लोगों के हित में वह व्यवस्था चले और आर्थिक व्यवस्था का मक़सद हो - सभी मेहनतकशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जो भी चाहिए वह किया जाए।

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Mar 16-31 2019    Voice of the Party    Economy     History    Political Process     Popular Movements     Rights     Theory    2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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