दक्षिण एशिया में शांति बहाल करने के लिए : हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच बिना शर्त वार्ता ज़रूरी

पाकिस्तान ने जब भारतीय वायु सेना के गिरफ़्तार किये गए पायलट को रिहा कर दिया, तो उसके कुछ ही क्षण बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने ऐलान किया था कि यह तो बस एक पायलट प्रोजेक्ट पूरा हुआ है। असली प्रोजेक्ट तो अब शुरू होगा। इससे पहले वाला तो सिर्फ प्रैक्टिस के लिए था।

कई मंत्रीगण और टी.वी. चैनलों के एंकर हर रोज़ बड़े भड़काऊ और उग्र बुलावे दे रहे हैं, पाकिस्तान के अन्दर निशानों पर और बम बरसाने की धमकी दे रहे हैं।

इस समय वातावरण बहुत ही तनावपूर्ण है। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की सेनायें सरहद पर तैनात हैं। हर रोज़, जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के उस और इस पार से गोली चलने की रिपोर्टें मिलती हैं। दोनों तरफ, सैनिक और नागरिक मारे गए हैं या घायल हुए हैं। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच विनाशकारी जंग की पूरी संभावना बनी हुयी है।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी में मुख्य मुद्दा कश्मीर का मुद्दा रहा है और अब भी है। कश्मीर दुनिया के सबसे ज्यादा फ़ौजीकृत इलाकों में से एक है। हिन्दोस्तानी सेना का आधे से ज्यादा भाग कश्मीर में तैनात है।

कश्मीर की समस्या की जड़ बरतानवी उपनिवेशवादी शासकों की हिन्दोस्तान को छोड़ने के समय की रणनीति में है। इस समस्या की जड़ धर्म के आधार पर, हिन्दोस्तान के दो भागों में, दो शत्रुतापूर्ण ताक़तों के बीच, बंटवारे में है। उस समय जम्मू-कश्मीर एक रजवाड़ा था, जिसके लोग वहां के महाराजा के दमनकारी शासन के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे थे। बरतानवी शासकों की निगरानी में बंटवारे का जो समझौता हुआ था, उसके अनुसार जम्मू-कश्मीर को तीन विकल्पों में से एक चुनना था - पाकिस्तान का हिस्सा होना, हिन्दोस्तान का हिस्सा होना या एक आज़ाद राज्य होना।

अक्तूबर 1947 में, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच प्रथम युद्ध के बाद, कश्मीर का बलपूर्वक बंटवारा किया गया था। हिन्दोस्तान की सरकार ने महाराजा के साथ एक परिग्रहण समझौता किया था, जिसमें जम्मू-कश्मीर को हिन्दोस्तानी संघ के अन्दर विशेष दर्ज़ा दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद में एक जनमत संग्रह करवाने का वचन दिया था, जिसके द्वारा जम्मू-कश्मीर की पूरी जनता अपने राजनीतिक भविष्य को तय कर सकेगी। हिन्दोस्तान की सरकार ने संयुक्त राज्य आम सभा में भी अपने उस वचन को दोहराया था।

परन्तु हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को दिए गए अपने वचन को आज तक पूरा नहीं किया है। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 370 के अनुसार, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्ज़ा है, परन्तु बीते 72 वर्षों के दौरान, जम्मू-कश्मीर अधिकतम समय तक केंद्र-शासित और सेना के शासन के तले रहा है।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों, दोनों ने ही कभी असूल के तौर पर यह नहीं स्वीकार किया है कि अविभाजित जम्मू-कश्मीर के लोगों का, बाहरी हस्तक्षेप के बिना, खुद अपना भविष्य तय करने का अधिकार है। उन्होंने कश्मीर की समस्या को दो पड़ोसी देशों के बीच के विवादास्पद क्षेत्र की समस्या के रूप में उठाया है, जिसे हथियारों के बल हल करना होगा। इस दृष्टिकोण की वजह से, ब्रिटेन और अमरीका जैसी विदेशी ताक़तें इस परिस्थिति को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने और दक्षिण एशिया को बांटकर कमजोर रखने में सक्षम हुयी हैं।

बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हमेशा ही दक्षिण एशिया पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए, कश्मीर को बड़े रणनैतिक महत्व का स्थान माना है। 1947 में उन्होंने हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की सरकारों तथा कश्मीर के महाराजा के साथ दांवपेच करके, कश्मीर का बंटवारा किया। इस प्रकार से उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हमारे दोनों देश कश्मीर के मुद्दे को लेकर निरंतर झगड़े में फंसे रहेंगे। उस समय से लेकर आज तक, वे हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में भिड़ाते रहे हैं, कभी एक का समर्थन करते नज़र आते हैं तो कभी दूसरे का। पर उनका उद्देश्य है पूरे एशिया पर अपना प्रभुत्व जमाना।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को हमेशा आपस में लड़वाकर, बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि दक्षिण एशिया के लोग साम्राज्यवादी व्यवस्था से कभी मुक्त न हो पाएं। वे रूस, चीन और ईरान समेत एशिया के अन्य देशों के प्रति अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को बढ़ावा देने के लिए, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुयी थी, तब अमरीका ने सोवियत संघ को घेरने के लिए, पाकिस्तान का एक सैनिक अड्डे बतौर इस्तेमाल किया था। पाकिस्तान जंग फरोशी एस...टी.. और सी..एन.टी.. सैनिक गठबंधनों का हिस्सा था, जिनका मकसद था दक्षिण पूर्वी एशिया और पश्चिम एशिया पर अमरीकी प्रधानता स्थापित करना। हिन्दोस्तान ने सोवियत संघ के साथ सैनिक संधि की थी। सोवियत संघ के समर्थन के साथ, हिन्दोस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली लोगों के मुक्ति संघर्ष में दखलंदाज़ी की और बांग्लादेश के स्वतंत्र राज्य की रचना की। एशिया के लोगों के साम्राज्यवाद-विरोधी मुक्ति संघर्षों के साथ खिलवाड़ करने और उन्हें ख़त्म करने की दोनों महाशक्तियों की दुष्ट करतूतों के चलते, उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा में दोनों हिन्दोस्तान और पाकिस्तान पूरी तरह लिप्त हो गए थे।

सोवियत संघ के पतन और दुनिया के दो-ध्रुवीय बंटवारे के समाप्त होने के बाद, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने कम्युनिस्ट ख़तरेसे लड़ने के अपने पुराने नारे की जगह पर आतंकवाद पर जंगका नया नारा अपनाया। पाकिस्तान व कुछ और देशों को अपने अड्डे बनाकर, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अनेक आतंकवादी गिरोहों को धन, प्रशिक्षण व हथियार देकर लामबंध करना शुरू कर दिया। इन आतंकवादी गिरोहों को इस्लाम के नाम पर लड़ने को लामबंध किया गया। इन्हें रूस, हिन्दोस्तान, चीन, पाकिस्तान तथा कई अन्य देशों में लामबंध किया गया। इन आतंकवादी गिरोहों को अलग-अलग देशों में अस्थायी हालतें पैदा करने और राज्य को दमन करने को मजबूर करने, फिर फ़ौजी दखलंदाज़ी और शासन परिवर्तन को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस तरीके से, “आतंकवाद पर जंगके नारे के साथ, अनेक देशों में फ़ौजी हमले, कब्जे़ और विनाश को जायज़ ठहराया है, जैसे कि अफ़गानिस्तान, इराक, लिबिया और सिरिया में।

हाल के वर्षों में, पाकिस्तान के शासक भी यह खुलेआम मान रहे हैं कि बीते दिनों में अमरीका के साथ सैनिक गठबंधन बनाना एक बड़ी भूल थी। उन्होंने यह माना है कि अमरीका को दूसरे देशों में अस्थायी हालतें पैदा करने के लिए, पाकिस्तान में आतंकवादी गिरोहों को स्थापित करने की इज़ाज़त दी गयी थी। पाकिस्तान के अन्दर बड़ी संख्या में लोग यह समझ रहे हैं कि अफ़गानिस्तान में अमरीका के जंग में पाकिस्तान का भाग लेना बहुत भारी ग़लती थी। वहां लोग अपनी सरकार से मांग कर रहे हैं कि देश में आतंकवादी गिरोहों पर कार्यवाही की जाए। लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान अमरीका के साथ अपने संबंधों को तोड़ दे। वे मांग कर रहे हैं कि पाकिस्तान की सरकार हिन्दोस्तान के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाने की कोशिश करे।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के लिए यह बहुत अच्छा मौका है कि कश्मीरी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों और आतंकवाद के सवाल समेत, सभी विवादास्पद मुद्दों को बातचीत के ज़रिये हल कर लिया जाए। हमारे दोनों देश इतनी विशाल-विशाल सेनाओं को बनाए रखने पर बहुत सारा धन-संसाधन खर्च करते हैं। अगर हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच स्थाई शांति होगी तो जंग और फ़ौजीकरण पर खर्च किये जा रहे क़ीमती संसाधन दोनों देशों के लोगों की सुख और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इस्तेमाल हो सकेंगे।

कश्मीर की समस्या एक राजनीतिक समस्या है जिसके राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों राज्य कश्मीरी लोगों के खुद अपना भविष्य तय करने के अधिकार को स्वीकार करें।

जो राजनीतिक ताक़तें कश्मीरी लोगों के अपने राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष को आतंकवाद बताती हैं और उन पर सेना के राजकीय आतंक को सही ठहराती हैं, वे इस समस्या के समाधान में कोई योगदान नहीं दे रही हैं। भूमिगत आतंकवादी गिरोहों की हरकतें और राजकीय आतंकवाद की नीति, दोनों ही समस्या के समाधान के रास्ते में रुकावटे हैं।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों को मिलकर कश्मीरी लोगों के एक राष्ट्र में जुड़ने के संघर्ष और अपने राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष के जनवादी समाधान की ओर काम करना होगा। इसके लिए अनिवार्य शर्त यह है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच में शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण संबंध हों। यह भी सच है कि जब तक कश्मीर की समस्या हल नहीं होती, तब तक हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच में स्थाई शांति नहीं हो सकती।

जो ताक़तें हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच की समस्याओं को हल करने के लिए अमरीका की मदद लेना चाहती हैं, वे बड़ी अदूरदर्शी हैं। अमरीका की रणनीति इस समस्या का बहुत बड़ा हिस्सा है। इसके समाधान में अमरीका की कोई भूमिका नहीं हो सकती। अमरीका हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को हमेशा ही आपस में लड़वाना चाहता है।

इस समय, अपनी एशिया धुर्री नीति के तहत, अमरीका चीन को घेरने, रूस को अलग करने और ईरान में शासन परिवर्तन करने के इरादे के साथ, सैनिक-रणनैतिक गठबंधन बना रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तानी राज्य को उनके सैनिक-रणनैतिक गठबंधनों में शामिल होने को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग खुद एशिया में एक बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त बनने के सपने देख रहा है। वह अमरीका के साथ सैनिक-रणनैतिक गठबंधन बनाकर इस सपने को पूरा करने की उम्मीद कर रहा है। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग वह सबक नहीं सीखना चाहता है, जो पाकिस्तान ने अमरीका के साथ गठबंधन बनाने से सीखा है।

देश के बंटवारे की कड़वी विरासत को ख़त्म करना है

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों देशों में बचपन से यही सिखाया जाता है कि पड़ोसी देश सबसे बड़ा दुश्मन है। दोनों देशों के शासक वर्ग हर रोज़ लोगों के मन में सांप्रदायिक जहर घोलते हैं। इस तरह हमारे दोनों देशों के शासक वर्ग लोगों की एकता को तोड़ते हैं और हमें अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ निकालने के रास्ते से भटका देते हैं।

देश के बंटवारे की इस कड़वी विरासत को ख़त्म करना होगा। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि हिन्दोस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश के लोग अपनी मातृभूमि के बंटवारे को नहीं चाहते थे। बंटवारा बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों का काम था।

बंटवारे की इस विरासत को ख़त्म करने के बजाय, हिन्दोस्तान का शासक वर्ग और उसकी मुख्य राजनीतिक पार्टियां बार-बार सांप्रदायिक जहर फैलाती रहती हैं और पाकिस्तान के लोगों के खि़लाफ़ नफ़रत भड़काती रहती हैं। हिन्दोस्तानी लोगों को इस रास्ते का विरोध करना होगा। असूल के तौर पर, हमें राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए बलप्रयोग का विरोध करना होगा।

कश्मीरी लोग अपने राष्ट्रीय अधिकारों की मांग कर रहे हैं और राजकीय आतंकवाद को ख़त्म करने की मांग कर रहे हैं। हिन्दोस्तानी राज्य को कश्मीरी लोगों की समस्या को लेकर, कानून और व्यवस्था की समस्या के जैसे बर्ताव नहीं करना चाहिए, बल्कि उनकी लम्बे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करना चाहिए।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों को राजकीय नीति बतौर आतंकवाद का प्रयोग करना बंद करना चाहिए। आतंकवाद के यंत्रों-तंत्रों को ख़त्म कर देना चाहिए। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों को अमरीका के साथ अपने-अपने सैनिक और खुफ़िया सहकार्यों को ख़त्म करना चाहिए और सी.आई.. को अपने-अपने इलाकों से आतंकवादी हमले करने की इज़ाज़त नहीं देनी चाहिए।

हिन्दोस्तानी सरकार को अमरीका के साथ अपने सैनिक-रणनैतिक संबंध को तोड़ देना चाहिए और दक्षिण एशिया में स्थाई शांति के लिए काम करना चाहिए।

हिन्दोस्तानी राज्य को आतंकवाद और कश्मीरी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों समेत सभी विवादास्पद मुद्दों पर, पाकिस्तान के साथ, बिना कोई पूर्वशर्त रखे, बातचीत करने को तैयार होना चाहिए।

दक्षिण एशिया में शांति बनाए रखने के लिए और इस इलाके के सभी लोगों की समस्याओं के स्थाई समाधान के लिए ये अत्यावश्यक शर्तें हैं।

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Mar 16-31 2019    Voice of the Party    War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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