17वीं लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर :

हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के संघर्ष को आगे बढ़ायें!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का आह्वान, 27 मार्च, 2019

साथियों और दोस्तों,

11 अप्रैल से 19 मई तक, लोकसभा के चुनाव होंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह दुनिया के सबसे महंगे चुनावों में से एक है। टाटा, बिरला, अंबानी और दूसरी हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां तथा विदेशी पूंजीवादी कंपनियां चुनाव मैदान में खड़ी मुख्य पार्टियों के अभियानों का समर्थन करने के लिए ढेर सारे पैसे डाल रही हैं।

 

Hindi_Sttatement on Election_2019हर राज्य में और पूरे हिन्दोस्तान में, पूंजीवादी पार्टियों के दो-तीन प्रतिस्पर्धी गठबंधन लोगों से वोट मांग रहे हैं। इन पार्टियों के बीते दिनों के काम से यह स्पष्ट है कि इन्होंने हमेशा ही उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को लागू किया है। इन्हीं के प्रवक्ता टी.वी. चैनलों पर बार-बार दिखते हैं। अन्य पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को पूरी तरह हाशिये पर रखा जाता है। 

टी.वी., सोशल मीडिया, गूगल-फेसबुक के विशाल डाटा-बेस और अंतर्राष्ट्रीय संचार एजेंसियों का भरपूर प्रयोग करके, यह प्रचार किया जा रहा है कि इस समय देश में सबसे बड़ी लड़ाई पूंजीवादी पार्टियों के दो गठबन्धनों के बीच में है। एक गठबंधन का नेता नरेन्द्र मोदी है और दूसरे का राहुल गांधी। यह एक गलत धारणा है।

असली बड़ी लड़ाई दो खेमों के बीच में है - एक खेमे में है शोषित-पीड़ित जनसमुदाय और दूसरे खेमे में है मुट्ठीभर पूंजीवादी शोषक।

करोड़ों मज़दूर और किसान बार-बार अपनी मांगों को लेकर, सड़कों पर उतर रहे हैं। मज़दूर न्यूनतम वेतन और अन्य मौलिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं। किसान अपने उत्पादों के लिए सुनिश्चित लाभकारी दाम मांग रहे हैं। वे बार-बार मांग कर रहे हैं कि किसानों की दुर्दशा की समस्या को संसद में उठाया जाए।

रेलवे, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अन्य जनसेवाओं के निजीकरण का बड़े पैमाने पर लोग विरोध कर रहे हैं। सब को शिक्षा, सब को रोज़गार - यह मांग उठाई जा रही है। महिलाओं के यौन उत्पीड़न को खत्म करने की मांग को लेकर देशभर में स्त्री-पुरुष आगे आ रहे हैं। उत्पीड़ित जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर लिंचिंग और दूसरे प्रकार की हिंसा का लोग जमकर विरोध कर रहे हैं।

मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को संगठित करने वाले कई लोग इन चुनावों में खड़े हो रहे हैं और पूंजीवादी पार्टियों के वर्चस्व को टक्कर दे रहे हैं। वे पीड़ित जनता की आवाज़ को संसद में उठाने के उद्देश्य से इन चुनावों में खड़े हो रहे हैं।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी पूंजीवादी हुकूमत के ख़िलाफ़ लोगों के संघर्षों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य के साथ, इन चुनावों में भाग ले रही है। राजनीति पर पूंजीवादी पार्टियों का दबदबा ख़त्म करने और लोगों की समस्याओं को केंद्र में लाने के लिए संघर्ष कर रहे सभी संगठनों और उम्मीदवारों के साथ हम कंधे से कंधा मिलकर खड़े हैं।

साथियों और दोस्तों,

हमारे हुक्मरानों को हिन्दोस्तान के डालर अरबपतियों की बढ़ती संख्या पर बहुत गर्व है। हमारे हुक्मरान बड़े घमंड के साथ ऐलान करते हैं कि हिन्दोस्तान दुनिया में एक बहुत बड़ी ताक़त बनने जा रहा है। परन्तु हक़ीक़त यह है कि देश की अधिकतम आबादी को पीने का साफ पानी, शौच व्यवस्था, सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सेवा, अच्छे स्कूल, आदि तक उपलब्ध नहीं हैं। माता-पिता की ग़रीबी की वजह से, करोड़ों-करोड़ों बच्चे खाली पेट सोते हैं और स्कूल नहीं जा पाते हैं।

हमारा देश अनमोल भौतिक और मानवीय संसाधनों से भरपूर है। हमारे मज़दूर, किसान और सभी मेहनतकश लोग अपनी मेहनत से बेशुमार दौलत पैदा करते हैं। लेकिन उस दौलत का सबसे बड़ा हिस्सा इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में मुट्ठीभर शोषकों की जेबों में जाता है। बारी-बारी से जो भी सरकार आती है, वह अर्थव्यवस्था के नित नए क्षेत्रों को देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की लूट के लिए खोल देती है।

समस्या की मुख्य वजह यह है कि सभी फैक्ट्रियों, खदानों, बैंकों, बीमा कंपनियों, विशाल व्यापार कंपनियों और टी.वी. चैनलों व अख़बारों की मालिकी और नियंत्रण एक मुट्ठीभर अति-अमीर तबके के हाथों में है। सरकारी मशीनरी और संसद में बैठी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों पर भी उन्हीं का नियंत्रण है।

वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और चुनाव प्रक्रिया उन मुट्ठीभर अति-अमीर शोषकों की हुकूमत को बरकरार रखने का ही काम करती है। हमारे शोषक चुनावों का इस्तेमाल करके, अपनी हुकूमत को “जनादेश” बताकर वैध ठहराते हैं और अपने आपसी अंतर्विरोधों को हल करते हैं। वे चुनावों का इस्तेमाल करके, लोगों को आपस में लड़वाते हैं और हमें अपने सांझे हितों व अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने से रोकते हैं।

पूरी राजनीतिक प्रक्रिया पर उन मुट्ठीभर शोषकों की पार्टियों का ही बोलबाला है। उम्मीदवारों का चयन करने में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती है। वोट डालने के बाद, चुने गए प्रतिनिधियों पर लोगों का कोई नियंत्रण नहीं होता है। चुने गए प्रतिनिधि चाहे कितने ही जन-विरोधी या अपराधी हों, उन्हें वापस बुलाने का लोगों के पास कोई तरीका नहीं है।

पूंजीपतियों की पार्टियां उत्पीड़ित जातियों का उद्धार करने के वादे करती हैं। परन्तु ये खोखले वादे हैं क्योंकि वर्तमान व्यवस्था जातिवादी पहचान को और मजबूत बनाती है। जाति के आधार पर भेदभाव और दमन को बरकरार रखा जाता है। पूंजीपति वर्ग की पार्टियां लोगों को जाति के आधार पर संगठित करती हैं और जातिवादी दुश्मनी भड़काती हैं। हर चुनाव क्षेत्र में जातिवादी गणना के अनुसार उम्मीदवारों का चयन किया जाता है। हर ऐसा प्रयास किया जाता है कि लोग आपस में लड़ते रहें और अपने सांझे शोषकों के ख़िलाफ़ एकजुट न हो पायें।

इसी प्रकार, महिलाओं को शोषण-दमन से मुक्त कराने के वादे भी खोखले हैं। वर्तमान व्यवस्था में काम की जगह पर व घर में महिलाओं का अतिशोषण बरकरार रखा जाता है। महिलाओं की भूमिका के बारे में बेहद पिछड़े रिवाज़ों और विचारों को ज़िंदा रखा जाता है। हर रोज़ महिलाओं को बलात्कार और दूसरे प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़ता है। अधिकतर ऐसे मामलों की रिपोर्ट भी नहीं दर्ज़ की जाती। महिलाओं पर हिंसा हमारे हुक्मरानों के हाथों में एक हथियार है जिसके ज़रिये वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं व सभी लोगों को कुचल देते हैं।

हमारे जीवन का अनुभव यह दिखाता है कि बार-बार किये गए चुनावों से हमारी हालतों में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी ले लेती है, परन्तु अर्थव्यवस्था की पूंजी-केन्द्रित दिशा नहीं बदलती है। सभी प्रकार के अत्याचार बद से बदतर होते जाते हैं। साल दर साल, कुछ मुट्ठीभर लोग और अमीर होते रहते हैं, जबकि मेहनतकश बहुसंख्या ग़रीब ही रह जाती है या और ग़रीब हो जाती है। जनसमुदाय की जायज़ मांगें कभी पूरी नहीं होतीं। हर निर्वाचित सरकार सिर्फ टाटा, बिरला, अंबानी व दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों की मांगों को ही पूरा करती है।

2019 के लोक सभा चुनावों में, बहुत से ऐसे उम्मीदवार खड़े हो रहे हैं, जो लोगों के मुद्दों को उठा रहे हैं। इससे यह दिखता है कि लोग वर्तमान व्यवस्था से बहुत ज्यादा नाखुश हैं। इससे यह दिखता है कि लोग अब इस व्यवस्था को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं, जिसमें बारी-बारी से पूंजीपतियों की एक पार्टी या दूसरी पार्टी की सरकार बनती है, परन्तु हमेशा बड़े पूंजीपतियों के जन-विरोधी कार्यक्रम को ही लागू किया जाता है। इससे यह दिखता है कि लोग खुद अपने हाथों में राज्य सत्ता लेना चाहते हैं, ताकि अपनी ज़रूरतों को पूरा कर सकें और इस शोषण-दमन को ख़त्म कर सकें।

साथियों और दोस्तों,

प्राचीन काल से इस उपमहाद्वीप के लोगों ने राजनीति के इस सिद्धांत को माना है कि राजा का काम है प्रजा को सुख और सुरक्षा दिलाना। हमारे पूर्वजों का यह मानना था कि अगर राज्य लोगों के प्रति अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता है, तो लोगों को पूरा अधिकार है कि उस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को उखाड़ फेंकें और एक ऐसा नया राज्य स्थापित करें जो सबको सुख और सुरक्षा दिलाएगा।

बहादुर शाह ज़फर, तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, नानासाहेब, आदि, जिन्होंने 1857 के महान ग़दर में लाखों-लाखों लोगों को प्रेरित किया था, उन्होंने ऐलान किया था “हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा!” उन्होंने विदेशी गुलामी और नियंत्रण से मुक्त एक नए हिन्दोस्तान का सपना देखा था। उन्होंने एक ऐसे हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष किया था जिसमें लोगों का राज होगा और सबको सुख और सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

लोगों को सत्ता में लाने के क्रांतिकारी संघर्ष को हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने आगे बढ़ाया। ग़दर पार्टी ने 1915 में एक विशाल क्रांतिकारी जनांदोलन आयोजित किया। उसके बाद, हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन और तमाम अन्य क्रांतिकारियों ने तथा अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों ने उस संघर्ष को और आगे बढ़ाया। परन्तु बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों के गठबंधन ने हमारे क्रांतिकारियों के उन उच्च लक्ष्यों के साथ विश्वासघात किया। उन्होंने उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन के साथ खिलवाड़ करके, खुद अपना राज स्थापित किया, जिसमें शोषण-दमन आज तक चलता आ रहा है।

1947 में विदेशी शासन ख़त्म हुआ लेकिन राजनीतिक सत्ता लोगों के हाथ में नहीं आयी। इसकी वजह से, बीते 71 वर्षों में, हिन्दोस्तानी लोगों के श्रम का अतिशोषण बद से बदतर होता रहा है। हमारी भूमि और अनमोल कुदरती संसाधनों की लूट भी बढ़ती जा रही है।

शहीद भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने ऐलान किया था कि :

“हिन्दोस्तान का संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक मुट्ठीभर लोग सत्ता में बैठकर, अपने लाभ के लिए, जनता की भूमि और संसाधनों का शोषण करते रहेंगे। शोषण करने वाले चाहे हिन्दोस्तानी हो या बरतानवी, या दोनों का गठबंधन, इस संघर्ष को कोई नहीं रोक सकेगा ...”

इस बात से कोई नहीं इंकार कर सकता है कि हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति आज भी हमारे देश के श्रम और संसाधनों का शोषण कर रहे हैं। हमारे जीवन का अनुभव बार-बार यही साबित करता है कि पूंजीवादी व्यवस्था सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती है। हमें आज की हालतों में, लोगों को सत्ता में लाने के उसी लक्ष्य के लिए संघर्ष करना होगा, जिसके लिए हमारे क्रांतिकारी शहीदों ने संघर्ष किया था। केवल ऐसा करके ही हम अपने श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण और लूट को ख़त्म कर सकेंगे। केवल ऐसा करके ही हम सभी प्रकार के अत्याचार को ख़त्म कर पायेंगे।

साथियों और दोस्तों,

हमें उत्पादन और विनिमय के मुख्य साधनों का सांझा मालिक बनना होगा। हमें बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों, खदानों, बैंकों और बीमा कंपनियों तथा घरेलू व विदेश व्यापार पर अपना नियंत्रण स्थापित करना होगा। जब हम इन सबके मालिक बन जायेंगे, तब हम सुनियोजित व समयबद्ध तरीके से, सभी भौतिक और मानव संसाधनों का इस्तेमाल करके, हर देशवासी के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे।

सर्वोच्च ताक़त को अपने हाथों में रखने के लिए, हमें एक नयी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें फै़सले लेने की ताक़त लोगों के हाथ में होगी, न कि पूंजीवादी शोषकों के आदेश पर चलने वाले मंत्रीमंडल के हाथों में। हमें निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने के तंत्र स्थापित करने होंगे। पूरी संसद या विधानसभा को सत्ता पक्ष और विपक्ष में बांटने के बजाय, सांझे तौर पर, लोगों के प्रति जवाबदेह और ज़िम्मेदार होना चाहिए। 

हमें एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया स्थापित करनी होगी जिसमें चुनाव अभियानों के लिए राज्य ही धन देगा। धन के और सभी स्रोतों पर रोक लगानी चाहिए। वोट डालने से पहले, लोगों को उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिये, कानून प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिये और जनमतसंग्रह के ज़रिये मुख्य सार्वजनिक फैसलों पर अपनी राय देने का अधिकार भी होना चाहिए।

यह हिन्दोस्तान के नव-निर्माण का कार्यक्रम है। यह जनता की हुकूमत को स्थापित करने और उसे लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाने का कार्यक्रम है। समाज के सभी सदस्यों को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने का यही एकमात्र रास्ता है। सदियों से चले आ रहे जातिवादी दमन और महिलाओं के शोषण को भी ख़त्म करने का यही एकमात्र रास्ता है।

साथियों और दोस्तों,

हुक्मरान वर्ग अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों पर बेरहम दमन को जायज़ ठहराने के लिए, “राष्ट्रीय सुरक्षा” का झंडा फहरा रहा है। लोगों के जायज़ संघर्षों को “राष्ट्र-विरोधी” बताया जा रहा है।

कश्मीर के लोगों को “राष्ट्रीय एकता का दुश्मन” बताया जा रहा है। असम, मणिपुर, नगालैंड और अन्य राज्यों के लोग, जो सैनिक शासन का विरोध कर रहे हैं और अपने जनवादी अधिकारों की मांग कर रहे हैं, उनको भी “राष्ट्रीय एकता का दुश्मन” बताया जा रहा है। आदिवासी समुदाय और वनवासी, जो बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधनों की लूट का विरोध कर रहे हैं, उन्हें “देश का विकास के दुश्मन” बताया जा रहा है।

अपने अधिकारों की मांग करने वाले लोगों को “देश के विकास का दुश्मन” या “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा” बताकर, हुक्मरान उन सभी पर क्रूर राजकीय आतंकवाद के प्रयोग को जायज़ ठहराते हैं। जन संघर्षों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है जैसे कि वे कानून और व्यवस्था की समस्या हैं। हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा की जा रही लूट का जो भी विरोध करता है, उसके वहशी दमन को जायज़ ठहराया जाता है। 

कांग्रेस पार्टी और भाजपा की अगुवाई में बारी-बारी से जो सरकारें आती रही हैं, उन सबने राजकीय आतंकवाद की नीति का पालन किया है। यह हमारे लोगों की एकता को कमजोर करने और देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाने के ख़तरे को बढ़ाने वाला प्रमुख कारक है।

ठीक इसी तरह, अंदरूनी असंतोष को बढ़ावा देकर और उसके साथ दांवपेच करके, अमरीका ने कई इलाकों में अपना हित साधने के लिए, शासन परिवर्तन किया है, कई राज्यों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है और यूरोप, एशिया व अफ्रीका के पूरे-पूरे इलाकों का राजनीतिक नक्शा ही बदल दिया है।

 

भाजपा या कांग्रेस पार्टी जब भी राष्ट्रीय हित की बात करती हैं, उनका असली मतलब होता है बड़े-बड़े पूंजीपतियों का खुदगर्ज़ हित। पूरे देश को लूटकर, सभी लोगों का शोषण करके, बड़े-बड़े देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की तिजौरियों को भरने के राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम के प्रति ये दोनों पार्टियां वचनबद्ध हैं।

देश के विभिन्न लोगों के अधिकारों और जजबातों को कुचल कर, हिन्दोस्तानी लोगों की एकता की रक्षा नहीं की जा सकती है।

हिन्दोस्तान में प्राचीन काल से, विभिन्न लोग बसे हुए हैं - पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल, ओड़िया, आदि। सभी लोगों के अधिकारों को मान्यता देकर और संप्रभु लोगों का सहकारी संघ बनाकर ही स्थाई हिन्दोस्तान बनाया जा सकता है।

देश में बसे विभिन्न लोगों का स्वेच्छाकारी संघ बनाना होगा। हमारे लोगों की एकता को मजबूत करने और राष्ट्रीय संप्रभुता को सभी अंदरूनी व बाहरी ख़तरों से बचाने का यही एकमात्र तरीका है।

साथियों और दोस्तों,

कॉर्पोरेट मीडिया जंग के ढोल पीट रही है और पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के लिए पाकिस्तान से बदला लेने का ज़ोर-शोर से प्रचार कर रही है। मंत्री और टी.वी. न्यूज एंकर हर रोज भड़काऊ बयान देते रहते हैं, पाकिस्तान पर बम बरसाने और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की धमकी देते रहते हैं। हुक्मरान वर्ग चाहता है की लोग इसी वाद-विवाद में फंसे रहें कि भाजपा या कांग्रेस पार्टी में से कौन पाकिस्तान को बेहतर जवाब दे सकती है।

भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों देश की संप्रभुता की हिफ़ाज़त करने का दावा करती हैं, लेकिन दोनों ही अमरीका के साथ सैनिक-रणनैतिक गठबंधन बनाने के पक्ष में हैं। अमरीका वह महाशक्ति है जो एशिया के सभी राष्ट्रों की संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों ‘आतंकवाद पर जंग’ का नारा देती हैं, परन्तु दोनों इस बात पर पर्दा डालती हैं कि अमरीका दुनिया में आतंकवादी गिरोहों का सबसे बड़ा संगठनकर्ता है।

अमरीकी शासक वर्ग आतंकवादी गिरोहों का इस्तेमाल करके, दूसरे देशों में अस्थायी हालतें पैदा करता है और उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देता है। उसने आतंकवाद का इस्तेमाल करके, पड़ोसी देशों को आपस में लड़वाया है। ‘आतंकवाद पर जंग’ के झंडे तले, अमरीका ने कई देशों पर हथियारबंद हमले किये हैं और उन पर कब्ज़ा किया है। इस समय अमरीका हिन्दोस्तान को पाकिस्तान और चीन के ख़िलाफ़ करके, पूरे एशिया पर अपना वर्चस्व जमाना चाहता है।

अमरीका को वफादार मित्र मानना और पाकिस्तान व हिन्दोस्तान के बीच में झगड़े भड़काना - यह एशिया के लोगों की एकता और इस इलाके में शांति के लिए बहुत ख़तरनाक रास्ता है। हमारे देश के लोगों और एशिया के सभी लोगों के हित में यही होगा कि हमारी सरकार अमरीकी जंग की मशीनरी का समर्थन करना बंद करे। इसके बजाय, हमारी सरकार को इस इलाके में बाहरी ताक़तों की दख़लंदाज़ी के ख़िलाफ़, दक्षिण एशिया और सम्पूर्ण एशिया के देशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनाने की नीति अपनानी चाहिए।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच में जंग हमारे दोनों देशों के मज़दूरों और किसानों के हितों के ख़िलाफ़ है। जंग में दोनों देशों के सैनिक और आम लोग ही मारे जायेंगे। हमारे दोनों देशों के लोगों के हित में यही है कि हम अपनी-अपनी सरकारों को कश्मीर और आतंकवाद की समस्याओं समेत सभी विवादास्पद मुद्दों पर बिना शर्त बातचीत करने को बाध्य करें।

साथियों और दोस्तों,

शासक वर्ग और उसके नियंत्रण में मीडिया शोषकों की प्रतिस्पर्धी पार्टियों में से किसी को सांप्रदायिक तो किसी को धर्मनिरपेक्ष बताकर, लोगों को उनके बीच में से चुनने को कहती हैं।

निर्वाचन आयोग में पंजीकृत सभी पार्टियों को धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेनी पड़ती है। लेकिन अगर उनके कार्यों को देखा जाए, तो इस पर कोई दो राय नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों ही सांप्रदायिक हैं। वे धर्म और जाति के आधार पर लोगों को लामबंध करती हैं और अपने-अपने वोट बैंक बनाती हैं। राज्य द्वारा आयोजित, बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा फैलाने में उन दोनों का घिनावना इतिहास है।

जिस प्रकार से बार-बार सांप्रदायिक हिंसा आयोजित की जाती है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह समस्या सिर्फ कुछेक “सांप्रदायिक” पार्टियों तक सीमित नहीं है। वास्तव में वर्तमान राजनीतिक सत्ता पूरी तरह सांप्रदायिक है। कानून और सरकारी संस्थान लोगों को धर्म के आधार पर बांटते हैं और उनके साथ भेदभाव करते हैं। समाज के सभी सदस्यों को ज़मीर का अधिकार, एक अलंघनीय अधिकार बतौर नहीं दिया जाता है। बरतानवी उपनिवेशवादी परंपरा के अनुसार, हिन्दोस्तान का संविधान लोगों को धर्म के आधार पर बांटता है।

पूंजीपति वर्ग ‘बांटो और राज करो’ के अपने पसंदीदा हथियार के सहारे मज़दूर वर्ग, किसानों और दूसरे मेहनतकशों पर अपनी हुकूमत को बरकरार रखता है। हाल के वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बहुत तेज़ गति से हो रही हैं तथा नए-नए तरीकों से आयोजित की जा रही हैं। इसका यह कारण है कि पूंजीपति वर्ग गहरे संकट में है और लोगों का असंतोष बहुत बढ़ गया है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी लोगों से आह्वान करती है कि सभी के अधिकारों के लिए संघर्ष में एकजुट होकर, ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति का मुंहतोड़ जवाब दें। हमें ज़मीर के अधिकार - यानी हर इंसान के अपने विचारों का पालन करने के अधिकार - की हिफ़ाज़त में एकजुट होना होगा। साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा को ख़त्म करने के लिए, हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लक्ष्य के साथ, हमें अपने संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

साथियों और दोस्तों,

पूंजीपति वर्ग की प्रातिस्पर्धी पार्टियां एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही हैं। उनमें से कुछ तो यह भी दावा करती हैं कि वे भ्रष्टाचार पर जंग कर रही हैं। परन्तु बीते 71 वर्षों का अनुभव यही दिखाता है कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था और उसे बारी-बारी से चलाने वाली सारी राजनीतिक पार्टियां ऊपर से नींचे तक भ्रष्ट हैं।

हमारे देश में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ है और आजकल बहुत बढ़ गया है क्योंकि पूंजी बहुत ही थोड़े हाथों में संकेंद्रित होती जा रही है।

सबसे बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों, उनकी वफ़ादार पार्टियों, मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों और बड़े-बड़े बैंकों के वरिष्ठ मैनेजरों के बीच में बहुत निकट संबंध है। इजारेदार पूंजीवादी घराने अपनी विश्वसनीय पार्टियों को खूब धन देते हैं ताकि ये पार्टियां सत्ता में आकर उनकी सेवा करें। इजारेदार पूंजीवादी घराने मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देते हैं, ताकि और आसानी से राजकोष को लूट सकें और अपनी तिजौरियां भर सकें।

यह कोई पहली बार नहीं है कि पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियां भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रही हैं। 70 के दशक में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में एक भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन चला था। 80 के दशक के आखिरी सालों में, वी.पी.सिंह की अगुवाई में एक और भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन चला था। 2012 में हमने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक और आंदोलन देखा था, जिसके बाद 2014 में भाजपा की जीत हुई थी।

भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों से भ्रष्टाचार की गहराई और विस्तार पर कोई असर नहीं पड़ा है। जैसे-जैसे इजारेदार पूंजीवादी घरानों और विदेशी साम्राज्यवादियों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने अपनी आपसी लड़ाइयों के लिए भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों का इस्तेमाल किया है। साम्राज्यवादी ताक़तों ने भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों का इस्तेमाल करके, हमारे देश में अपनी दख़लंदाज़ी को खूब बढ़ा दिया है।

वर्तमान पूंजीवादी हुकूमत की व्यवस्था के चलते, भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं किया जा सकता है। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष शोषण और लूट के ख़िलाफ़ संघर्ष का ही हिस्सा है। यह हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के संघर्ष का हिस्सा है।

साथियों और दोस्तों,

ये चुनाव हमारे इतिहास की एक निर्णायक घड़ी पर हो रहे हैं। हमारे हुक्मरान अपने तंग, खुदगर्ज़ हितों के लिए, देश को बेहद ख़तरनाक रास्ते पर खींच ले जा रहे हैं। हमारे हुक्मरान लोगों की एकता को तोड़ने पर तुले हुए हैं, ताकि हमारे श्रम और संसाधनों का अति-शोषण जारी रख सकें। हमारे पड़ोसी देशों के साथ जंग में फंस जाने का ख़तरा भी मंडरा रहा है। इस हुक्मरान वर्ग के हाथों में हमारे देश का भविष्य बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी कम्युनिस्टों, सभी प्रगतिशील ताक़तों और सभी देशभक्त हिन्दोस्तानियों से आह्वान करती है कि एकजुट होकर, हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के इस ख़तरनाक रास्ते का विरोध करें।

आइये, हम सभी के अधिकारों की हिफ़ाज़त में एकजुट हो जायें। एक ऐसी नयी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने के लक्ष्य के साथ एकजुट हो जायें, जिसमें फैसले लेने का अधिकार लोगों के हाथ में होगा और सभी मानव अधिकार व जनवादी अधिकार सुनिश्चित होंगे। लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हो जायें। शांति सुनिश्चित करने और साम्राज्यवादी ताकतों की जंग फरोश योजनाओं को हराने के उद्देश्य से, हिन्दोस्तान की विदेश नीति और दूसरे देशों के साथ संबंधों को नयी दिशा दिलाने के लिए, एकजुट हो जायें। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हो जायें।

आइये, हम उन उम्मीदवारों को वोट देकर जितायें, जो हमारे अधिकारों के लिए और हमारे हाथों में राज्य सत्ता लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं!

आइये, उन उम्मीदवारों को चुनकर लोकसभा में भेजें, जो हमारी आवाज़ को उठाएंगे!

आइये, चुनाव के मैदान में उतरकर, पूंजीवादी पार्टियों के झूठे प्रचार को टक्कर दें, ताकि राजनीति पर उनका बोलबाला ख़त्म हो और हिन्दोस्तान के नव-निर्माण का संघर्ष आगे बढ़े!

वतन के लोगों की है यह मांग, हिन्दोस्तान का नव-निर्माण!

बांटो और राज करो’ की राजनीति को हराएं!

हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मज़दूर, किसान, औरत और जवान! 

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17वीं लोकसभा चुनावों    उदारीकरण    निजीकरण    भूमंडलीकरण    Apr 1-15 2019    Statements    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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