महाराष्ट्र में सूखा : शासक वर्ग की पार्टियों की गुनहगार लापरवाही का नतीजा

“2019 तक महाराष्ट्र सूखा-मुक्त हो जाएगा।” यह ऐलान चार साल पहले 9 मार्च, 2015 को महाराष्ट्र की नव-निर्वाचित भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने किया था। गंभीर सूखे से परेशान किसानों और गांवों के लोगों के दबाव तले मजबूर होकर सरकार ने महाराष्ट्र को “सूखा-मुक्त” करने के लिए “जलयुक्त शिविर अभियान” की घोषणा की। लेकिन राज्य में एक बार फिर 2019 में भी गंभीर सूखे की हक़ीक़त से पता चलता है कि सरकार ने यह दिखावा केवल लोगों का बेवकूफ बनाने के लिए किया था।

Drought in Maharashtra

 

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2018 में मानसून के दौरान राज्य के बड़े हिस्से में अपर्याप्त मात्रा में बरसात होने की वजह से, नवंबर 2018 में महाराष्ट्र सरकार कुल 355 तालुकों में से 151 को सूखा प्रभावित घोषित करने को मजबूर हो गयी। लेकिन केवल 2 ही महीनों के भीतर सरकार को 8 जिलों में 931 से अधिक गांवों को सूखा प्रभावित घोषित करना पड़ा। अब यह अनुमान लगाया जा रहा है कि राज्य के कुल 85.76 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से 60 प्रतिशत से अधिक भूमि गंभीर रूप से सूखे से प्रभावित हुई है, जिसके चलते 82 लाख से अधिक किसान बर्बाद हो गए हैं। 2016 में पड़े सूखे ने खास तौर से मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों को प्रभावित किया था। लेकिन, इस बार महाराष्ट्र के सभी जिले भयंकर सूखे से प्रभावित हुए हैं।

कई वर्षों से महाराष्ट्र पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों ही की सरकारें सूखे से पीड़ित लाखों किसानों की दुर्दशा की प्रति पूरी तरह से लापरवाह रही हैं। वे इस बात को बखूबी जानती हैं कि हर 3-4 वर्षों में राज्य को सूखे का सामना करना पड़ता है, जैसे कि - 2002, 2004, 2009, 2015, 2016 में हुआ था और अब 2018-19 में हुआ है, लेकिन उन्होंने इसका हल निकालने के लिए कोई भी ठोस क़दम नहीं उठाये।

वर्ष 2012 से लेकर आज तक लगभग हर साल महाराष्ट्र को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। सूखे के कारण, फ़सलों के नुकसान और कर्ज़ के कुचक्र में फंसने की वजह से किसान बहुत बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले एक दशक में राज्य में किसानों की सबसे अधिक आत्महत्याएं हुई हैं। एक आर.टी.आई. (राईट टू इनफार्मेशन) के जवाब से मिली जानकारी से पता चलता है कि 2015 और 2018 के बीच 11,598 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। 2011 और 2014 के बीच दर्ज़ की गई 6,268 आत्महत्याओं की तुलना में यह भारी बढ़ोतरी है। विभिन्न रिपोर्टों और किसानों की यूनियनों के दावों के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से लगभग 1,25,000 किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि आत्महत्याओं की संख्या राज्य के सभी इलाकों में बढ़ रही है। इससे पहले, अधिकांश मामले पश्चिमी विदर्भ में सामने आए थे। लेकिन, अब मराठवाड़ा के किसान भी आत्महत्या कर रहे हैं। आम तौर पर समृद्ध समझे जाने वाले पश्चिमी महाराष्ट्र को भी पिछले तीन वर्षों में इस संकट का सामना करना पड़ा है।

महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर बांध बनाये गए हैं, लेकिन उनकी देखरेख में लापरवाही की वजह से अब वे लोगों के लिये किसी काम के नहीं हैं। 20 फरवरी, 2019 तक, राज्य के सभी बांधों में उनकी क्षमता की तुलना में केवल 35 प्रतिशत ही पानी था, जबकि पिछले साल यह 51 प्रतिशत था! विदर्भ और मराठवाड़ा के बांधों का सबसे बुरा हाल है और उनमें क्रमशः क्षमता का केवल 18 प्रतिशत और 9 प्रतिशत पानी है। इसका यह मतलब है कि आने वाले महीनों में पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं होगा!

इस साल सूखा इतना गंभीर है कि मवेशियों के लिए चारे की कमी के कारण, किसानों को अपने मवेशियों को बेहद कम दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, लगभग 70,000 रुपए के दाम वाली एक गाय को संकट के समय पर किसान केवल 23,000 रुपए से भी कम दाम पर बेचने को मजूबर हैं। राज्य सरकार ने बहुत कम चारा शिविर खोले हैं और वे भी केवल बड़े मवेशियों के लिए हैं। किसानों और गांव वालों से उम्मीद की जाती है कि वे भेड़ और बकरी जैसे छोटे जानवरों की देखभाल खुद करें, जैसे कि इन छोटे जानवरों को चारे की ज़रूरत नहीं है! छोटे और सीमांत किसान, जो महाराष्ट्र में बहुसंख्या में हैं, केवल ऐसे छोटे जानवरों को ही पाल पाते हैं। सरकार की चारा शिविर नीति के कारण वे सबसे ज्यादा मुसीबत में हैं। वे अपनी बकरी या भेड़ को 4,000 रुपए से भी कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं, जबकि उनको 15,000 रुपए से अधिक दाम देकर खरीदा गया था। एक बार जब वे अपने मवेशियों को बेच देते हैं, तो कुछ साल बाद फिर से मवेशियों को खरीदना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है। इस प्रकार कर्ज़ का कुचक्र चलता ही रहता है! महाराष्ट्र सरकार ने अभी भी सारे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारा शिविर नहीं खोले हैं, जबकि नवंबर में ही सूखे का अनुमान लगाया जा चुका था।

केंद्र सरकार भी महाराष्ट्र के लोगों के प्रति बेहद लापरवाह रही है। दिसंबर 2018 में, राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में से केवल 7,961 करोड़ रुपये जारी करने का अनुरोध किया! लेकिन केंद्र सरकार ने सूखा राहत सहायता के लिये केवल 4,714 करोड़ रुपये ही जारी किए, जबकि बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों के लाखों-करोड़ों रुपयों की कर्ज़ माफ़ी करने में उसने पलकें तक नहीं झपकाई!

इस वर्ष मार्च में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट में किसानों के प्रति राज्य सरकार की लापरवाही एक बार फिर देखने को मिली। जबकि बजट में बड़े उद्योगों की स्थापना के लिए बड़े पूंजीपतियों के लिए बनायी गयी नई औद्योगिक नीति के तहत 16,000 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशी की घोषणा की, लेकिन सूखा प्रभावित किसानों के लिए केवल 200 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया!

यह हालात न केवल किसानों और खेत मज़दूरों के लिए, बल्कि महाराष्ट्र के सभी मेहनतकश लोगों के लिए बेहद गंभीर है क्योंकि इससे कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आएगी, जिसके चलते सभी खाद्य पदार्थों की क़ीमतें बढ़ जाएंगी।

मौके का फ़ायदा उठाते हुए कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ग्रामीण लोगों को लुभाने की कोशिश कर रही हैं। इन पार्टियों के नेता किसानों से कह रहे हैं कि यदि उन्होंने उनकी पार्टी को वोट दिया, तो वे  उनको तमाम समस्याओं से मुक्त करे देंगे। लेकिन, क्या किसान इस हक़ीक़त को भुला सकते हैं कि इसी कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में रहते हुये किसानों के हितों की रक्षा के लिये कुछ भी नहीं किया था? वास्तव में केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बनायी गयी सरकारों ने किसानों को संकट में डालने वाली कई नीतियां लागू की थीं।

न तो किसान और न ही अन्य मेहनकश लोग पूंजीपतियों की किसी भी पार्टी पर भरोसा कर सकते हैं। उन्हें इन पार्टियों के चुनावी खेल में मोहरा बनने से इंकार करना होगा।

मानसून पर किसानों की निर्भरता को कम करने की ज़रूरत है। जल संसाधनों के उचित उपयोग और उनकी हिफ़ाज़त के लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी के ज़रिये और पानी की बचत करने वाले खेती करने तरीकों के ज़रिये यह हासिल किया जा सकता है। पूंजीवादी हितों की सेवा करने वाली यह मौजूदा व्यवस्था मज़दूरों और किसानों के हितों में सुनियोजित रूप से काम करने में पूरी तरह से असमर्थ है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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