जलियांवाला बाग के हत्याकांड के सौ साल बाद : हिन्दोस्तानी लोगों का अपराधपूर्ण जनसंहार

100 साल पहले, 13 अप्रैल, 1919 को, हमारे लोगों पर बरतानवी उपनिवेशवादी शासकों द्वारा किये गए अत्याचारों के सिलसिले में एक बेहद दर्दनाक काण्ड हुआ था। उस दिन, हजारों निहत्थे लोग एक बंद जगह पर, बरतानवी हुक्मरानों के जन-विरोधी क़दमों की खि़लाफ़त कर रहे थे। बरतानवी अफ़सर डायर की अगुवाई में एक सेना ने उन पर बेरहमी से गोलियां बरसाई थीं। वह काण्ड बदनाम जलियांवाला बाग का हत्याकांड था। 1857 के बाद, बरतानवी उपनिवेशवादी हुकूमत की बर्बरता उस काण्ड के साथ नयी ऊंचाइयों तक पहुंच गयी। उससे कुछ ही समय पहले, उपनिवेशवादी हुक्मरानों ने ऐलान किया था कि वे हिन्दोस्तानी लोगों को अपनी “ज़िम्मेदार सरकार” बनाने की इजाज़त देंगे। जलियांवाला बाग के हत्याकांड से बरतानवी हुक्मरानों का कपट स्पष्ट हो गया। उस भयानक हत्याकांड की वजह से, देश-विदेश में हिन्दोस्तानी लोगों के अन्दर इतना गुस्सा पैदा हुआ कि उपनिवेशवाद-विरोधी आन्दोलन तेज़ी से आगे बढ़ गया।

उस दिन को याद करते हुए, मज़दूर एकता लहर जलियांवाला बाग के शहीदों को और उन सभी को सलाम करती है, जिन्होंने हिन्दोस्तान पर बर्बर बरतानवी शासन को ख़त्म करने के लिए कुरबानी दी थी।

जलियांवाला बाग का हत्याकांड एक अकेला आदमी, डायर का किया हुआ एक आकस्मिक हादसा नहीं था। वह बरतानवी हुक्मरानों की सुनियोजित नीति का हिस्सा था। बरतानवी हुक्मरानों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, यह ठान लिया था कि वे हिन्दोस्तानी लोगों को फिर कभी बग़ावत नहीं करने देंगे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, बरतानवी शासन से हिन्दोस्तानी लोग बहुत दुखी हो गए थे। बरतानवी हुक्मरानों को यह डर लगने लगा कि 1857 की तरह फिर से बग़ावत न हो जाये। हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी की बरतानवी हुकूमत को बलपूर्वक गिराने की कोशिशों ने बरतानवी हुक्मरानों की नींद हराम कर रखी थी। बरतानवी हिन्दोस्तानी सेना के सिपाहियों और किसानों व प्रगतिशील बुद्धिजीवियों में ग़दर पार्टी का बहुत समर्थन था।

हमारे देश के बड़े पूंजीपति और बड़े जमींदार, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बहुत उत्साह के साथ, बरतानवी साम्राज्यवाद के पक्ष में लड़े थे। वे युद्ध के उद्योग से बहुत मुनाफे़ कमाते थे और बरतानवी सेना के लिए सिपाहियों को भर्ती करते थे। परन्तु देश के मज़दूरों और किसानों को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा था। बड़े पूंजीपति और बड़े ज़मींदार उपनिवेशवादियों के साथ मिलकर सत्ता चलाने की कोई नयी व्यवस्था लाने की कोशिश कर रहे थे जिसमें उन्हें, बरतानवी उपनिवेशवादियों को युद्ध में समर्थन देने के बदले में, अपनी कांग्रेस पार्टी के ज़रिये, सत्ता का कुछ ज्यादा हिस्सा मिलने की उम्मीद थी।

उपनिवेशवादियों ने हिन्दोस्तानी लोगों के संघर्ष के साथ दो अलग-अलग प्रकार के बर्ताव किये। एक तरफ, उन्होंने बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों तथा उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों को सत्ता का ज्यादा हिस्सा देकर, अपने पक्ष में लाने की कोशिश की। दूसरी तरफ, उपनिवेशवादी गुलामी से सम्पूर्ण मुक्ति चाहने वाले जनसमुदाय पर उन्होंने वहशी राजकीय आतंक का प्रयोग किया।

जब प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने वाला था, तब बरतानवी उपनिवेश्वादियों ने मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की। उन सुधारों को बाद में भारत सरकार अधिनियम 1919 के रूप में संहिताबद्ध किया गया था। उन सुधारों के अनुसार, प्रांतीय विधानसभाओं में हिन्दोस्तानी सरमायदारों के प्रतिनिधियों को बहुत ही सीमित ताक़त दी जा रही थी। हिन्दोस्तानी सरमायदारों ने अपनी पार्टी, कांग्रेस पार्टी, के माध्यम से जो-जो मांगें रखी थीं, उनसे बहुत कम ही उनको मिला। साथ ही साथ, उपनिवेशवादी हुक्मरानों ने अपने शासन के खि़लाफ़ हर प्रतिरोध को कुचलने के लिए, मार्च 1919 में ‘अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम’ (जो रावलेट एक्ट के नाम से जाना जाता था) को लागू किया। रावलेट एक्ट में, बिना वारंट गिरफ़्तारी, बिना मुकदमा अनिश्चितकालीन कैद, राजनीतिक अपराधों के लिए कैमरा-में-मुकदमा और कई अन्य कठोर दंडों के प्रावधान थे, ताकि बरतानवी हुकूमत के किसी भी प्रकार के राजनीतिक विरोध को दबा दिया जा सके।

विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान, हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने साफ-साफ समझाया था कि उपनिवेशवादियों से भीख मांगकर और उपनिवेशी परिषदों में बैठकर, आज़ादी की उम्मीद करना बड़ी बेवकूफी थी। बरतानवी उपनिवेशवादियों ने जो सुधार लागू किये थे, उनसे देशभक्त लोग समझने लगे कि ग़दरियों की सीख सही है। रावलेट एक्ट के लागू होने से लोगों का गुस्सा और भी बढ़ गया। लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल आये।

पंजाब में बरतानवी हुकूमत और रावलेट एक्ट का बहुत बड़े पैमाने पर विरोध किया जा रहा था। ओ ड्वायर की उपनिवेशवादी सरकार ने कई दमनकारी क़दम लिए। उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के दो जाने-माने नेताओं, डाक्टर सत्यपाल और डाक्टर सैफुद्दीन किचलू को देश से निकाल दिया गया। अमृतसर में 10 अप्रैल को 50,000 से अधिक लोगों के विरोध प्रदर्शन पर फ़ौज ने गोली चलायी। कई दर्जनों लोग मारे गए और घायल हुए। इससे लोगों का गुस्सा और भी तेज़ हो गया। जालंधर में बरतानवी सेना के प्रधान अफ़सर डायर को अमृतसर बुलाया गया। 12 अप्रैल को उन्होंने कफ्र्यू लगा दिया और सभी सभाओं व जन प्रदर्शनों पर रोक लगा दी।    

इसके बावजूद, अगले दिन, बैसाखी के दिन, 15,000-20,000 लोग जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए। उन्होंने रावलेट एक्ट और 10 अप्रैल की गोलीबारी की भत्र्सना करते हुए, दो प्रस्ताव पारित किये। जैसे ही लोग सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करने के बारे में एक और प्रस्ताव पारित करने वाले थे, तो ठीक उसी समय पर डायर अपनी फ़ौज को लेकर पहुंचा और बाग से बाहर निकलने के एकमात्र रास्ते को बंद कर दिया।

बर्बर फ़ौज ने लगातार 20 मिनट तक, गोलियां ख़त्म होने तक, जनसभा पर गोलियां चलायीं। उन्होंने दीवारों पर चढ़कर बच निकलने की कोशिश करने वाले लोगों को भी नहीं बख्शा। गोलियों से अपनी जान बचाने के लिए सौ से अधिक लोग एक कुएं में कूद पड़े और मारे गए। दर्जनों घायल लोगों को जान से हाथ धोने पड़े क्योंकि उन्हें अस्पताल ले जाने की इजाज़त नहीं दी गयी। कुल मिलाकर, 1000 से अधिक लोग मारे गए और 1500 से अधिक लोग घायल हुए।

वह हत्याकांड इतना भयानक था कि उसे देखने वाले उसे कभी न भुला सके। शहीद उधम सिंह ने जवानी में उस हत्याकांड को देखा था। 20 साल बाद, उधम सिंह ने लन्दन जाकर, एक जनसभा में ओ ड्वायर पर गोली चलायी और उसे मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया। इसके लिए उधम को फांसी दी गयी। महान शहीद भगत सिंह उस हत्याकांड से बहुत दुखी हुए थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय वे बालक मात्र थे। उन्होंने वहां से थोड़ी सी खून से सींची हुयी मिट्टी उठा ली थी और कई सालों तक उसे अपने पास रखा था।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के खि़लाफ़ देशभर में विरोध की आवाज़ उठी। उसके दो दिन बाद, गुजरांवाला में एक विरोध प्रदर्शन पर मशीन गन और विमानों से हमला किया गया। कई दर्जन लोग मारे गए। पूरे पंजाब पर सैनिक शासन लागू किया गया।

बरतानवी सरकार ने खुद को बदनामी से बचाने के लिए और हत्याकांड पर लीपापोती करने के लिए, हंटर जांच आयोग को नियुक्त किया। आयोग की जांच के दौरान पता चला कि डायर को उस हत्याकांड पर बिलकुल भी पछतावा नहीं था। उसने आयोग को खुद बताया कि उसका मक़सद सिर्फ सभा को भंग करना नहीं था। उसका मक़सद ज्यादा से ज्यादा आतंक फैलाना और लोगों को सबक सिखाना था।   

उस भयानक जनसंहार के लिए किसी को सज़ा नहीं दी गयी। पंजाब के लेफ्टनेंट गवर्नर ओ ड्वायर, जिसने डायर के काम को “सही” ठहराकर उसकी सराहना की थी, उसने हिन्दोस्तान में अपना पूरा सेवाकाल ख़त्म किया और ब्रिटेन वापस गया, परन्तु अंत में उसे उधम सिंह के हाथों अपने कुकर्मों की सज़ा मिली। कातिल डायर को भी अपना पूरा सेवाकाल ख़त्म करने और बेरोकटोक ब्रिटेन वापस जाने की छूट दी गयी, हालांकि उसे “अनावश्यक” फैसलों के लिए हल्की सी डांट खानी पड़ी थी। ब्रिटेन में उसके समर्थकों ने इसे भी बहुत कठोर माना और उसकी राहत के लिए खूब धन इकट्ठे किये।

जलियांवाला बाग के हत्याकांड और उसके बाद की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिन्दोस्तान में बरतानवी हुकूमत पूर्ण रूप से अवैध थी। वह हुकूमत वहशी बल प्रयोग और लोगों के जीने के अधिकार व सारी आज़ादियों को नकारने पर आधारित थी। उस फैलाये गए झूठ का भी पर्दाफ़ाश हुआ कि बरतानवी हुक्मरान हिन्दोस्तानी लोगों को “सभ्यता सिखाने” के लिए यहां राज कर रहे थे। बरतानवी उपनिवेशवादी राज्य दमन और लूट का यन्त्र था। उसके तमाम तंत्र - पुलिस, सेना, अफ़सरशाही, न्याय व्यवस्था और “प्रतिनिधित्व परिषद” - सभी हिन्दोस्तानी लोगों को लूट कर कुचल रहे थे। 

जलियांवाला बाग के हत्याकांड से हमारे लोग और अच्छी तरह समझ गए कि इन असहनीय हालातों को ख़त्म करने का एक ही रास्ता है। उपनिवेशवादी शासन का तख्तापलट करना होगा और हमें अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी। एक नए राज्य की स्थापना करनी होगी, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से पूरी तरह नाता तोड़ना होगा। इस लक्ष्य से प्ररित होकर, उसके बाद के वर्षों में, हमारे देशभक्तों और क्रांतिकारियों ने अनेक संगठन बनाए और आन्दोलन चलाये, जैसे कि हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी। इन संगठनों को हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी और रूस की महान अक्तूबर क्रांति से प्रेरणा और सीख मिली। रूस की महान अक्तूबर क्रांति ने साम्राज्यवाद का तख्तापलट करके, दुनिया के प्रथम मज़दूर-किसान के राज्य की स्थापना की थी।

हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों तथा कांग्रेस पार्टी व मुस्लिम लीग में उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों ने क्रांतिकारियों के रास्ते को ठुकरा दिया। उन्होंने बरतानवी हुक्मरानों के साथ सौदा किया, ताकि उपनिवेशवादी हुकूमत को बरकरार रखते हुए, उसके अन्दर हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपतियों और जमींदारों को सत्ता का कुछ ज्यादा हिस्सा मिले। उन्होंने उपनिवेशवादियों के साथ समझौता करके, बरतानवी हुक्मरानों के खि़लाफ़ जनसमुदाय के संघर्षों को कुचल डाला। उन्होंने उपनिवेशवादियों के साथ समझौता करके, देश के सांप्रदायिक बंटवारे में उनका साथ दिया।

अगस्त 1947 में राज्य सत्ता हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों को मिली। उन शोषक वर्गों ने दमनकारी राज्य तंत्र समेत पूरी उपनिवेशवादी विरासत को बरकरार रखने का फैसला किया, क्योंकि वह राज्य तंत्र उपनिवेशवादियों की लूट-खसोट की हुकूमत के लिए बहुत उपयोगी साबित हो चुका था।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग उपनिवेशवादी हुक्मरानों के रास्ते पर ही चल रहे हैं। लोगों के संघर्षों के साथ गद्दारी करने वालों को पुरस्कार दिये जाते हैं। अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लोगों पर वहशी राजकीय आतंक का प्रयोग किया जाता है। आज़ाद हिन्दोस्तान में, रावलेट एक्ट के ही नमूने पर कई फासीवादी कानून बनाए और लागू किये गए हैं। आज भी हिन्दोस्तान में हजारों-हजारों लोग राज्य द्वारा आयोजित हिंसा में मारे जाते हैं, पुलिस या फ़ौज की गोलियों से या फिर, राज्य के संरक्षण में काम करने वाले अपराधी गुंडों के हाथों। इस हिंसा का मक़सद है सत्ता का विरोध करने वालों को डरा-धमका कर रखना। आज भी, राज्य द्वारा आयोजित इन हत्याकांडों के लिए किसी को सज़ा नहीं दी जाती। लेकिन अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे, कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य जगहों के हजारों नौजवानों को ‘आतंकवादी’ करार दिया जाता है और उत्पीड़ित किया जाता है।

हमें अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी और वर्तमान हिन्दोस्तानी राज्य की जगह पर एक नया राज्य स्थापित करना होगा। हमें एक ऐसा नया राज्य स्थापित करना होगा, जिसमें देशी-विदेशी शोषक देश को लूट नहीं सकेंगे और सब को सुख व सुरक्षा सुनिश्चित होगी। जलियांवाला बाग और उसके बाद के बीते सौ सालों का यही सबक है।

Tag:   

Share Everywhere

जलियांवाला बाग    हत्याकांड    अपराधपूर्ण    जनसंहार    Apr 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

thumb

 

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)