बी.एस.एन.एल. को बंद करने तथा उसका निजीकरण करने के क़दम

भारत संचार निगम लिमिटेड (बी.एस.एन.एल.) प्रबंधन ने सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से कम करके 58 वर्ष करने की योजना बनाई है। उन्होंने 50 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी मज़दूरों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वी.आर.एस.) देने की पेशकश की है। इन दोनों क़दमों से 54,000 से अधिक मज़दूरों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। यह बी.एस.एन.एल. के कुल कर्मचारियों की संख्या का 31 प्रतिशत है। बी.एस.एन.एल. प्रबंधन ने कर्मचारियों की संख्या को कम करने के इन दोनों क़दमों को पिछले कुछ वर्षों से हो रहे घाटे का कारण देकर उचित ठहराया है।

परन्तु घाटे का असली कारण निजीकरण करने के इरादे से सरकार द्वारा बी.एस.एन.एल. की जानबूझकर की गई उपेक्षा है। जबकि सभी निजी दूरसंचार कंपनियां 4जी मोबाइल सेवा दे रही हैं तो बी.एस.एन.एल. को 4जी मोबाइल सेवा के लिए कोई भी स्पेक्ट्रम आवंटित नहीं किया गया। इसकी वजह से बी.एस.एन.एल. अन्य मोबाइल कंपनियों के साथ स्पर्धा में पीछे रह गया। दूसरा कारण है भाजपा की केंद्र सरकार के पूरे समर्थन के साथ मुकेश अंबानी की जिओ द्वारा 2016 के बाद से छेड़ी गयी मोबाइल शुल्कों की जंग, जिसके कारण देश की हर दूरसंचार कंपनी को तब से भारी नुकसान झेलना पड़ा है।

बी.एस.एन.एल. के 1 लाख से अधिक मज़दूर 4जी स्पेक्ट्रम के आवंटन की प्राथमिक मांग को लेकर, 18 से 20 फरवरी 2019 तक, 3 दिवसीय हड़ताल पर गए। संचार राज्य मंत्री, मनोज सिन्हा द्वारा दिए गए जनवरी 2018 के आश्वासन के बावजूद, बी.एस.एन.एल. को अब तक स्पेक्ट्रम का आवंटन नहीं किया गया है। हड़ताल का आह्वान बी.एस.एन.एल. (ए.यू.ए.बी.) की सभी यूनियनों और संघों द्वारा दिया गया था - जो कि मज़दूरों और अधिकारियों के विभिन्न संगठनों का संगठित मंच है। इस हड़ताल को सेंट्रल प्लेटफार्म आफ ट्रेड यूनियंस का समर्थन भी प्राप्त था, जिसने बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों और अधिकारियों की 4जी के आवंटन और 2017 के बाद से लंबित वेतन संशोधन की दोनों मांगों के संघर्ष का पूर्णतः समर्थन करते हुए, बी.एस.एन.एल. की उचित मांगों को पूरा करने की मांग की।

सार्वजनिक क्षेत्र की बी.एस.एन.एल. एक मात्र दूरसंचार कंपनी है, जो देश के दूर-दराज के हिस्सों में मोबाइल सेवाएं प्रदान करती है। इसके अलावा, इसके पास देशभर में मूल्यवान भू-संपत्ति है, जिसकी अनुमानित कीमत 1 लाख करोड़ रुपये है। इसलिए बी.एस.एन.एल. देश के पूंजीपतियों के लिए एक आकर्षक निशाना है। सेवानिवृत्ति की आयु में कमी और वी.आर.एस. के माध्यम से मज़दूरों की छंटनी, पूंजीपतियों के लिए निजीकरण को और अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम हैं।

सरकार का तर्क खोखला है कि बी.एस.एन.एल. को ओवर-स्टाफिंग के कारण घाटा हो रहा है क्योंकि 2004-05 में, जब कंपनी में एक लाख से अधिक कर्मचारी थे, तब बी.एस.एन.एल. ने 10,000 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया था। बी.एस.एन.एल. ने 2014-15, 2015-16 और 2016-17 के वित्तीय वर्षों में भी लाभ कमाया। इसलिए वास्तविक समस्या मज़दूरों की अधिक संख्या नहीं है, बल्कि दूर संचार क्षेत्र के लिए इजारेदार पूंजीपतियों के पक्ष में सरकारी नीतियां हैं।

2017-18 की अवधि में, केंद्र सरकार के पूर्ण समर्थन से, रिलायंस की जिओ द्वारा आक्रमक शुल्कों का व्यापार युद्ध शुरु हुआ, जिससे लगभग सभी निजी दूरसंचार कंपनियों को भारी नुकसान सहना पड़ा है। वोडाफोन-आइडिया ने वित्त वर्ष 2018-19 (अक्तूबर से दिसंबर) की सिर्फ एक तिमाही में ही 5,005.7 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया। बी.एस.एन.एल. को भी इसका परिणाम भुगतना पड़ा। बी.एस.एन.एल. का 2017-18 में वार्षिक नुकसान 7,992 करोड़ रुपये था जबकि 2016-17 में यह नुकसान 4,793 करोड़ रुपये था।

पिछले 20-30 वर्षों से हर सरकार की यही नीति रही है कि जनता की संपत्ति से बनाये गये लाभदायक सार्वजनिक क्षेत्र के कारोबारों की सुनियोजित तरीके से लूट और विनाश की जाये और उन्हें जानबूझकर घाटे वाले कारोबारों में परिवर्तित किया जाये, ताकि इन कारोबारों की मूल्यवान संपत्ति को निजी इजारेदार पूंजीपतियों को सस्ते दामों पर बेचना जायज़ ठहराया जा सके। बी.एस.एन.एल. के मामले में भी यही सब कुछ दोहराया जा रहा है।

बी.एस.एन.एल. के निजीकरण की सरकार की नापाक योजनाओं का पर्दाफाश करना चाहिए तथा बी.एस.एन.एल. मज़दूरों के जायज़ संघर्ष का समर्थन किया जाना चाहिए।

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बी.एस.एन.एल.    निजीकरण    May 16-31 2019    Struggle for Rights    Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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