चीफ जस्टिस पर यौन उत्पीड़न का आरोप : न्याय की मांग - निष्पक्ष जांच

प्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है। इस न्यायिक प्राधिकरण में सर्वोच्च पद चीफ जस्टिस का है। अदालत की एक भूतपूर्व कर्मचारी, जिन्हें चीफ जस्टिस के घर पर काम करने के लिए नियुक्त किया गया था, द्वारा चीफ जस्टिस पर यौन उत्पीड़न का आरोप बहुत ही गंभीर मामला है। इस आरोप पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया और जिस तरह से उसने 15 दिन के अन्दर मामले को खारिज़ कर दिया है, उससे पूरी न्याय व्यवस्था का बदसूरत चेहरा स्पष्ट हो गया है।

कम से कम समय में चीफ जस्टिस को निर्दोष ठहराने की जल्दी में, सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष जांच और इन्साफ दिलाने के सारे कायदों का हनन किया है। आरोपित द्वारा खुद ही आरोप की जांच करने के लिए बिठाई गयी पीठ की अध्यक्षता करना अन्याय की हद थी। अपने ऊपर लगाये गए आरोप पर खुद ही न्याय करते हुए, चीफ जस्टिस ने एक भाषण दिया, जिसका मीडिया में खूब प्रचार हुआ, जिसमें उन्होंने आरोप लगाने वाली महिला को देश की न्यायपालिका की आज़ादी पर हमला करने की साजिश का दोषी ठहराया।

अगर चीफ जस्टिस सचमुच बेकसूर होते तो क्या वे अपने पद का इतने खुलेआम दुरुपयोग करते? यही लोगों के मन में पहला सवाल है। स्वाभाविक है कि इससे उन पर शक पैदा होता है।

इस खुलेआम पक्षपाती क़दम के बाद, चीफ जस्टिस खुद मामले से हट गए और तीन जजों की एक अन्दरूनी कमेटी बिठाई गयी। सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज, जस्टिस बोबडे ने उस कमेटी की अध्यक्षता की। कमेटी ने कई घंटों तक, बंद दरवाज़ों के पीछे, आरोप लगाने वाली महिला के साथ चर्चा की, जिसके दौरान महिला के वकील को उपस्थित रहने के अधिकार से इनकार किया गया। महिला को आरोपित जज से सवाल करने का अधिकार भी नहीं दिया गया। इस पूरी अन्यायपूर्ण प्रक्रिया का विरोध करती हुयी, महिला ने सुनवाई में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। महिला ने एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि “मुझे कमेटी का माहौल बहुत डरावना लगा। अपने वकील या किसी समर्थक के बिना, सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों के सवालों का सामना करते हुए, में बहुत परेशान हो गयी थी”।

सभी जानते हैं कि यौन उत्पीड़न का शिकार बनी महिला जब अपने अनुभवों का खुलासा करती है, तो उसे और ज्यादा बेइज्जतियां झेलनी पड़ती हैं। उसे अपने निजी दुःख-दर्द को सबके सामने रखना पड़ता है। समाज उसे शक की नज़र से देखने लगता है। इंसान और महिला बतौर उसकी ईमानदारी पर सवाल किया जाता है। अगर उसे अदालत में अपनी सफाई देनी पड़े तो उसकी पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है।

महिला संगठनों के लम्बे संघर्ष के बाद, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पोश एक्ट) को पास किया गया था। क्या चीफ जस्टिस, जो एक बालिग पुरुष हैं, पर वही कानून नहीं लागू होना चाहिए, जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में अन्य पुरुषों पर लागू होता है?

यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट कहता कुछ है और करता कुछ और। इस मामले में न तो विशाखा निर्देशों का पालन किया गया, न ही पोश एक्ट के प्रावधानों का। जांच कमेटी में किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं शामिल किया गया। उसमें सिर्फ कोर्ट के वर्तमान जज थे, जिनका अध्यक्ष खुद ही आरोपित है। जब आरोप लगाने वाली महिला ने अनुचित तौर-तरीकों के विरोध में, सुनवाई में भाग लेने से इंकार कर दिया, तो जांच-प्रतिजांच की पूरी प्रक्रिया के बिना, महिला के वकील की अनुपस्थिति में ही, चीफ जस्टिस को निर्दोष घोषित कर दिया गया।

भूतपूर्व महिला कर्मचारी को नाजायज़ तरीके से नौकरी से निकाल दिए जाने का आरोप, उनके पति और दूसरे परिजनों के निलंबित या बर्खास्त किये जाने का आरोप, इन सारे आरोपों की सच्चाई पता की जा सकती है। यह सवाल उठता है कि, उन्हें तथा उनके परिजनों को लगभग एक ही समय पर नौकरियों से क्यों निलंबित या बर्खास्त किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया है।

पीड़िता के आरोपों को खारिज कर दिया गया है, परन्तु साथ ही साथ, सुप्रीम कोर्ट में एक और मामला दर्ज किया गया है जिसमें उस महिला को एक राष्ट्र-विरोधी साजिश का हिस्सा बताया गया है। उस मामले की जांच के लिए एक सेवानिवृत्त जज को नियुक्त किया गया है।

चीफ जस्टिस को इस प्रकार निर्दोष करार दिया जाना, यह ज़मीर वाली महिलाओं और पुरुषों को मंजूर नहीं है। यह इन्साफ का घोर उल्लंघन है। महिला संगठनों और मानव अधिकार संगठनों ने भारी संख्या में इकट्ठे होकर, सुप्रीम कोर्ट की इस घोषणा के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई है।

यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष न्याय नहीं दे रहा है। कानून के सामने सबकी बराबरी के असूल को पांव तले रौंद दिया जा रहा है। एक विशेषाधिकार वाला कुलीन तबका ऐसा बर्ताव कर रहा है जैसे कि कानून सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं जबकि वे खुद कोई भी अपराध करके बच निकल सकते हैं।

सभी प्रगतिशील और इन्साफ-पसंद लोगों को इस जायज़ मांग का समर्थन करना चाहिए, कि सेवानिवृत्त जजों और महिला अधिकारों के जाने-माने कार्यकर्ताओं की एक कमेटी, पोश एक्ट के अनुसार सही कायदों का पालन करते हुए, इन आरोपों की जांच करे।

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यौन उत्पीड़न    न्याय की मांग    निष्पक्ष जांच    May 16-31 2019    Voice of the Party    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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