यह चुनाव न तो निष्पक्ष और न ही मुक्त : राजनीतिक प्रक्रिया के जनतांत्रिक नव-निर्माण की सख्त ज़रूरत है

हिन्दोस्तान को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र कहा जाता है। चीन और पाकिस्तान के साथ हिन्दोस्तान की तुलना करते हुए दावा किया जाता है कि हिन्दोस्तान में निर्धारित समय पर “मुक्त और निष्पक्ष” चुनाव कराये जाते हैं। चूंकि यहां के केंद्र और राज्य स्तर के विधायकी निकायों के चुनाव में बहुत सारी पार्टियां एक-दूसरे से होड़ लगाती हैं, इस बात को जनतंत्र के फूलने-फलने के सबूत के रूप में पेश किया जाता है।

लेकिन हमारे जीवन का अनुभव बार-बार यह साबित करता है कि मौजूदा व्यवस्था में चुनाव किसी भी मापदंड से न तो निष्पक्ष हैं और न ही मुक्त।

यदि चुनावों को सही मायने में निष्पक्ष होना है तो इसके लिए समाज के हर एक व्यक्ति को चुनने और चुने जाने का समान अधिकार होना ज़रूरी है। असलियत में केवल मुट्ठीभर विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को ही चुने जाने का अधिकार है।

17वीं लोकसभा की 543 सीटों के लिए हजारों उम्मीदवार चुनाव के मैदान में उतरे हैं। लेकिन केवल मुट्ठीभर पार्टियों के उम्मीदवारों को ही मीडिया में बढ़ावा दिया जाता है। भाजपा, कांग्रेस पार्टी और कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को टी.वी. न्यूज चैनलों पर चर्चाओं और इंटरव्यू में जगह दी जाती है।

अनेकों ऐसे महिला और पुरुष हैं जो मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों के संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाते आये हैं और लोगों के उम्मीदवार बतौर चुनाव के मैदान में उतरे हैं। लोगों के इन उम्मीदवारों को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये उम्मीदवार कड़ी मेहनत से अपना चुनाव प्राचर करते हैं और हर रोज़ लोगों को उनके घर और फैक्ट्री गेट पर मिलने के लिए सैकड़ों घंटे व्यतीत करते हैं। चुनाव प्रचार पर खर्चा करने के लिए उनके पास केवल कुछ लाख रुपये होते हैं जो उन्होंने समर्थकों और दोस्तों से इकट्ठा किये होते हैं। एक लोक सभा चुनाव क्षेत्र में औसतन 15 लाख मतदाता होते हैं। लोगों के ये उम्मीदवार यदि अपनी पूरी ताक़त भी लगा दें तो भी वे अपने चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं के केवल एक छोटे से अंश तक ही पहुंच पायेंगे।

दूसरी ओर वे उम्मीदवार हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग से समर्थन प्राप्त पार्टियों ने चुनकर खड़ा किया है। इन उम्मीदवारों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इन पार्टियों को चुनाव प्रचार के लिए टाटा, बिरला, अंबानी और अन्य हिन्दोस्तानी इजारेदार घरानों और क्षेत्रीय पूंजीवादी समूहों के अलावा विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से भी ढेर सारा धन मिलता है। इन पार्टियों के उम्मीदवारों के प्रचार के लिए टी.वी. और सोशल मीडिया पर हर रोज़ हजारों करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं और यह प्रचार चुनाव की घोषणा के कई महीने पहले से शुरू हो जाता है। इनके चुनाव प्रचार को चलाने के लिए हजारों वालंटियर वेतन पर रखे जाते हैं।

चुनाव आयोग, जो कि एक अनिर्वाचित संस्था है, इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव निष्पक्ष हों। चुनाव आयोग ने व्यक्तिगत उम्मीदवार द्वारा चुनाव पर किये जाने वाले खर्च पर एक सीमा निर्धारित की है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां चुनाव पर कितना खर्चा करती हैं, इस पर कोई सीमा नहीं है और न ही इसकी कोई निगरानी की जाती है। इसके चलते लोगों के उम्मीदवार और पूंजीपतियों की पार्टियों के उम्मीदवार द्वारा चुनाव प्रचार के लिये किये जाने वाले खर्चे में बेहद गैर-बराबरी है, जो कि बढ़ती ही जा रही है। यहां तक कि पूंजीपतियों की पार्टियों के आपस बीच भी बढ़ते पैमाने पर गैर-बराबरी है। चुनाव आयोग इस धन की ताक़त की गैर-बराबरी पर काबू पाने में पूरी तरह से शाक्तिहीन है और केवल कभी-कभी चुनाव से पहले बांटने के लिए जमा किये गए खूब सारे पैसों को जब्त करने का दिखावा करता रहता है।

ऐसा अनुमान लगाया गया है कि 17वीं लोक सभा का चुनाव दुनियाभर में आज तक हुए चुनावों में सबसे महंगा चुनाव है। अलग-अलग एजेंसियों द्वारा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस चुनाव में करीब 50,000 से 1,00,000 करोड़ रुपए खर्च किये जा रहे हैं। इसका अधिकांश हिस्सा पूंजीपति वर्ग की पार्टियों द्वारा खर्च किया जा रहा है। कुछ अनुमानों के मुताबिक इस खर्चे में भाजपा का हिस्सा तीन-चैथाई से अधिक है।

चुनाव आयोग द्वारा बनाये गए नियम न केवल धन के बेतहाशा प्रयोग पर कोई पाबंदी लगाने में असमर्थ हैं, बल्कि ये नियम लोगों के उम्मीदवारों के खि़लाफ़ घोर पक्षपात करते हैं। ये नियम पोस्टर और अन्य साधारण प्रचार सामग्री के उपयोग पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाते हैं, जबकि लोगों के उम्मीदवारों के पास प्रचार के लिए केवल यही सामग्रियां उपलब्ध होती हैं। भाजपा, कांग्रेस और अन्य पूंजीवादी पार्टियां जिन प्रचार माध्यमों का उपयोग करती हैं, जैसे कि बड़े-बड़े होर्डिंग, अख़बारों, टी.वी. और सोशल मीडिया पर खरीदे हुए विज्ञापन, इन सब पर कोई भी पाबंदी नहीं है। इसके अलावा “मान्यताप्राप्त” पार्टियों को एक और फ़ायदा यह होता है कि उनको एक स्थायी चुनाव चिन्ह दिया जाता है। इस तरह से वे अपने चुनाव चिन्ह का प्रचार चुनावों की घोषणा से कई महीने पहले से शुरू कर देती हैं, जबकि लोगों के उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह वोटिंग के दिन से मात्र कुछ सप्ताह पहले ही जारी किया जाता है।

पूंजीपति वर्ग की पार्टियां लोगों का ध्यान ज्वलंत सवालों से भटकाने की पूरी कोशिश करती हैं, जैसे बेरोज़गारी, किसानों के लिए आजीविका की सुरक्षा का सवाल, मज़दूरों के अधिकारों का उल्लंघन और महिलाओं की सुरक्षा का सवाल, इत्यादि। विशेष जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देशों के खि़लाफ़ नफ़रत और द्वेष फैलाकर ये पार्टियां लोगों का ध्यान लगातार भटकाती रहती हैं।

लोगों के साथ फरेब करने, उनको भटकाने और बांटने के अलावा पूंजीवादी पार्टियों के पास और कोई चारा नहीं होता है क्योंकि लोगों के ज्वलंत सवालों का उनके पास कोई भी हल नहीं है। ये पार्टियां उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को अपनाकर पूंजीपतियों को और अधिक अमीर बनाने के प्रति वचनबद्ध हैं। ये पार्टियां राजनीतिक चर्चा को सबसे निचले स्तर पर ले आती हैं और लोगों को एक दूसरे के खि़लाफ़ भड़काती हैं। 

17वीं लोक सभा के चुनाव के दौरान इन परस्पर विरोधी पार्टियों के नेताओं ने एक दूसरे को चोर, कातिल और राष्ट्रीय गद्दार तक कहा है। जब नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी एक दूसरे को इस तरह की गालियां देते हैं तो हिन्दोस्तान के लोग सोचते हैं कि इन चोरों और कातिलों के हाथों में देश की बागडोर क्यों सौंपी जानी चाहिए।

चुनाव की आदर्श आचार संहिता उम्मीदवारों द्वारा धर्म या जाति के आधार पर नफ़रत फैलाने पर पाबंदी लगाती है। लेकिन इतिहास देखें तो पता चलता है कि चुनाव आयोग ने शायद ही कभी उन लोगों को कोई सज़ा दी है जो इसका उल्लंघन करते हैं। 2019 में सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग को निर्देश देने पड़े कि वह ऐसे उम्मीदवारों के खि़लाफ़ कार्यवाही करे जो नफ़रत भरे भाषण और वक्तव्य देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा फटकार लगाए जाने के बाद चुनाव आयोग ने कुछ चुनिंदा उम्मीदवारों को कुछ दिनों के लिए प्रचार करने से रोकने का आदेश दिया। इनमें मायावती और योगी आदित्यनाथ शामिल थे, जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान सांप्रदायिक भाषण दिए थे।

लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खि़लाफ़ कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी, जिन्होंने बार-बार और खुलेआम लोगों के बीच कश्मीरियों के खि़लाफ़ नफ़रत भड़काई और बांग्लादेश से आये आप्रवासियों को ‘दीमक’ कहा है। ये नेता मुसलमान जनसमुदाय के बारे में कहते हैं कि “उन्हें अपनी औकात दिखने की ज़रूरत है”। बार-बार नफ़रत भरे भाषण देने के लिए इन दोनों के खि़लाफ़ कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी है। ऐसा क्यों है? इससे यही साबित होता है कि असलियत में प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष कानून से ऊपर हैं। चुनाव आयोग इनकी मुट्ठी में है। चुनाव आयोग इन्हें किसी भी आदेश का पालन करने को मजबूर नहीं कर सकता है।

चुनाव का अखाड़ा किसी भी मापदंड से निष्पक्ष नहीं है। और यह तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकता जब तक समाज मुट्ठीभर शोषकों और शोषित जनसमुदाय में बंटा हुआ है। सभी उम्मीदवारों को समान अवसर तब तक नहीं मिल सकता जब तक उत्पादन के साधनों और मीडिया पर इजारेदार पूंजीपतियों की मालिकी और नियंत्रण है। चुनाव प्रक्रिया तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक इजारेदार पूंजीपति अपनी पसंदीदा पार्टी के चुनाव प्रचार में मनमाने तरीके से ढेर सारा धन खर्चा करने के लिए आज़ाद हैं।

ये चुनाव मुक्त भी नहीं हैं। इन चुनावों में हर एक महिला और पुरुष मतदाता अपनी मनपसंद के उम्मीदवार के लिए वोट डालने को भी मुक्त नहीं है। लोगों के अलग-अलग तबकों पर एक या दूसरे उम्मीदवार को वोट देने के लिए तमाम तरह से दबाव डाला जाता है। लोगों पर दबाव डालने के लिए पैसे और दारू की लालच, मार-पीट की धमकी जैसे तमाम तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं। करोड़ों मेहनतकश वोट डालने के लिए अपने गांव नहीं जा पाते क्योंकि ऐसा करने से उनकी आमदनी का नुकसान हो जायेगा।

चुनाव के कानून और नियम इस तरह से बनाये गए हैं जिससे पूंजीवादी पार्टियों के उम्मीदवार सबसे घिनौने अपराधों से बच निकलते हैं। लेकिन जहां तक मेहनतकश बहुसंख्य आबादी का सवाल है, उनको ऐसी कोई आज़ादी नहीं दी जाती। राज्य के अधिकारी मज़दूरों और किसानों के प्रतिनिधियों को प्रताड़ित करने और सताने के लिए इन कानूनों और नियमों का इस्तेमाल करते हैं।

मौजूदा व्यवस्था में चुनाव सत्ताधारी वर्ग के लिए लोगों के बीच खौफ, शक और तमाम तरह के तनाव पैदा करने का एक मौका है। समय-समय पर किये जाने वाले चुनाव सत्ताधारी वर्ग के हाथों में एक हथियार है जिसका इस्तेमाल वे लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने और पूरे समाज पर इजारेदार पूंजीपति वर्ग की मर्ज़ी को थोपने और उसे एक कानूनी जामा पहनाने के लिए करते हैं। चुनाव के समय इजारेदार पूंजीपति और उनकी पार्टियां टी.वी., अख़बार और फेसबुक, ट्विटर और वाट्स-एप जैसे सोशल मीडिया के साधनों का इस्तेमाल बहुत बड़े पैमाने पर झूठी जानकारी फैलाने के लिए करती हैं।

ये चुनाव सात चरणों में 40 दिनों तक चलाये जा रहे हैं। पिछले चुनावों के अनुभव से हम यह देख सकते हैं कि कई चरणों में आयोजित किये गए चुनावों से न केवल सुरक्षा बलों को ज्यादा संख्या में तैनात करने में आसानी होती है, बल्कि कई चरणों में चुनाव आयोजित किये जाने से हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को लोगों के सोच-विचारों को भांपने और उसके मुताबिक चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपनाने में भी मदद मिलती है।

बड़ी-बड़ी इजारेदार कंपनियां चुनाव के हर एक चरण के बाद एग्जिट-पोल आयोजित करती हैं, जिससे वे लोगों के सोच-विचारों को भांप सकें और उसके आधार पर अपनी पसंदीदा पार्टी व नारे का प्रचार कर सकें। इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग, शुरुआती चरणों में किये गए सर्वेक्षणों के आधार पर यह फैसला करता है कि उनकी कौन सी वफादार पार्टी इस समय लोगों को बेवकूफ बनाने में सबसे क़ाबिल है। सबसे आधुनिक प्रचार तंत्र का इस्तेमाल करके पूंजीपति वर्ग अपनी पसंदीदा टीम को देश के लिए सबसे योग्य टीम के तौर पर बढ़ावा देता है। बहु-चरणों में चुनाव आयोजित किये जाने से पूंजीपति वर्ग को अंतिम चरणों में किसी एक पार्टी के पक्ष में लहर पैदा करने का मौका मिल जाता है।

हमारा पिछला अनुभव यह दिखाता है कि चुनावों के द्वारा जब एक पार्टी की जगह पर कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आती है तो हमारे देश या हमारे लोगों की हालत में कोई भी गुणात्मक परिवर्तन नहीं होता है। केवल वोट देने का अधिकार लोगों के किसी काम का नहीं है क्योंकि चुनाव प्रक्रिया के कानून और नियम इस तरह से बनाये गए हैं कि केवल वही पार्टियां चुनाव जीतकर सत्ता पर बैठ सकती हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग का समर्थन प्राप्त है।

मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया, जिसमें धनबल समर्थित पार्टियां बारी-बारी से सरकार चलाने का जिम्मा उठाती हैं, एक ऐसा तंत्र है जिसके ज़रिये इजारेदार पूंजीपति पूरे समाज पर अपनी मर्ज़ी थोपते हैं। ये इजारेदार पूंजीपति चुनाव को अपनी हुकूमत को बरकरार रखने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं और साथ ही यह भ्रम पैदा करते हैं कि चुनावों के ज़रिये लोगों ने अपनी मर्ज़ी को प्रकट किया है।

हर एक चुनाव में बढ़ती तादाद में लोगों के उम्मीदवारों का खड़ा होना यह दिखाता है कि लोगों में देश के फैसले लेने और देश का हुक्मरान बनने की आकांक्षा और मांग जोर पकड़ रही है। यह दिखाता है कि लोग इजारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत के इस कुचक्र से निकलना चाहते हैं, जिसमें एक ही तरह की पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। लोग खुद अपने भविष्य के मालिक बनना चाहते हैं।

लोगों की इस आकांक्षा और मांग को हासिल करने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया और राजनीतिक सत्ता के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन की सख्त ज़रूरत है, ताकि वे खुद अपने भविष्य के मालिक बन सकें। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की जगह पर एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करने की ज़रूरत है जो लोगों की इस मांग के अनुरूप होगी, कि लोगों को इस देश का मालिक होना होगा। यह नयी राजनीतिक व्यवस्था ऐसी होगी जहां फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के हाथों में होगा और किसी भी पार्टी या निहित स्वार्थ को इसे हड़पने से रोका जायेगा। 

ऐसी व्यवस्था में राजनीतिक पार्टी की भूमिका होगी लोगों को खुद अपनी हुकूमत चलाने के लिए आवश्यक नज़रिया, योजना और अगुवाई देना। इस व्यवस्था में राजनीतिक कार्य करने के ऐसे कानून बनाये जायेंगे जो सांप्रदायिक या जातिवादी आधार पर लोगों के बीच दुश्मनी और नफ़रत फैलाने वाली पार्टी पर पाबंदी लगायेंगे। इस व्यवस्था में ऐसी पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं होगी जो लोगों को फैसले लेने के अधिकार से वंचित करना चाहती हो।

आइये हम सब राजनीतिक प्रक्रिया के जनतांत्रिक नव-निर्माण के कार्यक्रम के लिए एकजुट हो जायें। यह कार्यक्रम हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा है। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण का अर्थ है - लोगों के हाथों में राजनीतिक सत्ता देना, अर्थव्यवस्था को इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की वर्तमान दिशा से बदलकर लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ना और विदेश नीति को शांति कायम करने तथा साम्राज्यवादियों के जंग-फरोश इरादों को पराजित करने की दिशा में मोड़ना।

राजनीतिक प्रक्रिया का जनतांत्रिक नव-निर्माण

फैसला लेने का अधिकार लोगों के हाथों में लाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आइये हम सब राजनीतिक प्रक्रिया में इन फौरी परिवर्तनों के लिए संघर्ष करें :

लोगों द्वारा उम्मीदवारों के चयन के बिना कोई चुनाव नहीं होना चाहिए!

मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के संगठनों को अपने बीच से उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए!

सभी चयनित उम्मीदवारों के लिए चुनाव चिन्ह को एक साथ जारी किया जाना चाहिए - मान्यता प्राप्त पार्टियों के उम्मीदवारों और अन्य उम्मीदवारों के बीच कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए!

उम्मीदवारों के चयन और चुनाव की प्रक्रिया में किसी भी तरह से निजी धन के खर्च पर पूरी तरह से रोक लगायी जानी चाहिए और पूरी प्रक्रिया का खर्चा राज्य को उठाना चाहिए!

चुने गए प्रतिनिधि से समय-समय पर हिसाब लेने और उनकी जवाबदेही तय करने का अधिकार लोगों के पास होना चाहिए। चुने गए प्रतिनिधि को किसी भी वक्त वापस बुलाने का अधिकार लोगों के पास होना चाहिए!

कानूनों और नीतियों में बदलाव करने का प्रस्ताव रखने का अधिकार लोगों के पास होना चाहिए!

हर एक चुनाव क्षेत्र में एक पक्ष-निरपेक्ष मतदाता समिति को चुना जाना चाहिए, जिसका काम होगा सभी बालिग लोगों के राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित करना, जिसमें चयन करने का अधिकार, चुनने और चुने जाने का अधिकार, चुने गए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार और कानूनों व नीतियों में बदलाव प्रस्तावित करने का अधिकार शामिल है।

नोट : हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए कम्युनिस्ट कार्यक्रम के सम्पूर्ण व्याख्यान के लिए कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति द्वारा 27 मार्च, 2019 को प्रकाशित आह्वान को पढ़ें, जिसका शीर्षक है “हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए आगे बढ़ें!”
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May 16-31 2019    Voice of the Party    Political Process     Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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