तेज़ी से बढ़ती भीषण बेरोज़गारी

बढ़ती बेरोज़गारी और अर्ध-रोज़गारी के चलते हिन्दोस्तानी समाज एक भीषण संकट के सामने खड़ा है।

नरेंद्र मोदी की सरकार सत्य को सर के बल खड़ा कर रही है। यह सरकार इस सत्य को उजागर करने वाले आंकड़ों को जान-बूझकर दबाने की कोशिश कर रही है। तो दूसरी तरफ यह “साबित” करने के लिए कि वह रोज़गार पैदा कर रही है, सरकार लोगों के साथ बड़ी बेशर्मी से झूठ पर झूठ बोले जा रही है।

सेंटर फॉर मोनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनोमी द्वारा संकलित किये गए आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2019 में बेरोज़गारी की दर 7.2 प्रतिशत थी, जो कि पिछले 28 महीनों में सबसे अधिक है।

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श्रम शक्ति, जिसमें इस समय रोज़गार करने वाले या रोज़गार की तलाश करने वाले मज़दूरों को गिरा जाता है उसकी संख्या में सितम्बर 2016 से 2.57 करोड़ की गिरावट हुई है। इसका अधिकांश हिस्सा इसी अवधि में रोज़गार करने वाले मज़दूरों की संख्या में 1.83 करोड़ की गिरावट की वजह से है।

पिछले कई महीनों से श्रम सहभागिता की दर में भी गिरावट आई है। श्रम सहभागिता का अर्थ है 15 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी के ऐसे मज़दूरों का अनुपात जो सक्रिय रूप से रोज़गार की तलाश कर रहे हैं। फरवरी 2019 में श्रम सहभागिता की दर 42.7 प्रतिशत तक गिर गयी।

श्रम शक्ति में गिरावट के साथ श्रम सहभागिता की दर में गिरावट एक बेहद दुखद कहानी बता रही है। एक तरफ औपचारिक रोज़गार में लगे मज़दूरों की नौकरियां छीनी जा रही हैं, तो दूसरी तरफ नौकरी तलाशने वाले मज़दूरों की संख्या घटती जा रही है, क्योंकि नौकरियां मौजूद ही नहीं हैं। श्रम सहभागिता की गिरती हुई दर यह दिखाती है कि बढ़ते पैमाने पर लोग ऐसा रोज़गार पाने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, जो उनको दो वक़्त की रोटी दे पायेगा। शहरों और देहातों में करोड़ों नौजवान बेकार घूमते मिल जाते हैं, क्योंकि उनके पास रोज़गार नहीं है।

हमारे देश में अधिकांश मज़दूर ऐसे हैं जो बेहद शोषक परिस्थितियों में ठेके पर काम कर रहे हैं। दिन में 12 घंटे से अधिक, न्यूनतम मज़दूरी से भी कम वेतन पर, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम करना आम बात हो गयी है। जब कभी सरकार कुछ सौ क्लर्कों के खाली पदों को भरने की घोषणा करती है तो हजारों लाखों स्नातक, स्नातकोत्तर और यहां तक कि पी.एच.डी. की उपाधी प्राप्त नौजवान इस काम को पाने के लिए आवेदन करते हैं। यह हक़ीक़त दिखाती है कि ये नौजवान निजी क्षेत्र में कभी इससे बेहतर आमदनी का रोज़गार पाने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। रेलवे या किसी अन्य सरकारी महकमे में रोज़गार पाने के लिए नौजवान एक परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा की तैयारी में बरसों बिता देते हैं, जिसका कोई फ़ायदा नहीं।

केंद्र सरकार यह दावा करती है कि उसके कार्यकाल में हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था संप्रग सरकार के कार्यकाल से बहुत अधिक तेज़ गति से आगे बढ़ी है। जबकि कांग्रेस पार्टी इसके ठीक उल्टा प्रचार करती है और दावा करती है कि उसके कार्यकाल में विकास की दर “अधिक” थी। भाजपा और कांग्रेस पार्टी दोनों ही इस बात को छुपाना चाहती हैं कि हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था में तथाकथित संवर्धन को ज्यादा से ज्यादा “रोज़गार विहीन संवर्धन” कहा जा सकता है। हर साल जिस पैमाने पर रोज़गार पैदा किया जाता है, उससे कहीं अधिक बड़े पैमाने पर रोज़गार नष्ट होता है।

बेरोज़गारी में यह विशाल बढ़ोतरी लाखों छोटी और मंझोली कंपनियों के बंद होने के साथ-साथ, निर्माण उद्योग, सीमेंट उद्योग, इस्पात और कोयला उद्योग, बिजली उद्योग इत्यादि में चल रहे संकट का नतीजा है। देहातों में छोटे और मंझोले किसानों की हो रही बर्बादी के चलते, नौजवानों का एक विशाल तबका बेरोज़गारों की कतार में शामिल होता जा रहा है।

पिछले कुछ दशकों से जो “संवर्धन” हुआ है उसकी वजह से हिन्दोस्तान के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीवादी घराने दुनिया के सबसे बड़े अमीरों की श्रेणी में शामिल हुए हैं। यह सब कुछ हमारे देश के मज़दूरों के तीव्र शोषण, किसानों की लूट और प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी के बल पर हासिल किया गया है। यह सब कुछ अमरीकी, यूरोपीय, जापानी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के संसाधनों के शोषण और लूट के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोलकर हासिल किया गया है।

तीन दशक पहले जब उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते भूमंडलीकरण का कार्यक्रम शुरू किया गया था, उस समय से देशभर में मज़दूरों के असली वेतनों में गिरावट हुई है। बढ़ते पैमाने पर मज़दूर ठेके पर, लंबे कार्य दिवस और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम करने को मजबूर हैं। बेरोज़गारों की लगातार बढ़ती रिज़र्व सेना का इस्तेमाल मज़दूरों पर रोज़गार की सबसे दमनकारी हालत को थोपने के लिए किया जा रहा है।

बाज़ार से ज़रूरत की वस्तुएं खरीदने के लिए मज़दूरों के पास पैसे नहीं हैं। यह अति-उत्पादन का संकट है। घर निर्माण उद्योग इसका एक बढ़िया मिसाल है।

देशभर के देहातों और शहरों में बसने वाले करोड़ों लोगों के पास रहने के लिए अपना घर नहीं है और दयनीय हालतों में रहने को मजबूर हैं। इन लोगों के लिए किफ़ायती दामों पर मकान चाहिएं। दूसरी ओर सट्टेबाजों ने देशभर में बड़ी-बड़ी रिहायशी परियोजनों में पूंजीनिवेश कर रखा है। 2008 में मकान-निर्माण उद्योग गिर गया, क्योंकि नए घरों को खरीदने के लिए कोई खरीदार नहीं था। देशभर के कई शहरों में बहुत सारे अर्ध-निर्मित मकान नज़र आते हैं। जो मकान बनाये गए थे, वे मेहनतकश जनसमुदाय की पहुंच से बाहर हैं। निर्माण उद्योग संकट में चला गया और अभी तक उस संकट से उबर नहीं पाया है। इसकी वजह से इस्पात और सीमेंट उद्योग भी संकट में चला गया। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों मज़दूर बेरोज़गार हो गए। ऐसी ही प्रक्रिया अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी चल रही है।

अपने अंतिम पड़ाव, साम्राज्यवाद में पूंजीवाद बेहद परजीवी है। दुनियाभर में वित्त पूंजी को वहां पर निवेश किया जाता है जहां से अधिकतम मुनाफ़े बनाने की गारंटी हो। अधिकतम मुनाफ़े की खोज में वित्त पूंजी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में, एक देश से दूसरे देश में जाती रहती है, और अपने पीछे बर्बादी फैलाती जाती है। वित्त पूंजी प्रत्येक पूंजीवादी देश की सरकार से यह मांग करती है कि पूंजी के और अधिक संचयन के लिए बेहतर से बेहतर हालतें बनायी जायें। हिन्दोस्तानी राज्य भी यही काम करता आया है। किस वस्तु का उत्पादन किया जाएगा और कितनी मात्रा में किया जायेगा इसका फैसला हिन्दोस्तानी समाज की ज़रूरत के आधार पर नहीं किया जाता। ये मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों की ज़रूरत पूरी करने के मकसद से नहीं किया जाता। यह वित्त पूंजी की अधिकतम मुनाफ़े की लालच के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसका नतीजा यह है कि अर्थव्यवस्था एक से दूसरे संकट की ओर घिसटती रहती है।

अपने मौजूदा पड़ाव पर पूंजीवाद के बेहद परजीवी चरित्र का इस बात से पर्दाफाश होता है कि जब बेरोज़गारी और अर्ध-रोज़गार में बढ़ोतरी होती जा रही है और जितना रोज़गार पैदा हो रहा है उससे कहीं अधिक रोज़गार नष्ट किये जा रहे हैं, इसके बावजूद हिन्दोस्तानी राज्य और अन्य पूंजीवादी राज्य बढ़ा-चढ़ाकर “संवर्धन” का दावा कर रहे हैं।

पूंजीवादी व्यवस्था विशाल जनसमुदाय को उत्पादन के साधनों पर मालिकी से वंचित रखने पर आधारित है। उत्पादन के प्रमुख साधनों की मालिकी आबादी के चंद मुट्ठीभर अल्पसंख्यक तबके के हाथों में लगातार बढ़ते पैमाने पर केंद्रित होती जा रही है। किसान, छोटे कारीगर और अन्य छोटे उत्पादक लगातार बर्बाद होते जा रहे हैं और उन मेहनतकश लोगों की कतार में जुड़ते जा रहे हैं, जो आजीविका चलाने के लिए अपना श्रम बेचने के लिए मजबूर हैं। मज़दूरों के एक तबके का अतिशोषण किया जाता है जबकि दूसरे तबके को जबरदस्ती बिना किसी रोज़गार के खाली बैठा कर रखा जाता है। बेरोज़गारों की रिज़र्व सेना के होने से, पूंजीपतियों को मज़दूरों के वेतनों को घटाने और उनके शोषण को ज्यादा तीव्र करने में सहायता मिलती है।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने यह दावा किया था कि नौजवानों को स्टार्ट-अप शुरू करने के लिये प्रोत्साहन देने से नयी कंपनियां शुरू होंगी जो लाखों मज़दूरों को रोज़गार देंगी। लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए यह एक धोखा है। जितने स्टार्ट-अप शुरू किये गए थे उनमें से अधिकांश धराशायी हो गए हैं। इसी तरह से स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत जिन नौजवानों को “स्किल्ड” बनाया गया था, उनमें से अधिकांश नौजवानों को रोज़गार नहीं मिला है।

यह बिल्कुल संभव है कि काम करने योग्य सभी व्यक्तियों को रोज़गार दिया जा सकता है। इस संभावना को हक़ीक़त में बदलने के लिए अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलने की ज़रूरत है, जहां अर्थव्यवस्था को लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चलाया जायेगा, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए। ऐसा करने के लिए मज़दूर वर्ग को किसानों के साथ गठबंधन में राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेना होगा। मज़दूर वर्ग को उत्पादन के सभी प्रमुख साधनों को इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों से छीनकर सामाजिक नियंत्रण में लाना होगा। हमारे समाज को बेरोज़गारी के श्राप से मुक्त करने के लिए हिन्दोस्तान के नव-निर्माण की सख़्त ज़रूरत है।

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भीषण बेरोज़गारी    Jun 16-30 2019    World/Geopolitics    Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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