अनेक इलाकों में सूखा और पानी की भारी किल्लत : पूंजीवादी व्यवस्था और हिन्दोस्तानी राज्य इसके लिए ज़िम्मेदार

कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कई अन्य राज्यों में सूखे की गंभीर हालतों की ख़बरें आ रही हैं। हिन्दोस्तान में बोये हुए पूरे क्षेत्र का लगभग 67 प्रतिशत सिंचाई के लिए वर्षा पर पूरी तरह निर्भर है। इसी क्षेत्र पर खाद्यान्नों का 44 प्रतिशत उगाया जाता है और आबादी के लगभग 44 प्रतिशत का भोजन पैदा किया जाता है। इसलिए, वर्षा की अनियमितता का हमारे लोगों पर बहुत भारी असर पड़ता है।

समाचारों के अनुसार, देशभर में, सैकड़ों-सैकड़ों गांवों से लोग अपने घर-बार और मवेशियों को छोड़कर, पानी की तलाश में किसी और जगह चले गए हैं। कर्नाटक के 80 प्रतिशत जिले और महाराष्ट्र के 72 प्रतिशत जिले सूखा ग्रस्त हैं, वहां सारी फ़सलें खराब हो चुकी हैं और इन दोनों राज्यों के 80 लाख किसान जीवन-मौत के बीच में लटके हुए हैं। खेतों में फसल नष्ट पड़ी है, मवेशी भूखे हैं और पीने का पानी नहीं है। अलग-अलग इलाकों के लोगों की दुर्दशा और सरकारों की लापरवाही की बहुत सारी दुःख-भरी कहानियां सुनायी दे रही हैं। (देखिये बॉक्स: महाराष्ट्र की स्थिति) 

महाराष्ट्र की स्थिति

जबकि मुंबई शहर बाढ़ में बह रहा है, तो महाराष्ट्र के बहुत सारे इलाकों में पानी की भारी किल्लत है। मराठवाड़ा एक ऐसा इलाका है जहां बार-बार भयानक सूखा पड़ता है, जिसकी वजह से बीते 5 वर्षों में 4,700 किसान खुदकुशी कर चुके हैं और सिर्फ पिछले साल के दौरान 947 किसानों ने खुदकुशी की। ख़बरों के अनुसार, इस इलाके में स्थिति गंभीर है। 8 जिलों में लगातार दो साल से सूखा पड़ा है। 2014 और 2015 के लगातार दो सालों में भी इन्हीं जिलों में सूखा पड़ा था।

नवंबर 2018 में महाराष्ट्र की सरकार ने 25 जिलों के 20,000 गांवों को संकटग्रस्त घोषित कर दिया। 35 बड़े बांधों में अब कोई पानी नहीं बचा है। 1,000 छोटे बांधों में जल स्तर 8 प्रतिशत से भी कम है। बांधों को पानी पहुंचाने वाली नदियां सूखी मिट्टी बन गई हैं। इन बांधों और तालाबों से जो थोड़ा पानी निकाला जाता है, वह पीने लायक नहीं है। साफ पीने का पानी न मिलने के कारण, दस्त, आंत्रशोध और प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियां खूब फैल रही हैं।

इन गांवों के लोगों के लिये टैंकर ही पानी का एकमात्र स्रोत है। लोगों को दिन-रात टैंकरों का इंतज़ार करते रहना पड़ता है, ताकि पानी की कुछ बाल्टियां मिल सकें।

धान की बुवाई के लिए जून के महीने में वर्षा निर्णायक है, इसलिए जून में वर्षा न होने के कारण, धान की बुवाई एक महीने देर से हुयी है। मकई, सोया, कपास, नीम्बू, दलहन और मूंगफली समेत लगभग सभी प्रमुख फसलों की कम क्षेत्र पर बुवाई हुयी है। कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 5 जुलाई, 2019 तक प्राप्त रिपोर्टों में बताया गया है कि बीते चार वर्षों के औसतन बुवाई क्षेत्र की तुलना में, इस वर्ष दलहन के बुवाई क्षेत्र में 71 प्रतिशत कमी है, तिलहन के बुवाई क्षेत्र में 46 प्रतिशत, धान के बुवाई क्षेत्र में 34 प्रतिशत और ज्वार-बाजरा-रागी के बुवाई क्षेत्र में 27 प्रतिशत कमी है। प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में दलहन के बुवाई क्षेत्र की कमी सबसे ज्यादा है।

सूखा और सिंचाई के पानी की किल्लत हमारे देश में कोई नयी समस्या नहीं है। ये बार-बार आती रहती है और हर बार किसानों तथा अन्य तबकों के लोगों के जीवन को बर्बाद करती रहती है।

देश के अलग-अलग इलाकों में बार-बार होने वाली सूखे की हालतें यह साफ-साफ दिखाती हैं कि हिन्दोस्तानी राज्य ने हमारे जल संसाधनों की देखभाल करने में कितनी लापरवाही की है।

Chennai-water-queuesBhim Nagar in Wadwani tehsil

हिन्दोस्तान में वर्षा के अलावा, बहुत सारे अन्य जल संसाधन भी हैं। यहां मौजूद हैं बर्फ से ढके हिमालय से निकलकर साल भर बहने वाली जल से भरपूर नदियां, अन्य नदियां, जल भरी भूमिगत चट्टानें, हमारी अनमोल परंपरागत जल संचय व जल प्रबंधन की व्यवस्थाएं, इत्यादि। बरतानवी उपनिवेशवादियों की हुकूमत की स्थापना से पहले, सदियों से यह माना जाता रहा है कि जनता को सिंचाई और पीने का पानी मुहैया कराना हर हुक्मरान का फ़र्ज़ है। देश के अलग-अलग भागों में हुक्मरानों ने गांवों और शहरों में हमारे जल संसाधनों और जल संचय व जलापूर्ति के साधनों की देख-रेख और विकास करने का महत्व समझा था। आज भी बहुत सारे इलाकों में प्राचीन काल से चलते आ रहे तालाब, नहर, कुँएं और भूमिगत जल संचय की व्यवस्थाएं देखने में आती हैं। ये सब वर्षा न होने पर हमारे लोगों के लिए जलापूर्ति के अहम साधन रहे हैं। इसके अलावा, भूमिगत जल को बचाने और बढ़ाने में वनों की भी बहुत अहम भूमिका है।

परन्तु आज इनमें से अधिकतर जल संसाधन पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। भूमिगत जलस्तर बहुत नीचे गिर गया है। इसके कई कारण हैं।

कृषि क्षेत्र में पूंजीवाद के बढ़ते प्रवेश के साथ-साथ, किसानों को अपनी रोज़ी-रोटी  के लिए उन फसलों को उगाना पड़ता है, जिन्हें उगाना उस जगह की भूमि और मौसम के अनुसार अनुचित माना जाता है और जिनके लिए ज्यादा सिंचाई के पानी की ज़रूरत होती है। पारंपरिक फसलों की जगह पर अब गन्ना और कपास (महाराष्ट्र) तथा गेहूं और चावल (हरियाणा और पंजाब) में उगाये जाते हैं। इनकी सिंचाई के लिए ज्यादातर ट्यूूबवेल का प्रयोग किया जाता है, जिसकी वजह से भूमिगत जल बहुत जल्दी ख़त्म होता जा रहा है।

देशी और विदेशी पूंजीपतियों के ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ों की मांग को पूरा करने के लिए, बहुत ही अनियमित तरीके से, जगह-जगह पर विशाल औद्योगिक और निर्माण परियोजनाएं शुरू की गयी हैं। लोगों की पानी की ज़रूरतों को पूरी तरह नज़रंदाज किया गया है। इन परियोजनाओं को भूमिगत जल का निरंकुश दोहन करने की पूरी छूट दी गयी है, जिसकी वजह से भूमिगत जलस्तर नीचे होता जा रहा है। औद्योगिक और निर्माण कार्य से पैदा होने वाला कचरा नहरों-नदियों-तालाबों में डाल दिया जाता है, जिससे उनका पानी प्रदूषित हो जाता है। इन परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ और वन काटे जाते हैं, जो गिरते भूमिगत जलस्तर का एक और कारण है।

भूमिगत जलस्तर के गिरने के लिए तमाम निजी जल सप्लाई कम्पनियां भी दोषी हैं। ये कम्पनियां बहुत सारे गहरे-गहरे बोरवेल खोद कर खूब सारा पानी निकाल लेती हैं और फिर उसे ज़रूरतमंद लोगों को बेचती हैं।

गिरते भूमिगत जलस्तर से बड़े शहरों में पानी की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। (देखिये बॉक्स: तेज़ गति से गिरता भूमिगत जलस्तर)। अनेक शहरों में पानी की भारी किल्लत है। महाराष्ट्र के बीड शहर में पीने का साफ पानी ख़त्म हो गया है, घरों में बर्तन-कपड़े धोने या टॉयलेट फ्लश करने के लिए भी पानी नहीं है। प्राइवेट पानी के टैंकर 1000 लीटर पानी के लिए 200 रुपये लेते हैं।

आज चेन्नई जैसे शहरों में पानी की बहुत भारी किल्लत है। लोगों को दो बाल्टी पानी लेने के लिए, हर रोज़ कई घंटों तक पब्लिक नलों पर लाइन लगानी पड़ती है। चेन्नई शहर में और उसके आस-पास, लोग 4000 रुपए प्रति माह की क़ीमत पर पानी खरीदने को मजबूर हैं। पीने का पानी इसमें शामिल नहीं है। उसे अलग से खरीदना पड़ता है। राज्य प्रशासन लोगों को पीने का साफ पानी और पर्याप्त मात्रा में पानी की सप्लाई दिलाने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट गया है।

तीन साल पहले, चेन्नई और तमिलनाडु के कुछ और शहरों में भारी बाढ़ आये थे। अब चेन्नई और आस-पास के इलाकों में पानी की भारी किल्लत है। इन दोनों घटनाओं की वजह प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश है। चेन्नई में और आस-पास, जहां पहले नहरें और नदियां हुआ करती थीं, वहां अब बड़ी-बड़ी आवासीय और औद्योगिक परियोजनाएं बनाई गयी हैं। वर्षा का पानी जो पहले नहरों में बह जाता था या धरती को सींचकर भूमिगत जलस्तर को बनाए रखता था, अब बाढ़ पैदा करता है। अब कुंए और तालाब खाली हैं, भूमिगत जलस्तर बहुत नीचे गिर गया है। पहले लोग कुंए से पंप करके थोड़ा पानी निकल लेते थे, पर अब वह भी नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, बड़े पूंजीपतियों ने शहर में और आस-पास गहरे बोर वेल गाड़ रखे हैं, जिनसे वे अपनी परियोजनाओं के लिए खूब सारा पानी निकाल लेते हैं।

चेन्नई का अनुभव हिन्दोस्तानी राज्य की लापरवाही को दर्शाता है। यह दावा किया जाता है कि हिन्दोस्तान में कितना वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हुआ है, परन्तु इस राज्य के पास इतनी काबिलियत नहीं है कि अतिरिक्त वर्षा के समय जल संचय किया जाए और भूमिगत जलस्तर को ऊपर उठाया जाये, ताकि सूखा पड़ने पर पानी की किल्लत न हो।

पूरे देश में, राज्य की अनदेखी के कारण, परंपरागत जल स्रोत नष्ट हो गए हैं। ज्यादातर कुंए, नहर और तालाब सूखे पड़े हैं। (देखिये बॉक्स: राज्य की अनदेखी के कारण परंपरागत जल स्रोत नष्ट)। कई बड़ी और छोटी नदियों पर कई बड़े और छोटे बांध बनाये गए हैं, परन्तु अब इनमें बहुत कम पानी है। राज्य के अधिकारियों ने बड़े पूंजीपतियों को नदियों और नहरों के तट पर निर्माण कार्य करने और उनमें औद्योगिक कचरा फेंकने की छूट दे रखी है।

नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजनाओं के बारे में मीडिया में बहुत प्रचार किया जाता है, परन्तु इनमें भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने की ज़रूरत पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया है। मिसाल के तौर पर, सरकार की अति-महत्वपूर्ण परियोजना, केन-बेतवा नदियों को जोड़ने वाली परियोजना, को कामयाब करने के लिए सूखा-ग्रस्त बुंदेलखंड में 46 लाख पेड़ों को काटना पड़ेगा, ताकि दूसरे इलाकों तक पानी को पहुंचाया जा सके। भूमिगत जलस्तर को बनाये रखने में इन 46 लाख पेड़ों की काफी अहम भूमिका होगी।

हिन्दोस्तानी राज्य विकास की इतनी बातें करता रहता है, परन्तु लोगों को पीने का साफ पानी और घर-घर में पाइप से पानी की सप्लाई नहीं दे सकता है। 2015-16 में किये गए चैथे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, आज भी ज्यादातर हिन्दोस्तानी लोगों को पीने का पानी नहीं मिलता है। देश की मात्र 30 प्रतिशत आबादी को घर में पाइप से पीने का पानी मिलता है। जहां पाइप से पानी आता भी है, वह पीने लायक नहीं है। इसलिए, अनेक निजी कम्पनियां वाटर प्यूरीफायर बेचकर खूब मुनाफ़ा कमाती हैं, जिनसे बहुत पानी बर्बाद होता है।

घर-घर पाइप से पानी की सप्लाई के हमारी जनता के इस अपूर्ण सपने को पूरा करने के नाम से, मोदी सरकार ने, दोबारा सत्ता में आने के बाद, एक पहले क़दम बतौर, नल से जल कार्यक्रम की घोषणा की। इस परियोजना में घर-घर पाइप से पानी पहुंचाने के वादे के साथ, देशभर में पाइपों के जाल बिछाए जायेेंगे। परन्तु अनेक वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने यह बताया है कि जब हमारे सारे जल स्रोत इतनी तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं, तो इस प्रकार की परियोजना एक सपना मात्र है। “पाइप लगाने का क्या फ़ायदा है जब उनमें से सप्लाई करने के लिए पानी ही नहीं है?”, यह सवाल पूछा जा रहा है।

तेलंगाना में कुछ साल पहले मिशन भागीरथ का उद्घाटन किया गया था, जिसमें यह वादा किया गया था कि गांव-गांव में पाइप से पानी दिया जायेगा। परन्तु वहां के लोगों का कड़वा अनुभव यही दिखाता है कि वर्तमान व्यवस्था के चलते, इन परियोजनाओं का असली मकसद लोगों को पीने का पानी दिलाना नहीं बल्कि कुछ और ही है। इन परियोजनाओं को चलाने वाले पूंजीपतियों, अफसरों और मंत्रियों को राज्य की तिजोरी को लूटकर अपनी जेबें भरने का अच्छा मौका मिलता है। (देखिये बॉक्स: मिशन भागीरथ)।

जबकि पाइप से पानी हमारा एक अधूरा सपना बनकर रह गया है, तो जल माफ़िया बहुत पनप रहा है। यह जल माफ़िया राज्य, सरकारों और अफ़सरों के साथ नजदीकी का संबंध रखता है। (देखिये बॉक्स: जल माफ़िया)।

इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि आज देश में बार-बार सूखा पड़ना और पानी की कमी होना, यह हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा हमारे प्राकृतिक जल स्रोतों के प्रति लापरवाही और इन जल स्रोतों के विनाश का परिणाम है।

हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े-बड़े इजारेदार पूंजीपतियों की अमिट लालच और उनके हितों को पूरा करने को वचनबद्ध इस राज्य की नीतियों और अभ्यासों के चलते, हमारे जल संसाधन नष्ट हो रहे हैं। भूमिगत जल का निरंकुश दोहन हो रहा है, नदियों और नहरों में औद्योगिक कचरा फेंका जा रहा है और विशाल पैमाने पर वन काटे जा रहे हैं। यही सब आज देश में सब-तरफा जल संकट के लिए दोषी हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य जल संकट से त्रस्त शहरों और गांवों के लोगों की दुर्दशा के प्रति उदासीन है। राज्य लोगों को पीने का साफ पानी, शहरों और गांवों को पर्याप्त पानी की सप्लाई और कृषि के लिए पर्याप्त पानी दिलाने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट रहा है। हर संकट की तरह, इसमें भी लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। सूखा और पानी की किल्लत ऐसे अवसर हैं जब विभिन्न पूंजीपति और राज्य के संस्थान लोगों के दुःख-दर्द का फ़ायदा उठाकर बेशुमार मुनाफ़े कमाते हैं। भूमिगत जल और प्राकृतिक जल स्रोतों का खूब दोहन करके, पानी बेचा जाता है। जिनके पास पानी खरीदने के लिए पैसे हैं, वे पानी को खरीद सकते हैं। जो पानी नहीं खरीद सकते हैं, उन्हें अपने हाल पर ही छोड़ दिया जाता है।

यह सुनिश्चित करना मुमकिन है कि शहरों और गांवों में सभी लोगों को पर्याप्त मात्रा में पीने का साफ पानी और दूसरी ज़रूरतों के लिए पानी मिले। यह सुनिश्चित करना मुमकिन है कि किसानों को अपनी फसलों की सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिले। इनमें कटौती किये बिना, उद्योग के लिए पानी की ज़रूरतों को पूरा करना भी मुमकिन है। इसके लिए, अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलना होगा, पूरे समाज की ज़रूरतें पूरी करने की दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाना होगा, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में। बार-बार होने वाले सूखे और पानी की किल्लत को समाप्त करने के लिए एक ही रास्ता है, और वह है पूंजीवादी व्यवस्था को ख़त्म करना तथा जल संसाधनों और प्राकृतिक संसाधनों समेत सभी उत्पादन के साधनों को मज़दूर वर्ग, किसानों और मेहनतकश लोगों के हाथों में लाना। मज़दूर वर्ग को किसानों और सभी शोषितों के साथ गठबंधन बनाकर, अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी। अपने हाथ में राज्य सत्ता लेकर, मज़दूर वर्ग निजी पूंजीवादी मुनाफ़ों के लिए हमारे जल संसाधनों के निरंकुश दोहन पर रोक लगायेगा। तब हम सुनिश्चित कर सकेंगे कि पानी का बचाव किया जायेगा, जल स्रोतों का सही प्रबंधन किया जायेगा और फसलों की सिंचाई के साथ-साथ भूमिगत जल का संचय किया जायेगा। तब वर्षा न होने पर भी सूखा और पानी की किल्लत को रोका जा सकता है।

तेज़ गति से गिरता भूमिगत जल स्तर

नीति आयोग की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिन्दोस्तान की पानी की ज़रूरतों के 40 प्रतिशत की आपूर्ति करने वाले स्रोत तेज़ गति से ख़त्म हो रहे हैं। रिपोर्ट में यह अंदेशा प्रकट किया गया है कि दिल्ली, बैंगलूरू, चेन्नई और हैदराबाद समेत 21 शहरों में 2020 तक भूमिगत जल बिल्कुल ख़त्म हो जायेगा और 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को पेयजल नहीं मिलेगा।

जल संचय पर काम करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस समय हिन्दोस्तान भूमिगत जल का दोहन करने में दुनिया में सबसे आगे है। पर जिस गति से भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है, उससे यह आशंका पैदा हो रही है कि देश के बहुत सारे हिस्से कुछ ही दिनों में मरुस्थल बन जायेंगे।

इसके बावजूद, सरकार का केंद्रीय जल आयोग भूमिगत जल के इस क्षय को मानने को तैयार नहीं है।

राज्य की अनदेखी के कारण परंपरागत जल स्रोत नष्ट

चेन्नई के पास, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिलों में जल संसाधन मंत्रालय के केन्द्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने 3000 से अधिक जलाशय पाये हैं। ये जिले जल संचय के लिये बनाई गई विस्तृत जलाशयों की व्यवस्था के लिये परंपरागत तौर पर मशहूर हैं। परन्तु अब इनमें से ज्यादातर जलाशय नगर-निगम के कचरादान बन गये हैं। बाकियों पर बड़े-बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं। जिनमें अभी भी थोड़ा पानी बचा है, उनकी सही देखरेख नहीं की जा रही है। केन्द्र और राज्य में जो भी सरकार आती रही हैं, उसने इन जलाशयों की बड़े अपराधपूर्ण तरीके से उपेक्षा की है और इन्हें नष्ट किया है।

मिशन भागीरथ

अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना में 53,000 करोड़ रुपये के मिशन भागीरथ का उद्घाटन किया था। उसका घोषित मकसद था राज्य के 23,000 गांवों को कृष्णा और गोदावरी नदियों पर बने 26 जलाशयों से दो साल के अंदर पानी की सप्लाई देना। परन्तु आज तीन साल बाद भी, राज्य के सिर्फ 50 प्रतिशत इलाके में पानी के पाइप लगाये गये हैं। पूरे राज्य में पानी की सप्लाई तो अभी बहुत दूर है। मिशन भागीरथ से जिन-जिन इलाकों में पानी पहुंचा है, वहां के गांववासियों की यह शिकायत है कि वह पानी प्रदूषित है और पीने लायक नहीं है।

प्रधानमंत्री इसी प्रकार की परियोजना को देशभर में लागू करने का वादा कर रहे हैं!

जल माफ़िया

कुछ समय पहले एक टीवी चैनल ने दिखाया था कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा सूखाग्रस्त मराठवाडा के गांवों को पानी पहुंचाने के लिये लगाये गये पानी के टैंकरों को प्रतिदिन 2000 रुपये की क़ीमत पर, वहां पानी न देकर कुछ बड़े-बड़े पूंजीपतियों को पानी देने के लिये भेजा जा रहा है।

बीते वर्षों में पानी के टैंकरों का मफ़िया खूब पनप चुका है। उसे कई राजनीतिक नेताओं और राज्य के अफ़सरों का समर्थन प्राप्त है। जल माफ़िया को सूखा बहुत पसंद है क्योंकि इस संकट की घड़ी में उसके मुनाफ़े आसमान छूने लगते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच स्थित, सूखाग्रस्त बुंदेलखंड इलाके में प्रभावशाली स्थानीय नेता नियमित तौर पर पानी की सप्लाई के काम को अपने दलालों को आउटसोर्स करते हैं। ये दलाल सूखाग्रस्त इलाकों में पानी की क़ीमत को कई गुना बढ़ाकर बेचते हैं। जल माफ़िया को जल समृद्ध इलाकों में गहरे बोर वेल खोदकर खूब सारा पानी निकालने की पूरी छूट दी गई है, जिसकी वजह से वे इलाके कुछ ही सालों में सूख जायेंगे।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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