भारतीय रेल के निजीकरण को आगे बढ़ाने वाले 100 दिन के एक्शन प्लान का विरोध करें

कामगार एकता कमेटी, ऑल इंडिया गार्ड्स काउन्सिल, ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसियेशन, ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसियेशन, ऑल इंडिया रेलवे इंजीनियर्स फेडरेशन, ऑल इंडिया रेलवे सिग्नल्स और टेलीकम्युनिकेशन स्टाफ एसोसियेशन, ऑल इंडिया ट्रेन कंट्रोलर्स एसोसियेशन, ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन, इंडियन रेलवे टिकिट चेकिंग स्टाफ ऑरगेनाईजेशन, एयर इंडिया सर्विस इंजीनियर्स एसोसियेशन, ऑल इंडिया बैंक इम्प्लॉईज़ एसोसियेशन, बैंक इम्प्लॉईज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया, लोक राज संगठन और ट्रेड यूनियन्स जॉइंट एक्शन कमिटी - महाराष्ट्र का सामूहिक आह्वान - 7 जुलाई, 2019

साथियों और दोस्तों,

पीयूष गोयल के नेतृत्व में रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल के विघटन और पुनर्गठन के लिए एक 100 दिन का एक्शन प्लान बनाया है। रेलवे बोर्ड ने भारतीय रेल के सभी विभागों को भेजे सर्कुलर में आदेश दिया है कि वे एक्शन प्लान में रेल मंत्री द्वारा लिखे सभी बिन्दुओं को 31 अगस्त, 2019 तक अमल करें। इनमें सम्मलित हैं यात्री गाड़ियों को चलाने के लिए निजी कंपनियों को आमंत्रित करना, यात्री टिकट दर बढ़ाना, रेलवे की उत्पादन इकाइयों की अलग कम्पनियां बनाना तथा भारतीय रेल का पुनर्गठन करना एवं आकरण सही करना, जिसका असली अर्थ है श्रम संख्या कम करना।

ICF Chennai Workers’ UnionLalganj Raibrelly

रेल मंत्रालय की ऊपर दी गयी सिफारिशें मोदी सरकार द्वारा सितम्बर 2014 में गठित बिबेक देबराय कमेटी की सिफारिशों पर आधारित हैं। उनका मुख्य जोर भारतीय रेल का क़दम-ब-क़दम विघटन कर उन्हें निजी कंपनियों को सौंपना था अतः सभी रेलवे यूनियनों द्वारा उनका बहुत ज़ोर-शोर से कठोर विरोध किया गया था। रेल मज़दूरों के इस विरोध को देख कर तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभू ने घोषणा की थी कि देबराय कमेटी की सिफारिशों पर अमल नहीं किया जायेगा। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिसम्बर 2014 में डीजल लोको वर्क्स के हजारों मज़दूरों के सामने ऐलान करना पड़ा था कि भारतीय रेल का कभी निजीकरण नहीं किया जायेगा तथा मज़दूरों को ऐसी “अफवाहों” पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

दूसरे सत्र के लिए पुनर्निर्वाचित होने के बाद अब मोदी सरकार देबराय कमेटी की रिपोर्ट की बिलकुल वही सिफारिशें 100 दिन के एक्शन प्लान के अंतर्गत लागू कर रही है। यह रेल मंत्री एवं प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन के साथ सीधा विश्वासघात है।

100 दिन के एक्शन प्लान ने प्रस्ताव दिया है कि बड़े शहरों को जोड़ने वाले व्यस्त सुनहरे चतुर्भुज (गोल्डन क्वारडीलैटरल) या डायगोनल मार्गों पर दो गाड़ियों को आई.आर.सी.टी.सी. को चलाने के लिए सौंप दिया जाए। क्योंकि आई.आर.सी.टी.सी. भारत सरकार का उद्यम है इन दो गाड़ियों को चलाने के लिए उसे आसान नियम व शर्तें दी जायेंगी। उसके बाद 3 महीनों के अंदर रेल मंत्रालय राजधानी, शताब्दी तथा अन्य अत्यंत-तेज़ गाड़ियों को चलाने के लिए निजी कंपनियों से टेंडर मंगाएगा। ऐसा लगता है कि इन निजी कंपनियों को भी आई.आर.सी.टी.सी. के जैसी ही आसान शर्तें “सामान खेल क्षेत्र” (लेवल प्लेइंग फील्ड) प्रदान करने के नाम पर दी जायेंगी। अतः शुरू में आई.आर.सी.टी.सी. को आसान शर्तें प्रदान करना एक चाल है जिससे कि बाद में निजी कंपनियों को आकर्षक शर्तों पर गाड़ियों को चलाने के लिए दिया जा सके।

Protest at the Diesel Locomotive Works in VaranasiRaily workers protest in Varansi

यह जाहिर है कि निजी कम्पनियां केवल व्यस्त मार्गों में दिलचस्पी लेंगी जहां अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं। ये हैं दिल्ली-मुंबई तथा दिल्ली-हावड़ा मार्ग जहां से 30 प्रतिशत यात्री और 20 प्रतिशत माल ट्रैफिक आता है। अतः इन मार्गों को निजी कंपनियों के लिए आकर्षक बनाने के लिए रेल मंत्रालय ने एक्शन प्लान में इन दो मार्गों के आधुनिकीकरण के लिए 13,490 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

प्रत्येक नागरिक को वहन करने योग्य दर पर रेलगाड़ी यात्रा प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है। परन्तु एक्शन प्लान रेल भाड़ों से यात्री अनुदान (सबसिडी) समाप्त करने को कहता है जो कि बिलकुल अन्यायपूर्ण है। रेलवे दावा करती है कि वह माल ढुलाई पर ज्यादा भाड़ा दर लगाकर यात्री भाड़े पर अनुदान देती है। बड़ी कम्पनियां माल भाड़ा दर कम करने की मांग कर रही हैं। अतः नरेन्द्र मोदी के पुनर्चुनाव के लिए फंड देने वाली बड़ी कंपनियों को खुश करने के लिए यात्री भाड़ा दर बढ़ाई जा रही है। गाड़ियां चलाने के लिए यात्री भाड़ा दर बढ़ाना निजी कम्पनियों की पूर्व शर्त है। 

एक्शन प्लान ने 7 उत्पादन इकाइयों को अलग-अलग कंपनी बना कर एक नयी कंपनी, इन्डियन रेलवे रोलिंग स्टॉक कंपनी को बेचने को भी कहा है। प्रत्येक कंपनी एक स्वतंत्र मुनाफ़ा इकाई के रूप में काम करेगी और अंततः उसका निजीकरण कर दिया जायेगा। उत्पादन इकाइयों की अलग-अलग कंपनी बनाने का प्रस्ताव भी देबराय कमेटी की सिफारिशों के अनुसार है।

मोदी सरकार द्वारा कम्पनियां बनाकर भारतीय रेल का निजीकरण पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई नीति को जारी रखता है। आई.आर.सी.ओ.एन. इंटरनेशनल, आई.आर.सी.टी.सी., आई.आर.एफ.सी., एम. आर.वी.सी.एल., आर.वी.एन.एल., सी.ओ.एन.सी.ओ.आर. एवं अन्य कॉर्पोरेशन कांग्रेस सरकर के शासन काल में ही बनाए गए थे।

जैसे ही रेलवे बोर्ड ने 18 जून को अपना सर्कुलर 100 दिन के एक्शन प्लान पर अमल करने के लिए भेजा रेल मज़दूरों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिये। राय बरेली के मॉडर्न कोच फैक्ट्री की सभी यूनियनों ने परिवार सहित फैक्ट्री के सामने संयुक्त विशाल प्रदर्शन किया। रेल मंत्रालय की कंपनी बनाने की योजना का एकमत से विरोध करते हुए उन्होंने 24 जून को फैक्ट्री के महाप्रबंधक को एक मेमोरंडम दिया। मज़दूरों के विशाल विरोध ने महाप्रबंधक को उस मेमोरंडम को रेलवे बोर्ड को 25 जून को भेजने के लिए मजबूर कर दिया और कंपनी बनाने के विषय पर मज़दूरों के गुस्से एवं विरोध की भी सूचना दी। 28 जून को वाराणसी के डीजल लोको वर्क्स के मज़दूरों व उनके परिवार ने प्रस्ताव के विरोध में विशाल प्रदर्शन किया। उन्होंने नरेन्द्र मोदी को चेतावनी दी कि वे दिसम्बर 2014 में किए गए वायदे से न मुकरें।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि रेलवे बोर्ड ने अगस्त 2019 के अंत में भारतीय रेल की ट्रेड यूनियनों की मान्यता के लिए चुनाव घोषित किये हैं। यह जानबूझकर किया गया है जिससे कि चुनाव के लिए मज़दूर एक दूसरे से लड़ने में व्यस्त रहें और ताकि उनकी पीठ के पीछे वे 100 दिन का एक्शन प्लान लागू करना चाहते हैं!

हम सभी भारतीय रेल मज़दूरों के साथ-साथ अन्य सभी मज़दूरों व यात्रियों को आह्वान करते हैं कि वे एकजुट होकर भारतीय रेल में निजीकरण को आगे बढ़ाने वाले 100 दिन के एक्शन प्लान का विरोध करें!

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