कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक 2019

23 जुलाई, 2019 को केंद्रीय श्रममंत्री ने संसद में, कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक 2019 को पेश किया।

यह विधेयक उन चार श्रम संहिता में से एक है जिसे बड़े सरमायदार चाहते थे कि राजग सरकार अपने पहले कार्यकाल में लागू करे। लेकिन मज़दूर वर्ग के मजबूत प्रतिरोध के चलते सरकार यह विधेयक पारित नहीं कर पाई थी। अब बड़े सरमायदार भाजपा को पहले से अधिक बहुमत के साथ जिताकर सत्ता में बैठाने में कामयाब रहे हैं और चाहते हैं कि यह सरकार उन चार मज़दूर-विरोधी कानूनों को ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर, जल्दी से जल्दी संसद में पारित करा दे।

हमारे देश में मज़दूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की परिस्थितियां हमेशा से मज़दूर वर्ग आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा रहे हैं। आज़ादी से पहले और उसके बाद के दौर में मज़दूर वर्ग मज़दूरों के कुछ तबकों के लिए कार्य की बेहतर परिस्थितियां सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने में पूंजीवादी सरकारों को मजबूर करने में कामयाब हुआ था। फैक्ट्री मज़दूर, खदान मज़दूर, पत्रकार और अख़बार उद्योग में काम करने वाले मज़दूर, ठेका मज़दूर, गोदी मज़दूर, बीड़ी मज़दूर, निर्माण मज़दूर और मज़दूरों के कुछ अन्य तबकों के मज़दूर अपने क्षेत्र से संबंधित कानून बनाने के लिए सरकार को मजबूर करने में कामयाब रहे थे।

13 believed dead in Meghalayabalco_mishap

लेकिन इन तमाम कानूनों के बावजूद मज़दूर दयनीय हालतों में काम करने को मजबूर हैं। ऐसा अनुमान है कि हर साल 80,000 मज़दूर कार्यस्थल पर “दुर्घटना” में अपनी जान गंवा देते हैं। लाखों मज़दूर घायल हो जाते हैं और कई मज़दूर ज़िन्दगी भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं। फैक्ट्री और गोदामों में आग लग जाना, भूमिगत खदानों के धंसने से मज़दूरों का फंस जाना, खदानों में पानी भर जाने से मज़दूरों का डूबकर मर जाना, भट्टियों में धमाके, निर्माण स्थलों से गिरकर मज़दूरों की मौत, रेल की पटरियों पर काम करते हुये ट्रेकमेनों की मौत और नालों की साफ-सफाई करते हुए मज़दूरों की मौत, ये हमारे देश में हर रोज़ की घटनायें हैं। इनमें से केवल कुछ घटनायें ही रिपोर्ट होती हैं, जबकि अधिकांश घटनाओं की कोई खोज-ख़बर भी नहीं होती। ऐसे हादसों में मरने वाले अधिकांश मज़दूर ठेके पर रखे जाते हैं। ये मज़दूर बेहद दयनीय हालतों में काम करने को मजबूर होते हैं और सुरक्षा के तमाम कानूनों और नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। ऐसे हादसों में हुई मज़दूरों की मौत के आधिकारिक आंकडे़ तक सरकार के पास मौजूद नहीं हैं, क्योंकि सरकार उन मज़दूरों के काम की हालतों की जानकारी तक नहीं रखती है, जो ऐसे लाखों गैर-पंजीकृत फैक्ट्रियों, दफ्तरों, दुकानों, निर्माण स्थलों, आदि में काम करते हैं। 

कार्यस्थलों पर “दुर्घटनाओं” में मज़दूरों की मौत, यह काम की हालतों की वजह से मौत का एकमात्र या प्रमुख कारण नहीं है। फैक्ट्रियों और खदानों में काम के हालात इतने खराब हैं कि इनकी वजह से मज़दूर कई तरह के रोगों के शिकार बन जाते हैं और उनकी जल्दी मौत हो जाती है। अक्सर मज़दूर कैंसर और गुर्दे की बीमारी के शिकार हो जाते हैं। आई.एल.ओ. के अनुसार, पूरी दुनिया में हर वर्ष करीब 36 लाख मज़दूरों की मौत कार्यस्थल की हालतों से हुई बीमारियों की वजह से होती है और इसमें 19 प्रतिशत की मौत दुर्घटनों में होती है। इनमें से 33 प्रतिशत यानी 12 लाख मौतें हिन्दोस्तान सहित दक्षिण एशिया में होती हैं। ये आंकड़े केवल इस समस्या के भयावह पैमाने की ओर इशारा करते हैं क्योंकि सरकार कार्यस्थल की हालतों से हुई बीमारियों की वजह से मज़दूरों की मौत का कोई ब्योरा नहीं रखती है।

हमारे देश के मज़दूर जिस तरह की दयनीय हालतों में काम करने के लिए मजबूर हैं यह हमारे देश में मौजूद आदमखोर पूंजीवादी व्यवस्था और राज्य की गुनहगारी को दर्शाता है, जो इस शोषण की व्यवस्था की हिफ़ाज़त करने के लिए प्रतिबद्ध है। मज़दूरों के लिए काम की सुरक्षित हालतें मुहैया कराना यह कोई बहुत कठिन काम नहीं है। लेकिन पूंजीपति वर्ग ऐसा करने से इंकार करता है क्योंकि ऐसा करने से उसके अधिकतम मुनाफे़ बनाने के लक्ष्य को क्षति होगी। आज़ादी के समय से आज तक तमाम सरकारें पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित करने के लक्ष्य से काम करती आई हैं, हालांकि वे साथ ही साथ मज़दूरों के स्वास्थ्य की चिंता प्रकट करती रही हैं। मोदी सरकार भी इसमें कुछ अलग नहीं है।

Bombay High Fire 27 July 2005

मज़दूरों के बीच इस विषय पर भ्रम पैदा करने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाया है जिसके तहत वह अपने मज़दूर-विरोधी हमलों को मज़दूरों के हित में उठाये गये क़दम के रूप में पेश कर रही है।

कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक को सरकार ने मज़दूरों के अलग-अलग तबकों जैसे निर्माण मज़दूर, पत्रकार, इत्यादि के बीच काम करते आ रही केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और तमाम मज़दूर संगठनों की सिफारिशों को ठुकराते हुए तैयार किया है। दूसरे शब्दों में सरकार ने उन्हीं मज़दूरों की सिफारिशों को पूरी तरह से ठुकराया है जो कार्यस्थल की घटिया हालतों के सबसे दयनीय शिकार हैं। यह इस बात का सबूत है कि सरकार के तमाम प्रचार के बावजूद इस विधेयक का लक्ष्य मज़दूरों के काम पर स्वास्थ्य व सुरक्षा तथा काम की हालतों को बेहतर करना नहीं है। इसका लक्ष्य है पूंजीपतियों द्वारा मज़दूरों के शोषण को और अधिक तेज़ करने को आसान बनाना। 

यह विधेयक खेत मज़दूरों सहित देश के 90 प्रतिशत मज़दूरों को अपने दायरे से बाहर रखता है, और यह विधेयक केवल उन्हीं उद्यमों पर लागू होगा जहां कम से कम 10 मज़दूरों का नाम वेतन सूची में दर्ज़ है। यह विधेयक आई.टी. मज़दूरों और “मेनेजर”, और “सुपरवाइजर”, इत्यादि कहे जाने वाले मज़दूरों को भी अपने दायरे से बाहर रखता है।

“ओवर टाइम” के नाम पर यह विधेयक एक सप्ताह में 48 घंटों से अधिक काम कराने की इजाज़त देता है। जबकि मज़दूर हर दिन 12 घंटे और सप्ताह में 6 दिन काम करने के लिए मजबूर हैं, तो यह विधेयक मज़दूरों की काम की मौजूदा घटिया हालतों को एक कानूनी मान्यता देता है।

यह विधेयक महिला मज़दूरों पर एक बड़ा हमला है। यह महिलाओं के रात्रि पाली में काम करने को भी कानूनी मान्यता देता है, यह कहकर कि यह “स्वेच्छापूर्ण” है। एक महिला या लड़की जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए काम करने को मजबूर है, उसके लिये रात्रि पाली में काम करना “स्वेच्छा” कैसे हो सकती है? यह विधेयक कार्यस्थल पर और काम पर आने-जाने के दौरान कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा की कोई भी गारंटी नहीं देता है।

ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है जिसके ज़रिये इस विधेयक में स्वास्थ्य, सुरक्षा और काम की हालत संबंधी किये गए वादों को हक़ीक़त में लागू किया जा सके। इस विधेयक के मुताबिक, यदि किसी मज़दूर को कोई समस्या है तो वह इसकी शिकायत प्रबंधन से कर सकता है और यह उम्मीद कर सकता है कि उसकी शिकायत का निवारण किया जायेगा! यह विधेयक इस हक़ीक़त को पूरी तरह से नज़रंदाज़ करता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में मज़दूर अपने रोज़गार के लिए पूरी तरह से पूंजीपतियों पर निर्भर हैं। यदि कोई मज़दूर प्रबंधन के खि़लाफ़ कोई भी शिकायत करता है तो उसकी नौकरी खोने का ख़तरा हो सकता है। यह विधेयक काम के बेहतर हालात के लिए लड़ने में ट्रेड यूनियनों की भूमिका को पूरी तरह से ख़त्म करता है।

मज़दूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम के हालातों से संबंधित मौजूदा 13 क्षेत्रीय कानूनों को एक श्रम संहिता में सम्मिलित करने का यह काम मज़दूरों के हितों की हिफ़ाज़त के लिए नहीं किया जा रहा है। इस विधेयक में ऐसे कई प्रावधानों को हटाया जा रहा है जिनको मज़दूर बड़े संघर्षों के बाद कानून के रूप में तब्दील कर पाए हैं। यह नयी श्रम संहिता इतनी लंबी है और जटिल कानूनी भाषा में बनायी गयी है कि कोई भी साधारण मज़दूर इसे समझ नहीं सकता है। केवल एक वकील, जो एक लाइन में एक बात और अगली लाइन में ठीक उसके विपरीत बात को कहने में माहिर हो, शायद वही इसको समझ सकता है। दूसरे शब्दों में, मोदी सरकार का यह वादा कि “पुराने कानूनों” को बदला जाना चाहिए और उसकी जगह पर सरल कानून बनाये जाने चाहिएं, यह केवल एक खोखला वादा है। यह विधेयक कार्यस्थल पर मज़दूरों के अधिकारों को साफ और सरल तरीके से परिभाषित करने वाला कानून किसी भी मायने में नहीं है, जिसे देश का हर एक मज़दूर आसानी से समझ सके।

कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक को मज़दूर वर्ग को एक आवाज़ में ठुकराना चाहिये। कार्यस्थल पर स्वास्थ्य, सुरक्षा और बेहतर हालात सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने का हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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