वेतन संहिता विधेयक 2019

3 जुलाई को केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने वेतन संहिता विधेयक 2019 को मंजूरी देकर यह सुनिश्चित किया कि यह विधेयक अभी चल रहे संसद सत्र में पेश किया जायेगा। इस विधेयक का एक मुद्दा यह भी है कि केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की घोषणा करेगी। सभी राज्यों को इस राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन से कम वेतन देने की इज़ाज़त नहीं होगी।

Minimum Wage in India_Hindi

विधेयक में राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को 178 रुपये प्रतिदिन निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह वेतन 2017 के वेतन से केवल 2 रुपये अधिक है, देश के कई राज्यों में न्यूनतम वेतन की राषि पहले से ही, इससे कहीं अधिक है। केवल कुछ प्रदेश जैसे नगालैंड, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश हैं, जहां पर न्यूनतम वेतन की राशि 178 रुपये प्रतिदिन से कम है। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि इस विधेयक का उद्देश्य लोगों की रोज़ी-रोटी के हालातों को बेहतर बनाना नहीं है जैसा कि सरकार अपने बयानों में झूठा प्रचार करती आयी है। इस विधेयक में सरकार का मज़दूर-विरोधी वर्ग चरित्र भी साफ़ दिखता है।

राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की राशि जिस स्तर पर निर्धारित की गयी है उससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सरकार मज़दूरों को एक सम्मानजनक मानव जीवन जीने का हक़दार नहीं समझती। यह विधेयक सरकार के “सबका साथ, सबका विकास” के खोखले नारे का भी पर्दाफाश करता है।

सरकार का केवल एक ही मक़सद है कि किस तरह से मज़दूरों का वेतन इतना कम रखा जाए, जिससे पूंजीपतियों को मज़दूरों के और अधिक शोषण से अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने का अवसर मिले।

जनवरी 2019 में, श्रम मंत्रालय ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया पर समीक्षा और विचार करके, एक नयी कार्यप्रणाली की सिफारिश करने के लिये एक समिति का गठन किया था। इस विशेष समिति ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को 375 रुपये प्रतिदिन रखने, इसके अलावा 55 रुपये प्रतिदिन मकान के किराये भत्ते के प्रावधान की सिफारिश की थी। फरवरी 2019 से विशेष समिति की ये सिफारिशें श्रम मंत्रालय की वेबसाइट पर भी उपलब्ध हैं। देशभर में सभी ट्रेड यूनियनों ने विशेष समिति की इन सिफारिशों को मानने से इसलिए इनकार किया क्योंकि वे 18,000 रुपये प्रति माह के न्यूनतम वेतन, जिसकी मांग कई सालों से की जा रही है, उससे भी कम थी। यह कितनी शर्मनाक और जले पर नमक छिड़कने वाली बात है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को 178 रुपये की इतनी दयनीय और अपमानजनक राशि तय करने का निर्णय लिया।

इसके अलावा इस सवाल से और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हैं।

आज के हालातों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन देश के अधिकांश मज़दूरों को नसीब नहीं है अधिकांश मज़दूरों की समस्या यह है कि उनका कोई स्थाई मालिक नहीं है। ज्यादातर मज़दूर ठेके के तहत दिहाड़ी पर काम करते हैं।

अगर दिल्ली का उदाहरण लेते हैं, तो यहां न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये से अधिक होना चाहिए, लेकिन लाखों मज़दूर जो हाउसिंग कालोनियों, बैंकों, शॉपिंग मॉलों और कारखानों में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं, जिनको प्रतिदिन 12 घंटे की शिफ्ट में काम करना पड़ता है और उनका वेतन 7,000 से 9,000 रुपये प्रति माह से ज्यादा नहीं होता। जैसा कि हम सभी जानते हैं - महिलाएं और नौजवान जो दुकानों में काम करते हैं या काल सेंटरों में ऑपरेटर और साफ़-सफाई या फ्रंट डेस्क पर तरह-तरह के काम करते हैं उनको 5,000-6,000 रुपये से ज्यादा वेतन नहीं मिलता। कहा जा रहा है कि इस विधेयक से 50 करोड़ मज़दूरों को राहत मिलेगी पर कैसे? इस क़ानून को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लागू कौन करेगा?

न्यूनतम वेतन कानून को लागू करने के तंत्र बनाने की बजाय, सरकार वर्तमान व्यवस्था जिसमें श्रम न्यायालय द्वारा निरीक्षण का प्रावधान है, उसको हटाकर, स्व-प्रमाणीकरण (सेल्फ सर्टिफिकेषन) को लागू करना चाहती है। क्या गारंटी है कि पूंजीपतियों द्वारा किया गया स्व-प्रमाणीकरण सही है और वे हक़ीक़त में इस कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। इस नए कानून के तहत मज़दूरों के पास पूंजीपतियों के प्रमाणीकरण को चुनौती देने का कोई साधन भी नहीं रहेगा। इस “स्व-प्रमाणीकरण” के प्रावधान का मतलब है कि उन पूंजीपतियों को भी न्यूनतम वेतन कानून का उल्लंघन करने की खुली छूट होगी जो हजारों मज़दूरों को नौकरी पर रखते हैं।

दूसरा मुद्दा यह है कि राज्य सरकारें न्यूनतम वेतन की राशि को समय-समय पर बदलती हैं और पांच वर्षों के अंतराल के बाद तो न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी अनिवार्य है। इस नए श्रम कानून के तहत, न्यूनतम वेतन में परिवर्तन पांच साल में केवल एक बार ही किया जाएगा। इसका मतलब है कि पांच वर्षोंं तक मज़दूरों के पास, बढ़ती महंगाई से राहत पाने का कोई साधन नहीं होगा। अधिकांश मज़दूरों के लिए, जो न तो यूनियनों में संगठित हैं और जिनका काम ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत आता है उनके लिए अगले पांच वर्षों तक न्यूनतम वेतन एक तरह से अधिकतम वेतन हो जाएगा। यह दिखाता है कि सरकार को मज़दूरों के साथ कितनी हमदर्दी है।

न्यूनतम वेतन की लड़ाई बहुत पुरानी है। 1957 में हिन्दोस्तानी श्रम सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसके अनुसार, न्यूनतम वेतन को इस प्रकार से तय करना होगा जो मज़दूरों की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए पर्याप्त हो। यह कितनी शर्म की बात है कि इस प्रस्ताव के 62 साल बाद भी, हिन्दोस्तान का शासक वर्ग न्यूनतम वेतन की परिभाषा को लागू करने को तैयार नहीं है। मज़दूरों को एक सम्मानजनक मानव जीवन जीने के लिए जो कुछ भी ज़रूरी है, उसकी पूर्ति के लिए आवश्यक वेतन सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है और सरकार इससे इंकार कर रही है।

हमारे देश में इस समय उत्पादन के साधन इतने विकसित हो गये हैं कि हर एक देशवासी को दूध, अंडे, मांस, खाद्य तेल, चीनी, दाल और सब्जियां आदि समेत पौष्टिक भोजन सुनिश्चित किया जा सकता है। हर पारिवार के लिये आरामदेह, शौचालय सहित घर उपलब्ध कराया जा सकता है, पीने का पानी और बिजली की सप्लाई मुहैया कराई जा सकती है। हर परिवार के बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा, सभी के लिये अच्छी स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुरक्षा और वृद्धावस्था पेंशन सुनिश्चित किये जा सकते हैं। यह ज़रूरी है और मुमकिन भी कि मज़दूरों को ऐसा जीने लायक वेतन दिया जाये जिससे वे एक इज्ज़तदार मानव जीवन जी सकें।

इस संभावना को हक़ीक़त में क्यों नहीं बदला जा सकता है? इसकी वजह उत्पादन के पूंजीवादी संबंध हैं, जिनमें उत्पादन के साधनों की मालिकी पूंजीपति वर्ग के हाथों में है और अधिकांश लोगों के पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते हैं, इसलिये वे अपनी श्रम शक्ति को पूंजीपतियों को बेचने को मजबूर होते हैं। अर्थव्यवस्था की दिशा का मकसद लोगों की ज़रूरतें पूरा करना नहीं बल्कि पूंजीपति वर्ग की अमिट लालच को पूरा करना है। हिन्दोस्तानी राज्य सरमायदारों को राज्य है और सरमायदार वर्ग के हितों की ही हिफ़ाज़त करता है। जो भी सरकार अब तक सत्ता में आई है, वह पूंजीपति वर्ग के हितों की ही हिफ़ाज़त करती रही है, परन्तु मज़दूरों की समस्याओं के बारे में घड़ियाली आंसू बहाती रही है। मोदी सरकार इससे किसी भी रूप में भिन्न नहीं है।

हिन्दोस्तान के शासक, न्यूनतम वेतन की बात करते हैं उस वेतन की नहीं जो एक सम्मानजनक मानव जीवन जीने के लिए पर्याप्त हो। जिस न्यूनतम वेतन का राज्य सरकारें और केंद्र सरकार निर्धारण करती हैं वह एक सम्मानजनक मानव जीवन जीने की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

मज़दूरों और उनके परिवारों के लिए ज़रूरी भोजन को एक पौष्टिक आहार की ज़रूरत के रूप में नहीं बल्कि कैलोरी में परिवर्तित करके देखा जाता है। शासक वर्ग का मानना है कि “मज़दूर अंडे और मांस नहीं खाते और झुग्गियों में रहते हैं इसलिए कम लागत वाले सरकारी घरों के बराबर मकान का किराया भत्ता पाने की उनकी मांग जायज़ नहीं है” (दिल्ली के मुख्यमंत्री ने यही जवाब दिया था जब 2013 में न्यूनतम वेतन को 15000 रुपये प्रति माह निर्धारित करने की मांग को लेकर ट्रेड यूनियनों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात की थी।) और सच यही है कि पूंजीपति और उनकी सरकारों की मज़दूरों के बारे में सोच यही है कि मजदूर कीडे़-मकोड़ों की जिंदगी जीने लायक हैं। चाहे सर्वोच्च न्यायालय और सरकारें न्यूनतम वेतन के बारे में कितनी भी अच्छी-अच्छी बातें कहें और बड़े-बड़े नारे दें।

anganwadi-workers

2019 का आर्थिक सर्वेक्षण इसका एक अच्छा उदाहरण है। इस सर्वेक्षण में जिक्र है, “एक सुनियोजित, सुव्यवस्थित न्यूनतम वेतन प्रणाली, जिससे देश में वेतनों की असमानता कम होगी”। वित्तमंत्री ने लोकसभा में अपने बजट भाषण में “एक प्रभावशाली न्यूनतम वेतन नीति जो सबसे निचले स्तर पर मज़दूरों के लिए बनाई गयी है”, उसका जिक्र किया। बजट पर वित्तमंत्री के भाषण के दो दिन बाद मंत्रीमंडल ने वेतन संहिता विधेयक को सहमति दे दी। और इस नये वेतन संहिता विधेयक में ऐसा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन प्रस्तावित किया गया है, जिससे एक इंसान को भी एक महीने के लिये पर्याप्त भोजन नहीं मिलेगा, तो मज़दूर के परिवार की जीवन की दूसरी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना तो बहुत दूर की बात है।

सभी मज़दूर यूनियनों ने इस प्रस्तावित श्रम कानून विधेयक का सख्त विरोध किया है। मज़दूर यूनियनों की मांग है 18,000 रुपये प्रति माह का न्यूनतम वेतन, जिसे समय-समय पर महंगाई के साथ बढ़ाया जाए और 6,000 रुपये प्रति माह की पेंशन। ट्रेड यूनियनें यह मांग कर रही हैं कि सभी मज़दूरों को सरकार के रिकार्डों में मज़दूर बतौर पंजीकृत किया जाये और यह सरकार की ज़िम्मेदारी हो कि हर मज़दूर को एक ऐसा जीने लायक वेतन मिले जो मज़दूर और उसके परिवार के लिये इज्ज़तदार मानव जीवन सुनिश्चित कर सकता है।

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मज़दूर वर्ग के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक संघर्ष है। मज़दूर और किसान ही समाज में उत्पादन की जा रही सभी संपत्ति के उत्पादनकर्ता हैं। मज़दूर वर्ग यह नहीं स्वीकार कर सकता कि एक तरफ मज़दूर गुलामों की तरह अमानवीय हालतों में ज़िन्दा रहने के लिए मजबूर हो और दूसरी तरफ, बड़े-बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति घराने देश की सम्पति को इस या उस बहाने लूटते रहें और अपने अधिकतम मुनाफ़ों के लिए देश के मज़दूरों-किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों का शोषण करते रहें।

पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य को मशीन की तरह देखा जाता है, पूंजीवादी सोच में मनुष्य मशीन की तरह है, जिसे दिन में केवल उतना ही देने की ज़रूरत है जिससे कि पूंजीपति को शोषण के लिए अगले दिन भी एक मनुष्य उपलब्ध हो। जबकि, मज़दूर वर्ग एक ऐसे नए समाज की रचना के लिए संघर्ष करता है, जिसमें समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली सुनिश्चित की जा सके और राज्य का कर्तव्य और ज़िम्मेदारी है कि समाज के सभी सदस्यों की हमेशा बढ़ती हुई भौतिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा करने के साधन उपलब्ध हों।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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