हिन्दोस्तानी और अमरीकी सरकारों द्वारा आप्रवासियों पर वहशी अत्याचार की कड़ी निन्दा करें!

17 जुलाई, 2019 को गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य सभा में ऐलान किया कि उनकी सरकार “देश की धरती के हर इंच पर बसे अवैध आप्रवासियों को ढूंढ़ निकालेगी और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार उन्हें देश से निकाल देगी”। भाजपा ने सभी राज्यों में “नेशनल रेजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स” (एन.आर.सी.) को पूरा करना अपने चुनाव कार्यक्रम का एक मुख्य मुद्दा बनाया है। इससे पूर्व, चुनाव अभियान के दौरान गृहमंत्री ने बार-बार बांग्लादेश से आये आप्रवासियों को “दीमक” जैसा बताया था।

इस समय असम राज्य के लिये खासकर एक एन.आर.सी. है, जिसे 1985 की असम संधि को लागू करने के लिये स्थापित किया गया है। अगस्त 2018 में एन.आर.सी. ने जो आंकड़े जारी किये थे, उनके अनुसार 40 लाख लोगों को गैर-नागरिक घोषित किया गया है और उन पर देश से निकाले जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। गैर-नागरिक करार दिये गये लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त, 2019 तक समय दिया है सरकार द्वारा नियुक्त अदालतों के सामने यह साबित करने के लिये कि वे वास्तव में हिन्दोस्तानी नागरिक हैं। बहरहाल, असम सरकार ने भूतपूर्व प्रकाशित एन.आर.सी. सूची की पुनः जांच की है तथा उसमें एक लाख और लोगों को “गैर-नागरिक” बताकर जोड़ दिया है।

“अवैध आप्रवासी” करार दिये गये लोगों को भयानक परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है। उनके सामने इस तथाकथित “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र” में नज़रबंदी शिविरों में बाकी जीवन बिताने का भयावह भविष्य है। इन पीड़ित लोगों के प्रति हमारी सरकार का अत्यंत अमानवीय रवैया एटोरनी जनरल के सुप्रीम कोर्ट में दिये गये बयान कि “हिन्दोस्तान सारी दुनिया के शरणार्थियों का अड्डा नहीं बन सकता है”, से स्पष्ट होता है।

केन्द्र और राज्य सरकारें एन.आर.सी. को पूरा करने के इस अभ्यास को जायज़ ठहराने के लिये लगातार यह ज़हरीला प्रचार फैला रही हैं कि “अवैध आप्रवासी” और “विदेशी” लोग “हमारी जनता की नौकरियां, ज़मीन और दूसरे क़ीमती संसाधनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं”। इस अभियान में खास तौर पर मुसलमान बंगालियों पर निशाना साधा जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य है धर्म और भाषा के आधार पर लोगों को बांटना और लोगों में डर व असुरक्षा फैलाना।

ग़रीबी, रोज़गार की असुरक्षा, राजकीय उत्पीड़न तथा जंग, ये कुछ कारण हैं जिनकी वजह से बीते कई वर्षों से हमारे पड़ोसी देशों के लोगों को अपने घर-बार और देश को छोड़कर, शरणार्थी बनकर आवास और रोज़गार की तलाश में हिन्दोस्तान में आने को मजबूर होना पड़ा है। जिन लोगों को गैर-नागरिक बताया जा रहा है, उनमें से कई ऐसे लोग हैं जो बीते अनेक दशकों से असम में बसे हुये हैं, वहां काम करते रहे हैं और समाज की दौलत को पैदा करते रहे हैं। हमारे देश के दूसरे भागों में आकर बसे हुये लोगों के बारे में भी ऐसा ही कहा जा सकता है। जिन्हें आज विदेशी बताकर भगाया जा रहा है, उनमें से कई ऐसे लोग हैं जिनका इसी मुल्क में जन्म हुआ है और जो बीते 50 वर्षों से यहीं बसे हुये हैं। खासतौर पर जो ग़रीब मेहनतकश लोग जीवन की कठोर हालतों की वजह से हिन्दोस्तान आने को मजबूर हुये हैं, जो बेहद क्रूर शोषण की हालतों में काम करने को मजबूर हैं, जो लगातार इस डर में रहते हैं कि कोई उन पर हमला करेगा या उन्हें देश के भगा दिया जायेगा, उन्हें राज्य के अत्याचार का निशाना बनाया जा रहा है। अवैध आप्रवासन पर तथाकथित रोक लगाने के बहाने, हिन्दोस्तानी राज्य बांग्लादेश के साथ हमारी हजारों किलोमीटर की सीमा पर कांटेदार तार का बाड़ा बना रहा है।

नागरिकता के सवाल पर हिन्दोस्तानी राज्य का रवैया हमेशा ही बेहद जन-विरोधी रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य ने नागरिकता के विषय को उठाकर बड़े सुनियोजित तरीके से सांप्रदायिक और विभाजनकारी भावनाओं को भड़काया है तथा लोगों की एकता पर वार किया है। राज्य ने नागरिकता के मुद्दे का इस्तेमाल करके, विभिन्न पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के अपने राष्ट्रीय आधिकारों के संघर्ष को गुमराह किया और तोड़ा है।

वर्तमान हिन्दोस्तानी राज्य सबसे बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के हितों का प्रतिनिधि है। ये इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां हिन्दोस्तानी जनसमुदाय के हितों को पांव तले रौंद रही हैं। बड़ी संख्या में लोगों को “अवैध आप्रवासी” करार देकर उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित करके, हुक्मरान सरमायदार मेहनतकशों को सफलतापूर्वक बांट देते हैं और अपने शासन को बरकरार रखते हैं।

वर्तमान भाजपा सरकार अपने देश में आप्रवासियों को ढूंढ-ढूंढकर निकालने का जो अभियान इस समय चला रही है, वह इन्हीं दिनों अमरीका में आप्रवासियों के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे भयानक अभियान से बहुत मिलता-जुलता है।

डोनाल्ड ट्रंप जबसे राष्ट्रपति पद पर आया है, तबसे उन्होंने अमरीका के मज़दूर वर्ग और लोगों की तमाम समस्याओं के स्रोत बतौर “अवैध आप्रवासियों” पर निशाना साधा है। ट्रंप ने दक्षिण दिशा से अवैध आप्रवासन पर तथाकथित रोक लगाने के लिये, मेक्सिको के साथ सीमा पर दीवार खड़ी करने की धमकी दी है। रिपोर्टों के अनुसार, अमरीका में 1.2 करोड़ गैर-दस्तावेज़ वाले आप्रवासी हैं, जिनमें अधिकतर मेक्सिको तथा अन्य मध्य अमरीकी देशों से हैं। हिन्दोस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और विभिन्न अफ्रीकी देशों से आये हुये हजारों आप्रवासी भी अमरीका में हैं। अनुमान लगाया जाता है कि अमरीका में गैर-दस्तावेज़ आप्रवासियों में आधे से ज्यादा अमरीका में 15 वर्ष से अधिक समय तक बसे हुये हैं।

बीते कुछ महीनों से अमरीकी सुरक्षा संस्थान और आप्रवासन अधिकारी दक्षिण सीमा से अमरीका में प्रवेश करने की कोशिश करने वाले हजारों आप्रवासियों पर बड़ी बेरहमी से हमले करते आ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोगों को नज़रबंदी शिविरों में, बेहद अमानवीय हालतों में बंद करके रखा गया है और बड़ी क्रूरता के साथ बच्चों को अपने मां-बाप व परिजनों से अलग करके रखा गया है।

अमरीका के राष्ट्रपति ने यह धमकी जारी की है कि उनकी सरकार जल्दी ही 10 लाख अवैध आप्रवासियों को पकड़कर बाहर फेंक देगी। 12 जुलाई को ट्रंप ने ऐलान किया कि फेडरल इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आई.सी.ई.) के एजेंट कम से कम 10 बड़े शहरों में आप्रवासियों पर छापे मारेंगे और हाल में अमरीका में आये हुये आप्रवासियों को गिरफ्तार कर लेंगे।

पूरे अमरीका में इस समय लाखों-लाखों आप्रवासी लोग डर और आनिश्चितता की हालतों में जी रहे हैं। इसके अलावा कई ऐसी बड़ी चिंताजनक रिपोर्टें आ रही हैं कि आई.सी.ई. के एजेंट सिर्फ उन लोगों को ही नहीं गिरफ्तार कर रहे हैं जिन पर देश से निकालने का आदेश जारी किया गया है, बल्कि उन आप्रवासियों को भी उठा रहे हैं जो सालों-सालों से उस देश में रहते आये हैं। लोगों में बड़ी आशंका फैली है कि इन छापों की वजह से, अनेक परिवार टूट जायेंगे तथा अनेक बच्चों को अपने मां-बाप से अलग कर दिया जायेगा।

उत्तरी अमरीका के पंजाबी एसोसियेशन (एन.ए.पी.ए.) के अनुसार, सिर्फ 2013-2015 के बीच में, अमरीका-मेक्सिको सीमा पर 27,000 हिन्दोस्तानियों को गिरफ्तार किया गया है। उनमें से 4,000 महिलायें हैं तथा 350 बच्चे। जाना जाता है कि उनमें से कई लोग अभी भी जेल में बंद पड़े हैं। हाल की एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, अमरीका-मेक्सिको सीमा पर नज़रबंदी शिविरों में सैकड़ों हिन्दोस्तानी लोग बंद हैं। पिछले महीने में मीडिया में कई भयानक कहानियां सामने आई थीं कि अमरीका-मेक्सिको सीमा पर हिन्दोस्तानी बच्चे मरूस्थल में प्यास से मर रहे हैं और उनकी मातायें बेतहाशा पीने का पानी तलाश रही हैं।

आप्रवासियों पर इस भीषण हमले को जायज़ ठहराने के लिये “अमरीका पहले” का नारा दिया जा रहा है। यह प्रचार किया जा रहा है कि अमरीकी उद्योगों तथा अमरीकी मज़दूरों की नौकरियों को बचाने के लिये ऐसा किया जा रहा है। लातिन अमरीका, अफ्रीका और एशिया से आये लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। अमरीकी साम्राज्यवाद के “आतंकवाद पर जंग” के तहत, आप्रवासियों पर किये जा रहे इन हमलों में मुसलमानों को खास निशाना बनाया जा रहा है।

14 जुलाई को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐलान किया कि अमरीका के हाउस आफ रेप्रजे़नटेटिव्स (जनप्रतिनिधि मंडल) के चार सदस्यों, जो लातिन अमरीकी, फिलिस्तीनी, पुर्तोरिकन और सोमाली मूल की हैं, को अपने देश वापस जाना चाहिये और “अपने तबाह हुये व अपराध ग्रस्त देशों की मरम्मत करने में मदद देनी चाहिये”। ट्रंप ने उन पर यह इल्ज़ाम लगाया कि उन्हें “अल कायदा जैसे अमरीका के दुश्मनों से प्यार है”। इन महिला पार्षदों पर उनके नस्ल, धर्म और राष्ट्रीय मूल के आधार पर हमला किया जा रहा है और इसलिये भी कि उन्होंने अमरीका के दक्षिण भाग में आप्रवासियों के “नज़रबंदी शिविरों” की जघन्य हालतों का विरोध किया है।

अमरीका का राज्य एक नस्लवादी और फासीवादी राज्य है। अमरीका खुद ही दूसरे राष्ट्रों को तबाह करने व उन हालतों को पैदा करने के लिये ज़िम्मेदार है, जिनकी वजह से लाखों-लाखों लोग शरणार्थी बनकर विदेशों को जाने को मजबूर हुये हैं। अफ्रीका, एशिया और लातिन अमरीका के करोड़ों लोगों को अपने घर-बार छोड़कर, रोज़गार की तलाश में विदेशों को जाना पड़ा है। अमरीका यह दावा करता है कि वह “लोकतंत्र और मानव अधिकारों की रक्षा करता है” पर इसी बहाने दूसरे देशों में दखलंदाज़ी तथा उन पर हमले करता है, वहां शासन परिवर्तन करता है और उन देशों को टुकड़े-टुकड़े कर देता है। अमरीकी राज्य अपने ही लोगों के प्रति बेहद नस्लवादी है। वह नस्लवादी आधार पर लोगों को बांटता है, भेदभाव करता है, अपराधी करार देता है और उनका उत्पीड़न करता है। ट्रंप की आप्रवासन नीतियां और आप्रवासियों व विदेशी मूल के लोगों के ख़िलाफ़ उनका यह अभियान अमरीकी राज्य की इस नस्लवादी और फासीवादी नीति की निरंतरता है, जिसे अब और तीक्ष्ण तरीके से बढ़ावा दिया जा रहा है।

सारी दुनिया में सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपति और साम्राज्यवादी सरमायदार मज़दूरों के शोषण को और तेज़ करके, अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने के इरादे से, मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों के अधिकारों पर बेरहमी से हमले कर रहे हैं। इजारेदार पूंजीपति अपने पैशाचिक इरादों को अंजाम देने के लिये तरह-तरह के फासीवादी गिरोहों और राजनीतिक पार्टियों को प्रोत्साहन और समर्थन दे रहे हैं। आप्रवासियों के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रशासन का वर्तमान अभियान तथा मुसलमानों और विदेशी मूल के लोगों पर उसके नस्लवादी हमले इसी के हिस्से हैं। भाजपा की अगुवाई में वर्तमान हिन्दोस्तानी सरकार भी इसी अपराधी, साम्पदायिक, विभाजनकारी और जन-विरोधी रास्ते पर चल रही है।

सभी प्रगतिशील ताक़तों को राष्ट्रीयता, धर्म या भाषा पर भेदभाव किये बिना, इजारेदार पूजीवादी शोषकों के ख़िलाफ़ मेहनतकशों की एकता बनाने के लिये संघर्ष करना होगा। हिन्दोस्तानी और अमरीकी राज्यों द्वारा आप्रवासियों के वहशी उत्पीड़न का हमें जमकर विरोध और कड़ी निन्दा करनी होगी।

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