मज़दूर वर्ग विरोधी विधेयकों के ख़िलाफ़ देशभर में ज़ोरदार विरोध!

2 अगस्त, 2019, को देशभर में संयुक्त ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व में लाखों-लाखों मज़दूरों ने सरकार द्वारा श्रम कानूनों के स्थान पर संहिताओं (कोड) को लाए जाने के खि़लाफ़ जोरदार प्रदर्शन किया।

देश की राजधानी दिल्ली में ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित बैंक आफ बड़ोदा से लेकर संसद तक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। प्रदर्शनकारी जैसे ही संसद की ओर आगे बढ़े, पुलिस ने जयसिंह मार्ग और जंतर-मंतर क्रास करने से पहले उन्हें रोक दिया। प्रदर्शनकारियों ने वहीं सभा की।

यह विरोध प्रदर्शन सरकार द्वारा संसद में - वेतन संहिता विधेयक 2019 और कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक 2019 - पेश किए जाने के ख़िलाफ़, केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के सर्व हिन्द विरोध के आह्वान पर था।

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प्रदर्शनकारियों को संबोधित करने वालों में थे - एटक से अमरजीत कौर, हिन्द मजदूर सभा से शिवगोपाल मिश्रा, सीटू से ए.आर. सिंधू, मज़दूर एकता कमेटी से संतोष कुमार, इंटक से आर.सी. खुंटिया, इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन से सबीना, सेवा से लता, ए.आई.यू.टी.यू.सी. से आर.के. शर्मा, यू.टी.यू.सी. से शत्रुजीत सिंह, एल.पी.एफ. से पी. मुत्थु, आई.सी.टी.यू. से नरेंद्र, ए.आई.सी.सी.टी.यू. से राजेश आदि।

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए, ट्रेड यूनियनों के नेताओं सहित अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों की फेडरेशनों व संगठनों ने एक स्वर में इन दोनों संहिताओं की कड़ी निंदा की और कहा, ये संहिताएं मज़दूर वर्ग पर एक बड़ा हमला हैं।

उन्होंने कहा कि अगर ये दोनों विधेयक संसद में पास हो जाते हैं, तो वे वेतन और काम की वर्तमान हालतों से संबंधित मौजूदा 17 श्रम कानूनों का स्थान लेंगे।

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उन्होंने समझाया कि इन दोनों विधेयकों में विभिन्न प्रावधानों के उन सारे विवादास्पद मुद्दों को नज़रंदाज़ किया गया है, जिन पर ट्रेड यूनियनों ने बार-बार आपत्ति जताई है। इन विधेयकों के ज़रिये मज़दूरों के अधिकारों को कम किया जाएगा, जिससे मज़दूरों के हितों को बहुत बड़ा नुकसान होगा।

उन्होंने बताया कि वेतन की गणना के लिए 15वीं लेबर कांफ्रेंस (आई.एल.सी.) ने जो फार्मूला माना था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, उसमें जो 25 प्रतिशत जोड़ा जाना था और जिसे 45वीं व 46वीं आई.एल.सी. ने एकमत से मंजूर किया था, को ताक पर रखते हुए श्रममंत्री द्वारा प्रति माह 4628 रुपये या प्रतिदिन 178 रुपये की घोषणा की गई। जबकि 7वें वेतन आयोग ने भी जनवरी 2016 में 18,000 रुपये प्रति माह न्यूनतम वेतन की सिफारिश की थी। 

उन्होंने बताया कि कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक 10 और उससे अधिक मज़दूरों वाले कार्यस्थलों पर ही लागू होगा। 90 प्रतिशत मज़दूर जो असंगठित क्षेत्र में, ठेके पर, या घरेलू उद्योगों में काम करते हैं, उन्हें इस विधेयक से कोई अधिकार नहीं मिलेंगे। इस विधेयक में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित मौजूदा 13 श्रम कानूनों को मिलाया गया है।

उन्होंने बताया कि मौजूदा 13 श्रम कानूनों को 1948 से 1996 के बीच की अवधि में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य था विभिन्न क्षेत्रों के मज़दूरों के काम की हालतों का नियामन करना, जैसे कि सेल्स प्रमोशन कर्मचारी, खदान मज़दूर, बीड़ी मज़दूर, निर्माण मज़दूर, कार्यकारी पत्रकार और अख़बारों के कर्मचारी, प्रवासी मज़दूर, ठेका मज़दूर, गोदी मज़दूर, आदि। उन सभी क्षेत्रों के मज़दूरों ने लम्बे संघर्ष करके इन कानूनों को पास करवाया था। इन कानूनों में अलग-अलग क्षेत्रों में काम की हालतों की विशेषताओं पर ध्यान देने का प्रयास किया गया था।

कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक 2019 ने अलग-अलग क्षेत्रों में मज़दूरों के स्वास्थ्य और काम की हालतों से संबंधित इन 13 श्रम कानूनों को सोच-समझकर एक साथ जोड़ दिया है, ताकि मौजूदा कानूनों में मज़दूरों को जो अधिकार मिलते थे, अब मज़दूरों को उनसे वंचित किया जा सके। वेतन संहिता विधेयक की तरह यह संहिता भी इजारेदार पूंजीपतियों के हित में है। इसके अलावा, सभी ट्रेड यूनियनों ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को सरकार द्वारा पूंजीपतियों को बेचे जाने का जमकर विरोध किया।

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Aug 16-31 2019    Letters to Editor    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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