मज़दूर एकता लहर के जून 16-30 के अंक में प्रकाशित पार्टी की केन्द्रीय समिति की परिपूर्ण सभा की विज्ञप्ति की प्रतिक्रिया में पाठकों से प्राप्त पत्र

संपादक महोदय,

मैंने मज़दूर एकता लहर के अंक 12 को पढ़ा। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 9वीं परिपूर्ण सभा की विज्ञप्ति भाजपा की रिकार्ड तोड़ जीत के पीछे के कारणों पर प्रकाश डालती है। जो मुझे बहुत अच्छा लगा।

मैं दक्षिणी दिल्ली की कुछ मज़दूर बस्तियों में पार्टी का संगठनात्मक काम करती हूं। चुनाव के परिणाम को लेकर लोग हैरान हैं क्योंकि जनता के बीच में भाजपा को लेकर काफी नाराजगी थी। फिर भी भाजपा बहुमत से कैसे आ गयी है। इस क्षेत्र में भाजपा से जुड़े लोग और कार्यकर्ता अपनी पार्टी को बहुमत मिलने पर हैरान थे। ऐसा परिणाम क्यों? वे कौन सी ताकतें हैं जो चुनाव के ज़रिए ऐसी सरकार को बहुमत में लेकर आ जाती हैं, जो हिन्दोस्तानी लोगों की इच्छा के विपरीत है। इन ताक़तों का मक़सद क्या है, जो लोगों के मक़सद के विपरीत है? इस खेल को समझना होगा।

जनप्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की वर्तमान प्रणाली पूंजीपति वर्ग की अपनी प्रणाली है। यह प्रणाली पूंजीपति वर्ग के हित में परिणाम देती है, बेशक चुनाव में मज़दूर व किसान वोट डालते हैं। पूंजीपति वर्ग अपनी मनपंसद पार्टी को सत्ता में लाने के लिए धन देता है। मीडिया के ज़रिए, सत्ता में आने वाली पार्टी को लोकप्रिय बनाया जाता है। लोक-लुभावन नारों से लोगों में प्रचार किया जाता है। इस चुनाव में, न सिर्फ देश के पूंजीपति वर्ग बल्कि विदेशी शक्ति अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई वाली बड़ी कंपनियों - गूगल, व्हाट्सएप, फेसबुक ने आधुनिक तकनीकी के ज़रिए भाजपा को सत्ता में लाने में बड़ी भूमिका निभायी है। अमरीका ने अपने खुदगर्ज़ हितों के लिए भाजपा को सत्ता में आने में पूरी मदद की। अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान की सरकार, ईरान को ख़त्म करने, चीन को रोकने और रूस को कमजोर करने में उसकी रणनीति का साझेदार बने।

हम मज़दूरों और किसानों को वर्तमान राजनीतिक प्रणाली को नकारना होगा। यह प्रणाली मज़दूरों-किसानों के हक़ को नकारती है। देश के सभी नौजवानों को एक सुरक्षित नौकरी के अधिकार को नकारती है। सभी को समान और आधुनिक शिक्षा के अधिकार को नकारती है। यह प्रणाली देश के अंदर ग़रीबी और भुखमरी को ख़त्म करने के क़ाबिल नहीं है। यह धर्म, जाति और लिंग आदि के आधार पर हिंसा को ख़त्म करने के क़ाबिल नहीं है।

मुझे खुशी हुई कि इस चुनाव में अपनी पार्टी ने मज़दूर वर्ग के कार्यक्रम - हिन्दोस्तान के नव-निर्माण - को पेश किया। पार्टी ने पूंजीपति वर्ग की वर्तमान प्रणाली की जगह पर मज़दूर वर्ग की प्रणाली की स्थापना करने का विकल्प पेश किया। नव-निर्माण का मतलब संप्रभुता लोगों के हाथों में हो, जहां वे फैसला ले सकें।

मैं, पार्टी के चुनाव में भाग लेने के हौसले को सलाम करती हूं।

साधना, नई दिल्ली


संपादक महोदय,

मैंने, मज़दूर एकता लहर के जून 16-30 के अंक में प्रकाशित, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति की 9वीं परिपूर्ण सभा की विज्ञप्ति को बहुत रुचि के साथ पढ़ा। हमारी पार्टी के साथियों द्वारा लोकसभा चुनावों में भागीदारी, परिणामों और उससे संबंधित काम की समीक्षा व हमारे समक्ष चुनौतियों पर टिप्पणी से स्पष्ट है कि हमारी पार्टी दुनिया की सामयिक भू-राजनीतिक अंतर्विरोधों और देश के इजारेदार पूंजीपतियों के स्वभाव को अच्छी तरह समझती है।

मैंने, मीडिया में इन चुनावों के परिणामों पर कई लेख पढ़े हैं। उन सभी में केवल एक ही झूठ को दोहराया गया है कि हिन्दोस्तान के शासकों को आम लोग चुनावों के ज़रिये चुनते हैं।

जैसा कि पार्टी की विज्ञप्ति में स्पष्ट है कि शासक, इस या उस पार्टी अथवा गठबंधन नहीं, बल्कि हिन्दोस्तान के पूंजीपति हैं। हिन्दोस्तान एक वर्ग विभाजित समाज है। इस पर देश के इजारेदार पूंजीपतियों का राज है। वे ही तय करते हैं कि अगले पांच वर्षों के लिये, उनके कार्यक्रम को लागू करने का काम किस पार्टी या गठबंधन को सौंपा जाए। तथाकथित “लोकतांत्रिक चुनावों” के ज़रिये, पूंजीपति उनके द्वारा चुनी गयी पार्टी या गठबंधन को, लोगों का “जनादेश” साबित करके, अपनी हुक्मशाही को वैधता प्रदान करते हैं। जिस पार्टी या गठबंधन को उन्होंने अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए, सरकार बनाने और चलाने के लिए, चुना है उसको आम चुनावों में जिताया जाए, इसके लिये वे हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं। हालांकि लोगों ने लड़कर वोट देने का अधिकार हासिल किया था। पूरे चुनाव के दौरान जो मुद्दे उठाए जाते हैं, जिस तरह से प्रचार के लिए, अखबारों, टी.वी. और सोशल मीडिया पर वाद-विवाद आयोजित किया जाता है, उन सबके ज़रिये, लोगों को इस या उस पार्टी को वोट देने के लिए लुभाया जाता है। यह चुनावी प्रक्रिया, जिसे दुनिया के सरमायदारों ने इस तरह से परिपक्व किया है और इसमें प्रचार किया जाता है कि चुनाव “लोगों के प्रतिनिधि’ चुनने के लिए किये जाते हैं, इजारेदार पूजीपतियों की सत्ता को इन चुनावों से कोई ख़तरा नहीं है। जैसा कि हम सब जानते हैं आम मज़दूरों, किसानों और मेहनतकशों के लिए इस व्यवस्था में चुनाव जीतना लगभग असंभव है।

यह भी स्पष्ट है कि इस समय पूंजीपतियों की प्राथमिकताएं क्या हैं - (1) अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में आक्रमक निजीकरण का दौर, जिसमें लोगों की पूंजी से बनाई गयी सम्पत्ति को कौड़ियों के दाम पर पूंजीपतियों को बेचा जाए और उनसे पूंजीपति अपने मुनाफ़ों को और बढ़ा सकें, (2) किसानों की ज़मीन को किस तरह से पूंजीपतियों को हड़पने के साधन सुलभ कराए जाएं, (3) श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर, यह सुनिशिचित किया जाए कि उत्पादन से पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य का अधिकतम हिस्सा पूंजीपति हड़प सकें और (4) आम लोगों को झूठे प्रचार, जंगफरोशी, खुलेआम सांप्रदायिकता और नफ़रत फ़ैलाने वाले भाषणों और बयानों के द्वारा, हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए बनाये गए कार्यक्रम के लिए लामबंध किया जाए। इस समय हिन्दोस्तानी पूंजीपति अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ नजदीकी के संबंध बनाने के लिए बहुत आतुर हैं।

पार्टी विज्ञप्ति में, हिन्दोस्तानी चुनावों में अमरीकी साम्राज्यवादियों की अहम भूमिका के बारे में भी अच्छी तरह से समझाया गया है। सोशल मीडिया के ज़रिये झूठा प्रचार और अफवाहें फैलाना, अब दुनिया के इजारेदार पूंजीपतियों के लिए और भी आसान हो गया है।

आज ज़रूरत है कि लोगों को अमरीकी साम्राज्यवादियों के खूनी इतिहास के बारे में जागरुक किया जाए। इतिहास गवाह है कि एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने कितने ही देशों को तबाह किया है (अफ़ग़ानिस्तान, इराक और लीबिया)। दुनिया के कई देशों में अमरीका और उसके मित्रों द्वारा सत्ता परिवर्तन का दर्दनाक इतिहास हमारे सामने है। दुनिया में केवल अमरीका ही ऐसा एक देश है जिसने निहत्थे, बेक़सूर लोगों पर परमाणु बम गिराया। अमरीकी साम्राज्यवादियो ने न तो किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते का पालन किया है और न ही वे दुनिया के लोगों, राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं की संप्रभुता का आदर करते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हर तरह के आतंकियों को पैदा किया है, उनको धन दिया है, उनका अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया है। उनके कार्यक्रम में, आज हिन्दोस्तानी पूजीपतियों के साथ गठबंधन शामिल है। वे हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों को अपना वफ़ादार दोस्त बनाकर, ईरान, चीन और रूस के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना चाहते हैं।

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हिन्दोस्तानी शासक वर्ग देश को एक बहुत ही ख़तरनाक रास्ते पर ले जा रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादियों का वफ़ादार दोस्त बनाने की साज़िश केवल हिन्दोस्तानी लोगों के लिए ही नहीं, इस भूखंड के लोगों के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी लोगों के लिए एक बहुत ही ख़तरनाक कदम है। मैं अपनी पार्टी की केंद्रीय समिति की परिपूर्ण सभा के निष्कर्षों से बिल्कुल सहमत हूं। हम सबको अपने सभी मज़दूर-किसान और मेहनतकश भाई-बहनों के साथ मिलकर अपने देश में राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेने के लिए काम करना होगा जिससे हम एक नए हिन्दोस्तान के नव-निर्माण की हालतें पैदा कर सकें। इस नए हिन्दोस्तान में आर्थिक व्यवस्था का मकसद होगा आम लोगों की ज़रूरतों की पूर्ति और देश की विदेश नीति साम्राज्यवाद-विरोधी होगी जिसका मकसद होगा सभी साम्राज्यवादी युद्धों के ख़िलाफ़ लोगों को लामबंध करना।

आपका पाठक

काशीनाथ, चंपारण बिहार

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Aug 16-31 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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