रेलवे के निजीकरण की 100 दिवसीय कार्य योजना का विरोध

भारतीय रेल के निजीकरण को तेज़ करने के उद्देश्य से उठाई गई 100 दिन की कार्य योजना के खि़लाफ़ देशभर के रेल मज़दूर आंदोलित हैं। अब तक के सभी रेल मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों द्वारा बार-बार इंकार किए जाने के बावजूद, भारतीय रेल के निजीकरण का कार्यक्रम दो दशकों से अधिक समय से गुप्त रूप से चल रहा है। हाल ही में नव-निर्वाचित भाजपा सरकार द्वारा घोषित 100 दिवसीय कार्य योजना इस निजीकरण के कार्यक्रम का खुला ऐलान है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ने 2018 में भारतीय रेल के निजीकरण को लेकर सत्तारूढ़ पूंजीपति वर्ग की वास्तविक योजनाओं का पर्दाफाश करते हुए, एक पुस्तिका, “भारतीय रेल के निजीकरण को एकजुट होकर हराएं” की हजारों प्रतियां छापकर रेल मज़दूरों के बीच वितरित की थी जिसमें निजीकरण के खि़लाफ़ एकजुटता का आह्वान किया गया था। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का मुखपत्र, मज़दूर एकता लहर, जिसे देशभर में अनेक रेल मज़दूरों द्वारा पढ़ा जाता है लगातार भारतीय रेल के निजीकरण के बारे में लिखता रहा है।

AILRSA 13 Aug 19

निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष में “मज़दूर एकता लहर” की भूमिका को स्वीकार करते हुए, ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.) के ईस्ट कोस्ट रेलवे के विशाखापट्टनम जोन ने 13 अगस्त को विशाखापट्टनम में अपने क्षेत्रीय सम्मेलन में भारतीय रेल के निजीकरण से संबंधित 100 दिवसीय कार्य योजना के संदर्भ में एक प्रस्तुति पेश करने के लिए मज़दूर एकता लहर को आमंत्रित किया। अधिवेशन में 100 से अधिक रेल चालकों ने भाग लिया।

सहभागियों का स्वागत करते हुए, क्षेत्रीय सचिव कॉ. एस.के. चैबे ने 100 दिवसीय कार्य योजना के विभिन्न प्रस्तावों पर विस्तार से रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि ए.आई.एल.आर.एस.ए. की केंद्रीय कार्यकारिणी ने इस योजना का विरोध करने का निर्णय लिया है, यह योजना 2014 में बनी बिबेक देबरॉय कमेटी की रेलवे के पृथकीकरण, पुनः संरचना व निगमीकरण के लिए की गयी सिफारिशों के अनुरूप है। यह कार्यक्रम रेल मज़दूरों और यात्रियों, दोनों के हितों के खि़लाफ़ है। उन्होंने सभी से एकजुट होकर इस कार्यक्रम का विरोध करने का आह्वान किया।

AILRSA 13 Aug 19

ए.आई.एल.आर.एस.ए. के केंद्रीय उपाध्यक्ष कॉ. आर.आर. भगत ने कहा कि 7 उत्पादन इकाइयों का निगमीकरण, उनके निजीकरण का पहला क़दम है। उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों के साथ दर्शाया कि प्रत्येक उत्पादन इकाई कैसे अपने उत्पादन लक्ष्यों को पार कर रही है और अति आधुनिक इंजनों और कोचों को आयातित लागत की तुलना में कम क़ीमत पर उत्पादित कर रही है। निजीकरण की आवश्यकता पर सवाल उठाते हुए, उन्होंने कहा कि यह योजना भारतीय रेल की 96 छोटी और बड़ी कार्यशालाओं को या तो बंद करने अथवा निजी मालिकों को सौंपने की योजना है। उन्होंने भारतीय रेल में अभी तक किये गये निजीकरण की विस्तार से जानकारी दी। जिसमें आधुनिकीकरण के नाम पर रेलवे स्टेशनों का निजीकरण भी शामिल है तथा 80 विभागों का काम निजी हाथों में सौंप दिया गया है। स्थायी मज़दूरों की संख्या को कम करके 12.56 लाख तक लाया गया है और इसके साथ ही लगभग 6 लाख ठेका मज़दूरों को काम पर लगाया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि स्थायी कर्मचारियों की संख्या को 10 लाख तक लाने की योजना है। उन्होंने घोषणा की कि निजीकरण के विरोध के साथ-साथ हमें नई पेंशन योजना को वापस लेने और पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग भी करनी होगी।

मज़दूर एकता लहर की प्रस्तुति सरकार की रेलवे के निजीकरण की कार्यनीति के स्पष्टीकरण के साथ शुरू हुई। उसमें बताया गया कि चूंकि भारतीय रेल सरकार का एक विभाग है, इसलिए इसका निजीकरण नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि रेलवे की विभिन्न गतिविधियों को एक-एक करके अलग-अलग निगमों जैसे कि आई.आर.सी.टी.सी., आई.आर.एफ.सी., आई.आर.सी.ओ.एन., सी.ओ.एन.सी.ओ.आर., के.आर.सी., इत्यादि के तहत लाया गया है। अब इन निगमों को टुकडे-टुकड़े में बेचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके अलावा, भारतीय रेल की हर नई गतिविधि को बाहर रखकर उसे एम.आर.वी.सी.एल., आर.वी.एन.एल., डी.एफ.डी.सी., एच.एस.आर.सी., डी.एम.सी., आदि जैसे निगमों के अंतर्गत किया जा रहा है। जो गतिविधियां आसानी से अलग नहीं की जा सकती थीं, उन्हें “गैर-ज़रूरी” गतिविधि कहकर बाहरी स्रोत को ठेके पर दे दिया गया है।

भारतीय रेल के निजीकरण का सूत्रपात 1991 में उदारीकरण व निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण की नई आर्थिक नीति के ऐलान के तुरंत बाद हुआ जब 1995 में प्रकाश टंडन कमेटी की स्थापना की गई। तत्पश्चात रेल के कामकाज में सुधार के नाम पर एक के बाद एक, 2001 में राकेश मोहन कमेटी, 2011 में सैम पित्रोदा कमेटी और 2014 में बिबेक देबरॉय कमेटी की स्थापना की गई। प्रत्येक कमेटी ने निजीकरण को और अधिक बढ़ावा दिया। सभी गतिविधियों को “ज़रूरी” और “गैर-ज़रूरी” में विभाजित किया गया। “सार्वजनिक-निजी-सांझेदारी” मॉडल को प्रोत्साहित किया गया। रेलवे के संपूर्ण निगमीकरण की सिफारिश की गई। उन सभी कमेटियों के प्रस्तावों का यह निचोड़ था कि रेलवे को सिर्फ पटरियों को अपनी मिल्कियत में रखना चाहिये और रेलवे चलाने की बाकी ज़िम्मेदारी पूंजीपतियों के लिए छोड़ देनी चाहिए।

इस रणनीति का अगला बड़ा चरण भारतीय रेल को एक “बीमार-उपक्रम” घोषित करना है, ताकि इसके पूर्ण निजीकरण को सही ठहराया जा सके, जैसा कि एयर इंडिया, एम.टी.एन.एल., बी.एस.एन.एल., आदि के मामले में किया गया है। निजी ऑपरेटरों को मुनाफे़ वाले मार्गों पर माल व यात्री गाड़ियों को चलाने के लिये दिया जायेगा और भारतीय रेल को घाटे में चलने वाले मार्गों को चलाने के लिये मजबूर किया जायेगा। लाभदायक काम माल यातायात को डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन के तहत लाया जाएगा और 100 दिन की कार्ययोजना के अंतर्गत राजधानी, शताब्दी, आदि गाड़ियों को निजी आपरेटरों को सौंपने की योजना है। सभी तेज़ रफ्तार से चलने वाली यात्री गाड़ियों को पहले से ही हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन के अंतर्गत चलाने की योजना है।

100 दिवसीय कार्य योजना में यात्री किराए पर दी जा रही सभी रियायतों को हटाने का प्रस्ताव है। इससे किरायों में अत्यधिक वृद्धि होगी और निजी पूंजीपतियों के लिए इन ट्रेनों का संचालन अधिक लाभकारी होगा। यात्री किरायों पर मिलने वाली सब्सिडी को ख़त्म करने से रेलवे को माल ढोने के लिए किराया कम करने में मदद मिलेगी, जो कि पूंजीपतियों की लंबे समय से चली आ रही मांग है।

प्रस्तुति में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि सरकार सभी देशवासियों को सस्ती, सुरक्षित और आरामदायक रेल यात्रा प्रदान करने के लिए बाध्य है। परन्तु, अगर यात्री किराए पर मिलने वाली सब्सिडी हटा दी जाती है, तो देश और हमारे लोगों का एक बड़ा हिस्सा रेल सेवा से वंचित हो जाएगा।

प्रस्तुति ने सरकार के इस झूठे दावे का पर्दाफाश किया कि निजीकरण करने से अधिक कुशल और आधुनिक रेल सेवाएं मिलेंगी। ब्रिटिश रेल के निजीकरण का उदाहरण देते हुए यह दिखाया कि वहां ट्रेन के किराए में भारी वृद्धि हुई और रेल यात्रियों की सुरक्षा के साथ समझौता किया गया।

इसलिए, रेल मज़दूरों के संघर्ष को मजबूत करने के लिए भारतीय रेल के करोड़ों यात्रियों को निजीकरण के खि़लाफ़ संगठित करने पर महत्व दिया गया।

प्रस्तुति में बताया गया कि हमारे देश के पूंजीपति वर्तमान संकट से बाहर आने के लिए मुनाफ़ेदार क्षेत्र को तलाश रहे हैं। इसी सिलसिले में लाभदायक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को “बीमार” घोषित करके उन्हें निजी कंपनियों को बेचा जा रहा है। शासक वर्ग के हर ऐसे प्रयास का कड़ा विरोध किया जाना चाहिए।

प्रस्तुति ने निष्कर्ष निकाला कि भारतीय रेल का निजीकरण हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के इशारे पर किया जा रहा है। इसे कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों के नेतृत्व वाली हर सरकार द्वारा अपनाया गया है। केंद्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों को बदलने से निजीकरण रुकने वाला नहीं है। यदि देखा जाये तो, सत्ता में आने वाली हर पार्टी ने पहले की तुलना में निजीकरण को अधिक तेज़ी से आगे बढ़ाया है।

इसलिए यह संघर्ष केवल रेल के निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष नहीं है अपितु सारे बड़े पूंजीवादी इजारेदारों के खि़लाफ़ भी है जो उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से भूमंडलीकरण को लागू कर रहे हैं। निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष एक नए हिन्दोस्तान के निर्माण के लिए किये जाने वाले हमारे लोगों के संघर्ष का एक हिस्सा है जिसमें अर्थव्यवस्था लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्मुख हो न कि पूंजीवादी लालच के लिए; और राजनीतिक व्यवस्था यह सुनिश्चित करे कि मेहनतकश लोग निर्णायक हों न कि शोषक अल्पसंख्यक।

रेल मज़दूर देश में सबसे बड़े संगठित कार्यबल हैं। उन पर हमला देश के पूरे मज़दूर वर्ग पर हमला है। रेल मज़दूरों को निजीकरण के खि़लाफ़ मज़दूर वर्ग की इस लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

प्रस्तुति में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सभी रेल मज़दूरों को पूरे मज़दूर वर्ग के साथ अपनी लड़ाकू एकता को मजबूत करना चाहिये। ताकि सरमायदार के मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को पराजित किया जा सके। निजीकरण के खि़लाफ़ लड़ाई को पूरे मज़दूर वर्ग का कार्यक्रम बनाना होगा। हमें निजीकरण के हर एक हमले का विरोध करना होगा, चाहे वह रेलवे में या किसी अन्य क्षेत्र में हो। हमें अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों के मज़दूरों के संघर्ष को समर्थन देना होगा और हमारे संघर्ष के लिए उनका समर्थन भी प्राप्त करना होगा। आयुध निर्माणियों के निगमीकरण की योजना के खि़लाफ़ 46 आयुध निर्माणियों के श्रमिकों ने इस माह में लंबी हड़ताल की योजना बनाई है। ऐसे समय में रेल मज़दूरों को उनके साथ एकजुटता से समर्थन देना चाहिए। इस मुद्दे पर भी ज़ोर दिया गया कि इस निजीकरण के हमले से निपटने के लिए रेल मज़दूरों की एकता, सार्वजनिक क्षेत्र की ईकाइयों के मज़दूरों की एकता और पूरे मज़दूर वर्ग की एकता बहुत आवश्यक है।

बैठक में उपस्थित रेल कर्मी निजीकरण के खि़लाफ़ हाल ही में छेड़े गए सफल संघर्ष के उदाहरण से प्रेरित हुये। जब सरकार ने मुंबई के पास कुछ उपनगरों में बिजली वितरण का निजीकरण करने का फैसला लिया, तो बिजली वितरण के निजीकरण के ख़तरों से लोगों को जागरुक करने के लिए, लोगों के बीच पर्चा वितरण, नुक्कड़ सभाएं और जुलूस निकालना आदि के सहित एक सार्वजनिक अभियान छेड़ा गया। निजीकरण का विरोध करने के लिए हजारों हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इसके साथ ही निजीकरण के खि़लाफ़ बिजली कर्मचारियों के संघर्ष को समर्थन दिया गया। इन सभी कार्यों और लोगों के आक्रोश ने विभिन्न राजनीतिक दलों को निजीकरण के खि़लाफ़ खड़े होने के लिए मजबूर किया। सरकार अब तक बिजली का वितरण निजी कंपनी को नहीं सौंप पाई है, हालांकि इसे 26 जनवरी, 2019 को किया जाना था।

प्रस्तुति के अंत में, “रेल मंत्रालय के 100 दिन के एक्शन प्लान का धिक्कार करें”, “रेलवे का निजीकरण किसी बहाने मंजूर नहीं”, “रेल मज़दूरों की एकता ज़िंदाबाद” और “रेल मज़दूर यात्री एकता ज़िंदाबाद” जैसे नारों से पूरा सभागृह गूंज उठा।

कार्यक्रम प्रतिनिधियों की उत्साही तालियों के साथ समाप्त हुआ जब कॉ. चौबे ने घोषणा की कि सभी तरह के निजीकरण के खि़लाफ़ और विशेषतः 100 दिन की कार्य योजना के खि़लाफ़ लड़ाई तेज़ की जाएगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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