कामरेड हरदयाल बेंस को लाल सलाम!

कामरेड हरदयाल बेंस की 80वीं सालगिरह मनाने के लिये हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के सदस्यों की एक सभा 25 अगस्त को दिल्ली में सम्पन्न हुई। उनका जन्म 15 अगस्त, 1939 को हुआ था।

कामरेड लाल सिंह ने कामरेड बेंस के बारे में अपनी हार्दिक भावनाएं व विचार सामने रखे। वे एक बेमिसाल कम्युनिस्ट सिद्धांतकार व संगठक, एक सच्चे अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे जिन्होंने अपनी पूरी शक्ति सभी देशों के मज़दूरों के उद्धार में समर्पित की थी। वे न केवल कनाडा की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के राष्ट्रीय नेता थे, बल्कि हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की स्थापना के प्रमुख रचनाकार भी थे। 1980 में हमारी पार्टी की स्थापना से लेकर 1997 में अपनी असामयिक मृत्यु तक, उन्होंने हमारी पार्टी की केन्द्रीय समिति का हिस्सा बनकर काम किया।

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पंजाब में कामरेड हरदयाल बेंस के बचपन के दिनों से लेकर अंत तक उनके जीवन और कार्यों की रूपरेखा पेश करते हुए, कामरेड लाल सिंह ने आम तौर पर कम्युनिस्ट व मज़दूर आंदोलन में और खास तौर से, हमारी पार्टी व हिन्दोस्तानी क्रांति के लिये, उनके अमूल्य योगदान के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया।

अनेक कामरेडों ने कामरेड बेंस और उनके कार्यों के प्रति अपने गहरे प्रेम व आदर को व्यक्त किया।

कामरेड हरदयाल बेंस का जन्म महलपुर में एक देशभक्त पंजाबी परिवार में हुआ था, जिन्होंने हमारे लोगों के उपनिवेशवाद-विरोधी मुक्ति संघर्ष में सक्रियता से भाग लिया था। 1950 के दशक में वेे हिन्दोस्तानी कम्युनिस्ट नौजवान संगठनों में कार्यरत रहे। उच्च शिक्षा के लिये विदेश जाने के बाद, 1960 के दशक में वे छात्रों व शिक्षकों के संगठक बतौर उभर कर आये। कनाडा, आयरलैंड व इंगलैंड के विश्वविद्यालय परिसरों में, उन्होंने व उनके कामरेडों ने उस वक्त फैली साम्राज्यवादी विचारधारा व संस्कृति के खि़लाफ़ बहादुरी से संघर्ष किया। 1963 में, उन्होंने द इंटरनेशलिस्ट्स नामक संगठन बनाया, जिसने अनेक नवयुवतियों व नौजवानों को मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांत के आधार पर दुनिया को बदलने के कार्य से जुड़ने के लिये प्रेरित किया।

कामरेड बेंस ने दार्शनिक दृष्टिकोण पेश किया कि “समझने के लिये व्यक्ति के सचेत सहभाग की ज़रूरत है, यह एक खोज की क्रिया है”। उन्होंने यह तर्क़ दिया कि मानव कारक या सामाजिक चेतना को अपनी भूमिका अदा करने के लिए और सामाजिक विकास के रास्ते में खड़ी भौतिक परिस्थितियों को बदलने के लिए, किसी भी एक व्यक्ति को एक संगठन का हिस्सा बनना ज़रूरी है। लोकतांत्रिक केन्द्रवाद के आधार पर कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करने के संघर्ष में उन्होंने अग्रिम भूमिका अदा की, एक ऐसी पार्टी जिसका आधार बुनियादी संगठन हो और जिसका मुख्य स्तंभ जनसमूह में राजनीतिक कार्य हो।

कनाडा राज्य के नस्लवादी हमलों के खि़लाफ़ हिन्दोस्तानी अप्रवासियों की सुरक्षा के संघर्ष को कामरेड बेंस ने अगुवाई दी। लोगों के अधिकारों की रक्षा में और कनाडा राज्य के हमलों के खि़लाफ़ वर्ग संघर्ष के संस्थान और संगठन को बनाने में उन्होंने अगुवाई दी और इसी दौरान 1973 में ईस्ट इंडिया डिफेन्स कमिटी की स्थापना की गयी ।

1968 में कामरेड बेंस ने हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी मार्क्सवाद-लेनिनवादियों का संगठन) की स्थापना के काम को अगुवाई दी। हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी मार्क्सवाद-लेनिनवादियों का संगठन) ने हिन्दोस्तान में क्रांति की विजय को अपना लक्ष्य बनाने के लिए अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन व ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हिन्दोस्तानी मज़दूरों व प्रगतिशील छात्रों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित और संगठित किया।

1977 के सितम्बर तक यह साफ हो गया था कि दुनिया के दो-ध्रुवीय बंटवारे के दबाव में हिन्दोस्तानी कम्युनिस्ट आंदोलन पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गया था। इसके अगल-अलग टुकड़े हिन्दोस्तानी शासक वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियों के पिछलग्गू बन रहे थे और उनके राज्य में विलीन हो रहे थे। कुछ आपात्काल को “दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद के खि़लाफ़ संघर्ष” बताते हुए उसका समर्थन कर रहे थे। तो दूसरे संसदीय विपक्ष के साथ एकजुट होते हुए “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” का बुलावा दे रहे थे। ऐसी परिस्थिति में हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी माक्र्सवाद-लेनिनवादियों का संगठन) ने फैसला लिया कि वह हिन्दोस्तानी कम्युनिस्टों की एक हिरावल पार्टी में एकता पुनः स्थापित करने के काम का बीड़ा उठायेगी।

1977 से 1980 की अवधि में, कामरेड बेंस ने हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी मार्क्सवाद-लेनिनवादियों का संगठन) के प्रशिक्षित सदस्यों को वापस हिन्दोस्तान भेजने के काम को अगुवाई दी ताकि वे हिन्दोस्तान की धरती पर एक ऐसी पार्टी की स्थापना कर सकें। 1980 के दिसम्बर में हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की स्थापना, 1977 के सितम्बर में हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी मार्क्सवाद-लेनिनवादियों का संगठन) द्वारा उठाये चुनौतीपूर्ण कार्य का चरमबिन्दू था।

1980 के दशक में जब हिन्दोस्तानी राज्य ने सिख धर्म को मानने वालों पर अभूतपूर्व राजकीय आतंक शुरू किया, उस वक्त कामरेड बेंस ने लोगों व उनकी धार्मिक आस्थाओं को ज़िम्मेदार ठहराने वाले जहरीले सरकारी प्रचार का सामना करने के काम में अहम भूमिका अदा की। ज़मीर के अधिकार की हिफ़ाज़त में और अधिकारों का हनन करने वाले राज्य के खि़लाफ़ राजनीतिक एकता बनाने के लिये, सैद्धांतिक तर्क की व्याख्या के लिए उन्होंने भक्ति लहर सहित हिन्दोस्तानी इतिहास की सर्वश्रेष्ठ विरासत को आधार बनाया।

सोवियत संघ के विघटन के पश्चात दुनिया में आये आकस्मिक बदलावों से दुनियाभर के कम्युनिस्टों के सामने नई चुनौतियां उभरकर आईं। चुनौती थी - क्या बदल गया है इसका विश्लेषण करना और अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की नयी आम कार्यदिशा निर्धारित करना। कामरेड बेंस ने इस कार्य में बहुमूल्य योगदान दिया जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि साम्राज्यवाद व श्रमजीवी क्रांति के युग के अंदर ही दुनिया एक नयी अवधि में प्रवेश कर गयी है। क्रांति की लहर ज्वार से भाटे में तब्दील हो गयी है। कम्युनिस्ट पार्टियां, पुराने नारों को ही बुलंद करते हुए और पुराने फार्मूलों को दोहराते हुऐ, पहले के जैसे काम नहीं कर सकती, मानों जैसे कि कुछ बदला ही न हो। कामरेड बेंस ने यह तर्क पेश किया कि वर्तमान अवधि में कम्युनिस्ट पार्टी को लोकतांत्रिक नव-निर्माण के संघर्ष को अगुवाई देनी चाहिये, ताकि संप्रभुता वास्तव में लोगों के हाथों में हो।

कामरेड बेंस ने सोवियत संघ के पतन के कारणों के सैद्धांतिक विश्लेषण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने आज के नज़रिये से, 1917 से लेकर आज तक के वर्ग संघर्ष के अनुभव का विश्लेषण करते हुए, समकालीन मार्क्सवादी-लेनिनवादी चिंतन के विकास में योगदान दिया।

कामरेड बेंस ने दिलो-जान से हिन्दोस्तानी सिद्धांत को विकसित करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, एक ऐसा सिद्धांत जो हिन्दोस्तानी परिस्थिति से निकलकर आता है और जो हिन्दोस्तान में कम्युनिज्म के विकास के लिये अनुकूल हो। मज़दूर वर्ग के मुक्ति संघर्ष को मार्गदर्शन देने के लिये, हम हिन्दोस्तानी कम्युनिस्टों को मज़दूर वर्ग को हिन्दोस्तानी फलसफा और क्रांतिकारी सिद्धांत, यानी खुद अपना दिमाग प्रदान करना होगा।

सभा का समापन करते हुए कामरेड लाल सिंह ने कामरेड हरदयाल बेंस की अविस्मरणीय याद को सलाम किया। उन्होंने हिन्दोस्तान की धरती पर क्रांति की जीत व कम्युनिज्म स्थापित करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिये अपनी पार्टी के दृढ़ निश्चय को अभिव्यक्त किया जिसके लिये कामरेड हरदयाल बेंस ने आखिरी सांस तक, अपना पूरा जीवन समर्पित किया था।

कामरेड हरदयाल बेंस के कार्य व शब्द अमर रहें!

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!

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Sep 1-15 2019    Voice of the Party    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम की हरायें!

मजदूरों और किसानों की सत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से संघर्ष करें!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का आवाहन, २३ फरवरी २०१२

अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों - बैंकिंग और बीमा, मशीनरी और यंत्रों का विनिर्माण, रेलवे, बंदरगाह, सड़क परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि - के मजदूर यूनियनों के बहुत से संघों ने 28 फरवरी २०१२ को सर्व हिंद आम हड़ताल आयोजित करने का फैसला घोषित किया है। यह हड़ताल मजदूर वर्ग की सांझी तत्कालीन मांगों को आगे रखने के लिये की जा रही है।

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मजदूर वर्ग के लिये राज्य सत्ता को अपने हाथ में लेने की जरूरत23-24 दिसम्बर, 2011 को मजदूर वर्ग गोष्ठी में प्रारंभिक दस्तावेज कामरेड लाल सिंह ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से पेश किया। मजदूर वर्ग के लिये राज्य सत्ता को अपने हाथ में लेने की जरूरत शीर्षक के इस दस्तावेज को, गोष्ठी में हुई चर्चा के आधार पर, संपादित किया गया है और केन्द्रीय समिति के फैसले के अनुसार प्रकाशित किया जा रहा है।

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