हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग का ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ता

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 25 अगस्त, 2019

स्वतंत्रता दिवस 2019 को लाल किले पर खड़े होकर प्रधानमंत्री मोदी ने यह वादा किया कि आर्थिक विकास की गति को खूब बढ़ा दिया जायेगा और अगले पांच वर्षों में हिन्दोस्तान को 5 खरब डालर की अर्थव्यवस्था में तब्दील कर दिया जायेगा। उन्होंने ऐलान किया कि “आज देश में आर्थिक सफलता हासिल करने के लिए बहुत अच्छा माहौल है” और “हमारी अर्थव्यवस्था की बुनियादें बहुत मजबूत हैं”। परन्तु सभी तथ्यों से यही पता चलता है कि हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था बहु-तरफा संकट में फंसी हुयी है।

उत्पादन की गति घटती जा रही है और बेरोज़गारी पिछले 45 वर्षों में न्यूनतम स्तर पर है। पूंजीनिवेश, निर्यात और बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज़ों की गति घट रही है। अप्रैल-जून की तिमाही में कंपनियों से प्राप्त आंकड़े यह दिखाते हैं कि पूंजीवादी मुनाफ़ों की औसतन गति घट गयी है।

उत्पादन की गति के घटने के पीछे एक मुख्य कारण यह है कि उत्पन्न की जा रही वस्तुओं को खरीदने के लिए मज़दूरों और किसानों के पास पैसे नहीं हैं। बढ़ती बेरोज़गारी, रोज़गारशुदा मज़दूरों के असली वेतनों में गिरावट और किसानों की घटती आमदनी की वजह से, मेहनतकश जनसमुदाय की खरीदारी की शक्ति बहुत कम हो गयी है।

न बिकी वस्तुओं का भण्डार बढ़ रहा है, जिसकी वजह से पूंजीपति उत्पादन में कटौती कर रहे हैं, मज़दूरों को नौकरियों से निकाल रहे हैं और अपनी निवेश की योजनाओं को स्थगित कर रहे हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि सिर्फ मोटर गाड़ी (ऑटो) उद्योग में ही इस वर्ष के अन्दर 3,00,000 मज़दूरों की नौकरियां चली जायेंगी।

हाल के वर्षों में सारी दुनिया में उत्पादन के स्थगित होने से और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के घट जाने से, निर्यात घट रहे हैं। विश्व व्यापार और हिन्दोस्तान के निर्यातों पर अमरीका के व्यापार शुल्क युद्ध और चीन, रूस व ईरान पर अमरीका द्वारा लगाये गए प्रतिबंधों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

यह स्पष्ट है कि इस समय घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक माहौल, दोनों ही हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक हैं। प्रधानमंत्री मोदी इस सच्चाई को छिपा रहे हैं और लोगों को बुद्धू बनाने के लिए झूठे सपने बेच रहे हैं।

टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने बाज़ार की इन नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद, अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने और अपनी दौलत का तेज़ी से विस्तार करने के लिए, बेतहाशा नए-नए रास्ते तलाश रहे हैं। वे इसके लिए अर्थव्यवस्था का फ़ौजीकरण करने, हिन्दोस्तान-अमरीका गठबंधन को और मजबूत करके ज्यादा हमलावर तरीके से विदेशी बाज़ारों पर कब्जा करने और मज़दूरों के शोषण, किसानों की लूट तथा प्राकृतिक संसाधनों की लूट को खूब बढ़ाने की योजनायें बना रहे हैं।

वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किये गए 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण में इजारेदार पूंजीवादी घरानों की इस रणनैतिक सोच की झलक देखी जा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगले पांच वर्षों में 5 खरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करने के लिए एकमात्र रास्ता है तेज़ गति से निर्यात-प्रेरित पूंजीवादी विकास। यह कहा गया है कि इसके लिए, हमें दुनिया के बाज़ार में बिकने वाली तरह-तरह की सामग्रियों के उत्पादन के लिए ढेर सारी विदेशी पूंजी को आकर्षित करना होगा और अमरीका के बाज़ार में उपभोग की निर्मित सामग्रियों की सप्लाई के पसंदीदा स्रोत बतौर, चीन की जगह पर हिन्दोस्तान को ले आना।

ऐसे समय पर, जब अमरीका द्वारा लगाये गए भारी व्यापार शुल्कों की वजह से, चीन के निर्यातों को चोट पहुंच रही है, तब हिन्दोस्तानी सरमायदार सोच रहे हैं कि वे इस हालत का फायदा उठा सकते हैं। इसलिए वे केंद्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि मज़दूरों के वेतनों को घटा दिया जाए और “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” (कारोबार चलाना आसान बनाना) में उन्नति लाने के अन्य क़दम उठाये जायें।

2 अगस्त को वेतन संहिता विधेयक को संसद में पारित किया गया। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को प्रतिदिन मात्र 178 रुपए या प्रति माह लगभग 5000 रुपए तय किया गया है। कुछ महीने पहले श्रम मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने जो सिफारिश की थी, यह उसके आधे से भी कम है। प्रति माह 18,000 रुपए का न्यूनतम वेतन, जो बीते कई सालों से देशभर के सभी मज़दूर यूनियनों की मांग रही है, उससे विशेषज्ञ समिति की सिफारिश बहुत कम है।

15 अगस्त को अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि “हमारे राष्ट्र की दौलत के निर्माताओं को पहचानना और प्रोत्साहन देना आज वक्त की ज़रूरत है। उनका और ज्यादा सम्मान करना होगा... मैं मानता हूं कि जो लोग देश की दौलत को पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, वे राष्ट्र की संपत्ति हैं और उन्हें पूरी ताक़त देनी होगी”।          

जब प्रधानमंत्री मोदी “दौलत के निर्माताओं” की बात करते हैं, तो वे पूंजीपतियों की बात कर रहे हैं, मेहनतकशों की नहीं। वे यह प्रचार कर रहे हैं कि टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे पूंजीपति राष्ट्र की दौलत के निर्माता हैं, इसलिए उनका सम्मान करना चाहिए और उन्हें हमेशा ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाने की “पूरी ताक़त देनी चाहिए”। वे पूंजीपति वर्ग की बिगड़ी हुई सोच और खुदगर्ज़ दृष्टिकोण को प्रकट कर रहे हैं, क्योंकि वे खुद भी उसी पूंजीपति वर्ग के सदस्य हैं और उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिनिधि हैं।

वास्तव में, मज़दूर, किसान और दूसरे मेहनतकश ही प्रतिवर्ष समाज के बेशी मूल्य का उत्पादन करते हैं, जो देश के धनकोष में जुड़ता है। मेहनतकश ही दौलत के वास्तविक निर्माता हैं, जबकि पूंजीपति उस दौलत को हड़प लेते हैं क्योंकि वे उत्पादन के साधनों के मालिक हैं। वे दौलत के लुटेरे हैं, निर्माता नहीं।

इतना कम न्यूनतम वेतन निर्धारित करना पूंजीपतियों के हित में है, क्योंकि इस तरह वे श्रमिकों का अधिक से अधिक शोषण कर सकते हैं। यह शोषक वर्ग की जेबें भरने के लिए दौलत के असली निर्माताओं की बढ़-चढ़कर लूट है। अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालना तो दूर, मज़दूरों के वेतनों को घटाने से उपभोग की वस्तुओं की अपर्याप्त मांग की समस्या और भी तीखी हो जायेगी। 

2019-20 के केन्द्रीय बजट को 5 जुलाई को पेश करते हुए, वित्त मंत्री ने बीमा, विमान और खुदरा व्यापार के क्षेत्रों को विदेशी पूंजीपतियों के प्रवेश के लिए और ज्यादा खोल देने के क़दमों की घोषणा की। निजीकरण कार्यक्रम के खि़लाफ़ मज़दूर वर्ग के एकजुट विरोध की उपेक्षा करते हुए, बजट में सार्वजनिक संपत्तियों को निजी कंपनियों के हाथों बेचकर धन प्राप्त करने का अप्रत्याशित ऊंचा लक्ष्य प्रस्तावित किया गया है। सौ दिन के कार्यक्रम के तहत, भारतीय रेल का निजीकरण, खुलेआम किया जा रहा है। एयर इंडिया को किसी निजी कंपनी या देशी-विदेशी कंपनियों के समूह को बेचने की फिर से तैयारी की जा रही है।

हिन्दोस्तान के किसान बहुत कठिन संकट में फंसे हुए हैं। देशी-विदेशी बड़ी-बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कम्पनियां जो कृषि उत्पादों के बाज़ार पर हावी हैं, उत्पादों की खरीदारी के दामों को निम्नतम स्तर पर रखकर, किसानों को तबाही की ओर धकेल रही हैं। सरकार ने सभी कृषि उत्पादों के लाभकारी दाम निर्धारित करने की किसानों की लंबित मांग को पूरा करने से इनकार कर दिया है। उसने सरकारी खरीदारी के केन्द्र स्थापित करने से इनकार कर दिया है, जिनमें किसानों को लाभकारी दाम सुनिश्चित हो सकते थे। किसानों को रोज़ी-रोटी की सम्पूर्ण असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है, न सिर्फ बाढ़ और सूखा जैसी बार-बार होने वाली प्राकृतिक आपदाओं की वजह से, बल्कि बाज़ार पर निजी व्यापार कंपनियों के हावी होने से। 

वित्त मंत्री ने खुदरा व्यापार को विदेशी कंपनियों के लिए और ज्यादा खोल देने के जो क़दम घोषित किये हैं, उनकी वजह से बहुत सारे और किसान व छोटे कारोबार वाले तबाह हो जायेंगे।

मज़दूर वर्ग और किसानों के हितों की बलि चढ़ाकर पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के इन आर्थिक क़दमों के साथ-साथ, राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक उत्पीड़न को भी बहुत बढ़ा दिया गया है।

संसद में यू.ए.पी.ए. संशोधन विधेयक को पारित कर दिया गया है। इस कानून के तहत, केंद्र सरकार किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी करार कर सकती है और उसके लिए कोई सबूत पेश करने की ज़रूरत नहीं होगी।

जम्मू-कश्मीर में अप्रत्याशित राजकीय आतंकवाद फैला हुआ है। 5 अगस्त को संसद में कश्मीर से संबंधित फैसलों के लिए जाने से पहले ही, वहां हजारों-हजारों अतिरिक्त केन्द्रीय सैनिक तैनात किये गये और संचार के सभी माध्यम बंद कर दिए गए। जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र-शासित इलाकों में बांट दिया गया, और यह जम्मू-कश्मीर के लोगों की मर्ज़ी के खि़लाफ़ व बलपूर्वक उनका मुंह बंद करके किया गया।

जम्मू-कश्मीर में राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराने के लिए पहले यह दावा किया गया था कि वहां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई गंभीर ख़तरा है, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा था कि शायद खुफिया एजेंसियों को ऐसी ख़बर है कि वहां स्वतंत्रता दिवस से पहले कोई आतंकवादी हमला हो सकता है। पर 5 अगस्त को सच्चाई सामने आ गयी। अतिरिक्त सैनिक तैनात करने और संचार पर रोक लगाने का असली मक़सद लोगों को किसी आतंकवादी हमले से बचाना नहीं था। असली मक़सद था जन-प्रतिरोध को कुचलना, ताकि लोग केंद्र सरकार के जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे़ को ख़त्म करने, उसे बांटकर दो केंद्र-शासित क्षेत्रों में तब्दील कर देने और उस इलाके को पूरी तरह नयी दिल्ली की मुट्ठी में लाने के फैसले का विरोध न कर सकें। 

कश्मीर के लोगों पर वहशी दमन, उन्हें “इस्लामी आतंकवादी” व “पाकिस्तानी एजेंट” करार दिया जाना, इन सबके साथ-साथ, केंद्र सरकार देशभर में यह प्रचार चला रही है कि “विदेशी” हमारे देश में घुसकर, हमारी नौकरियां, ज़मीन और दूसरे क़ीमती संसाधन लूट रहे हैं। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (नागरिकों की राष्ट्रीय सूची) बनाने का कार्यक्रम, जो हाल में असम में लागू किया गया, अब पूरे देश में लागू किया जायेगा। मुसलमान धर्म के लोगों को दस्तावेज़ पेश करके यह साबित करना पड़ेगा कि वे इस देश के नागरिक हैं और अगर वे ऐसा करने में असमर्थ हुए तो उन्हें कारागार शिविरों में भेज दिया जायेगा।

गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि उनकी सरकार देश की धरती के हर इंच पर बसे हुए अवैध आप्रवासियों को ढूंढ निकालेगी और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक देश से बाहर निकाल देगी। यह अमरीका के ट्रम्प प्रशासन के इस्लामी आप्रवासियों के खि़लाफ़ नस्लवादी हमले के जैसा ही है।

जून में नयी सरकार ने सत्ता में आने के ठीक बाद, अमरीकी विदेश सचिव माइक पोम्पेओ की मेजबानी की। जून के अंतिम हफ्ते में, एक संयुक्त प्रेस वार्ता में विदेश मंत्री जयशंकर ने ऐलान किया कि हिन्दोस्तान और अमरीका, दोनों “सीमा-पार आतंकवाद” को बिलकुल न बर्दाश्त करने की नीति पर सहमत हैं। पाकिस्तान के खि़लाफ़ हिन्दोस्तान की जंग फरोशी और “सर्जिकल स्ट्राइक” का अमरीका ने समर्थन किया। उसके बदले में, अब अमरीका ईरान पर अपने नाजायज़ हमले के लिए हिन्दोस्तान के समर्थन की मांग कर रहा है।

हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार “इस्लामी आतंकवाद” से लड़ने के झंडे तले, अमरीका के साथ गठबंधन बनाकर, देश को तेज़ गति से फौजीकरण करने और नाजायज़ कब्ज़ाकारी जंग में भाग लेने के रास्ते पर घसीट रहे हैं। उनका उद्देश्य है दक्षिण एशिया में हिन्दोस्तान के निर्विवादित प्रभुत्व को और मजबूत करना, विदेशों में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के प्रभाव क्षेत्रों और बाज़ारों का विस्तार करना और सारी दुनिया पर हावी बड़ी ताक़तों के विशेष गिरोह में हिन्दोस्तान को शामिल करना।

फ़ौजीकरण का यह मतलब है कि हिन्दोस्तान के मज़दूर-किसान जो दौलत पैदा कर रहे हैं, उसका अधिक से अधिक हिस्सा इजारेदार पूंजीवादी घरानों के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए, गैर-उत्पादक और विनाशकारी कार्यों पर खर्च किया जायेगा। अमरीका के साथ सैनिक-रणनैतिक गठबंधन को मजबूत करने का मतलब है दक्षिण एशिया में जंग के ख़तरे को बढ़ाना और दूसरे इलाकों में हिन्दोस्तान के नाजायज़ जंग में फंसने के ख़तरे को बढ़ाना।

2024 तक देश को एक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का अति-प्रचारित लक्ष्य इस बात का ऐलान है कि आर्थिक नीति पूंजी-केन्द्रित ही रहेगी और उसकी दिशा देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने वाली दिशा ही रहेगी। देश की आबादी की बढ़ती भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही कोई इरादा। संक्षेप में, “सबका विकास” का नारा सरासर झूठा है और लोगों को बुद्धू बनाने के लिए एक खोखला वादा है।

 

प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं कि लोगों को उन पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वे सिर्फ देश का हित चाहते हैं। 15 अगस्त को उन्होंने कसम खाई कि उनका दिल 130 करोड़ हिन्दोस्तानियों और उनकी खुशहाली के लिए धड़कता है।

ऐतिहासिक अनुभव यही दिखाता है कि देश का प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो और उसका दिल चाहे किसी के लिए भी धड़कता हो, पर समाज का एजेंडा पूंजीपति वर्ग तय करता है और पूंजीपति वर्ग की अगुवाई इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं। इजारेदार पूंजीवादी घराने ही फैसला करते हैं कि उनके एजेंडा को लागू करने और उसे लोगों को बेचने का काम किस समय किस पार्टी को सौंपा जाना चाहिए।

आज़ादी के बाद के दशकों में बड़े पूंजीपतियों ने नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी पर भरोसा किया था, यह झूठा प्रचार करने के लिए कि एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी समाज का निर्माण किया जा रहा है। बड़े पूंजीपतियों ने समाजवाद के लिए हिन्दोस्तानी लोगों के जजबातों को समझ लिया था। इसलिए, राजकीय इजारेदार पूंजीवाद को विकसित करने की टाटा-बिरला योजना को कांग्रेस पार्टी ने सजा-संवार कर समाजवाद के निर्माण की योजना के रूप में पेश किया था। आज वही हुक्मरान वर्ग अपने साम्राज्यवादी इरादों को हमलावर तरीक़े से बढ़ावा देने के लिए, अपने पसंदीदा हथकंडे बतौर भाजपा पर निर्भर कर रहा है।

राजनीतिक आज़ादी हासिल करने के बाद, पहले तीन दशकों तक, बड़े सरमायदारों ने घरेलू बाज़ार को विदेशी पूंजीवादी स्पर्धा से बचाने की नीति अपनाई, जिसके लिए आयात शुल्कों को ऊंचा रखा गया और विदेशी पूंजीनिवेश को कुछ गिने-चुने क्षेत्रों तक ही सीमित रखा गया।

उस समय दुनिया दो छावनियों में बंटी हुई थी। एक छावनी की अगुवाई अमरीका कर रहा था और दूसरा की सोवियत संघ। हिन्दोस्तान ने दोनों छावनियों के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध बनाये। हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग ने दोनों महाशक्तियों के साथ दांवपेच करके, अपने लिए सबसे बेहतर सौदे हासिल किये।

1980 के दशक के बीच तक, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार समझ गए थे कि अगर उन्हें एक वैश्विक साम्राज्यवादी ताक़त बनना है तो उन्हें विदेशी बाज़ारों पर कब्ज़ा करना होगा और हिन्दोस्तानी बाज़ारों को विदेशी पूंजी के लिए खोल देना होगा। उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हिन्दोस्तानी पूंजी के आधुनिकीकरण और भूमंडलीकरण का नारा बुलंद किया था।

1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ, तब दुनिया में बहुत बड़े-बड़े और अचानक परिवर्तन हुए। दो ध्रुवों में दुनिया का बंटवारा ख़त्म हो गया। साम्राज्यवाद और श्रमजीवी क्रांति के युग के अन्दर एक नयी अवधि शुरू हुयी, जिसमें क्रांति की लहर ज्वार से भाटे में बदल गई। इस अवधि में अमरीका अपने निर्विवादित प्रभुत्व के तले एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के लिए हमलावर प्रयास कर रहा है।

1991 से, नयी दिल्ली में जो भी सरकार आयी है, उसने विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सिफारिशों के अनुसार, तथाकथित आर्थिक सुधारों के कार्यक्रम को लागू करने के क़दम उठाये हैं। हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों ने व्यापार के उदारीकरण के ज़रिये विदेशों में अपने बाज़ार और प्रभाव क्षेत्र विस्तृत किये हैं। साथ ही साथ, हिन्दोस्तान के बाज़ारों को भी विदेशी पूंजीपतियों के प्रवेश के लिए खोल दिया गया है।

हाल के दशकों में कई हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीवादी घराने पूंजी के प्रमुख निर्यातक बतौर उभर कर आगे आये हैं। उन्होंने एशिया और यूरोप के अनेक देशों में पूंजीनिवेश किया है। टाटा, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों के लिए अब विदेशों में किये गए पूंजीनिवेश देश के अन्दर किये गए निवेशों से ज्यादा मुनाफ़ेदार होने लगे हैं।

1991-2008 के दौरान, वस्तुओं और सेवाओं के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बड़ी तेज़ गति से वृद्धि हुई। हिन्दोस्तान के आयात कुल वार्षिक उत्पादन के 7 प्रतिशत से बढ़कर, 20 प्रतिशत हो गए। सेवाओं, खास तौर पर अमरीका के बाज़ारों के लिए कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और आई.टी. समर्थित सेवाओं के निर्यात में सबसे तेज़ गति से वृद्धि हुयी।

इस समय, हिन्दोस्तान से निर्यात की गयी वस्तुओं और सेवाओं के लिए सबसे बड़ा बाज़ार अमरीका में है। हिन्दोस्तान के कुल निर्यातों का एक-चैथाई हिस्सा अमरीकी बाज़ार के लिए है। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और आई.टी. समर्थित सेवाओं के निर्यात का 60 प्रतिशत अमरीकी बाज़ार के लिए है। हमारे देश के बड़े पूंजीपतियों का एक प्रमुख हिस्सा अमरीकी बाज़ार में अपनी पहुंच को किसी भी क़ीमत पर बनाये रखने पर निर्भर है। इस बात का फायदा उठाकर, अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तानी राज्य पर अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

1997 तक, विश्व बैंक जैसे विदेशी संस्थानों को सिर्फ केंद्र सरकार के साथ नीतिगत विषयों पर चर्चा करने की इज़ाज़त दी जाती थी। परन्तु, 1998 से, विश्व बैंक को चुनिन्दा राज्यों के साथ नीतिगत विषयों पर सीधी बातचीत करने और नीतिगत सुधारों के लिए उन्हें उधार देने की इज़ाज़त दी गयी। इसके साथ, बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए, राज्यों के स्तर पर नीतियों और राजनीति पर प्रभाव डालने के द्वार खुल गए।

अमरीका अब हिन्दोस्तान में विदेशी पूंजी के प्रवेश का एक मुख्य स्रोत बन गया है। बीती अवधि में, सरकारी दुतरफा “सहयोग” तथा विश्व बैंक जैसे बहुदेशीय संस्थानों द्वारा दिए गए कर्जे़ विदेशी पूंजी के प्रवेश के प्रमुख रास्ते हुआ करते थे। वर्तमान अवधि में, विदेशी पूंजी के प्रवेश के स्तर में बहुत बड़ी छलांग देखने में आ रही है। आज निजी कंपनियों, बैंकों व अन्य वित्त संस्थानों द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश (एफ.डी.आई.) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफ.पी.आई.) विदेशी पूंजी के प्रवेश के मुख्य रूप हैं।

हिन्दोस्तान के मामलों पर बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादी प्रभाव तरह-तरह से डाला जाता है। यू.एस.ए.आई.डी., अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे सरकारी माध्यमों के अलावा, अलग-अलग एन.जी.ओ., शोध संस्थानों, थिंक टैंक, अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े-बड़े बैंकों में नियुक्त किये गए हिन्दोस्तानी मुख्य अधिकारियों के ज़रिये भी यह प्रभाव डाला जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर और भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के पदों के लिए अमरीका में प्रशिक्षित हिन्दोस्तानी बुद्धिजीवियों को नियुक्त करना अब आम अभ्यास बन गया है। हिन्दोस्तानी राज्य के सभी संस्थानों, खुफिया एजेंसियों, अफ़सरशाही के उच्च स्तरों, हुक्मरान वर्ग की सारी राजनीतिक पार्टियों आदि में बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बड़ी गहराई तक अपने पांव जमा रखे हैं।

अमरीका की नीति है उन-उन देशों के हुक्मरान वर्ग का समर्थन करना, जो एक-ध्रुवीय दुनिया बनाने के अमरीका के प्रयासों के साथ क़दम मिलाकर चलने को तैयार हैं। जो सरकारें अमरीका के दबावों का विरोध करती हैं, उन्हें अस्थायी कर देने, टुकड़े-टुकड़े कर देने या उन पर फ़ौजी हमला करने की कोशिश की जाती है।

अमरीका ने हमारे देश में राजनीतिक स्थिति को अस्थायी करने के कई प्रयास किये हैं। इनमें से सबसे हाल का प्रयास था 2011-12 में सुर्खियों में आने वाला भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन।

अमरीका मनमोहन सिंह सरकार की बहुत तारीफ करता था, लेकिन बाद में परमाणु दायित्व कानून पर हमारी सरकार और अमरीका के बीच गंभीर मतभेद सामने आये। अमरीकी प्रशासन ने इस बात पर आपत्ति जताई कि हिन्दोस्तानी सरकार रक्षा सामग्रियों की खरीदारी के ठेके रूसी और गैर-अमरीकी कंपनियों को दे रही थी। हिन्दोस्तान-अमरीकी सैनिक सांझेदारी को मजबूत करने में मनमोहन सिंह सरकार की देरी पर भी अमरीका नाखुश था। अचानक, अमरीकी पत्रिका टाइम ने मनमोहन सिंह को “निष्क्रिय सुधारक” का नाम दे दिया।

उस समय, मनमोहन सिंह सरकार पर निशाना साधकर छेड़े गए भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन को अमरीका ने गुप्त रूप से पूरा प्रश्रय दिया। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में उस आन्दोलन को इतना विस्तृत कवरेज दिया जाना, अमरीकी प्रशासन के उच्च अफ़सरों द्वारा हिन्दोस्तान की सरकार को चेतावनी कि उस आन्दोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग न किया जाए, इन बातों से यह स्पष्ट हो जाता है।

अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तान की स्थिति को अस्थायी करने और हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग पर दबाव डालने के लिए, एक हथकंडा बतौर, भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन का इस्तेमाल करना चाहते थे। परन्तु आम आदमी पार्टी नामक राजनीतिक पार्टी की स्थापना को गुप्त रूप से समर्थन देकर और दिल्ली विधानसभा चुनावों में उस पार्टी को भारी मतों से जिताकर, उसे राज्य तंत्र में शामिल करके, हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग ने उस खतरे को टाल दिया। साथ ही साथ, नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने, गुप्त अमरीकी समर्थन के साथ, भ्रष्टाचार-विरोध का जामा पहन लिया।

इतिहास में पहली बार, 2015 में, गणतंत्र दिवस समारोह में अमरीका के राष्ट्रपति को मुख्य अतिथि बतौर आमंत्रित किया गया। इससे यह सन्देश दिया गया कि हिन्दोस्तान ने अब “गुट-निरपेक्षता” के पुराने ढांचे से बाहर निकलने का निश्चय कर लिया है, कि अब उसे अमरीका के साथ गले लगाने में कोई झिझक नहीं है। उसके बाद, कई ऐसे समझौते किये गए हैं, जिनके अनुसार, अमरीकी सैनिक जहाजों को हिन्दोस्तानी सैनिक अड्डों पर रुकने और ईंधन लेने की इज़ाज़त दी गयी है और हिन्दोस्तानी व अमरीकी सेनाओं की एक सांझी संचार व्यवस्था विकसित की जा रही है। 

2019 के चुनावों में भाजपा की भारी बहुमत से जीत को अंजाम देने में वाशिंगटन का हाथ साफ नज़र आता है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी हुक्मशाही के तले, एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के इरादे से, सारी दुनिया में इस्लाम-विरोधी, समाज-विरोधी और जंग फरोश हमले कर रहे हैं। इसमें वे हिन्दोस्तान को अपना वफादार मित्र बनाना चाहते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी यह मानते हैं कि मोदी की अगुवाई में दुबारा जीत कर आयी भाजपा सरकार हिन्दोस्तान को अमरीका के वफादार मित्र की भूमिका निभाने में सबसे बेहतर नेतृत्व दे सकती है।

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने “इस्लामी आतंकवाद” के खि़लाफ़ लड़ने के नाम पर, बहुत सारे नाजायज़ जंग छेड़े हैं और पूरे-पूरे राष्ट्रों को बर्बाद किया है। उनका मक़सद है पश्चिम एशिया के तेल समृद्ध इलाके में अमरीकी वर्चस्व को स्थापित करना। अमरीका के हुक्मरान एशिया और सारी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के इस मक़सद को हासिल करने के रास्ते में, चीन, रूस और ईरान की मिली-जुली ताक़त को मुख्य रुकावट मानते हैं। वे चाहते हैं कि चीन को रोकने, रूस को कमजोर करने, ईरान को अलग-थलग करने और इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के नाम पर नए-नए जंग छेड़ने की उनकी इन कोशिशों में हिन्दोस्तान उनका सहयोगी बने।

हांगकांग में “लोकतंत्र परस्त” जन-विरोध को उकसाने और धन देने में अमरीकी एजेंसियों की अहम भूमिका है। अमरीकी एजेंसियां चीन के अन्दर शिनचियांग में तथा पाकिस्तान के अन्दर बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलनों को धन देकर व उनका खूब प्रचार करके, उन्हें समर्थन दे रही हैं। ये दोनों स्थान चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के रास्ते पर स्थित हैं।

हिन्दोस्तान की वफादारी को सुनिश्चित करने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने परमाणु गिरोह में शामिल होने के हिन्दोस्तान के प्रयासों का समर्थन किया है। हिन्द-प्रशांत महासागर इलाके में अमरीकी प्रभुत्व को मजबूत करने के इरादे से, उन्होंने क्यू.यू.ए.डी. नामक चीन-विरोधी गठबंधन में जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत हिन्दोस्तान को भी शामिल किया है।

 

म्मू-कश्मीर के विशेष दजेऱ् को समाप्त करने और उसे दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बांट देने का फैसला हुक्मरान वर्ग की तरफ से ऐलान है कि दक्षिण एशिया में हिन्दोस्तान सर्व-प्रधान ताक़त है और इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती है। इसका मक़सद है कश्मीर विवाद के मुद्दे पर हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच किसी बाहरी ताक़त की मध्यस्थता को रोकना। इस समय अमरीका हिन्दोस्तान के साथ मित्रता चाहता है, इसलिए इसका फायदा उठाते हुए, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों ने बड़ी तेज़ी से यह क़दम उठाया, ताकि उनके इस दावे को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिल सके कि पाकिस्तान अधिकृत भाग समेत सम्पूर्ण कश्मीर हिन्दोस्तान का ही है।

अमरीकी और हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्गों के आपसी संबंध में सांझे हित भी हैं और विवाद के विषय भी। उनके बीच में समझौता भी होता है और टकराव भी। वे अपने सांझे हितों के लिए समझौता करते हैं, जैसे कि चीन को एशिया में प्रधान ताक़त बतौर आगे बढ़ने से रोकना। लेकिन जब हिन्दोस्तान तेल और गैस के अलग-अलग स्रोतों से आयात करके अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहता है या विभिन्न देशों, खास कर रूस से उच्चतम हथियार खरीदना चाहता है, तब उनके आपसी हितों में टकराव होता है। अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान अपनी ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए अमरीका पर ही निर्भर हो। वह हिन्दोस्तान को रूस से हथियार खरीदने से रोकना चाहता है। पाकिस्तान को लेकर भी हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच में अंतर्विरोध हैं।

अमरीकी हुक्मरान वर्ग को गुस्सा न दिलाने के लिए, हिन्दोस्तान ने ईरान से अपने तेल के आयातों को पहले ही कम कर दिया है। उसने फिलिस्तीनी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष का समर्थन करने के अपने सालों पुराने रवैये को बदल दिया है। वह अब इस्राइल के साथ रणनैतिक संबंध बना रहा है। इस सरकार के पदग्रहण के ठीक बाद, जब ईरान ने अपने उच्च राजनयिक, विदेश मंत्री ज़रीफ को हिन्दोस्तान भेजा, तब प्रधानमंत्री मोदी ने उनके साथ मिलने से इनकार कर दिया। जैसे ही ईरान के मंत्री वापस गए, वैसे ही हिन्दोस्तान की सरकार ने इस्राइल के साथ मिलकर बनाए गए मिसाइल का परीक्षण किया। ये सब हिन्दोस्तान के नेताओं की ओर से, अपने “रणनैतिक सांझेदार” अमरीका को स्पष्ट सन्देश थे। अमरीका का वफादार मित्र बनने के लिए, ईरान के साथ हिन्दोस्तान की लम्बे समय से चली आ रही मित्रता को त्याग दिया जा रहा है।

हमारा हुक्मरान वर्ग अपने खुद के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए, अमरीका के समर्थन की उम्मीद कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय अनुभव यही दिखाता है कि अमरीका कभी भी, दुनिया के किसी भी देश का भरोसेमंद मित्र नहीं रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने खुदगर्ज़ हितों के लिए गठबंधन बनाते और तोड़ते हैं। वे इस या उस देश का समर्थन सिर्फ तब तक करते हैं, जब तक अपनी दादागिरी जमाने का उनका लक्ष्य पूरा न हो। उसी देश के साथ अमरीका के गठबंधन बनाने के फायदे जब खत्म हो जाते हैं, तो उसे तहस-नहस करने में अमरीका को कोई झिझक नहीं होती।

इसी अवधि में अमरीका ने मजहबी और सामुदायिक हिंसा आयोजित करके यूगोस्लाविया को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, जबकि उसने पहले यूगोस्लाविया का समर्थन किया था। अमरीका ने इराक पर हमला और कब्ज़ा करके, सद्दाम हुसैन की सरकार को गिरा दिया, जबकि पहले अमरीका ने उसी सरकार का समर्थन किया था और उसे ईरान पर हमला करने को उकसाया था। अमरीका ने इराकी लोगों का सामुदायिक बंटवारा करके, उनके देश को एक स्थाई रणभूमि में बदल दिया है। अमरीका ने अपने लम्बे समय के मित्र, पाकिस्तान को तबाह कर दिया है और उस देश को पश्चिम व मध्य एशिया में इस्तेमाल किये जाने वाले तरह-तरह के आतंकवादी गिरोहों का प्रशिक्षण केंद्र बना दिया है।

अमरीका के इस इतिहास को देखते हुए, यह हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग की बेहद बेवकूफी है कि वे अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अमरीका पर निर्भर हो रहे हैं। अगर हिन्दोस्तान अमरीका का भरोसेमंद मित्र बन जाता है, तो इसका मतलब है कि हम अमरीका के अपराधी साम्राज्यवादी जंग में उसके सांझेदार होंगे। यह हिन्दोस्तानी लोगों के हितों के बिलकुल खि़लाफ़ है। यह अमरीकी दादागिरी के विरोध में संघर्ष कर रहे सभी राष्ट्रों और लोगों के हितों के खि़लाफ़ है।

 

बसे बड़ा और ख़तरनाक झूठ जो हर रोज़ फैलाया जाता है, वह है यह प्रचार कि हिन्दोस्तानी राज्य और उसका संविधान धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक है, कि लोग अपनी पसंद की सरकार को चुनते हैं। “लोगों ने मोदी सरकार को चुना है, इसलिए उसे चैन से अपना काम करने दीजिये” - यह सन्देश आजकल टी.वी. में कई सारे फिल्म अभिनेता और दूसरे जाने-माने लोग देते रहते हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य के बारे में यह सरकारी प्रचार इस ऐतिहासिक सच्चाई से बिलकुल विपरीत है कि इस राज्य की कार्यकारिणी, विधायिकी और न्याय पालिका के संस्थान, सारे उपनिवेशवाद की विरासत हैं। इस उपमहाद्वीप के लोगों को बांटकर उन पर राज करने के लिए बरतानवी उपनिवेशवादियों ने जिन संस्थानों को स्थापित किया था, उन्हें आज़ादी के बाद सत्ता में आये हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग ने बरकरार रखा है तथा और कुशल बना दिया है। इनमें शामिल हैं सेना, अफ़सरशाही, कानून, अदालत, केंद्र व राज्य के स्तर पर विभिन्न निर्वाचित निकाय, जो सभी इस शोषण और लूट की आर्थिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त करते हैं।

हिन्दोस्तान के संविधान के पूर्वकथन को पढ़ने से ऐसा लगता है कि लोग ही सर्वोच्च फैसले लेने वाले हैं। पर सच्चाई तो यह है कि यह संविधान लोगों के नाम पर फैसले लेने का अधिकार मंत्रिमंडल को देता है। मिसाल के तौर पर, जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने और केंद्र-शासित प्रदेशों में तब्दील करने के हाल के फैसले को मंत्रिमंडल ने एक-तरफा तरीके से लिया और फिर ऐलान कर दिया कि यह सबके हित में है। सबसे शक्तिशाली आर्थिक ताक़तों के समर्थन के साथ, इस प्रकार के एक-तरफा फैसलों को इस संविधान के तहत वैध माना जाता है।

संविधान में यह माना जाता है कि हर बालिग नागरिक को मतदान करने का सामान अधिकार है। परन्तु चुनाव प्रक्रिया के नियम और कानून ऐसे बनाए गए हैं कि सिर्फ वही पार्टियां चुनावों में जीत सकती हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग का समर्थन प्राप्त हो। पूंजी के मालिक अनेक अलग-अलग गुटों और राजनीतिक पार्टियों में बंटे हुए हैं। ये पार्टियां चुनावों का इस्तेमाल करके, लोगों को बांटती हैं और अपनी समस्याओं के असली स्रोत से गुमराह कर देती हैं। उम्मीदवारों का चयन और इन पार्टियों के आपसी चुनाव गठबंधन, सब धर्म और जाति के आधार पर किये जाते हैं।

मुट्ठीभर सम्पत्तिवान इजारेदार पूंजीपतियों के अलग-अलग भाग कार्यकारिणी का संचालन करने के लिए आपस में स्पर्धा करते हैं। उम्मीदवारों का चयन करना, चुनाव प्रचार अभियान चलाना, सरकार का गठन करना, कानून बनाना और नीतियों को अपनाना - वे इस पूरी राजनीतिक प्रक्रिया पर हावी हैं।       

चूंकि करोड़ों लोग मतदान करते हैं, इसलिए यह धारणा फैलाई जाती है कि लोगों ने अपनी पसंद की सरकार को चुना है। परन्तु बीते 72 वर्षों का अनुभव यही दिखाता है कि वर्तमान व्यवस्था के चलते, चुनाव लोगों के मत को नहीं प्रकट करते हैं। चुनावों के परिणाम को लोग नहीं निर्धारित करते हैं।

जनसमुदाय के पास बस इतना ही चुनने का अधिकार है कि पूंजीपति वर्ग की कौन-सी पार्टी सरकार बनायेगी और शोषण-लूट की इस व्यवस्था को चलायेगी। प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों के नेता उम्मीदवारों का चयन करते हैं। लोग जिन्हें जानते नहीं हैं और जिन पर भरोसा नहीं करते हैं, उन्हीं में से किसी एक को चुनने को बाध्य होते हैं। मतदान करने के बाद, निर्वाचित प्रतिनिधि पर लोगों का कोई नियंत्रण नहीं होता है। सरकार क्या काम करती है और किसके हित में करती है, इस पर लोगों का कोई नियंत्रण नहीं होता।

व्यक्तिगत उम्मीदवारों के चुनाव अभियान पर खर्च की एक कानूनी सीमा है और निर्वाचन आयोग का काम है उस पर निगरानी करना। लेकिन हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों द्वारा समर्थित राजनीतिक पार्टियों के अत्यधिक खर्चों पर न तो कोई सीमा है और न ही इनकी कोई निगरानी की जाती है। इस वजह से, इन राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों और दूसरे उम्मीदवारों के बीच में बहुत असमानता होती है। बहुत ही असमान स्पर्धा होती है। इजारेदार पूंजीवादी घराने हजारों-करोड़ों रुपये खर्च करके यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी भरोसेमंद पार्टियों में से किसी एक या दूसरे को ही सरकार बनाने का मौका मिले।

कहा जा रहा है कि 2019 का लोक सभा चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव था। अनुमान लगाया जा रहा है कि उसमें कुल खर्च पचास हजार करोड़ से एक लाख करोड़ रुपए था। आधे से ज्यादा खर्च भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान पर था।

3 जुलाई को कुछ सेवानिवृत्त सरकारी अफ़सरों ने एक खुला पत्र लिखा, जिसमें इस बात पर रोशनी डाली गयी है कि निर्वाचन आयोग ने सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में खुलेआम काम किया था। यह बताया गया है कि चुनाव के दिनों की घोषणा भी सोच-समझ कर देर से की गयी ताकि प्रधानमंत्री मोदी कई परियोजनाओं का उद्घाटन पूरा कर सकें। जिन राज्यों में भाजपा का बहुत कम समर्थन था, वहां चुनाव एक सत्र में करवाए गए। जिन राज्यों में भाजपा के सामने कठिन चुनौती थी या वह अपनी सीट संख्या बढ़ा सकती थी, उनमें चुनाव कई सत्रों में करवाए गए।

बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के टी.वी. चैनलों ने भी इसमें बड़ी पक्षपात वाली भूमिका निभायी। उन्होंने कांग्रेस पार्टी और विपक्ष की अन्य पार्टियों को पुराना व भ्रष्ट दिखाया और भाजपा को नए हिन्दोस्तान का प्रवर्तक बताया।

अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी फेसबुक, जो व्हाट्स एप्प का भी मालिक है, ने मोदी के चुनाव प्रचार अभियान के साथ नजदीकी से जुड़कर काम किया। उसने अप्रत्याशित संख्या में लोगों तक पहुंचने के लिए डाटा उपलब्ध कराये। करोड़ों-करोड़ों लोगों को प्रतिदिन मोबाइल फोन पर मेसेज भेजे जाते थे। खास समूहों को निशाना बनाकर मेसेज तैयार किये जाते थे और भेजे जाते थे, जो धर्म, जाति, व्हाट्स एप्प मेसेज के बीते रिकॉर्ड, इन्टरनेट प्रयोग के इतिहास, आदि पर आधारित होते थे।

इस व्यवस्था के अन्दर, चुनावों के ज़रिये उस पार्टी और उस नेता को चुना जाता है जो उस समय पर सबसे बेहतर तरीके से लोगों को बुद्धू बना सकता है और बड़े पूंजीपतियों के एजेंडे को लागू कर सकता है। पूंजीपति वर्ग के अन्दर, अलग-अलग पूंजीपतियों के आपसी झगड़ों को निपटाने के लिए भी चुनावों का इस्तेमाल किया जाता है। आम तौर पर, इनमें से सबसे धनवान और शक्तिशाली पूंजीपति हावी हो जाते हैं और अपनी पसंद की सरकार को बैठाते हैं। इसमें विदेशी साम्राज्यवादी ताक़तों की भी भूमिका होती है।

2019 के चुनावों में बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों की एजेंसियों की भूमिका से यह सुनिश्चित हुआ है कि एक ऐसी सरकार बनी है जो इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ़ अमरीका के तथाकथित जंग में हिन्दोस्तान को उसका रणनैतिक मित्र व सांझेदार बनाने के लिए सबसे बेहतर है। भाजपा को सम्पूर्ण बहुमत के साथ जिताने के लिए, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों ने बेइंतहा धनबल, आधुनिक प्रौद्योगिकी, टी.वी. और सोशल मीडिया तथा ई.वी.एम. के साथ दांवपेच का इस्तेमाल किया।

हिन्दोस्तान और सारी दुनिया में, यह दिन-ब-दिन स्पष्ट होता जा रहा है कि बहुपार्टीवादी प्रनिधित्ववादी लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया है जिसके ज़रिये इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही बरकरार रखी जाती है। आज की राजनीतिक परिस्थिति की यह एक विशेषता है।

 

हिन्दोस्तान का हुक्मरान वर्ग एक ऐसे देश की अगुवाई करता है जो किसी महाद्वीप के जितना बड़ा है और बहुत ही रणनैतिक महत्व वाली जगह पर स्थित है। इस हुक्मरान वर्ग का हमेशा ही यह सपना रहा है कि वह एक दिन एशिया में एक शक्तिशाली औद्योगिक व सैनिक ताक़त बनकर आगे आयेगा। इस सपने को साकार करने के लिए उसने बरतानवी साम्राज्यवादियों द्वारा स्थापित और उसे विरासत में प्राप्त राज्य का इस्तेमाल करके, अपनी सैनिक-औद्योगिक ताक़त को खूब बढ़ाया है। उसने हिन्दोस्तानी संघ के अन्दर बसे सभी लोगों की भूमि और श्रम के शोषण व लूट के ज़रिये, अपनी दौलत को कई गुना बढ़ाया है।

आज हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बन गयी है। हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीवादी घराने पूंजी के मुख्य निर्यातक बन गए हैं। वे हिन्दोस्तान को जल्दी से जल्दी दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं। उन्होंने फैसला किया है कि इस लक्ष्य को हासिल करने का एकमात्र रास्ता है अमरीका के साथ गठबंधन बनाना। इससे चीन को कमजोर किया जा सकेगा, अर्थव्यवस्था का फ़ौजीकरण किया जा सकेगा और हिन्दोस्तान के हुक्मरान खुद एशिया की सर्वप्रधान ताक़त बतौर उभर कर आगे आ सकेंगे।

बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ गठबंधन बनाकर, हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग ने भाजपा को लोकसभा में सम्पूर्ण बहुमत तथा राज्य सभा में लगभग सम्पूर्ण बहुमत के साथ फिर से सरकार में बैठाया है। हुक्मरान वर्ग मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार से उम्मीद कर रहा है कि वह विदेशी पूंजी के प्रवेश के लिए नए-नए दरवाज़ों को खोल देगी और निर्यात के लिए उत्पादन को बढ़ाएगी, ताकि वर्तमान आर्थिक संकट के बावजूद, हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपतियों की वृद्धि तेज़ गति से होती रहे।

इजारेदार पूंजीपतियों के इस साम्राज्यवादी एजेंडे को लागू करने के लिए, “इस्लामी आतंकवाद” से लड़ने के नाम पर राजकीय आतंकवाद को खूब बढ़ाया जा रहा है, हर प्रकार के विरोध को अपराधी ठहराने वाले कानून बनाए जा रहे हैं और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उग्र-राष्ट्रवादी प्रचार व जंग फरोशी तेज़ की जा रही है।

हिन्दोस्तानी समाज को बड़े दुस्साहसवादी तरीके से, एक बेहद ख़तरनाक रास्ते पर खींच कर ले जाया जा रहा है। जनवादी अधिकारों पर खुलेआम हमले किये जा रहे हैं। इजारेदार पूंजीवादी घरानों के साम्राज्यवादी इरादों को पूरा करने के लिए, मज़दूरों और किसानों के हितों तथा राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ समझौता किया जा रहा है।

इस रास्ते पर आगे चलकर, विदेशी पूंजी और विदेशी बाज़ारों पर हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था की निर्भरता और ज्यादा बढ़ेगी। इससे अर्थव्यवस्था की परजीविता और बढ़ जायेगी। हमारे संसाधनों के अधिक से अधिक हिस्से को अनुत्पादक काम के लिए, जैसे कि सैनिक ताक़त बढ़ाने के लिए, इस्तेमाल किया जायेगा, न कि लोगों की खुशहाली को सुनिश्चित करने के लिए। साम्राज्यवादी इरादों वाले नाजायज़ जंग में हिन्दोस्तान के फंसने का ख़तरा बहुत बढ़ जायेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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