हुक्मरान वर्ग के ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ते पर प्रकाशित बयान पर पाठकों से प्राप्त प्रतिक्रिया

महोदय,

1-15 सितम्बर के अंक में छपे हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति के बयान, जिसका शीर्षक था, “हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग का ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ता”, को ध्यान से पढ़ा। शीर्षक के समर्थन में दिये अनेक तर्कों में से एक पर मैं कुछ विचार प्रकट करना चाहती हूं। इसका संदर्भ इस वाक्य से है - “ऐतिहासिक अनुभव यही दिखाता है कि देश का प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो और उसका दिल चाहे किसी के लिए भी धड़कता हो, पर समाज का एजेंडा पूंजीपति वर्ग तय करता है और पूंजीपति वर्ग की अगुवाई इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं।” यह 100 टका सच है।

1952 में प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर आज के प्रधानमंत्री मोदी तक, कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा जिसने यह न घोषणा की हो कि उसने अपना जीवन हिन्दोस्तान के लोगों को समर्पित कर दिया है, अतः उनकी समृद्धि के लिये वह कोई कसर नहीं छोड़ेगा। अगर उनकी घोषणाएं सच्ची थीं तो करोड़ों हिन्दोस्तानियों की ज़िन्दगी में सकारात्मक बदलाव क्यों नहीं आया? इसका कारण है कि उन्होंने जो किया वह उनकी मर्ज़ी से नहीं था, बल्कि उनको ऐसा करना अनिवार्य था।

हिन्दोस्तान एक पूंजीवादी देश है और शासक वर्ग पूंजीपति वर्ग है जिसकी अगुवाई कुछ सौ इजारेदार घराने करते हैं जो देश का अजेंडा तय करते हैं व पूरे देश के लोगों व संसाधनों पर हावी हैं। यह वर्ग नहीं बतलाता कि वह देश का अजेंडा बनाता है लेकिन वह अपनी पार्टियों के ज़रिये सुनिश्चित करता है कि उसका अजेंडा ही लागू होगा। हर मोड़ पर यही वर्ग तय करता है कि कौन सी पार्टी व नेतृत्व उसका अजेंडा सबसे अच्छे तरीके से लागू कर सकेगा और उसे चुन कर सत्ता में लाता है। अगर 1952 से हम किसी भी सत्ताधारी पार्टी के काम को परखें तो यह बात साफ दिखेगी। इन पार्टियों के नेताओं ने सुंदर भाषण दिये हैं जिनमें उन्होंने कहा है कि उनका दिल लोगों के लिये धड़कता है। लेकिन असलियत में वे पूंजीपतियों का अजेंडा ही पूरा करते हैं। इसका सबूत हर चीज में दिखेगा - मुट्ठीभर अमीरों व अधिकांश ग़रीब लोगों के बीच गहराती खाई, अधिकांश लोगों की बहुत कठिन ज़िन्दगी जबकि मुट्ठीभर अमीरों की ज़िन्दगी उतनी ही ऐशो-आराम की जितनी दुनिया के सबसे अमीरों की।

पहले चार दशकों में कांग्रेस पार्टी ने पूंजीपतियों का अजेंडा लागू किया। उसके बाद जनता पार्टी, भाजपा, संप्रग और राजग की सरकारें सत्ता में आईं और अपनी-अपनी बारी में पूंजीपतियों के अजेंडे को लागू किया। क्या लोगों के जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव आया जब नेहरू के बाद इंदिरा गांधी या मोरारजी देसाई या वाजपेयी या नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह या मोदी प्रधानमंत्री बने? जबाव तो साफ है। नारे बदल जाते हैं, आश्वासन अन्य शब्दों में दिये जाते हैं लेकिन सरकार की दिशा वही रहती है। प्रधानमंत्री वही बनता है जिसकी राजनीतिक पार्टी लोगों को बुद्धू बनाते हुए पूंजीपतियों के अजेंडे को लागू करन में सबसे सक्षम होगी। इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि वह किसके लिये अपने दिल के धड़कने का दावा करता है।

आपकी,

लक्ष्मी, नोएडा


महोदय,

मज़दूर एकता लहर के सितम्बर 1-15, 2019 के अंक में प्रकाशित, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान ‘हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग का ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ता’, हमारे देश की वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक दिशा का बहुत ही गहराई से विश्लेषण करता है, जो हम सब को सोचने को मजबूर करता है।

बयान में बताया गया है कि टाटा, बिरला, अम्बानी आदि देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था की नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद, अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए बेतहाशा नए-नए रास्ते तलाश रहे हैं। वे फ़ौजीकरण को बढ़ा रहे हैं, “आतंकवाद पर जंग” की आड़ में अमरीका के साथ गठबंधन बनाकर विदेशी बाज़ारों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं और देश के अन्दर शोषण व लूट को खूब तेज़ कर रहे हैं।

हमारे हुक्मरान दक्षिण एशिया में हिन्दोस्तान के निर्विवादित प्रभुत्व को और मजबूत करना चाहते हैं। वे दुनिया पर हावी बड़ी ताक़तों के विशेष गिरोह में हिन्दोस्तान को शामिल करना चाहते हैं। अमरीका चाहता है कि चीन को रोकने, रूस को कमज़ोर करने, ईरान को अलग-थलग करने और इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के नाम पर नए-नए जंग छेड़ने की उनकी कोशिशों में हिन्दोस्तान उनका सहयोगी बने। हिन्दोस्तान की वफ़ादारी को सुनिश्चित करने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने परमाणु गिरोह में शामिल होने के हिन्दोस्तान के प्रयासों का समर्थन किया है। हिन्द-प्रशांत महासागर इलाके में अमरीकी प्रभुत्व को मजबूत करने के इरादे से, उन्होंने क्यू.यू.ए.डी. नामक गठबंधन में हिन्दोस्तान को भी शामिल किया है। हमारा हुक्मरान वर्ग अपने खुद के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए, अमरीका के समर्थन की उम्मीद कर रहा है।

अगस्त के अंतिम हफ्ते में, फ्रांस में हुई जी-7 की शिखर वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, हालांकि हिन्दोस्तान उस साम्राज्यवादी समूह का सदस्य नहीं है। जी-7 में दिये गए अपने सार्वजनकि बयानों में मोदी ने हिन्दोस्तान को एक बड़ी और तेज़ी से आगे बढ़ने वाली ताक़त बतौर पेश किया, एशिया में हिन्दोस्तान के प्रभुत्व का फिर से ऐलान किया तथा जम्मू-कश्मीर में हाल में लिए गए क़दमों को सही ठहराया। अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी “मित्रता” दर्शाते हुए मोदी को गले लगाया।

लेकिन, जैसे कि बयान में चेतावनी दी गयी है, अमरीकी साम्राज्यवादी इस या उस देश का समर्थन सिर्फ तब तक करते हैं, जब तक अपनी दादागिरी जमाने का उनका लक्ष्य पूरा न हो। उसी देश के साथ अमरीका के गठबंधन बनाने के फायदे जब ख़त्म हो जाते हैं, तो उसे तहस-नहस करने में अमरीका को कोई झिझक नहीं होती। यह हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग की बेहद बेवकूफी है कि वे अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अमरीका पर निर्भर हो रहे हैं। इसका मतलब है कि हम अमरीका के अपराधी साम्राज्यवादी जंग में उसके सांझेदार होंगे। हमें इस ख़तरनाक रास्ते का डटकर विरोध करना होगा।

सुनेत्रा,

फरीदाबाद, हरियाणा

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Sep 16-30 2019    Letters to Editor    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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