राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 का मसौदा : शिक्षा के सर्वव्यापी अधिकार को नकारने वाली नीति

नव-निर्वाचित भाजपा सरकार का एक पहला क़दम था राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे को सरकारी वेबसाइट पर चढ़ाना।

मसौदे में यह दावा किया गया है कि इस नीति का उद्देश्य है “एक ऐसी नई व्यवस्था बनाना जो 21वीं सदी में शिक्षा हासिल करने के जज़बातों के अनुकूल हो और हिन्दोस्तान की परम्पराओं और मूल्यों के अनुसार हो”। इसका मक़सद है हिन्दोस्तान को अगले पांच सालों के अन्दर एक “वैश्विक शिक्षा केंद्र” में बदल देना।

विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालय
31 मार्च, 2019 तक की सूचना।
(स्रोतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)
  विश्वविद्यालय  कुल संख्या
 राजकीय विश्वविद्यालय 399
 डीम्ड विश्वविद्यालय 126
 केन्द्रीय विश्वविद्यालय 48
  निजी विश्वविद्यालय 334
  कुल 907

देशभर के मज़दूरों, किसानों और मेहनतकशों की यह आकांक्षा है कि उनकी बेटियों और बेटों को अच्छी शिक्षा मिले और सही रोज़गार मिले, जिसके सहारे वे अपने और अपने परिवारों के लिए सुखी जीवन सुनिश्चित कर सकें। हमारे नौजवानों की आकांक्षा है सबसे आधुनिक शिक्षा और कौशल हासिल करना, ताकि वे 21वीं सदी की प्रौद्योगिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हों। ये आकांक्षायें अभी तक पूरी नहीं हुयी हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे का अगर गंभीरता से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हालांकि यह “नयी” और “पुरानी नीतियों से अलग” होने का दावा करती है, परन्तु इसमें उन वास्तविक कारणों को नहीं बताया गया है, जिनकी वजह से आज़ादी के 72 वर्ष बाद भी हमारी ये आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाई हैं। बल्कि, उन कारणों पर पर्दा डाला गया है। हमारे लोगों की इस गहरी और लम्बे समय से चली आ रही आकांक्षा को हासिल करने के रास्ते में जो आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हालतें रुकावट बनकर खड़ी हैं, उन्हें दूर करना इस नीति का उद्देश्य नहीं है।

इस बात को मानना होगा कि हमारे देश में शिक्षा की सबसे मौलिक समस्या यह है कि देश के सभी भागों में अच्छी गुणवत्ता की, सर्वव्यापी, चैतरफा शिक्षा देने वाली सरकारी स्कूलों की व्यवस्था मौजूद नहीं है।

50-60 के दशक में जो सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था स्थापित की गई थी, हर सरकार ने जानबूझकर और सोच-समझकर उसकी बड़ी उपेक्षा की है। सरकारी स्कूलों के लिये पैसे नहीं दिये गये, ढांचागत सुविधायें नहीं दी गईं, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, शिक्षकों, अन्य कर्मचारियों आदि की ज़रूरतें पूरी नहीं की गईं। सरकारी घोषित वेतन से बहुत कम वेतनों पर, अस्थाई रूप से नियुक्त किये गये अतिथि शिक्षक और पैरा शिक्षक अधिकतर सरकारी स्कूलों में नियमित तौर पर शिक्षकों व कर्मचारियों का काम करते हैं।

जिस गति से आबादी बढ़ी है, उसकी तुलना में, सरकारी स्कूलों में छात्रों की भर्ती की गति बीते वर्षों में तेज़ी से गिरती रही है। दूर-दूर तक सफर करने की कठिनाइयां, पड़ोस में स्कूल न होना, स्कूल में शिक्षक न होना, पीने का पानी और खास तौर पर युवा बालिकाओं के लिये इस्तेमाल करने योग्य शौचालय न होना, बिल्डिंग, कक्षा आदि न होना - ये स्कूली छात्रों की गिरती संख्या के कुछ कारण हैं जिन्हें आमतौर पर माना गया है।

थोड़ी सी अच्छी आमदनी वाले मेहनतकश तबकों के बच्चों के लिए, अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने वाले निजी स्कूलों को खूब फलने-फूलने की सुविधायें दी गई हैं। उन्हें शहरों में मुख्य-मुख्य स्थानों पर सस्ती सरकारी ज़मीन दी गई है, सस्ती दर पर पानी और बिजली दिये जाते हैं। “उच्च गुणवत्ता की शिक्षा” दिलाने के नाम पर उन्हें छात्रों से अधिक से अधिक शुल्क वसूलने का अधिकार दिया गया है।

सरकारी स्कूलों के इस विनाश के साथ-साथ, शहरों और गांवों में बड़ी तेज़ गति के साथ तरह-तरह के निजी स्कूल पनपने लगे हैं, जिनकी गुणवत्ता पर अक्सर शक होता है। ये निजी स्कूल ग़रीब परिवारों के बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का दावा करते हैं परन्तु उनमें अक्सर प्रशिक्षित शिक्षकों का भारी अभाव होता है। अनेक ग़रीब परिवारों के मां-बाप अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते हैं, इस झूठी उम्मीद के साथ कि उनके बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य मिलेगा।

भूतपूर्व सरकारों की शिक्षा नीतियों और निःशुल्क और बाध्यकारी शिक्षा के अधिकार पर हालिया कानून, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, में इन सारी समस्याओं को स्वीकार किया गया है। इन्हें मिटाने के लिये ऊंची-ऊंची योजनायें बनाई गई हैं तथा लक्ष्यों को हासिल करने के लिये समय सीमायें भी तय की गई हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में भी कई ऐसी योजनायें और समय सीमायें बताई गई हैं। सभी भूतपूर्व नीतियों की समय सीमाओं को बार-बार आगे बढ़ाया गया है, जबकि शिक्षा की समस्यायें और बिगड़ती गई हैं। एक सर्वव्यापी, उच्च गुणवत्ता की स्कूली शिक्षा, जो सबको उपलब्ध हो और सबकी पहुंच के अंदर हो - यह सपना दिन-ब-दिन और दूर होता रहा है। इसके साथ-साथ, निजी स्कूली शिक्षा एक तेज़ी से पनपने वाला, अत्यंत मुनाफ़ेदार धंधा बन गया है।

बीते 5-6 वर्षों में सरकार सार्वजनिक-निजी सांझेदारी (पी.पी.पी.) नमूने पर स्कूल चलाने लगी है, जो सरकारी स्कूलों का निजीकरण करने का ही एक तरीका है। इस नमूने के अंतर्गत, राज्य स्कूल चलाने के लिये ज़रूरी ढांचागत सुविधाओं और संसाधनों को मुहैया कराता है और फिर स्कूल को निजी सांझेदार के हाथों सौंप देता है। उसके बाद निजी सांझेदार को पूरा अधिकार होता है कि वह अपनी मर्ज़ी के अनुसार स्कूल को चलाये, पाठ्यक्रम तय करे, फीस तय करे, शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन, नियुक्ति और काम की शर्तें तय करे। यह ज़ाहिर है कि निजी कम्पनियां उन्हीं स्कूलों को चलाने के लिए राज़ी होंगी जिन्हें मुनाफ़ेदार धंधे के रूप में चलाया जा सकेगा। देशभर में, शिक्षक संघों और छात्रों ने सरकारी स्कूलों के निजीकरण का सख़्त विरोध किया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में, स्कूली शिक्षा पर भूतपूर्व सरकारों की पहलक़दमियों की तरह, कुछ “आदर्श विद्यालयों” को स्थापित करने की योजना पेश की गई है। ये बड़े शहरों में कुछ गिने-चुने सरकारी स्कूल होंगे, जिन्हें काफी धन दिया जायेगा और उच्च स्तर की ढांचागत सुविधायें, स्मार्ट कक्षायें, आदि उपलब्ध कराई जायेंगी। परन्तु इन विशेष विद्यालयों का लाभ पाने वाले छात्रों की संख्या बहुत कम होगी। सर्वव्यापी, अच्छी शिक्षा की ज़रूरत इनसे पूरी नहीं होगी।

सरकारी स्कूल व्यवस्था को गंभीरता से विकसित और विस्तृत करना ज़रूरी है, ताकि यह देश के सभी भागों में, वास्तिक रूप में सर्वव्यापी हो, सभी लोगों को उपलब्ध हो और सभी की पहुंच के अन्दर हो। परन्तु ऐसा करने की बजाय, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में सर्वव्यापी शिक्षा सुनिश्चित करने की सरकार की ज़िम्मेदारी को और घटाने के प्रस्ताव पेश किये गए हैं। ज्यादा से ज्यादा संख्या में, आधुनिक शिक्षा और संचार के साधनों वाले निजी स्कूलों की स्थापना, पी.पी.पी. नमूने पर चलाये जाने वाले स्कूलों की स्थापना, सरकारी स्कूलों को निजी कंपनियों को सौंपा जाना, इन क़दमों को पूरा-पूरा और खुलेआम प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

“सबको शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए”, आधुनिक प्रौद्योगिकी और आधुनिक संचार साधनों के प्रयोग पर बहुत ज्यादा ज़ोर दिया गया है, जैसे कि टेलीविजन, इन्टरनेट और मोबाइल फोन। स्कूलों की कमी, स्कूलों में ढांचागत सुविधाओं और शिक्षकों की कमी की समस्या को “हल” करने के ये समाधान बताये गए हैं। दूर शिक्षा और ओपन शिक्षा का विस्तार, बहुत बड़े पैमाने पर ओपन ऑनलाइन पाठ्यक्रमों की शुरुआत, ई-शिक्षा, ई-पुस्तक, वैश्विक शिक्षा पोर्टल में पहुंच, केन्द्रीय कंप्यूटर परीक्षण और जांच व मूल्यांकन के प्रस्ताव किये गए हैं। प्रयोगशालाओं के भारी अभाव के चलते, कंप्यूटर सिमुलेशन का प्रस्ताव किया गया है, ताकि सरकार प्रयोगशालाओं और यंत्रों में निवेश करने से बच सके। घर में पढ़ाई, अनौपचारिक स्कूल और तरह-तरह के स्कूलों और शिक्षा माध्यमों के प्रस्ताव किये गए हैं।

आधुनिक प्रौद्योगिकी और संचार साधन शिक्षा में योगदान दे सकते हैं अगर बच्चों को सही ढांचागत सुविधाओं वाले स्कूलों में जाने का मौका मिलता है और ऐसे शिक्षक मिलते हैं जो इस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने में प्रशिक्षित हैं। परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 में अच्छे सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। बल्कि, इस नीति का लक्ष्य है स्कूलों और शिक्षकों की ज़रूरत को दूर करके, स्कूली शिक्षा में सरकारी निवेश को और कम करना।

जब तक शिक्षा की इन दो सामानांतर व्यवस्थाओं - सरकारी और निजी - को जारी रखा जायेगा, तब तक हमारे देश में शिक्षा के दो अलग स्तर बरकरार रहेंगे। अच्छी शिक्षा जो सबकी पहुंच के अन्दर हो, यह सपना एक दूर का सपना ही बना रहेगा।

उच्च शिक्षा का और ज्यादा निजीकरण करने का प्रस्ताव

31 मार्च, 2019 तक की सूचनाओं के अनुसार, देश में 924 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 334 निजी हैं। (देखिये बॉक्स: विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालय) अधिकतम निजी विश्वविद्यालय बीते दशक के अन्दर स्थापित किये गए हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में विश्वविद्यालयों में शिक्षा का निजीकरण करने के कई तरीके प्रस्तावित किये गए हैं। इनके लागू होने से, उच्च शिक्षा नौजवानों की बहुत बड़ी संख्या की पहुंच से बाहर हो जायेगी।

नीति में यह सिफारिश की गयी है कि सरकारी कालेजों और विश्वविद्यालयों को राज्य अनुदान देना बंद कर दे। इसके बजाय, कालेजों और विश्वविद्यालयों को अपने विकास की ज़रूरतों के लिए कर्ज़ा लेना होगा, जिसे ब्याज समेत निर्धारित समय के अन्दर चुकाना होगा। कर्ज़े को चुकाने के लिए छात्रों की फीस और दूसरे शुल्क बढ़ाये जायेंगे। तरह-तरह के स्व-वित्तपोषित (सेल्फ फाइनेंसिंग) पाठ्यक्रम शुरू किये जायेंगे, जिनके लिए निजी संस्थाओं से शिक्षक आमंत्रित किये जायेंगे और छात्रों को भारी फीस देनी पड़ेंगी।

बीते कई वर्षों से, देशभर में अनेक सरकारी कालेजों और विश्वविद्यालयों को सुनियोजित तरीके से नष्ट किया गया है। राज्य ने इन्हें धन नहीं दिया है और इनके साथ घोर उपेक्षा की है। इस हालत को बदलने के बजाय, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या को घटाने का प्रस्ताव किया जा रहा है। कालेजों और विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता दिलाने के प्रस्ताव किये जा रहे हैं। स्वायत्त संस्थान का संचालन निजी प्रबंधन के हाथ में होगा। पाठ्यक्रम, छात्रों की फीस, शिक्षकों के वेतन, नियुक्ति और काम की शर्तें, ये सब निजी प्रबंधक ही तय करेंगे। निजी प्रबंधकों के फैसले अधिकतम मुनाफ़ों को नज़र में रखते हुए ही किये जायेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में, उच्च शिक्षा संबंधित नीतिगत और अन्य फैसले लेने में शिक्षकों व छात्रों और उनके संगठनों की भूमिका व भागीदारी को बहुत कम करने के प्रस्ताव किये गये हैं।

देश के सारे केंद्रीय व राजकीय सरकारी विश्वविद्यालयों के संसाधनों और शिक्षकों को और विकसित करने के बजाय, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे में हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी घरानों द्वारा “विश्व-स्तरीय पाठ्यक्रम और प्रौद्योगिकी” उपलब्ध कराने वाले कई निजी विश्वविद्यालयों को खोलने का प्रस्ताव किया गया है। यह घोषणा की गयी है कि दुनिया के सर्वोच्च 200 विश्वविद्यालयों को हिन्दोस्तान में अपने-अपने कैंपस खोलने की इजाज़त दी जायेगी।

यह प्रस्ताव किया गया है कि एक अन्तर-विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा केंद्र स्थापित किया जायेगा और चुनिन्दा हिन्दोस्तानी विश्वविद्यालयों के अन्दर अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा केंद्र बनाये जायेंगे। “विश्व स्तरीय बहुतरफा शोध के विश्वविद्यालय” का खूब प्रचार किया जा रहा है, ताकि मुनाफ़ों के लालची देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीवादी घरानों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार को इस प्रकार खोलने को जायज़ ठहराया जा सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 का मसौदा उच्च शिक्षा के त्वरित और विस्तृत निजीकरण का मसौदा है। इसका उद्देश्य है हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को शिक्षा क्षेत्र में घुसकर, और तेज़ी से अपनी अमीरी को बढ़ाने में सक्षम बनाना।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 यह जायज़ ठहराने की कोशिश करती है कि एक अधिकार बतौर, सर्वव्यापी, अच्छी और सबकी पहुंच के अन्दर, स्कूली शिक्षा दिलाना राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं है। इससे हमारे मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकशों के, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के, सपने पूरे नहीं हो पाएंगे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 उच्च शिक्षा को अधिक से अधिक नौजवानों की पहुंच से बाहर कर देगी। इसमें नालंदा और तक्षशिला जैसे हमारे प्राचीन और विश्व-प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों का नाम लिया गया है, इस सच्चाई को छिपाने के लिए कि इसका असली मक़सद देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों की लालच को पूरा करना है। इसका उद्देश्य हमारे नौजवानों के ज्ञान पाने, प्रगति करने और बेहतर ज़िंदगी जीने के सपनों को पूरा करना नहीं है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे से यह स्पष्ट हो जाता है कि, भूतपूर्व सरकारों की तरह, इस सरकार का इरादा भी, एक अधिकार बतौर सर्वव्यापी, अच्छी शिक्षा दिलाना नहीं है। मज़दूरों और किसानों की बेटियों-बेटों के लिए अच्छी उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना इसका इरादा नहीं है। यह सरकार भी शिक्षा को, पूंजीपति वर्ग के नज़रिए से, अधिकतम मुनाफ़ों का एक और स्रोत मानती है।

Tag:   

Share Everywhere

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019    Sep 16-30 2019    Political-Economy    Privatisation    Rights     2019   

टिप्पणी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019

संपादक महोदय,

मज़दूर एकता लहर के सितंबर 16 से 30 के अंक में प्रकाशित लेख राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 बहुत ही सटीक और झंझोेड़ने वाला है। जैसा कि लेख में बताया गया है कि यह मज़दूरों और किसानों के बच्चों के अधिकारों पर बहुत बड़ा हमला है। इसका जीता-जागता उदाहरण बिहार राज्य की शिक्षा प्रणाली है।

बिहार में सरकार की जो नीति है वह बहुत ही ख़राब है। बिहार में पिछले 15 साल से जदयू और भाजपा के गठबंधन की सरकार है। बिहार में साक्षरता दर पूरे भारत में सबसे नीचे है। जो 68.8 प्रतिशत है। क्योंकि बिहार सरकार ने शिक्षा को महत्वपूर्ण काम नहीं समझा है। चाहे मौजूदा सरकार हो या पुरानी सरकार हो, सबकी नीति एक समान ही रही है। इस बात में कुछ ग़लत नहीं होगा कि पूरे भारत में बिहार की शिक्षा निचले स्तर पर है या बद से बदतर है। बिहार में दसवीं तथा बारहवीं के स्कूलों की संख्या 6,068 है, तथा प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 71 हज़ार है। बिहार में प्राथमिक से लेकर माध्यमिक में 4.40 लाख शिक्षक हैं, जिनमें 3.19 लाख अस्थाई तथा 70 हजार स्थाई शिक्षक हैं। उच्च तथा उच्चतर विद्यालयों मंे 36 हज़ार अस्थाई तथा 7 हज़ार स्थाई शिक्षक हैं वर्तमान समय में प्राथमिक विद्यालयों में 1 लाख तथा माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों में 38 हज़ार शिक्षकों की कमी है। यदि जनसंख्या तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हिसाब से देखा जाये तो 2,78,602 शिक्षकों की कमी है।

बिहार में विद्यालयों की जो स्थिति है वह काफ़ी दयनीय है। विद्यार्थियों को बैठने के लिये कक्षाओं में जगह नहीं है। हिन्दोस्तान में औसतन एक कक्षा में 27 विद्यार्थियों के बैठने का प्रावधान है किंतु बिहार में एक कक्षा में 51 से भी अधिक बच्चे बैठते हैं। भेड़-बकरी जैसी हालत बन गयी है, यहां तक कि कई गांवों में दसवीं के विद्यालय नहीं हैं। उनको 4 से 6 किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता है। हैरान करनेवाली बात ये भी है कि बहुत सारे विद्यालयों मंे शौचालय एवं पीने का शुद्ध पानी भी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि कई गांवों में बच्चों को पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाया जाता है।

अस्थाई शिक्षकों की गुणवत्ता का एक अलग ही मसला है। उनको यह भी मालूम नहीं होता कि उनको पढ़ाना क्या है। उनको वर्णमाल ज्ञान भी नहीं है, क्योंकि उनकी नियुक्ति किसी भी स्पर्धा परीक्षा से नहीं होती और न ही उनकी डिग्री की जांच होती है। ऐसे में हम खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि वे बच्चों को क्या पढ़ायेंगे। और ये बच्चे आगे चलकर क्या हासिल कर पायेंगे? 2017 में हुई 12वीं की परीक्षा से इस बात का बखूबी पता लग जाता है। हाल में 2018 के परीक्षा परिणाम में सिर्फ 37 प्रतिशत बच्चे उत्तीर्ण हुये और 63 प्रतिशत अनुत्तीर्ण हुये।

बिहार राज्य जहां एक तरफ़ ग़रीबी से जूझ रहा है वहीं निजी स्कूल दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल-फूल रहे हैं। बिहार के हर एक मज़दूर-किसान की चाहत रहती है कि उसका बच्चा अच्छे से पढ़-लिख सके, जिसके लिये उसे अपने बच्चे के लिये मजबूरन निजी स्कूलों का सहारा लेना पड़ रहा है। और दूसरी तरफ़ सरकार सरकारी स्कूलों की हालत ख़राब करके निजी स्कूलों को तमाम तरह के अनुदान खैरात में दे रही है।

मोहन, बिहार

अंग्रेजी

पार्टी के दस्तावेज

thumb

 

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)