रेलवे के यात्री-विरोधी निजीकरण का विरोध करें!

एक लंबे अरसे से रेलवे मज़दूर विभिन्न सरकारों द्वारा भारतीय रेल को हिस्सों में बांटकर उनका एक-एक करके निजीकरण किये जाने के खिलाफ़ लगातार लड़ते आये है। रेल सेवा का उपयोग करने वाले रेल यात्रियों को उनके संघर्ष में शामिल किये जाने के महत्व को समझते हुए कामगार एकता कमेटी और लोक राज संगठन ने इस बयान के ज़रिये संघर्ष की जानकारी लोगों में फैलाने की पहल की। इस पहल में निम्नलिखित अन्य संगठन भी शामिल हो गए हैं।

ऑल इंडिया गार्ड्स कौंसिल (ए.आई.जी.सी.), ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), ऑल इंडिया रेल ट्रैक मैन्टैनेर यूनियन (ए.आई.आर.टी.यू.) आल इंडिया ट्रैफिक कंट्रोलर एसोसिएशन (ए.आई.टी.सी.ए.), हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गेनाईजेशन (आई.आर.टी.सी.एस.ओ.), एयर इंडिया सर्विस इंजिनियर एसोसिएशन (ए.आई.एस.ई.ए.), ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन (ए.आई.बी.ई.ए.), आवाज-ए-निसवान, बैंक एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (बी.ई.एफ.आई.), इनोसेंस नेटवर्क, ट्रेड यूनियन जॉइंट एक्शन कमिटी, महाराष्ट्र (टी.यु.जे.ए.सी.), ठाणे मतदार जागरण अभियान (टी.एम.जे.ए.) और पुरोगामी महिला संगठन।

इस रिपोर्ट के पे्रस जाने तक, कई मज़दूर यूनियनें, और नागरिक जन संगठन इस अभियान से जुड़ रहे हैं।

प्रिय रेल यात्रियों,

नव-निर्वाचित सरकार के रेल मंत्रालय की 100 दिनों की कार्य योजना में दो कार्यक्रमों की घोषणा की गई है जिनका रेल यात्रियों पर प्रत्यक्ष और बहुत हानिकारक प्रभाव होने वाला है :

यात्री किराए पर दिए जाने वाले अनुदान (सब्सिडी) को समाप्त करो;

दो मौजूदा ट्रेनों का परिचालन आई.आर.सी.टी.सी. को तुरन्त सौंपो तथा तत्पश्चात राजधानी, शताब्दी के साथ-साथ अन्य प्रीमियम ट्रेनों को चलाने के लिए निजी ऑपरेटरों को आमंत्रित करो।

अनुदान हटाने से वर्तमान यात्री किराए में अत्यधिक वृद्धि होगी। यदि यात्री किराया साल-दर-साल बढ़ता रहा, तो हममें से कितने लोग रेल से सफर कर पायेंगे?

विश्व भर में यात्री किराए में अनुदान दिया जाता है क्योंकि सस्ती रेल सेवा प्रदान करना सामाजिक रूप से आवश्यक सार्वजनिक सेवा मानी जाती है। सरकार आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं को लाभ के स्रोत के रूप में नहीं देख सकती। हर साल 810 करोड़ से अधिक यात्री भारतीय रेल का उपयोग करते हैं। मेट्रो शहरों में अपने घरों और काम के स्थानों के बीच यात्रा करने के लिए प्रत्येक दिन 1 करोड़ से अधिक यात्री रेल सेवाओं का उपयोग करते हैं। भारतीय रेल द्वारा दिया जाने वाला प्रति यात्री औसत अनुदान केवल 37 रुपये है जबकि फ्रांस में प्रति यात्री अनुदान 900 रुपये और जर्मनी में 600 रुपये है!

रेलवे कई वर्षों से दावा कर रहा है कि यात्री किराए में अनुदान के कारण उन्हें हर साल 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। हम यह तर्क कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि भारतीय रेल का उपयोग करने वाले करोड़ों लोगों के लिए दिये गये 30,000 करोड़ रुपये के अनुदान को सरकार वहन नहीं कर सकती, जबकि इसी सरकार ने 2018-19 के केवल एक वर्ष में देश के कुछ सौ अमीर पूंजीपतियों के 2,50,000 करोड़ रुपये (जो यात्री अनुदान का 8 गुना से अधिक है) के बैंक ऋणों को माफ़ कर दिया?

यह भी याद रखना चाहिए कि यात्री किराये में अनुदान उन करों से दिया जा रहा है जो हम भारतीय लोगों से वसूल किया जाता है; अतः यह हमारा पैसा ही है जो हम पर खर्च किया जा रहा है। यहां तक कि हमारे देश में सबसे ग़रीब व्यक्ति भी जब बाजार में कुछ भी खरीदता है तो जी.एस.टी. के ज़रिये कर का भुगतान करता है। कुछ सैकड़ों सबसे अमीर लोगों के लिए बैंक ऋणों की माफ़ी भी तो हमारे दिए गए करों से अथवा बैंकों में जमा की गई हमारी बचत से की जा रही है।

हमें इस बात पर अड़े रहना होगा कि यह इस सरकार का कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि रेल किराया ऐसा हो जिसे करोड़ों मज़दूर, किसान, छोटे व्यापारी, फेरीवाले और अन्य सभी रेल उपयोगकर्ता आसानी से वहन कर पायें!

हमारे मुंबई शहर में बेस्ट बस सेवा इसका एक उदाहरण है जिसमें यात्रियों की संख्या 40 लाख से घट कर 25 लाख प्रति दिन हो गयी थी। लेकिन, कुछ माह पूर्व जब न्यूनतम किराया 8 रुपये से घटा कर 5 रुपये किया गया तब यात्रियों की संख्या दस दिनों के भीतर 40 प्रतिशत तक बढ़ गई! निजी तौर पर चलायी जा रही मुंबई मेट्रो द्वारा वसूल किया जाने वाला न्यूनतम किराया लोकल ट्रेनों द्वारा लिये जाने वाले किराये से दोगुना है; मुम्बई मेट्रो का किराया अपने दो टर्मिनस के बीच तय की गई समान दूरी के लिए लोकल ट्रेनों के किराये का चार गुना है।

दूसरा क़दम, यात्री ट्रेन सेवाओं के निजीकरण की दिशा में शुरुआत है। दिल्ली और लखनऊ के बीच तेजस एक्सप्रेस और मुंबई और अहमदाबाद के बीच प्रस्तावित तेजस एक्सप्रेस, दो ट्रेनें, तत्काल आई.आर.सी.टी.सी. को सौंपी जा रही हैं। आई.आर.सी.टी.सी. को इन ट्रेनों का किराया तय करने की आज़ादी दी गई है। आई.आर.सी.टी.सी. का निजीकरण पहले ही निजी निवेशकों को उसके शेयरों की बिक्री की घोषणा के साथ शुरू हो गया है। बाद में, निजीकरण की इस कड़ी में, राजधानी, शताब्दी और अन्य प्रतिष्ठित ट्रेनों के संचालन को निजी कंपनियों को सौंपने की घोषणा की गई है।

एक पूंजीपति का मक़सद हमेशा कम से कम निवेश करके अधिकतम लाभ कमाना होता है, जैसा कि हम सभी जानते हैं। इसलिए रेल-यात्री सेवाओं के निजीकरण का परिणाम निम्न होगा :

  1. किरायों में भारी वृद्धि;
  2. डायनामिक किराया नीति का लागू करना; यानी मांग अधिक तो किराया अधिक;
  3. गैर-लाभकारी मार्गों पर और गैर-पीक घंटों के दौरान सेवाओं में कमी;
  4. सारी रियायतें ख़त्म (वर्तमान में छात्रों, बूढ़े लोगों, अलग-अलग लोगों को मिलाने वाली छूट, आदि);
  5. सीजन टिकट बंद (मेट्रो में कोई सीजन टिकट नहीं होता है);
  6. पानी, शौचालय, बिस्तर रोल आदि जैसी हर सेवा के लिए अलग से भुगतान करना होगा;
  7. लागत में कटौती के लिए रखरखाव पर कम से कम खर्च परिणाम हमारी सुरक्षा के साथ समझौता;

जब ब्रिटिश रेल का निजीकरण किया गया तो वास्तव में यही हुआ। ब्रिटिश रेल का किराया यूरोप में सबसे अधिक है। 1990 की शुरुआत में जब ब्रिटिश रेल का निजीकरण हुआ, तब यात्री किराये औसत से दोगुने से भी अधिक हो गए थे और दो दशकों के बाद कई मार्गों पर तीन गुना से अधिक। ब्रिटेन में मासिक अवधि का टिकेट अब फ्रांस की तुलना में, जहां रेल प्रणाली फ्रांसीसी सरकार द्वारा चलाई जाती है, दस गुना है। जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन, जहां पर रेल सेवाएं सार्वजनिक स्वामित्व में हैं, उनकी तुलना में ब्रिटेन में रेल यात्रा धीमी और अधिक भीड़भाड़ वाली है।

लाभ जब प्राथमिक उद्देश्य हो तो सुरक्षा में लापरवाही होने वाली है। अर्जेंटीना में ठीक ऐसा ही हुआ। रेलवे के निजीकरण के बाद, गंभीर दुर्घटनाओं की आवृत्ति में तेज़ी से वृद्धि हुई। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि जनता ने 2015 में अर्जेंटीना सरकार को रेलवे प्रणाली के निजीकरण को वापस करने के लिए मजबूर किया! अपने पूरे देश में, निजी बस ऑपरेटरों द्वारा चलाई जा रही बसें सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। कोई भी राज्य सरकार उनके ख़तरनाक आचरण पर अंकुश नहीं लगा पाई है।

हम सभी को ज्ञात है कि सुरक्षित रेल यात्रा के लिए ट्रैक रखरखाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रैक रखरखाव करने वाले मज़दूर अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में यह कार्य संपन्न करते हैं। भारतीय रेल द्वारा उचित रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए ट्रैक रखरखाव करने वाले आवश्यक 3 लाख पदों में से 70 हजार पदों को खाली रखा गया है! उनके स्थान पर, यह कार्य निजी ठेकेदारों को दिया गया है। ये निजी ठेकेदार अप्रशिक्षित ठेका मज़दूरों को ट्रैक का रखरखाव करने के लिए, नियमित मज़दूरों के वेतन का एक तिहाई या एक चैथाई वेतन ही देते हैं। बढ़ती हुई रेल दुर्घटनाएं इसका स्पष्ट परिणाम हैं। पटरी से उतरने और उसके परिणामस्वरूप होने वाली मौतों और चोटों की संख्या में पहले से काफी वृद्धि हुई है। निजीकरण से तो रेल यात्रा और अधिक असुरक्षित हो जाएगी।

भारतीय रेल पहले ही विभिन्न गतिविधियों को बाहरी-स्रोतों और निगमीकरण के माध्यम से करवाकर निजीकरण की दिशा में कई क़दम उठा चुका है जो न तो यात्रियों हित में है और न ही रेल मज़दूरों के हित में।

यह दावा करके सरकार हमें विश्वास दिलाना चाहती है कि निजी ऑपरेटर, उपभोक्ता सेवाओं में सुधार के लिए आवश्यक पूंजी लगाएंगे जिससे कि हम भारतीय रेल के निजीकरण का समर्थन करें। हम इतने मूर्ख नहीं हैं कि यह विश्वास कर लें कि निजी कंपनियां, जिनका एकमात्र लक्ष्य किसी भी क़ीमत पर अधिकतम लाभ अर्जित करना है, यात्री आराम और सुरक्षा में सुधार के लिए पुराने बुनियादी ढांचे को नवीनीकृत करने में पैसा खर्च करेंगी? अर्जेंटीना का अनुभव हमें यही सिखाता है।

इसलिए, प्रिय रेल यात्रियों, हमें भारतीय रेल के निजीकरण के लिए झूठे वादों और इसके औचित्य को सही ठहराने के तर्क से मूर्ख नहीं बनना चाहिए। हमें निजीकरण की दिशा में किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रयास का विरोध करना है और इसको वापस करने की मांग करनी है। आइए हम सब उन लाखों रेल मज़दूरों को अपना समर्थन भी दें जो पहले से ही भारतीय रेल के निजीकरण की दिशा में 100 दिन की कार्य योजना का विरोध कर रहे हैं! 

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