उदारीकरण और निजीकरण के समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को हराने के लिए एकजुट हों! एक पर हमला सब पर हमला!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 12 सितम्बर, 2019

साथियों,

केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों की फेडरेशनों ने 30 सितम्बर, 2019 को नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय मज़दूर अधिवेशन करने का आह्वान किया है। यह संसद मार्ग पर होगा और इसका मकसद है मज़दूर वर्ग के आगे के कार्यक्रम को तय करना।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में मज़दूर वर्ग के सभी संगठनों से आह्वान करती है कि इस अधिवेशन में सक्रियता से भाग लें और मज़दूर वर्ग के आगे के कार्यक्रम को तय करने में अपना योगदान दें।

यह अधिवेशन ऐसे समय पर होने जा रहा है जब हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था घोर संकट में डूबती जा रही है। घटती बिक्री और न बिकी वस्तुओं के बढ़ते भण्डार के चलते, पूंजीपति वर्ग उत्पादन में कटौती कर रहा है और मज़दूरों की छंटनी कर रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों - मोटर वाहन व पुर्जों, निर्माण, वस्त्र-निर्यात, चमड़ा निर्यात, टेलिकॉम और आई.टी. क्षेत्रों में लाखों-लाखों मज़दूरों की नौकरियां चली गयी हैं। वैश्विक इजारेदार कंपनियों के वर्चस्व में ऑनलाइन खुदरा व्यापर के बहुत बढ़ जाने से, लाखों-लाखों छोटे व्यापारी और दुकानदार तबाह हो रहे हैं और बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय, बेरोजगारी बीते 45 सालों में सबसे ज्यादा है।

टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था के संकट के बावजूद, अपने मुनाफों को बढ़ाने और अपनी दौलत का तेज़ी से विस्तार करने के लिए, बेतहाशा नए-नए रास्ते तलाश रहे हैं। वे इसके लिए अर्थव्यवस्था का फौजीकरण करने, हिन्दोस्तान-अमरीका गठबंधन को और मज़बूत करके ज्यादा हमलावर तरीके से विदेशी बाजारों पर कब्ज़ा करने की योजनायें बना रहे हैं। वे अपने मुनाफों की वृद्धि के लिए, विदेशी पूंजी के प्रवेश के नए-नए द्वार खोलने, मज़दूरों के शोषण, किसानों की लूट तथा प्राकृतिक संसाधनों की लूट को खूब बढ़ाने की योजनायें बना रहे हैं।

हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों ने अपने बेशुमार धनबल, आधुनिक प्रौद्योगिकी, टी.वी., सोशल मीडिया और तरह-तरह की चालों के ज़रिये, 2019 के लोक सभा चुनावों में भाजपा को सम्पूर्ण बहुमत के साथ जिताया है। वे उदारीकरण और निजीकरण के जरिये भूमंडलीकरण के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को ज्यादा तेज़ गति से लागू करने के लिए इस सरकार पर भरोसा कर रहे हैं।

सरकार ने देश के मज़दूरों के यूनियनों की मांग को ख़ारिज़ कर दिया कि वेतन कम से कम प्रति माह 18,000 रुपए होना चाहिये, कि हर 6 महीने बाद महंगाई के अनुसार इसमें वृद्धि होनी चाहिए। इसके बजाय, सरकार ने वेतन संहिता विधेयक (वेज कोड बिल) को पास किया है, जिसमें यह साफ निर्धारित नहीं किया गया है कि राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन क्या होगा। महंगाई के साथ वेतन वृद्धि के सर्वव्यापक अधिकार को मंजूर नहीं किया गया है।

सर्वव्यापी सामाजिक सुरक्षा की मज़दूरों की मांग को ठुकराया गया है। कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतों पर संहिता विधेयक को संसद में पेश किया गया है, जिसके दायरे से मज़दूर वर्ग के बहुत बड़े हिस्से को बाहर रखा गया है। सरकार औद्योगिक संबंधों और सामाजिक सुरक्षा पर संहिता को भी लागू करने की कोशिश कर रही है। इन कानूनों के जरिये, देशी-विदेशी पूंजीपतियों की “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” को और बेहतर करने की मांग को पूरा किया जा रहा है।

मज़दूरों के ट्रेड यूनियनों में संगठित होने के अधिकार पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं। मज़दूरों को अस्थायी ठेकों पर रखना और कभी भी निकाल देना, यह पहले से और ज्यादा आसान बना दिया जायेगा। और भी बहुत सारी फैक्ट्रियों और कंपनियों को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया जायेगा। पूंजीपतियों को खुद ही अपने आप को श्रम कानूनों के पालन का प्रमाण पत्र देने की इजाजत दी जायेगी।

सरकार ने घोषणा की है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश और बिक्री के जरिये, एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा धन जुटाया जायेगा। इसके लिए जिन कंपनियों को लक्ष्य बनाया गया है, उनमें कई मुनाफेदार सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियाँ शामिल हैं, जैसे कि इंडियन आयल कारपोरेशन, एन.टी.पी.सी., पॉवर ग्रिड, आयल इंडिया, जी.ए.आई.एल., नेशनल एल्युमीनियम कंपनी, बी.पी.सी.एल., ई.आई.एल., भारत अर्थ मूवर्स, इत्यादि। डीज़ल और बिजली के रेल इंजन व कोच बनाने वाले रेलवे कार्यालयों को निजी कंपनियों के हाथों बेच दिया जायेगा। सरकार ने अपना प्रस्ताव घोषित किया है कि एयर इंडिया को पहले से ज्यादा आकर्षक शर्तों पर किसी निजी कंपनी को बेचा जायेगा।

अर्थव्यवस्था के नए-नए क्षेत्रों को विदेशी पूंजीनिवेश के लिए खोल दिया जा रहा है। रक्षा अस्त्र निर्माण और कोयला खनन में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश की इजाज़त दी जायेगी। खुदरा व्यापर में विदेशी कंपनियों पर पहले जो पाबंदी थी, कि उन्हें अपने उत्पादों के 30 प्रतिशत को देश के अन्दर से होना होता था, उसे अब हटा दिया गया है। उच्च शिक्षा में और निजीकरण किया जा रहा है और देशी-विदेशी पूंजीपतियों के अधिक से अधिक मुनाफ़ों के लिए उसे खोल दिया जा रहा है।

मज़दूर वर्ग और किसानों को लूटकर पूंजीपतियों के मुनाफों को बढ़ाने के इन आर्थिक कदमों के साथ-साथ, सब-तरफा राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक उत्पीड़न भी फैलाया जा रहा है।

साथियों,

बीते दशक में अधिकतम मज़दूरों के असली वेतन गिरते रहे हैं। अधिकतम किसानों की असली आमदनी भी गिरती रही है। पूंजीवादी उद्योग में उत्पादित सामग्रियों को खरीदने के लिए मज़दूरों और किसानों के पास पैसे नहीं हैं। यही हमारे देश में आर्थिक संकट का मूल कारण है। दुनिया की अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संकट की वजह से हालतें और भी गंभीर हो गयी हैं। हिन्दोस्तान के निर्यातों की गति बहुत कम हो गयी है। कांग्रेस और भाजपा की अगुवाई में जो-जो सरकारें आती रही हैं, वे सब इसी झूठ को दोहराती रही हैं कि जो पूंजीपति वर्ग के हित में है, वही पूरे समाज के हित में है।

हिन्दोस्तान को विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ और ज्यादा जोड़ दिया गया है। टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे बड़े इजारेदार पूंजीपति आज पूंजी के प्रमुख निर्यातक बन गए हैं। हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपति दुनिया में विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के साथ स्पर्धा कर रहे हैं। वे विदेशी पूंजीपतियों के साथ मिलकर, हमारे मज़दूरों का शोषण कर रहे हैं, किसानों को लूट रहे हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों को भी लूट रहे हैं।

हुक्मरान पूंजीपति वर्ग अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ मिलकर, “इस्लामी आतंकवाद” से लड़ने के नाम पर, देश को बड़ी तेज़ी से फौजीकरण और नाजायज़ कब्ज़ाकारी जंग के रास्ते पर खींच ले जा रहा है। 2024 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था हासिल करने का बहु-प्रचारित लक्ष्य इस बात का ऐलान है कि आर्थिक नीति देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में ही रहेगी।

साथियों,

हिन्दोस्तानी समाज को इस संकट से बाहर निकालने के लिए, अर्थव्यवस्था की इस दिशा को बदलने की जरूरत है। सामाजिक उत्पादन का लक्ष्य पूरी आबादी की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना होना चाहिए, न कि अधिकतम निजी मुनाफों की पूंजीपतियों की लालच को। सामाजिक उत्पादन को इस तरह आयोजित करना होगा ताकि काम करने में सक्षम सभी लोगों को रोज़गार प्राप्त हो और मेहनतकशों की असली आमदनियों में क्रमशः वृद्धि होती रहे।

अर्थव्यवस्था की दिशा को इस मानव-केन्द्रित दिशा में कौन बदलेगा? इस परिवर्तन को कामयाब करने के लिए मज़दूर वर्ग को किसानों व दूसरे मेहनतकशों को अगुवाई देनी होगी।

राष्ट्रीय मज़दूर अधिवेशन को यह चुनौती उठानी होगी।

सबसे पहले, हमें उदारीकरण और निजीकरण के समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को पूरा-पूरा खारिज़ करना होगा। उस कार्यक्रम को हराने के लिए, हमें ज्यादा से ज्यादा मज़दूरों की एकता बनानी होगी।

परन्तु हमारा लक्ष्य यहीं तक सीमित नहीं हो सकता है। बीते 30 वर्षों से मज़दूर वर्ग उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम के खिलाफ़ संघर्ष कर रहा है, परन्तु हम यह समझे कि हम उसे तब तक हरा नहीं सकते जब तक हम मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों के सामने बहादुरी से यह न स्थापित कर सकें कि उसका एक विकल्प है।

वह विकल्प है मज़दूर वर्ग का अपना स्वतंत्र कार्यक्रम - जिसका उद्देश्य है मेहनतकश बहुसंख्या को सत्ता में लाना और अर्थव्यवस्था को नयी दिशा देना, ताकि सब की रोजी-रोटी और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

हमें फैक्ट्रियों, औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी इलाकों में मज़दूरों के बीच में इस पर चर्चा चलानी होगी, ताकि इस कार्यक्रम का और विस्तार किया जा सके। इस काम के दौरान, हमें इस वैकल्पिक कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकशों की एकता बनानी और मजबूत करनी होगी।

हमें मज़दूरों की संगठनात्मक एकता को बनाना और मजबूत करना होगा। सरमायदारों ने हमेशा ही हम मज़दूरों को तरह-तरह से बांटने की कोशिश की है। इस तरह, सरमायदार अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों पर, एक-एक करके हमले करते हैं। इसी तरह से उन्होंने अपने समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को इतने सालों तक लागू किया है। अब इस स्थिति को बदलने का समय आ गया है।

एक पर हमला, सब पर हमला!” - यह हम मज़दूरों का नारा है।

चाहे किसी भी क्षेत्र के मज़दूरों पर इस समय हमला हो रहा हो, हम सबको उनकी हिफ़ाज़त में आगे आना चाहिए।

हमें फैक्ट्रियों, औद्योगिक क्षेत्रों और सभी कार्यस्थलों पर मज़दूर एकता कमेटियों को बनाना और मजबूत करना होगा। इन एकता कमेटियों को हुक्मरान वर्ग द्वारा निशाना बनाये गए मज़दूरों का समर्थन करना चाहिए।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सर्व हिन्द मज़दूर अधिवेशन के सभी सहभागियों से आह्वान करती है कि अपने-अपने ट्रेड यूनियनों, फेडरेशनों, कार्यस्थलों और सभी क्षेत्रों के मज़दूरों के बीच, मज़दूर वर्ग के अपने स्वतंत्र कार्यक्रम का विस्तार करने का काम उठाएं।

सरमायदारों ने बहुत समय तक समाज का कार्यक्रम निर्धारित किया है। अब मज़दूर वर्ग को समाज का कार्यक्रम निर्धारित करना होगा। इसके लिए हमें अपना वैकल्पिक कार्यक्रम विकसित करना होगा और जनसमुदाय को हमारे कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट करना होगा।

मज़दूरों के संघर्ष तेज होते जा रहे हैं

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मज़दूरों के विरोध संघर्ष दिन-ब-दिन और तेज होते जा रहे हैं। मज़दूर निजीकरण कार्यक्रम और अपनी रोजी-रोटी व अधिकारों पर हमलों का विरोध कर रहे हैं।

रेलवे : देश भर में रेल मज़दूर भारतीय रेल के निजीकरण और निगमीकरण के लिए सरकार की “100 दिन कार्य योजना” के खिलाफ़ अपनी आवाज उठा रहे हैं। डीजल और बिजली लोको निर्माण कारखानों में और कोच निर्माण कारखानो में मज़दूरों ने सरकार से यह मांग की है कि इन कारखानों को देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को सौंपने के फैसले को फौरन वापस लिया जाए। कामगार एकता कमेटी, ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन, आल इंडिया गार्ड्स काउन्सिल, आल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन, आल इंडिया ट्रैक्स मेन्टेनर्स एसोसिएशन और भारतीय रेल के अन्य मज़दूर यूनियनों ने रेल सवारियों के संगठनों के साथ मिलकर, रेल निजीकरण कार्यक्रम के खिलाफ कई विरोध कार्यक्रम आयोजित किये हैं।

रक्षा क्षेत्र : सरकार ने आर्डिनेंस (युद्ध सामग्री बनाने वाली) फैक्ट्रियों का निगमीकरण करनी की घोषणा की है। भारतीय सेना के लिए युद्ध सामग्री बनाने वाली 41 सरकारी आर्डिनेंस फैक्ट्रियों के 82,000 से अधिक मज़दूरों ने 20 अगस्त को इस फैसले के विरोध में हड़ताल की। मज़दूरों न समझाया कि रणनैतिक महत्त्व वाले रक्षा क्षेत्र को हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को सौंपने का पहला कदम यह निगमीकरण है। मज़दूरों ने मांग की कि सरकार इस फैसले को फौरन वापस ले। मज़दूरों के विरोध को देखते हुए, सरकार ने आर्डिनेंस फैक्ट्रियों का निगमीकरण करने के फैसले को कुछ समय के लिए रोक दिया है और मामले की जांच करने के लिए एक कमेटी बिठाई है। इसके बाद आर्डिनेंस फैक्ट्री मज़दूरों ने अपनी हड़ताल वापस ले ली।

बैंकों का विलयन : सरकार ने घोषणा की कि 10 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलयन करके 4 बड़े बैंक बनाये जायेंगे। बैंक मज़दूरों ने इसका व्यापक विरोध किया। 10 लाख बैंक कर्मियों का प्रतिनिधित्व करने वाले यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक वर्कर्स ने इन हड़तालों को अगुवाई दी है। बैंक कर्मियों ने समझाया है कि बैंकों के विलयन का मकसद है कई शाखाओं को बंद करके तथा मज़दूरों को निकालकर, शोषण को खूब बढ़ाना। इससे पहले भी, जब-जब बैंकों का विलयन हुआ है, तब-तब खर्च कटौती के नाम पर, अनेक शाखाओं, खास कर गाँवों की शाखाओं को बंद कर दिया गया है। भारतीय स्टेट बैंक के साथ पांच अन्य बैंकों के विलयन की वजह से, 1000 बैंक शाखाएं बंद हो गयीं।

बैंक कर्मियों ने समझाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की समस्याओं की वजह बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा कर्ज़े न चुकाए जाना है। जो भी सरकार आयी है, उसने इसमें कॉर्पोरेट घरानों की मदद की है। बैंक कर्मियों ने मांग की है कि सरकार को कर्ज़दारों से बकाया पैसा वसूलना चाहिए। लेकिन सरकार इसके बजाय, दिवालिया कोड प्रक्रिया के ज़रिये, इन कर्ज़े न चुकाने वाले कॉर्पोरेट घरानों के कर्ज़ों को माफ कर रही है और उनके द्वारा बैंकों की इस लूट को वैधता दे रही है।

मोटर वाहन क्षेत्र : तमिलनाडु के श्री पेरेम्बुदूर क्षेत्र, हरियाणा के गुडगांव-मानेसर क्षेत्र और देश के अन्य मोटर वाहन उद्योग केन्द्रों में मज़दूर अपनी पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार की हिफाज़त में, बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं। वे ठेकेदारी प्रथा का विरोध कर रहे हैं और पूंजीपतियों द्वारा इन दिनों इस क्षेत्र में की जा रही बड़े पैमाने पर छंटनी का विरोध कर रहे हैं।

एयर इंडिया : भूतपूर्व सरकार को एयर इंडिया के लिए कोई खरीदार नहीं मिला था, इसलिए नयी सरकार ने बिक्री की शर्तों को किसी संभावित खरीदने की इच्छुक कंपनी के लिए और आकर्षक बना दिया है। जब कि पहले सरकार का प्रस्ताव था कि 24 प्रतिशत शेयर अपने पास रखेगी, तो अब सरकार ने घोषणा की है कि एयर इंडिया को निजी खरीदार को पूरा-पूरा सौंप दिया जायेगा। सरकार ने यह भी घोषणा की है कि एयर इंडिया के बकाया कर्ज़े के 50 प्रतिशत को वह खुद चुकाएगी, ताकि निजी खरीदार को उसका बोझ न उठाना पड़े।

यह जानी-मानी बात है कि एयर इंडिया का इतना बड़ा कर्ज़ा भूतपूर्व सरकारों की नीतियों की वजह से है। भूतपूर्व सरकारों ने निजी विमान कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए कई कदम उठाकर, एयर इंडिया को दिवालिया बना दिया। खास विदेशी विमान निर्माता कंपनियों के मुनाफों को बढ़ावा देने के उद्देश्य के लिये, एयर इंडिया को बहुत बड़ी संख्या में विमानों को खरीदने को मजबूर किया गया। इस सब के बावजूद, एयर इंडिया बीते कुछ सालों से मुनाफे पर चल रही है। एयर इंडिया के मज़दूरों का कहना है की अगर सरकार उसके कर्ज़ों को माफ कर देती है, जैसा कि वह संभावित निजी खरीदारों के लिए करने का वादा कर रही है, तो एयर इंडिया को एक मुनाफेदार सरकारी कंपनी बतौर चलाया सकता है। मज़दूर यह सवाल कर रहे हैं कि सरकार को अगर कर्ज़े माफ ही करने हैं, तो वह एयर इंडिया को किसी निजी कंपनी को क्यों बेचना चाहती है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण : भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के मज़दूर एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया एम्प्लाइज यूनियन के झंडे तले संगठित होकर, सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहे हैं, जिसके अनुसार 6 हवाई अड्डों - अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, थिरुवनंतपुरम और मंगलौर - को 50 वर्षों के लिए अदानी समूह को सौंपा जायेगा।

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राष्ट्र-विरोधी    Sep 16-30 2019    Statements    Popular Movements     Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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