कर्नाटक के कपड़ा मज़दूर अपने अधिकारों के लिये डटकर खडे़ हुये

कपड़ा मज़दूरों और यूनियनों ने 12 सितंबर को बेंगलुरू में गारमेंट एंड टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन (जी.ए.टी.डब्ल्यू.यू.) द्वारा आयोजित एक लड़ाकू विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

Garment workers demonstrating in Bengaluru

2 अगस्त, 2019 के दिन राज्य सभा में वेतन संहिता-2019 को पास करके अधिनियम बनाया गया। इस संहिता में 4 मौजूदा कानूनों को सम्मिलित किया गया है, जिनमें न्यूनतम वेतन अधिनियम (1948) शामिल था। संहिता और उससे पूर्व अधिनियम के अनुसार, पांच साल की अवधि में हर बार न्यूनतम वेतन की दर में संशोधन किया जाना चाहिए। 2014 में, कर्नाटक में पिछला संशोधन हुआ, जिसमें इसे 8,000 रुपये प्रति माह तय किया गया। फरवरी 2018 में सरकार ने 3 अंतिम अधिसूचनाएं और 1 ड्राफ्ट अधिसूचना को जारी करते हुए न्यूनतम वेतन को 11,580 रुपये प्रति माह घोषित किया। लेकिन जब गारमेंट कंपनियों के प्रबंधकों ने सरकार से संपर्क किया तब इन अधिसूचनाओं को वापस ले लिया गया।

बेंगलुरु में मज़दूर यूनियनों ने उच्च न्यायालय में सरकार के ख़िलाफ़ रिट याचिका दर्ज़ की है। न्यायालय के फैसले में यह निष्कर्ष दिया गया कि सरकार को अधिसूचनाओं को वापस लेने का हक़ है लेकिन सरकार को संशोधित अधिसूचनाओं को 6 महीनों के अंदर जारी करना चाहिए।

इस दौरान, बताया गया है कि 5 सितम्बर को त्रिपक्षीय समिति जिसे सरकार ने न्यूनतम वेतन की सिफारिश देने के लिए अधिकृत किया गया है, की सबसे पिछली बैठक में सरकार और मालिकों के प्रतिनिधियों को यूनियन के प्रतिनिधियों से ज्यादा वोट मिले। जिसमें 8,880 रुपयों के न्यूनतम वेतन की सिफारिश की जो कि 5 साल बाद सिर्फ 9 प्रतिशत संशोधन को दिखाता है। यूनियनों ने इस पहल का जो कि पिछड़ेपन की ओर जाता है का खंडन किया और यह स्पष्ट तरीके से बताया कि सरकार खुलकर मज़दूर-विरोधी और पूंजीवाद के समर्थन का पक्ष ले रही है।

कपड़ा क्षेत्र की बिक्री में 10-15 प्रतिशत की गिरावट हुई है और पिछले छह महीनों के अंदर 20 से अधिक कारखाने बंद हो गए हैं। पहले से ही, कई मध्यम और छोटी इकाइयां हर महीने 2-3 दिन के लिए अपने कारखाने बंद कर रही हैं। जैसे-जैसे निर्यात में गिरावट के साथ हालात बिगड़ते जा रहे हैं, मज़दूरों का वेतन कम हो रहा है और कई मज़दूर अपना रोज़गार खो रहे हैं। पूंजीपति वर्ग यह ढोल पीट रहा है कि वस्त्र और कपड़ा निर्यात में वेतन को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों के मुकाबले “प्रतिस्पर्धी” रखना पड़ता है, जिसका अर्थ है कि वेतन न्यूनतम वेतन से भी नीचे रखा जाना चाहिए।

जी.ए.टी.डब्ल्यू.यू. और मज़दूरों ने दिखा दिया है कि यह अस्वीकार्य है। मज़दूरों के रोज़गार और न्यूनतम वेतन के अधिकारों को सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है।

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कपड़ा मज़दूर    Oct 1-15 2019    Struggle for Rights    Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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