दक्षिण अफ्रीका की बैंक हड़ताल को गैरकानूनी घोषित किया गया

जब दक्षिण अफ्रीका के वित्तीय क्षेत्र को बड़ी हड़ताल का सामना करना पड़ा तब वित्तीय पूंजीपतियों ने अदालत के सहारे इस हड़ताल को विफल कर दिया। मालिकों के संगठन, बिज़नेस यूनिटी साउथ अफ्रीका (बी.यू.एस.ए.) ने 27 सितम्बर की हड़ताल के दो दिन पहले श्रम अदालत में मामला दाखिल किया और अदालत से अतिशीघ्र फैसला चाहा कि हड़ताल को गैर-कानूनी घोषित किया जाये।

दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी यूनियन सास्बो (जो पहले साउथ अफ्रीकन सोसायटी ऑफ बैंक ऑफिशियल्स थी) एक बहुत बड़ी हड़ताल की तैयारी कर रही थी जिससे देश का बैंकिंग उद्योग अस्त-व्यस्त होने वाला था। यूनियन अपने 73,000 सदस्यों को 27 सितम्बर की हड़ताल के लिये लामबंध करने में अगुवाई दे रही थी, जो शताब्दी की सबसे बड़ी औद्योगिक कार्यवाई होने वाली थी। देश के बड़े शहरों में - जोहानेसबर्ग, डर्बन, ब्लोएम्फोंटेन, पोर्ट एलिज़ाबेथ व केप टाउन में बड़े जुलूस प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे थे।

बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी से निकालने की योजना की वजह से हड़ताल की जा रही थी। जैसे-जैसे कम्प्यूटर प्रणाली ने परंपरागत बैंकिंग की जगह ली, वैसे-वैसे उपभोक्ताओं को बैंक जाने की जगह इंटरनेट व मोबाइल फोन के ज़रिये बैंकिंग करने के लिये प्रोत्साहित किया गया, दक्षिण अफ्रीका के बैंकों ने हजारों को नौकरी से निकाल दिया था और बहुत सी शाखाओं को बंद कर दिया था। देश के चार बड़े बैंकों ने पहले ही कुछ शाखाओं को बंद करके और बैंकिंग सेवाओं को नयी दिशा के लिये दूसरे बैंकों से विलयन करके, कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी थी। स्टैंडर्ड बैंक ने अपनी 104 शाखाएं बंद कर दी थीं जिससे 1000 से भी अधिक नौकरियां प्रभावित हुईं। नेडबैंक, एफ.एन.बी. और अब्सा ने भी अपनी शाखाओं में कटौतियां की थी। अब्सा की 2011 में 885 शाखाएं थीं जो इस साल की पहली तिमाही में घट कर 698 रह गयी थीं।

सास्बो चाहती है कि नौकरी से निकालने की बजाये बैंक दूसरे तरीकों को चुनें और उन कर्मचारियों को पुनः दक्षता दें जिनकी नौकरी ख़तरे में है।

इस बीच, कुछ तकनीकी बिंदुओं को लेकर, वित्त पूंजीपतियों ने अदालत द्वारा हड़ताल को गैरकानूनी करार करवा दिया। हमेशा की तरह कारोबार के नेता बात करते हैं कि “बैंक मज़दूरों को हड़ताल करने का अधिकार है,” परन्तु उन्होंने चेतावनी दी है कि इस कार्यवाई से बैंकिंग क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं का सामना नहीं किया जा सकता है और यह भी चेतावनी दी है कि इससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा और निवेश कम होंगे। इसी तर्क का इस्तेमाल करके दुनियाभर के पूंजीपति मज़दूरों की हड़तालों को बदनाम करना चाहते हैं।

जोहानेसबर्ग की श्रम अदालत द्वारा 26 सितम्बर की हड़ताल को गैरकानूनी घोषित करवाकर बैंकिंग उद्योग के मालिक हड़ताल को विफल करने में सफल हुए। अब इसका मतलब है कि अगर यूनियन और मज़दूर हड़ताल करते हैं तो उनकी कार्यवाई गैरकानूनी मानी जायेगी और उन्हें अपने खि़लाफ़ की जाने वाली कार्यवाईयों को भुगतना पड़ेगा। सास्बो अदालत के फैसले पर अपील करने की तैयारी कर रही है और अपने अगले क़दम की योजना बना रही है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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